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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 289, कुल 584 में से

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पृष्ठ 289

भाषाटीकासहित । ( २६३ )
भुजङ्गा मूषिका दंशाः संघनामा मतङ्गजाः ।
दूरादेव पलायन्ते किं न कीटाश्च ये पराः ॥ २३ ॥
लाख, भिलावे, श्रीवासका गोंद ( गंधबिरोजा ), सुफेद कोइलकी
जड़, अर्जुनके फल, अर्जुनके फूल, वायविडंग और गूगल इन सब
औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र मर्दन करके गोली बना लेवे;
इन गोलियोंके सेवन करनेसे क्रिमिरोग नष्ट होता है । जिस घरमें यह
औषधि स्थित रहती है उस घरमेंसे साँप, चूहे, डांस, मकोड़े आदि जीव
दूर भाग जाते हैं । इसको लाक्षादि वटी कहते हैं ॥ २२ ॥ २३ ॥
क्रिमिहर रस ।
शुद्धसूतमिन्द्रयवमजमोदा मनःशिला ।
पलाशबीजं गन्धश्च देवदाल्या द्रवैर्दिनम् ॥ २४ ॥
संमर्द्य भक्षयेन्नित्यं शालपर्णीरसैः सह ।
सितायुक्तं पिबेच्चानु क्रिमिपातो भवत्यलम्॥ २५ ॥
पारा, इन्द्रजौ, अजमोद, मैनशिल, ढाकके बीज और गंधक इन
सब औषधियोंको समान भाग लेकर देवदाली ( वंदाल ) के रसमें एक
दिन तक खरल करके गोली बना लेवे, शालिपर्णीके रस और मिश्रीके
साथ इन गोलियोंके सेवन करनेसे उदरस्थित सम्पूर्ण क्रिमि नष्ट हो
जाते हैं । इसको क्रिमिहर रस कहते हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥
विडंगलोह ।
रसं गन्धञ्च मरिचं जातीफललवंगकम् ।
कणा तालं शुण्ठि टङ्कं प्रत्येकं भागसम्मितम् ॥ २६ ॥
सर्वचूर्णसमं लौहं विडङ्गं सर्वतुल्यकम् ।
लौहं विडङ्गकं नाम कोष्ठस्थक्रिमिनाशनम् ॥२७॥