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सर्वकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 110, कुल 584 में से

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पृष्ठ 110

( ९४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह ।
माषमुद्गाख्यपर्पिन्त्यौ विदारीकन्दकेतकी ।
एरण्डादिगणो ह्येष सर्ववातविकारनुत् ॥ ३३ ॥
अब वातादि दोष विशेषपर पुटपाकके लिये कहे हुए इन गणोंको
श्रवण करो । एरण्डकी जड, शारिवा, द्राक्षा, शिरीष, प्रसारणी, माष-
पर्णी, मुद्गपर्णी, विदारीकंद और केतकी यह एरण्डादि गण संपूर्ण
वातविकारोंको नष्ट करता है । ( यदि वातविकार शांतिके लिये लोह-
भस्म करना हो तो इस एरण्डादि गणसे पुट देना चाहिये ) ॥ ३२-३३ ॥
किरातादि गण ।
किरातममृतानिम्बकुस्तुम्बुरुशतावरी ।
पटोलं चन्दनं पद्मं शाल्मल्यौडुम्बुरी जटा ।
पैत्तिकामयहन्ताऽयं किरातादिगणो मतः ॥ ३४ ॥
चिरायता, गिलोय, नीम, धनियाँ, शतावर, पटोल, चंदन, पद्म,
सेमलकी जड और गूंलरंकी जड यह किरातादि गण पित्तविकारोंको
नष्ट करनेमें श्रेष्ठ है । ( इसलिये पित्तरोग दूर करनेको इसकी पुटें देना
चाहिये ) ॥ ३४ ॥
शृंगवेरादि गण ।
शृङ्गवेरस्य मूलानि निर्गुण्डीकौटजं फलम् ।
करञ्जद्वितयं मूर्वा शोभाञ्जनशिरीषकौ ॥ ३५ ॥
वरुणश्चार्कपर्णञ्च पटोलं कण्टकारिका ।
शृङ्गवेरादिको ह्येष गणः श्लेष्मगदापहः ॥ ३६ ॥
अदरख, संभालू, इंद्रजौ, करंज, पूतिकरंज, मूर्वा, सुहांजना, शिरीष,
वरुणवृक्ष, आकके पत्र, पटोलपत्र और कटेली यह शृंगवेरादि गण
कफके विकारोंको दूर करता है । ( कफके रोग दूर करनेकी लिये
लोहमें इसकी पुटें देनी चाहिये ) ॥ ३५ ॥ ३६ ॥
गोक्षुरादि गण ।
गोक्षुरक्षुरकौ व्याघ्री सिंहपुच्छीद्वयं स्थिरा ।
गोक्षुरादिरिति प्रोक्तो वातश्लेष्महरो गणः ॥ ३७ ॥