रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ - रसतरङ्गिणी संस्कृत व हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण प्रथम आनन)
Rasagangadhara of Panditaraja Jagannatha with Commentary
पण्डितराज जगन्नाथ (टीकाकार: डॉ. श्रीनारायण मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३२ रसगङ्गाधरः
यथा वा—
स्वेदाम्बुसान्द्रकणशालिकपोलपालि-
रन्तःस्मितालसविलोकनवन्दनीया।
आनन्दमङ्कुरयति स्मरणेन कापि
रम्या दशा मनसि मे मदिरेक्षणायाः ॥
प्रथमे पद्येऽतिशयोक्त्यलंकृतस्य भगवद्ध्यानौत्सुक्यस्य भगवद्विषयक-
रतेर्वा ध्वन्यमानायाः शान्त एव पर्यवसानात्तद्गतमाधुर्यस्याभिव्यञ्जिका
किङ्करीकृता दासीकृता नवाम्बुदत्विड् यया तादृशीमथ च नैचिकीनामुत्तमाजां गवां
नयनैश्चुम्बितां तां विलक्षणां श्रीकृष्णश्रियं चिरं शान्तये शाश्वताय विश्रमाय कलय
समाश्रयेत्यर्थः। अत्र सम्बोधनप्रथमान्तस्य स्वान्तपदस्यासन्निहितत्वेन 'आमन्त्रितं
पूर्वमविद्यमानवत्' इत्यनुशासनेनाविद्यमानवद्भावादस्मत्पदस्य पदात्परत्वाभावेन 'मे'
इत्यादेशश्चिन्त्य इति चन्द्रिकायाम्।
स्वेदाम्बुसान्द्रेत्यादि। पूर्वोद्धृतेऽस्मिन् पद्ये द्वितीयपादे कुण्डलशब्दे 'ण्ड'
इत्यस्य प्रतिकूलतया किञ्चित् परिवर्तितमत्र। अत्र च पालिरित्यन्तमेकं विशेषणं
दशायाः ,अन्यच्च वन्दनीयेत्यन्तम्। अन्तःस्मितकाले कपोलयोरुत्फुल्लतया नेत्रसंकोचा-
दलसत्वं विलोकनस्य लभ्यते।
अतिशयोक्तीति। श्रीकृष्णश्रियो वस्तुतस्तमालतरुकान्तिलङ्घकत्वाद्य-
सम्बन्धेऽपि तत्सम्बन्धवर्णनाद् बोध्याऽऽतिशयोक्तिः। तद्गतेति। तत्रयोज्येत्यर्थः।
है, नवीन घन की छवि भी जिसकी दासी बन चुकी है और दुधारू गायों की
अनुरक्त आँखें जिसे चूमती रहती हैं।"
इसका दूसरा उदाहरण है—'स्वेदाम्बुसान्द्र···' आदि पद्य। इसका अर्थ
निम्नलिखित है—
"मदमाती आँखों वाली कामिनी की वह अलौकिक रमणीय दशा, जिसमें उसके
गालों पर पसीने की घनी बूँदें छलक आई थीं और जो (दशा) मुस्कुराहट
और अलसाई आँखों के कारण प्रशंसनीय रही, स्मरणमात्र से मेरे मन में आनन्द
उत्पन्न कर रही है।"
प्रथम उदाहरण-पद्य में शान्तरसगत माधुर्य का व्यञ्जक वर्णविन्यास है, क्योंकि
उस पद्य में चाहे अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन में भगवान् कृष्ण के ध्यान की उत्सुकता
ध्वनित होती हो या उनमें रति (=भक्ति), दोनों का पर्यवसान तो अन्ततः शान्त-
रस में ही है। किन्तु द्वितीय उदाहरण में स्मरण से परिपुष्ट शृङ्गार-रस के माधुर्य