रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशस्तरङ्गः ७०१
वक्तव्य—अहिफेनासव को (Tincture opium) कहते हैं और इसको
अहिफेनवारुणीसार या अहिफेनासुत भी कह सकते हैं । मृतसञ्जीवनी सुरा का
योग और निर्माण भैषज्यरत्नावली में विस्तृत रूप से लिखा हुआ है । उसके
अभाव में रेक्टीफाइड स्प्रिट में भी इसको बनाया जा सकता है ।
अस्य गुणाः
विविधोत्थानसम्भूतातीसारविनिषूदनः ।
कर्णशूलप्रशमनो दन्तशूलनिबर्हणः ॥२६०॥
अस्थिभग्नादिसम्भूतां तथास्थिच्युतिसम्भवाम् ।
वेदनां बहुहेतूत्थां विनिहन्त्यतिसत्वरम् ॥२६१॥
विविधोत्थानजातानां वेदनानां निवृत्तये ।
महौषधमिदं ख्यातं रसतन्त्रविचक्षणैः ॥२६२॥
भा.टी.—उक्त अहिफेनासव विधि कारणजन्य अतीसार को दूर करता है ।
कानकी पीड़ा तथा दांत की पीड़ा को इसके सेवन से आराम आता है । इसी
तरह हड्डी टूटने या हड्डी के अपने स्थान से हटने पर होनेवाली पीड़ा तथा
अन्यान्य कारणों से होनेवाली पीड़ा में अहिफेनासव सेवन से शीघ्र आराम आता
है । इसी तरह शरीर के किसी स्थान पर किसी कारण होनेवाली वेदना को शान्त
करने के लिए रसशास्त्र में अहिफेनासव उत्तम औषधि है ॥२६०-२६२॥
अस्य मात्रा
आरभ्य शरबिन्दुभ्यस्तिथिबिन्दुमितं परम् ।
अहिफेनासवं युञ्ज्यात् बलकालाद्यपेक्षया ॥२६३॥
भा.टी.—इस अहिफेनासव की पूर्ण मात्रा पाँच बूँद से लेकर पन्द्रह बूँद
तक समझनी चाहिए ॥२६३॥
अहिफेनासवस्य आमयिकः प्रयोगः
अहिफेनासवोऽयन्तु मात्रया परिशीलितः ।
विविधोत्थानसम्भूतं नूतनं वा पुरातनम् ॥२६४॥
सुदारुणमतीसारमतीसारैकलक्षणम् ।
विषूचीं च निहन्त्याशु यथा सूर्यस्तमस्ततिम् ॥२६५॥
बिन्दुत्क्षेपकयन्त्रेण निक्षिप्तः कर्णयोरयम् ।
अत्यल्पमात्रयैवेह कर्णशूलं व्यपोहति ॥२६६॥
अहिफेनासवे सक्तं तूलं तु कृमिदन्तके ।
न्यस्तं नातिचिरादेव वेदनां हन्ति तद्भवाम् ॥२६७॥