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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 249

१४ नवमस्तरङ्गः २०६
श्रीसिद्धहिंगुलेश्वरः—धत्तूरमूलरसैः सप्तवारं सम्यग्भावनं दरदस्य विशेष-
गुणाधानकरम् । विश्वं शुण्ठी, पुरुहूतयवाः इन्द्रयवः । शीघ्रं धान्यशीतकषाय-
पानं योगजनितपित्तोद्रेकानुत्पत्त्यर्थम् । तत्फलं प्राह-दाहेत्यादि । स्पष्टम् । ५७–६२।
इति हिंगुलविज्ञानीयो नाम नवमस्तरङ्गः
भा.टी.—शुद्ध हिंगुल को धत्तूरमूलस्वरस से सात भावना देकर सुखालें ।
अब इसमें हिंगुल के बराबर सुहागा मिलाकर बारीक चूर्ण करलें । इसको
रसशास्त्रज्ञ "श्रीसिद्धहिंगुलेश्वर" कहते हैं । इसमें से आधी रत्ती प्रमाण मात्रा
में लेकर इसमें शुण्ठी, मोचरस तथा इन्द्रजौ का चूर्ण मिलाकर सेवन करायें,
इसके पश्चात् अनुपान के रूप में धनिये का शीत कषाय पिलायें । इसके प्रयोग
से दाह, मूर्च्छा, तृषा आदि उपद्रव नष्ट हो जाता है । यह रस पाचक तथा
दीपक है । इसके प्रयोग से अनियमित नाड़ी नियमित हो जाती है। इसके अति-
रिक्त यह रस ज्वरनाशक, कृमिनाशक, कफ स्रावक और साधारण रूप से ग्राही
है । यह कोष्ठ में प्रकुपित वायु का शमन करता है और अपान वायु का अनु-
लोमन करता है । सारांश यह है कि ज्वरातिसार रोग के लिये संसार में इस रस
के समान कोई दूसरी औषधि नहीं है ॥ ५७–६२ ॥
यह हिंगुलविज्ञानीय नाम नवमतरङ्ग समाप्त हुआ
चपलः
गौरः श्वेतोऽरुणः कृष्णश्चपलस्तु चतुर्विधः ।
हेमाभश्चैव ताराभो विशेषाद्रसबन्धनः ॥ १ ॥
शेषौ तु मध्यौ लाक्षावच्छीघ्रद्रावौ तु निष्फलौ ।
वंगवद् द्रवते वह्नौ चपलस्तेन कीर्तितः ॥ २ ॥
चपलो लेखनः सिद्धो देहलोहकरो मतः ।
रसराजसहायः स्यात् तिक्तोष्णमधुरो मतः ॥ ३ ॥
चपलः स्फटिकच्छायः षडस्री स्निग्धको गुरुः ।
त्रिदोषघ्नोऽतिवृष्यश्च रसबन्धविधायकः ॥ ४ ॥
महारसेषु कैश्चिद्धि चपलः परिकीर्तितः ।
जम्बीरकङ्कोटकशृङ्गवेरैर्विभावनाभिश्चपलस्य शुद्धि॥ ५ ॥
चपलस्य सत्त्वपातनम्
शैलं तु चूर्णयित्वाथ धान्याम्लोपविषैर्विषैः ।
पिण्डं बद्ध्वा तु विधिवत् पातयेच्चपलं तथा ॥ ६ ॥
( इति रसरत्नसमुच्चयात् )