रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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त्रिफलादिगण ।
त्रिफलात्रिवृतादन्तीकटुकीतालमूलिकाः ।
वृद्धदारकवृश्चीरवृषपत्रकचित्रकाः ॥ २७ ॥
शृंगवेरविडङ्गौ च भृंगभल्लातकौषधम् ।
दाडिमस्य च पत्राणि शतपत्री पुनर्नवा ॥ २८ ॥
कुठेरक्रामुकौ कन्दः तन्त्रीभेकस्य पर्णिका ।
हस्तिकर्णः पलाशश्च कुलिशः केशराजकः ॥ २९ ॥
माणः खण्डितकर्णश्च गोजिह्वालोहमारकः ।
गिरिशान्तनकः प्रोक्तस्त्रिफलादिरयं गणः ॥३०॥
सामान्यपुटपाकार्थमेतानिच्छन्ति सूरयः ॥ ३१ ॥
त्रिफला, निशोथ, दंती, कुटकी, तालमूली ( मुसली ), विधायरा,
श्वेतपुनर्नवा, अडूसा, पत्रज, चित्रक, अदरख, वायविडंग, भांगरा,
भिलावे, सोंठ, दाडिमके पत्र, शतावरी, लालपुनर्नवा, कुठेर ( तुलसी ),
सुपारीकी जड, जिमीकंद, तंत्री ( गिलोय ), मण्डूकपर्णी, हस्तिकर्ण-
पालाश, ( बड़ेपत्तेका ढाक), हडसंहारी, भांगरा, मानकंद, खंडितकर्ण,
( सकरकंदके समान कंद ), गोजियाघास और अपराजिता यह लोह-
मारकगण हैं, इसीको त्रिफलादिगण भी कहते हैं । सामान्यतासे सर्व-
रोग नाशार्थ लोहपुटपाक करनेके लिये इस मारणगणको बुद्धिमान्
वैद्योंने श्रेष्ठ माना है ॥ २७-३१ ॥
वातनाशक एरंडादिगण ।
विशेषपुटपाकाय गणानन्याञ्छृणूदितान् ।
एरण्डशारिवाद्राक्षाशिरीषाश्च प्रसारणी ॥ ३२ ॥
१ कोई 'वृषपत्रक' शब्दको इकट्ठा लेकर छागलांत्री नामक वनौषधी
अर्थ करते हैं । यदि वृषपत्रकका छागलांत्री अर्थ करे तो लोहमारकका
शांतिशाक अर्थ कर लेना चाहिये ।