सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 141, कुल 584 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 141

भाषाटीकासहित । ( ११५ )
तिन्दुकजं समांशम् । संमर्द्य वज्रिपयसा मधुना
द्विगुञ्जस्त्रैलोक्यडुम्बररसोऽभिनवज्वरघ्नः ॥ ३८ ॥
पारा, ताम्रभस्म, गंधक, पीपल, कुटकी, शुद्ध जमालगोटे, हरड़का
छिलका, दक्षिणी निशोथ और कुचला इन सब औषधियोंको समान
भाग लेकर थोहरके दूधमें घोटकर दो दो रत्तीकी गोलियें बनावे;
इसकी एक गोलीको शहदके साथ खानेसे तीक्ष्ण विरेचन होकर नवीन
ज्वर दूर होता है । इसको त्रैलोक्यडुम्बर रस कहते हैं ॥ ३८ ॥
प्रतापमार्तण्ड रस ।
विषहिंगुलजैपालटंकणं क्रमवर्द्धितम् ।
रसः प्रतापमार्त्तण्डः सद्योज्वरविनाशनः ॥ ३९ ॥
तेलिया विष १ भाग, सिंगरफ २ भाग, शुद्ध जमालगोटे ३ भाग,
सुहागा ४ भाग इन सबको खरल कर जलके योगसे एक एक रत्तीकी
गोली बनावे; यह प्रतापमार्तण्ड रस सब प्रकारके नवीन ज्वरोंको नष्ट
करता है ॥ ३९ ॥
तरुणज्वरारि रस ।
जैपालगन्धं विषपारदञ्च तुल्यं कुमारीस्वरसेन
पिष्टम् । अस्य द्विगुञ्जा हि सितोदकेन ख्यातो
रसोऽयं तरुणज्वरारिः ॥ ४० ॥ दातव्य एषोऽहनि
पञ्चमे वा षष्ठेऽथवा सप्तम एव वापि । जाते विरेके
विजितो ज्वरः स्यात्पटोलमुद्गाम्बुनिषेवणेन ॥ ४१ ॥
शुद्ध जमालगोटे, गंधक, विष और पारा इन सबको सम भाग
लेकर घीकुमारके रसमें खरल करके दो दो रत्तीकी गोलियें बनावे;
इसको तरुणज्वरारि रस कहते हैं । इसकी एक गोली खाकर ऊपरसे
मिश्रीका शर्बत पीवे तो तरुणज्वर नष्ट होजाता है । इस रसको