रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअस्य च रोगयोग्यः प्रयोगः-अतीसारैकलक्षणामिति विषूचीविशेषणं प्रयोग-
योग्यतानिर्देशार्थम् । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥२६४-२६७॥
भा.टी—उक्त अहिफेनासव को मात्रापूर्वक सेवन करने से विविध कारणों
से उत्पन्न पुरातन अथवा नूतन भयंकर अतीसार तथा तीव्र एवं एकमात्र
अतीसार लक्षणयुक्त विसूचिका रोग शीघ्र नष्ट हो जाते हैं । बिन्दुक्षेपक यन्त्र के
द्वारा इसको बहुत थोड़ी मात्रा में कान में डालने से कान की पीड़ा शान्त हो
जाती है । अहिफेनासव में रूई को तर करके कीड़ा लगे हुए दाँत के छेद में
भरने से उसकी वेदना शीघ्र शान्त हो जाती है ॥२६४-२६७॥
मंगलोदया वटी
फणिफेनं सुविमलं माषकैकमितं शुभम् ।
उत्तमं घनसारं च सप्तमाषकसंमितम् ॥२६८॥
सम्पेष्य वारिणा यत्नाद्गुटिका रक्तिकोन्मिता ।
कारयेद्भिषजां वर्यो रसतन्त्रविचक्षणः ॥२६९॥
नामतस्तु समाख्याता वटिका मङ्गलोदया ।
प्रलापाक्षिप्रणुत्त्यर्थं सता हिततमा परम् ॥३००॥
मङ्गलोदया वटी-अहिफेनं शुद्धं १ मा०, घनसारं कर्पूरम् ७ मा०,स्पष्टमन्यत्॥
भा.टी.—शुद्ध अफीम एक मासा, उत्तम कपूर सात मासा लेकर दोनों
को एकत्र जल से पीसकर एक-एकरत्ती की गोलियाँ बना लें । इन गोलियों को
मंगलोदया वटिका कहते हैं । सन्निपातज्वरादि में प्रलाप, निद्रानाश आदि
उपद्रव तीव्र होने पर इस वटी के प्रयोग से उत्तम लाभ होता है ॥२६८-३००॥
वेदनान्तकमलहरः
सिक्थतैलं सुविमलं ग्रहतोलकसंमितम् ।
फणिफेनञ्च विमलं ग्रहमाषकसंमितम् ॥३०१॥
फणिफेनमितञ्चैव खलु हेरम्बभूषणम् ।
समादाय भिषग्वर्यः खल्वे सम्मेलयेत्ततः ॥३०२॥
काचकुप्यां निधायाथ पिधानेन निरोधयेत् ।
मतो मलहरोऽयं तु वेदनान्तकसंज्ञकः ॥३०३॥
वेदनां शमयत्याशु गुदाङ्कुरसमाश्रयाम् ।
पायुस्थविद्रदोद्भूतां वेदनाञ्चातिदारुणाम् ॥३०४॥