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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 142

( ११६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
ज्वरके चढ़नेसे पांचवें अथवा छठे या सातवें दिन खिलाना चाहिये ।
इसके खानेसे उत्तम विरेचन होकर ज्वर नष्ट होजाता है । इसके ऊपर
परवल और मूंगका यूष देना पथ्य है ॥ ४० ॥ ४१ ॥
गदमुरारि रस ।
रसवह्निशिललोहव्योषताम्राणि तुल्यान्यथ सद्रद-
नागं भागमेतत्प्रदिष्टम् । भवति गदमुरारिश्चास्य
गुञ्जाद्वयं वैक्षपयति दिवसेन प्रौढमामज्वराख्यम्॥४२
शुद्ध पारा, गंधक, शुद्ध मनसिल, लोहभस्म, त्रिकुटा, ताम्रभस्म,
सिंगरफ और नागभस्म इन सबको विधिवत् खरल करके दो दो
रत्तीकी गोलियां बनावे । इसके सेवनसे एक दिनमें ही सब प्रकारके
नवीन और पुराने ज्वर नष्ट होते हैं । इस रसको गदमुरारि रस
कहते हैं ॥ ४२ ॥
विद्याधर रस ।
रसो गन्धस्ताम्रं त्रिकटुकटुकीटंकणवरा-
त्रिवृद्दन्तीहेमद्युमणिविषमेतत्सममिदम् ।
समस्तैस्तुल्यं स्याद्विमलजयपालोद्भव रजः
ततः स्नुक्क्षीरेण प्रचुरमृदितं दन्तिसलिलैः ॥४३॥
द्विगुञ्जाऽस्य प्रौढं जयति वटिका साममतुलं
ज्वरं पाण्डुं गुल्मं ग्रहणिगुदकीलोद्भवरुजः ।
मरुच्छूलाजीर्णं प्रबलमथ सामं क्रिमिगदं
विबद्धं प्लीहानं प्रबलमपि विद्याधररसः ॥ ४४ ॥
पारा, गंधक, ताम्रभस्म, त्रिकुटा, कुटकी, सुहागा, त्रिफला,
निशोथ, दंती, धतूरेके बीज, आककी जड़का छिलका और सिंगिया
विष यह सब समान भाग लेवे शुद्ध जमालघोटा सबके बराबर लेवे;
इन सबको एकत्र कर पहिले दन्तीके क्वाथमें खरल करे फिर थोहरके