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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 248

( २२२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
बना लेवे । इसको श्रीमद्गहनानन्दनाथने विशेष विचारपूर्वक निर्माण
किया है ॥ २४-२६ ॥
सूर्यवत्तेजसा चायं रसो नृपतिवल्लभः ।
अष्टादशवटीं खादेत्पवित्रः सूर्यदर्शकः ॥ २७ ॥
हन्ति मन्दानलं सर्वमामदोषं विषूचिकाम् ।
प्लीहगुल्मोदराष्ठीलायकृत्पाण्डुत्वकामलाम् ॥ २८ ॥
सर्वानेव गदान् हन्ति चण्डांशुरिव पापहा ।
बलवर्णकरो हृद्य आयुष्यो वीर्यवर्द्धनः ॥ २९ ॥
परं वाजीकरः श्रेष्ठः पटुदो मन्त्रसिद्धिदः ।
अरोगी दीर्घजीवी स्याद्रोगी रोगाद्विमुच्यते॥१३०॥
रसस्यास्य प्रसादेन बुद्धिमाञ्जायते नरः ।
बदरास्थिप्रमाणेण वटिकां कारयेद्भिषक् ॥ ३१ ॥
इस नृपतिवल्लभ रसका प्रताप सूर्यके समान है। इसकी १८ गोली
पवित्र और सूर्यके दर्शन करनेवाला मनुष्य भक्षण करे । यह रस मंदाग्नि,
सब प्रकारका आमदोष, विषूचिका, प्लीहा, गुल्म, उदररोग, अष्ठीला,
यकृत्रोग, पांडुरोग, कामला और सब प्रकारके रोगोंको दूर करता है;
बल और वर्णको बढ़ानेवाला, हृदयको हितकारी, अवस्थाको स्थापन
करनेवाला, वीर्यवर्द्धक, श्रेष्ठ,परम वाजीकरण और चतुरताको देनेवाला
है । इसका नित्य सेवन करनेवाला मनुष्य सदैव निरोगी, बहुत
कालतक जीनेवाला होता है और रोगी मनुष्य रोगसे मुक्त होजाता है ।
इस रसके प्रसादसे मनुष्य बुद्धिमान् हो जाता है । इसकी बेरकी
गुठलीकी बराबर गोली बनानी चाहिये ॥ २७-३१ ॥
राजवल्लभ रस ।
जातीफललवङ्गाब्दत्वगेलाटङ्करामठम् ।
जीरकं तेजपत्रञ्च यमानीविश्वसैन्धवम् ॥ ३२ ॥