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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 667

६४२ रसतरङ्गिणी
राजावर्तस्य प्रथमः शोधनप्रकारः
सगव्यमूत्रः सक्षारो निम्बूकद्रवयोगतः ।
स्विन्नो नृपोपलो यामं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ १६३ ॥
राजावर्तशोधनं गोमूत्रक्षारनिम्बूजलेन कार्यम् ॥ १६३ ॥
भा.टी.—दोलायन्त्र में गोमूत्र तथा निम्बूस्वरस और यवक्षार डालकर
उसमें लाजवर्द की पोटली को लटकाकर तीन घण्टे तक स्वेदन करने से वह
अच्छी तरह शुद्ध हो जाता है ॥ १६३ ॥
द्वितीयः शोधनप्रकारः
निम्बूकाम्लसमायुक्तः सजलः क्षारसंयुतः ।
नृपोपलः परिस्विन्नो विशुद्ध्यति न संशय ॥ १६४ ॥
निम्बूकाम्लं प्रागुक्तपरिभाषम्, तेन समायुक्तः ॥ १६४ ॥
भा.टी.—दोलायन्त्र में निम्बूस्वरस, यवक्षार और जल भरकर उसमें लाजवर्द
को तीन घंटे तक स्वेदन करने से भी वह अच्छी तरह शुद्ध हो जाता है ॥१६४॥
तृतीयः शोधनप्रकारः
शिरीषपुष्पस्वरसैः स्वेदितस्तु नृपोपलः ।
दोलायन्त्रे याममात्रं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥ १६५ ॥
शिरीषपुष्पस्वरसैर्वा दोलायन्त्रे स्वेदनाच्छुद्ध्यति ॥ १६५ ॥
भा.टी.—शिरीष पुष्प के स्वरस में दोलायन्त्र विधान से लाजवर्त को ३
घंटे तक स्वेदन करने से उत्तम शुद्धि हो जाती है ॥ १६५ ॥
राजावर्तस्य मारणम्
विचूर्णितं नृपोपलं विशुद्धगन्धकान्वितम् ।
नवेन निम्बुकाम्बुना सुपेषयेद् दिनत्रयम् ॥ १६६ ॥
विशोषितञ्च विन्यसेच्छुरावसम्पुटस्थितम् ।
विधाय सन्धिलेपनं पुटेत्पुटे गजाह्वये ॥ १६७ ॥
विपक्त्वतः सुवर्त्मना ह्यनेन नागवारकम् ।
नृपोपलोऽविलम्बितं समेति पञ्चतामलम् ॥ १६८ ॥
एतन्मारणञ्च गन्धकयोगेन निम्बूकद्रवैः सुपेषणमन्वष्टधा पुटनात् साध्यम् ।१६८॥
भा.टी.—शुद्ध लाजवर्द को खरल में अच्छी तरह चूर्ण करके उसमें सम-
भाग शुद्ध गन्धक मिलाकर इसको ताजे नींबू के रस के साथ तीन दिन तक
मर्दन करें और धूप में रखकर अच्छी तरह सुखा लें। अब इसको शरावसम्पुट में