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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 322

( २९६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
मर्कट्यतिबला चैव जातीकोषफले तथा ।
लवङ्गं विजयाबीजं श्वेतस्वर्जरसं तथा ॥ ७४ ॥
शाणभागं समादाय चैकीकृत्य प्रयत्नतः ।
मधुना मर्दयेत्तावद्यावदेकत्वमागतम् ॥ ७५ ॥
चतुर्गुञ्जाप्रमाणेन वटिकां कुरु यत्नतः ।
भक्षयेद्वटिकामेकां पिप्पल्या मधुना सह ॥ ७६ ॥
पारा १ कर्ष, गन्धक १ कर्ष, अभ्रकभस्म आधा पल, कपूर ४
मासे, सोनाभस्म १ तोला परिमाण लेवे, तांबाभस्म १ तोला, लोहेकी
भस्म १ तोला तथा विधारेके बीज, जीरा, विदारीकंद, शतावर, ताल-
मखाना, खिरेंटी, कौंचके बीज, कंघी, जायफल, जावित्री, लौंग, भांगके
बीज और सफेद राल यह प्रत्येक औषधि चार चार मासे लेवे । इन
सबको एकत्र पीसकर सहतमें खूब खरल करे, फिर चार चार रत्तीकी
गोली बनाकर पीपलके चूर्ण और सहतके साथ सेवन करावे । इससे
क्षयरोग नष्ट होता है ॥ ७१–७६ ॥
महामृगांक ।
निरुत्थभस्म सौवर्णं द्विगुणं भस्म सूतकम् ।
त्रिगुणं भस्म मुक्तोत्थं शुकपुच्छं चतुर्गुणम् ॥७७॥
मृतताप्यञ्च पञ्चांशं तारभस्म चतुर्गुणम् ।
सप्तभागं प्रवालञ्च रसतुल्यञ्च टंकणम् ॥ ७८ ॥
सर्वमेकत्र संमर्द्य त्रिदिनं लुङ्गवारिणा ।
ततश्च गोलकं कृत्वा शोषयित्वा खरातपे ॥ ७९ ॥
लवणैः पात्रमापूर्य तन्मध्ये गोलकं क्षिपेत् ।
तन्मुखन्तु मृदा रुद्ध्वा पचेद्यामचतुष्टयम् ॥ ८० ॥