रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
दुर्नाममरुचिश्चैव मन्दाग्निश्च विसूचिकाम् ।
शोथं शूलं ज्वरं हिक्कां श्वासं कासं विनाशयेत् ॥ २८॥
इति रसेन्द्रसारसंग्रहे क्रिमिचिकित्सा ।
पारा, गंधक, कालीमिरच, जायफल, लौंग, पीपल, हरिताल, साँठ
और सुहागा ये प्रत्येक औषधि एक एक भाग और लोह सबकी बरा-
बर लेवे, सबको एकत्र पीसकर चूर्ण कर ले और सब चूर्णकी बराबर
वायविडंगका चूर्ण मिलावे । इसको जलमें पीसकर यथोचित मात्रानु-
सार यथायोग्य अनुपानके साथ सेवन करे तो कोष्ठगत क्रिमि, बवा-
सीर, अरुचि, मंदाग्नि, विसूचिका, शोथ, शूल, ज्वर, हिक्का, श्वास
और कास यह समस्त रोग नष्ट होते हैं ॥ २६–२८ ॥
इति क्रिमिरोग चिकित्सा ।
अथ पाण्डुरोगचिकित्सा ।
निशालोह ।
लोहचूर्णं निशायुग्मं त्रिफलारोहिणीयुतम् ।
प्रलिह्यान्मधुसर्पिर्भ्यां कामलापाण्डुशान्तये ॥ १ ॥
हलदी, दारुहलदी, हरड़, बहेडा, आमला और कुटकी यह प्रत्येक
औषधि एक एक भाग और सबकी बराबर लोहेकी भस्म लेवे । इस
औषधिके शहद और घीमें मिलाकर सेवन करनेसे पाण्डु और कामला
रोग नष्ट होते हैं । इसको निशालोह कहते हैं ॥ १ ॥
धात्री लोह ।
धात्रीलौहरजोव्योषनिशाक्षौद्राक्षशर्कराः ।
भक्षणाद्विनिहन्त्याशु कामलाञ्च हलीमकम् ॥ २ ॥
आमले, लोहेकी भस्म, त्रिकुटा, हलदी, शहद, बहेड़ा और मिश्री
इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रानुसार सेवन कर-
नेसे कामला और हलीमकरोग दूर होते हैं ॥ २ ॥