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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 497

एकोनविंशस्तरङ्गः ४७१
प्रसङ्गात् सुतीव्रकाञ्जिकाम्लस्य निर्माणप्रकारः
अत्यम्लं निर्मलं शुक्तं गृहनीरमथापि वा ।
समाहरेद्भिषग्वर्यो रससेरकसंमितम् ॥ ७६ ॥
काचलिप्ते तु मृत्पात्रे नाडिकायन्त्रयोगतः ।
पचेन्मन्दांग्निना तावत्पञ्चसेरकसंमितम् ॥ ७७ ॥
यावत्तु गृहनीरस्थं जलांशं न परिस्रवेत् ।
परिस्रुताम्बुसन्त्यक्तं जायते तीव्रकाञ्जिकम् ॥ ७८ ॥
प्रासंगिकः सुतीव्राम्लकाञ्जिकनिर्माणप्रकारः—गृहनीरं काञ्जिकं रससेरकं षट्-
सेरकम्, नाडिकायन्त्रमर्कनिष्कासनयन्त्रम्। ५ सेरकं परिस्रुतं च तस्माज्जलं त्याज्यम्।
एवं सति प्रभूतजलभागापनयात् सुतीव्रता भवति काञ्जिकस्येति ॥ ७६-७८ ॥
भा.टी.—छः सेर अत्यन्त खट्टा और साफ सिरका अथवा काञ्जी लें । अब
इस काञ्जी या सिरके को एक कांचलिप्त मिट्टी के भभके में डालकर चूल्हे पर
चढ़ा दें । इसी भभके में अर्क निकालने की विधि के अनुसार नली भी जोड़
दें । अब इसके नीचे मन्द अग्नि तब तक देते रहें जब तक कि नली से पाँच
सेर जल उड़कर निकल आये । पाँच सेर जल उड़कर निकलने के बाद अव-
शिष्ट एक सेर काञ्जी या सिरका बहुत तीव्र होता है । इसी को तीव्रकाञ्जिकाम्ल
कहते हैं ॥ ७६-७८ ॥
अथ सजलारनालीयक्सीसद्रवस्य निर्माणप्रकारः
आरनालीयकाहेस्तु द्रवे शुभ्रांशुभागिके ।
निक्षिपेद्रसतन्त्रज्ञस्तन्मितां निर्मलां सुराम् ॥ ७९ ॥
परिस्रुतं तु सलिलं शुद्धं वस्वश्वभागिकम् ।
दत्त्वा सम्मेलयेद्वैद्यः काचकुप्यां निधापयेत् ॥ ८० ॥
अयमेव समाख्यातो रसायनविचक्षणैः ।
द्रवः खलु ससलिलः काञ्जिकीयकसीसजः ॥ ८१ ॥
शुभ्रांशुभागिके इति शुभ्रांशुश्चंद्रः, तस्मादेकभागिके इति सम्पन्नम्, तन्मिता-
मेकभागम्, वसवोऽष्टौ अश्वाश्च सप्त वामतोगतिन्यायात् ७८ भागिकमिति
निष्पन्नम् ॥ ७६-८१ ॥
भा.टी.—एक भाग आरनालीय सीसकद्रव में उतनी ही निर्मल सुरा और
अठहत्तर ७८ भाग शुद्ध परिस्रुत जल मिलाकर एक काँच की बोतल में रख लें ।
इसी को सजल आरनालीय सीसक द्रव कहते हैं ॥ ७६-८१ ॥