रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १६५)
अधोमुखीं दृढे भाण्डे तां निरुध्याथ पूरयेत् ।
चुल्ल्यां वालुकंया यन्त्रमग्निं प्रज्वालयेद्दृढम् ॥८६॥
शीते संचूर्ण्य माषोऽस्य नागवल्लीदले स्थितः ।
भक्षितो मरिचैः सार्द्धं समस्तान्विषमज्वरान् ॥
शीतदाहादिकं हन्यात्पथ्यं शाल्योदनं पयः॥८७॥
हरिताल १ भाग, सिंगरफसे निकाला हुआ पारा २ भाग, गन्धक
३ भाग और मनशिल ४ भाग इन सबको ( भांगरेके रसमें ) खरल
कर एक तांबेकी कटोरीमें लेप कर दे; इस लिपी हुई कटोरीको एक
पक्की हांडीमें अधोमुख रख दे जिससे लिपी हुई औषधी बीचमेंही रहे
इस प्रकार रख सन्धि लेप करके इस हांडीको बालूरेतसे भर देवे । इस
यन्त्रको चूल्हेपर चढ़ा नीचे तीव्र अग्नि जलावे बारह पहर अग्नि देकर
फिर शीतल होनेपर यत्नसे बालूरेतको अलग कर उस तांबेकी कटो-
रीके बीचसे रस निकालकर पीस लेवे । इसको एक माष बराबर पानमें
रखकर खावे, ऊपरसे कालीमिरचें चबावे तथा उत्तम शाली चावलोंका
भात और दूध पथ्य सेवन करे तो सब प्रकारके विषमज्वर, शीत-
पूर्वक ज्वर और दाहपूर्वक ज्वर नष्ट होते हैं । इसको शीतभञ्जी रस
कहते हैं ॥ ८५-८७ ॥
चिन्तामणि रस ।
तालकं शुल्वकं चूर्णं शिखिग्रीवं समांशकम् ।
संपिष्य कारयेत्सर्वं चक्रिकासन्निभं शुभम् ॥८८॥
शरावपिहितं रात्रौ पचेद् गजपुटेन तु ।
स्वांगशीतं समुद्धृत्य भक्षयेन्माषमात्रकम् ॥
शर्करासहितं सेव्यं सर्वज्वरहरं परम् ॥ ८९ ॥
हरिताल; शुद्ध तांबेका चूर्ण और शुद्ध नीलाथोथा इन सबको
समभाग लेकर ( घीकुंवारके रसमें ) खरलकर गोल टिकिया बना ले,