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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 327

द्वादशस्तरङ्गः २८५
भा.टी.—बल, काल आदि के अनुसार गोदन्तभस्म की मात्रा एक रत्ती
से लेकर तीन रत्ती तक दी जा सकती है ॥ २४२ ॥
यह तालकादिविज्ञानीय नाम एकादशतरङ्ग समाप्त हुआ ।
अथ शंखादिविज्ञानीयो नाम द्वादशस्तरङ्गः ।
अथ शंखस्य नामानि
शंखस्तु शंखकः कम्बुस्त्रिरेखश्च समुद्रजः ।
सुनादो दीर्घनादश्च कम्बोजश्च प्रकीर्तितः ॥१॥
भा.टी. -शंख, शंखक, कम्बु, त्रिरेख, समुद्रज, सुनाद, दीर्घनाद, कंबोज
ये सब नाम शंख के समझने चाहिये ॥ १ ॥
ग्राह्यशंखस्य स्वरूपम्
वृत्तः स्निग्धः सूक्ष्ममुखो निर्मलश्चेन्दुसुन्दरः ।
दीर्घकायो गुरुश्चापि शङ्खः श्रेष्ठः प्रकीर्तितः ॥२॥
भा.टी.—गोलाकार, चिकना स्पर्श, सूक्ष्म मुख, स्वच्छ चन्द्रमा सदृश सुन्दर,
बृहत् आकार और गुरुभार शंख औषधिकर्म में ग्राह्य समझना चाहिये ॥ २ ॥
शंखस्य द्वौ भेदौ
शङ्खस्तु द्विविधः प्रोक्तो रसतन्त्रविचक्षणैः ।
प्रथमो दक्षिणावर्तो वामावर्तोऽपरो मतः ॥३॥
दक्षिणावर्तशङ्खस्तु प्रशस्तो देवपूजने ।
त्रिदोषघ्नो निधिश्वापि स्मृतो दारिद्र्यनाशनः ॥४॥
वामावर्ताभिधः शङ्खः सर्वत्र सुलभो मतः ।
अतः स एव वैद्यैस्तु मारणार्थं प्रयुज्यते ॥५॥
शंखस्य नामस्वरूपभेदोपयोगाः स्पष्टप्रायाः ॥ ३-५ ॥
भा.टी.—रसशास्त्रज्ञों ने शंख के दो भेद माने हैं । १—दक्षिणावर्तशंख,
२—वामावर्तशंख । इनमें से दक्षिणावर्तशंख देवताओं की पूजा में काम आता
है । यह त्रिदोषनाशक और दरिद्रता को दूर करनेवाली एक निधि (विशेष
बहुमूल्य पदार्थ) मानी जाती है । वामावर्तशंख प्रायः सर्वत्र सुलभ होता है ।
अतः इसी को ही वैद्य लोग भस्म करने के काम में लाते हैं ॥ ३–५ ॥
अथ शंखस्य प्रथमः शोधनप्रकारः
शङ्खन्तु खण्डशः कृत्वा पोट्टल्यां स्थापयेद्भिषक् ।
दोलायन्त्रे चतुर्यामं पचेज्जम्बीरवारिणा ॥६॥