रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २५० ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
शृङ्गीव्योषयमानि चित्रजलदं द्वे जीरके टंकण,-
मेलापत्रलवंगहिंगुकटुकीजातीफलं सैन्धवम् ॥६८॥
एतान्यार्द्रकचित्रदन्तिसुरसावासारसैर्बिल्वजैः, पत्रो-
त्थैरपि सप्तधा सुविमले खल्ले विभाव्यान्यतः ।
खादेद्वल्लमितं तथा च सकलव्याधौ प्रयोज्या बुधै-
र्विद्बन्धे कफजे त्रिदोषजनिते ह्यामानुबन्धेऽपि
च ॥ ६९ ॥ मन्दाग्नौ विषमज्वरे च सकले शूले
त्रिदोषोद्भवे, हन्यात्तानपि भक्तपाकवटिका भूयश्च
सामं जयेत् ॥ ७० ॥
अभ्रक भस्म, पारा, गंधक, सिंग्रफ, तांबा भस्म, हरितालभस्म,
मैनाशिलभस्म, वंगभस्म, त्रिफला, विष और नैपाली मैनशिल यह प्रत्येक
औषधि एक एक भाग, दंती ३ भाग, काकड़ासिंगी, त्रिकुटा,
अजवायन, चित्रक, नागरमोथा, जीरा, कालाजीरा, सुहागा,
इलायची, तेजपात, लौंग, हींग, कुटकी, जायफल और सेंधानमक यह
प्रत्येक औषधि एक एक भाग; इन सब औषधियोंको एकत्र करके
अदरख, चित्रक, दंती, तुलसी, अडूसा और बेलके पत्ते इन प्रत्येकके
रसकी सात सात भावना देवे । इसको सब प्रकारके रोगोंमें तीन रत्ती
परिमाण प्रयुक्त करनी चाहिये । कफजन्य मलरोध, त्रिदोषजनित
आमानुबन्ध, अग्निमांद्य, विषमज्वर और त्रिदोषजनित शूल रोगमें यह
औषधि अतीव हितकारी है । इसको भक्तपाक वटी कहते हैं॥६८-७०॥
लवङ्गादि वटी ।
लवंगशुण्ठीमरिचानि भृष्टसौभाग्यचूर्णानि समानि
कृत्वा । भाव्यान्यपामार्गहुताशवारा प्रभूत-
मांसादिकजारणाय ॥ ७१ ॥