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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 584 में से

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पृष्ठ 321

भाषाटीकासहित । ( २९६ )
सोनाभस्म, रससिन्दूर या पारद् भस्म, गन्धक, मोती, शुद्ध पारा,
सुहागा, चांदी भस्म और सोनामाखीभस्म यह प्रत्येक औषधि समान
भाग लेकर कांजीमें पीसकर गोलासा बना लेवे । फिर इस पिंडको
मिट्टीमें लपेटकर धूपमें सुखाकर नमकसे भरी हुई हांडीमें रखकर एक
दिन तक मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब शीतल होजाये तब इसमेंसे
औषधिको निकालकर चूर्ण कर ले । दो रत्ती परिमाण इस औषधिको
कालीमिरचोंके चूर्ण और घृतके साथ सेवन करे तो राजयक्ष्मा रोग
नष्ट होता है । इसको कुमुदे-श्वर रस कहते हैं ॥ ६८ ॥ ६९ ॥
यक्ष्मकेसरी रस ।
त्रिकटुत्रिफलैलाभिर्जातीफललवङ्गकैः ।
नवभागोन्मितैस्तुल्यं लौहपारदसिन्दुरम् ॥
मधुना क्षयरोगाँश्च हन्त्ययं यक्ष्मकेसरी ॥ ७० ॥
हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, इलायची, जायफल
और लौंग यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, लोहभस्म ९ भाग,
रससिन्दूर नव भाग और स्वर्णसिन्दूर ९ भाग लेवे, इन सब औषधि-
योंको एकत्र पीसकर सहतमें मिलाकर सेवन करे तो क्षयरोग नष्ट
होता है । इसको यक्ष्मकेसरी रस कहते हैं ॥ ७० ॥
बृहच्चन्द्रामृत रस ।
रसगन्धकयोर्ग्राह्यं कर्षमेकं सुशोधितम् ।
अभ्रं निश्चन्द्रकं दद्यात्पलार्द्धञ्च विचक्षणः ॥ ७१ ॥
कर्पूरं शाणकं दद्यात्स्वर्णं तोलकसंमितम् ।
ताम्रञ्च तोलकं दद्याद्विशुद्धं मारितं भिषक् ॥ ७२॥
लौहं कर्षं क्षिपेत्तत्र वृद्धदारकजीरकम् ।
विदारी शतमूली च क्षुरकञ्च बला तथा ॥ ७३ ॥