रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (२६१)
लौंग, सोंठ, काली मिरच और भुना हुआ सुहागा इन सब औष-
धियोंको समान भाग लेकर चिरचिटे और चित्रकके रसकी सात सात
भावना देकर गोलियां बना लेवे । इस औषधिके भक्षण करनेसे भारी
पदार्थ और देरमें पचनेवाले मांसादि पदार्थ शीघ्र ही पच जाते हैं ।
इसको लवंगादि वटी कहते हैं ॥ ७१ ॥
बृहल्लवंगादि वटी ।
लवङ्गजातीफलधान्यकुष्ठं जीरद्वयं त्र्यूषणत्रैफलञ्च ।
एलात्वचं टंकवराटमुस्तं वचाजमोदाविडसैन्धवञ्च
॥ ७२ ॥ तदर्धकं पारदगन्धमभ्रं लौहञ्च तुल्यं
सुविचूर्ण्य सर्वम् । तन्नागवल्लीदलतोयपिष्टं वल्ल-
प्रमाणां वटिकाञ्च कृत्वा ॥ ७३॥ प्रातर्विदद्यादपि
चोष्णतोयैरियं निहन्याद्ग्रहणीविकारम् । आमानु-
बन्धं सरुजं प्रवाहं ज्वरं तथा श्लेष्मभवं सशूलम्
॥ ७४ ॥ कुष्ठाम्लपित्तं प्रबलं समीरं मन्दानलं
कोष्ठगतञ्च वातम् । वटी लवङ्गाद्यवसुप्रणीता
तथाऽऽमवातं विनिहन्ति शीघ्रम् ॥ ७५ ॥
लौंग, जायफल, धनिया, कूठ, जीरा, काला जीरा, सोंठ, मिरच,
पीपल, हरड़, बहेड़ा, आमला, इलायची, दालचीनी, सुहागा, कौड़ीकी
भस्म, नागरमोथा, वच, अजमोद, विडनमक और सेंधानमक यह
समस्त प्रत्येक औषधि एक एक भाग और पारा, गंधक, अभ्रक-
भस्म, लोहाभस्म यह प्रत्येक औषधि आधा आधा भाग; इन सब
औषधियोंको एकत्र कर पानके रसमें खरलकर तीन तीन रत्तीकी
गोली बना लेवे । इन गोलियोंके प्रातःकाल गरम जलके साथ सेवन कर-
नेसे संग्रहणी रोग, आमसहित पीड़ायुक्त प्रवाहिका, ज्वर, कफजनित