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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 295, कुल 584 में से

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पृष्ठ 295

भाषाटीकासहित । (२६९)
त्रैलोक्यसुन्दर रस ।
मानश्चैकं चतुःसूतं षडभ्रं वसुलौहकम् ।
गन्धकं त्रिफलाव्योषं चूर्णं मोचरसस्य च ॥ २३ ॥
मुसली चामृतासत्त्वं प्रत्येकं पञ्चभागिकम् ।
भावयेत्सर्वमेकत्र त्रिफलानां कषायके ॥ २४ ॥
भावना विंशतिर्देया दशरात्रं सुभावना ।
शिग्रुचित्रकमूलाभ्यामष्टधा च पृथक् पृथक् ॥ २५ ॥
त्रैलोक्यसुन्दरो नाम रसो निष्कमितो हितः ।
सितया च समं क्षौद्रैः शोथपाण्डुक्षयापहः ॥
ज्वरातिसारसंयुक्तसर्वोपद्रवनाशनः ॥ २६ ॥
मानकन्द १ भाग, पारा ४ भाग, अभ्रक भस्म ६ भाग, लोहेकी
भस्म ८ भाग, गंधक, त्रिफला, त्रिकुटा, मोचरस, मुसली और गिलो-
यका सत्त्व यह प्रत्येक पांच पांच भाग लेवे, सबको एकत्र पीसकर
दश दिनतक त्रिफलेके क्वाथकी बीस भावना देवे । पश्चात् सहंजिनेके
रसमें आठ भावना देवे और चित्रककी जड़के रसमें आठ भावना देवे ।
इसमेंसे नित्य चार मासे औषधि मिश्री और शहदमें मिलाकर सेवन
करनेसे सूजन, पांडु, क्षयरोग और सर्वोपद्रवसंयुक्त ज्वरातिसार नष्ट
होते हैं । इसको त्रैलोक्यसुन्दररस कहते हैं ॥ २३-२६॥
दार्वादि लोह ।
दार्वीसत्रिफलाव्योषविडङ्गान्ययसो रजः ।
मधुसर्पिर्युतं लिह्यात्कामलापाण्डुरोगवान् ॥ २७ ॥
दारुहल्दीकी छाल, त्रिफला, त्रिकुटा और वायविडंग यह प्रत्येक
औषधि एक एक भाग लेवे और सबकी बराबर लोहभस्मका चूर्ण
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