रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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गोदन्तस्य स्वरूपम्
पत्राचितं सुमस्तृणं शरदिन्दुसुनिर्मलम् ।
दीप्तप्रभं तु गोदन्तं ग्राह्यमत्र प्रकीर्तितम् ॥२३८॥
भा.टी.—यह गोदन्त आपस में मिले हुए अनेक पतले-पतले पत्रों से बना
हुआ बाहर से चिकना, देखने में शरत्कालीन चन्द्रमा के समान श्वेत चमकीला
होता है । यही रसशास्त्र में ग्राह्य समझना चाहिये ॥ २३८ ॥
गोदन्तस्य शोधनम्
गोदन्तं निम्बुनीरेण द्रोणपुष्पीरसेन वा ।
यामार्द्धेनैव सुस्विन्नं विशुद्धयति न संशयः ॥२३६॥
भा.टी.—गोदन्त को नीम्बूस्वरस में अथवा द्रोणपुष्पीस्वरस में डेढ़ घण्टे
उबाल लेने से वह शुद्ध हो जाता है ॥ २३६ ॥
गोदन्तस्य मारणम्
शरावसम्पुटान्तःस्थं गोदन्तं सुविशोधितम् ।
म्रियते पुटितं भस्म जायते शशिसुन्दरम् ॥२४०॥
भा.टी.—शुद्ध गोदन्त को छोटे-छोटे टुकड़े करके शरावसम्पुट में बन्द
करके साधारण पुट देने से इसकी श्वेतभस्म बन जाती है ॥ २४० ॥
गोदन्तस्य गुणाः
गोदन्तं सुमृतं शीतं पित्तज्वरनिषूदनम् ।
जीर्णज्वरहरं बल्यं दीपनं श्वासकासनुत् ॥२४१॥
गोदन्तं सुमृतं शीतमित्यस्य गुणाः, अपि च पित्तातिसारहरं रक्तपित्तहरञ्च ।
इदं रक्तप्रदरं प्रवाहिकाञ्च विनिहन्ति ॥ २४१ ॥
भा.टी.—गोदन्त ( श्वेता ) भस्म शीतगुण होने से पित्तज्वर को शान्त
करती है । विभिन्न अनुपान के साथ प्रयोग करने पर जीर्णज्वर, श्वास, कास
को दूर करती है । यह शरीर में बल बढ़ाती है और अग्नि को दीप्त भी
करती है ॥ २४१ ॥
गोदन्तस्य मात्रा
गुञ्जैकतः समारभ्य गुञ्जात्रयमितं परम् ।
गादन्तं विनियुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥२४२॥
प्रवाहिकादिशान्त्यै त्रिगुञ्जा मात्रास्य दातव्येति स्पष्टमन्यत् ॥ २४२ ॥
इति तालकादिविज्ञानीयो नाम एकादशस्तरङ्गः