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सर्वकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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पृष्ठ 238

१६८ रसतरङ्गिणी
तृषां विसूचिकोद्भूवां हरत्ययं विशेषतः ।
तथातिघर्मरोधकः सदातिसारनाशनः ॥१३२॥
विकारान् दारुणान् नित्यं दुष्टनागाशनोत्थितान् ।
नाशयत्यचिरादेव तिमिरन्तु यथा रविः ॥१३३॥
निर्भरं अत्यर्थम् । सङ्कोचः मलस्तम्भक इत्यर्थः । अतिघर्मरोधकः प्रभू-
तस्वेदहन्ता । सदा इति नियमेनेत्यर्थः । सङ्कोचकत्वादिति यावत् । दुष्टनागा-
शनम् अशुद्धामृतसीसकभक्षणं तदुत्थान् पक्षवधादीन् ॥ १३१-१३३ ॥
इति गन्धकविज्ञानीयो नाम अष्टमस्तरङ्गः
भा.टी.—गन्धकद्राव गुल्म और प्लीहारूपी हाथी के लिये अंकुश है ।
क्रिमिनाशक, सब उदर रोगों को नष्ट करनेवाला, उष्णवीर्य, विसूचिकारोग-
नाशक, स्थानीयसंकोचक, मलस्तम्भक है । आध्मान युक्त ज्वरवेग को रोकने-
वाला, रक्तातिसार में लाभदायक, तथा शरीर में से होनेवाले रक्तस्राव को बन्द
करनेवाला है । इसके प्रयोग से अग्नि बढ़ती है । हैजे की प्यास को रोकने में
यह विशेष रूप से लाभदायक है । इसके देने से रोग की अवस्था में अधिक
निलकनेवाला पसीना रुक जाता है । अतीसार के लिये सदा उपयोगी है ।
इसके अतिरिक्त अशुद्ध नाग ( सीसा ) के सेवन से होनेवाले भयंकर विकारों
को यह शीघ्र मिटाता है ॥ १३१-१३३ ॥
यह गन्धकविज्ञानीय नाम अष्टमतरङ्ग समाप्त हुआ ।
अथ हिङ्गुलविज्ञानीयो नवमस्तरङ्गः
हिङ्गुलस्य नामानि
हिङ्गलो हिङ्गुलश्चैव हिङ्गुलं चेङ्गुलाह्वयम् ।
म्लेच्छं रक्तं सुरङ्गञ्च चित्राङ्गं चूर्णपारदम् ॥१॥
रसोद्भवो रसस्थानं रञ्जनं कपिशीर्षकम् ।
रक्तकायो हंसपादो दरदञ्च प्रकीर्तितम् ॥२॥
पर्यायभेदविवरणं शास्त्रे व्यवहारार्थम् ॥१-२॥
भा.टी.—हिंगल, हिंगुल, हिंगूल, इंगुल, म्लेच्छ, रक्त, सुरंग, चित्रांग,
चूर्णपारद, रसोद्भव, रसस्थान, रञ्जन, कपिशीर्षक, रक्तकाय, हंसपाद और
दरद, ये सब सिंगरफ के नाम या पर्यायवाचक शब्द हैं ॥ १-२ ॥