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रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)

Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary

पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 414 में से

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पृष्ठ 95

प्रथमाननम् ६३
यथा यमुनावर्णने—‘तनयमैनाकगवेषणलम्बीकृतजलधिजठरप्रविष्ट-
हिमगिरिभुजायमानाया भगवत्या भागीरथ्याः सखी' इति। अत्रोत्प्रेक्षा
स्यापकृष्टवाच्यचमत्कारस्य च सामानाधिकरण्यं प्रसिद्धम् । तथा च यदि व्यङ्ग्य-
चमत्कारो वाच्यचमत्कारापेक्षयोत्कृष्टो न प्रकाशते तर्हि व्यङ्ग्यचमत्कारो वाच्य-
चमत्कारसमानाधिकरणो न भवति । एषा च स्थितिर्वाच्यचमत्कारस्य व्यङ्ग्य-
चमत्कारसमकक्ष्यत्वे तदपेक्षोत्कर्षवत्त्वे चेति बोध्यम् । यद्वा ‘व्यङ्ग्यचमत्काराप-
मानाधिकरणः’ इत्येव पाठः । तत्रापमानमधिकरोतीति कर्त्तरि ल्युट्, करणे वा ।
तथा च यत्र काव्ये वाच्यचमत्कारो व्यङ्ग्यचमत्कारमपमानयति तन्मध्यमम् ।
अपमानश्च वाच्यचमत्कारकृतस्तस्य व्यङ्ग्यचमत्कारापेक्षयोत्कर्षेण तत्तुल्यकक्ष्यत्वेन
चेति पूर्ववदेव व्यवस्था । अत्र वाच्यचमत्कृतेर्विशेष्यतयोपन्यासेऽपि तत्प्राधान्ये नाग्रहः ।
अत एव समप्राधान्ये मध्यमत्वं वक्ष्यति स्वयमेव । अत एवात्र तस्याः प्राधान्यं
साक्षादन्यथा वा नोक्तम् ।
तनयमैनाकेत्यादि । मैनाको हिमालयस्य तनयः क्रुद्धेन्द्रकर्तृकपक्ष-
च्छेदनभिया जलधि प्रविष्ट इति पुराणम् । हिमालयात्प्रभूता गङ्गाऽपि जलधि
प्रविष्टैव । तत्रोत्प्रेक्ष्यते—तनयेत्यादिना । तनयो मैनाकस्तस्य गवेषणाय
लम्बीकृता जलधिजठरप्रविष्टा या हिमगिरिभुजा तामिव आचरन्त्या भागीरथ्याः
सखीत्यर्थः । पुँल्लिङ्गेन भुजशब्देन विग्रहस्तु न युक्त एव । उत्प्रेक्षा = स्वरूपोत्प्रेक्षा,
अतः अतिशयचमत्कारजनक वाच्यार्थ के साथ उक्तविध व्यङ्ग्यार्थ का किसी एक
अधिकरण में रहना सम्भव नहीं । इश विषय को इस रूप में भी कहा जा सकता
है कि उपर्युक्त वाच्यार्थ और व्यङ्ग्यार्थ विषयता सम्बन्ध से सहृदयों के एक ज्ञान
में आश्रित हो नहीं सकते । इससे स्पष्ट है कि मध्यम काव्य में व्यङ्ग्यार्थ वाच्यार्थ
से अधिक चमत्कार का जनक नहीं होता, वह या तो समानस्तर के चमत्कार को
उत्पन्न कर सकता है या हीन स्तर के चमत्कार को । उक्त रीति से सामाना-
धिकरण्य तो अल्पचमत्कारजनक अथवा चमत्काराजनक वाच्यार्थ एवम् अतिशय-
चमत्कारजनक व्यङ्ग्यार्थ का हीं हो सकता । लक्षणवाक्य में वाच्यार्थ का
विशेष्य रूप मे निर्देश कर ग्रन्थकार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मध्यम काव्य में
वाच्यार्थ हीं चमत्कारजनक होता, व्यङ्ग्यार्थ उससे अधिक चमत्कार का जनक
कदापि नहीं होता ।
इसका उदाहरण मेरे यमुनावर्णन-नामक काव्य का यह वाक्य है—"यमुना उस
भगवती भागीरथी की सखी है जो मानो, हिमालय की वह भुजा है जो उसके
(हिमालय के) पुत्र मैनाक को ढूंढने के लिए फैलाई गई और समुद्र के उदर में