रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
जिस प्रकार संस्कारविशेषसे शुद्ध, बद्ध और मृत अर्थात् भस्म किये
गये पारदके यथाविधि सेवनसे शरीरस्थ जरा ( बुढापा ) और व्याधि-
योंका निःशेष ( समूल ) नाश होता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक
जरा व्याधियोंके नाश करनेवाले योगसाधन ( योगगम्य ) जगद्गुरु
शंकर अर्थात् समस्त संसारका कल्याण करनेवाले महादेवको मैं
भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूं ॥ १ ॥
नत्वा गुरुपदद्वन्द्वं दृष्ट्वा तन्त्राण्यनेकंशः ।
श्रिया गोपालकृष्णेन क्रियते रससंग्रहः ॥ २ ॥
अपने गुरुजीके दोनों चरणोंको प्रणाम करके अनेक तन्त्रोंको
देखकर मैं श्रीगोपालकृष्णभट्ट इस रसेन्द्रसारसंग्रह नामक ग्रन्थको
बनाता हूं ॥ २ ॥
सिद्धयोगाश्च ये केचित् कृतिसाध्या भवन्ति हि ।
एकीकृत्य तु ते सर्वे लिख्यन्ते यत्नतो मया ॥ ३ ॥
जो सिद्ध अर्थात् प्रत्यक्ष फल देनेवाले योग मनुष्योंसे बन सकते
हैं या मनुष्य जिन सिद्ध योगोंको बना सकते हैं उनको अनेक तंत्रोसे
यत्नपूर्वक इकट्ठे करके मैं इस ग्रन्थमें लिखता हूं ॥ ३ ॥
रसकी प्रधानता ।
अल्पमात्रोपयोगित्वादरुचेरप्रसङ्गतः ।
क्षिप्रमारोग्यदायित्वादौषधेभ्योऽधिको रसः ॥ ४ ॥
पारदकी बहुत थोड़ी मात्रा ( खुराक ) होती है, और उस अल्प
मात्रासे ही बहुत गुण होजाता है, एवं इसके सेवनमें अरुचिभी नहीं
होती तथा शीघ्रही आरोग्यता ( तंदुरुस्ती ) प्राप्त होती है, इस लिये
सम्पूर्ण औषधिमात्रमें पारद सबसे श्रेष्ठ कहा है ॥ ४ ॥
साध्येषु भेषजं सर्वमीरितं तत्त्ववेदिना ।
असाध्येष्वपि दातव्यो रसोऽतः श्रेष्ठ उच्यते ॥ ५ ॥