रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
इन टिकियोंको दो शरावोंमें बन्दकर कपड़मिट्टी कर सुखा लेवे, इस
सम्पुटको रात्रिके समय गजपुटमें रखकर अग्नि देवे दूसरे दिन शीतल
होनेपर निकालकर पीस ले । इसमेंसे एकमासे प्रमाण खांडमें रखकर
खावे तो सब प्रकारके ज्वर दूर होते हैं ॥ ८८ ॥ ८९ ॥
ज्वरांकुश रस ।
ताम्रतो द्विगुणं तालं मर्दयेत्सुषरीद्रवैः ।
प्रपुटेद्भूधरे शीते वज्रीक्षीरैर्विमर्दयेत् ॥ २९० ॥
प्रपुटेद्भूधरे पश्चात्पञ्चगुञ्जामितं शुभम् ।
आर्द्रकस्य रसेनैव सर्वज्वरनिकृन्तनः ॥ ९१ ॥
ऐकाहिकं द्व्याहिकञ्च त्र्याहिकञ्चातुराहिकम् ।
विषमञ्चापि शीताढ्य ज्वरं हन्ति ज्वरांकुशः ॥९२॥
तांबा भस्म १ भाग, हरिताल भस्म २ भाग इन दोनोंको एकत्र
करेलेके रसमें पीसकर भूधरयन्त्रमें पकावे । शीतल होनेपर
थूहरके दूधमें खरल करके फिरसे पुटपाककी रीतिसे पकावे । पांच
रत्ती भर इस औषधिको अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे ऐकाहिक,
द्व्याहिक, त्र्याहिक, चातुर्थिक, विषम और शीताढ्य प्रभृति सब प्रकारका
ज्वर नष्ट होता है । इसको ज्वरांकुश रस कहते हैं ॥ २९०-२९२ ॥
मेघनाद रस ।
अभ्रं कांस्यं मृतं ताम्र त्रिभिस्तुल्यञ्च गन्धकम् ।
रसेन मेघनादस्य पिष्ट्वा बद्ध्वा पुटे पचेत् ॥ ९३ ॥
भक्षयेत्पर्णखण्डेन विषमज्वरनाशनम् ।
अस्य मात्रा द्विगुञ्जा स्यात्पथ्यं दुग्धौदनं हितम्९४॥
अभ्रक भस्म, काँसा भस्म और तांबा भस्म यह प्रत्येक एक एक
भाग और गंधक ३ भाग इन सबको एकत्र चौलाईके रसमें खरल