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झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)

Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography

वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

४२७ झांसी की रानी

भाऊ बख्शी ने जिम्मा लिया । उसका मकान कोरियो के मुहल्ले के
निकट था । और वह उन लोगो को अच्छी तरह जानता था । * बख्शी
गुप्त मार्ग से किले के बाहर चला गया । रानी ने अपने पुराने सेवक
सेविकाओ को पुरस्कार देकर विदा किया । वे पैर छू छूकर, रो रोकर
वहा से चले गये । नाना भोपटकर भी चला गया ।
जवाहरसिंह को रानी ने आज्ञा दी, 'आप अपने इलाके में जाकर
सैन्य संग्रह करिये और कालपी आ जाइये ।'
जवाहरसिंह ने प्रार्थना की, 'मे आपको सुरक्षित स्थान में पहुँचाकर
लौटूँगा अन्यथा नही । केवल इस आज्ञा का जीवन में उल्लङ्घन किया है ।
इस अपराध के लिये क्षमा चाहता हूं ।'
रानी ने स्वीकार किया ।
थोडे समय उपरान्त रानी और मुन्दर महादेव के मन्दिर में गईं ।
वन्दना की । ध्यान किया ।
समाप्ति पर रानी ने मुन्दर से कहा, वह पलाश अब भी फूल रहा
है । सिन्दूरोत्सव के दिन की मालाये अब भी उससे लिपटी होगी ।'
मुन्दर बोली, 'एक बार उसको भेट लीजिये बाईसाहब ।'
'अवश्य,' रानी ने कहा, 'वह हर साल फूलेगा और झासी हरसाल
'सिन्दूरोत्सव मनायेगी । झासी का सिन्दूर अमर हो ।'
उन दोनो ने उस पलाश से भेंट की ।
मुन्दर बोली, 'फूल की मालायें सूख गई हैं ।'
रानी ने कहा, 'उनकी आत्मा तो हरी-भरी है । ये उनके चढ़ाये
फूल हैं जो इस युद्ध में वलिदान हो गईं हैं ।'
इसके बाद वे दोनो महल पर आ गईं ।


  • बख्शी की हवेली के नाम से वह मकान अब भी प्रसिद्ध है । श्री
    सेठ जिनदास कोचर के अधिकार मे है । अमेरिकन मिशन की कुछ स्त्रिया
    उसमें किराये से रहती थी ।

लक्ष्मीबाई ४२१
मोरोपन्त ताम्बे ने बहुत सा द्रव्य और जवाहर इकट्ठे किये। किले
के उत्तरी भाग में नीचे की ओर द्वार की बगल में एक हवेली, हाथीखाना
और घुडसार थी। लडाई के दिनो में जवाहरसिंह और रघुनाथसिंह इसी
हवेली में रहते थे। मोरोपन्त ने एक हाथी पर जवाहर और अशर्फियां
लादी। और लोगो ने कमर में अशर्फिया बाधी। रानी और मुन्दर पुरुष
वेश में घोडो पर सवार हुईं।
उस समय रात बहुत नही गई थी। पूर्व दिशा में बडा तारा ऊपर
चढ आया था। घना अँधेरा केवल शहर की आगो से फट फट जा रहा
था। अँधेरे के ऊपर बड़े छोटे तारे दम दमा रहे थे। नीचे शहर के
अँधेरे पर उन आगो के बड़े बड़े लाल-पीले छपके से पड पड जाते थे।
रानी ने एक चादर से दामोदरराव को पीठ पर कसा और अपने
तेसस्वी सफेद घोडे को किले के उत्तरी भाग से निकालकर आगे किया।
पीछे पीछे पठान, मुन्दर, जवाहरसिंह, रघुनाथसिंह इत्यादि। द्वार से
निकलते ही उन्होने किले को नमस्कार किया, झासी को नमस्कार किया।
कण्ठ में कुछ अवरोधसा अवगत किया। इस भय से कि कही आख में
आसू न आ जाय उन्होने उत्तर दिशा की ओर मुह मोडा और किले के
उतार के नीचे आ गईं। किला बिलकुल सूना छोडा।
मोरोपन्त का हाथी बीच में था। सवार अधिक न थे। उनकी रक्षा
के हेतु बाकी सैनिक पैदल थे। नङ्गी तलवारे लिये हुये।
यह टोली टकसाल के पश्चिम वाले मार्ग से भाडेरी फाटक की ओर
अग्रसर हुई। जैसे ही कोतवाली की बराबरी पर आई अङ्गरेज़ी सेना से
भिडामिडी हो गई। रानी 'हर हर महादेव' उच्चार करती हुई उनको
चीरती फाडती मुन्दर सहित निकल गईं। पठान शत्रुओ से बेतरह लडे।
बहुत से मारे गये बाकी आगे बढे।
जगह जगह-जलते हुये मकानो से उजाला हो रहा था। रानी और
अनेक सङ्गी द्रुत गति से भाडेरी फाटक के निकट पहुच गये। वहां बख्शी
कोरियो को लिये हुये अङ्गरेज़ी फौज की एक टुकडी को तलवार के युद्ध

४२२ झांसी की रानी

में उलझाये हुये था। इधर से रानी की टुकड़ी पहुंची। जलते हुये मकानों
के प्रकाश में थोड़ी देर के लिये विकट युद्ध हुआ। बख्शी ने फाटक खोल
दिया और फिर अपने कोरी सैनिको को लेकर अङ्गरेज टुकड़ी पर टूट
पड़ा। जान पड़ता था कि उसको जीवन का मोह नही। वैसे ही निर्मोही
पठान थे। बख्शी फाटक के बगल में मारा गया। उसने मरने के पहले
रानी को देख लिया था। मरने के पहले उसने 'हर हर महादेव' और
'झांसी की रानी की जय' का घोष किया था। उसके शरीर पात को
रानी ने देखा, परन्तु इतना समय भी न था कि मुह से 'धन्य' भी कह
पाती।
थोडे से लोगो के साथ रानी बाहर हो गईं। मरने से बचे हुये
अङ्गरेज सैनिक भाग गये। कोरियो ने भांडेरी फाटक फिर बन्द कर
लिया* और भाऊ बख्शी को एक जलते हुये मकान के अँगारो में डालकर
उसकी अन्त्येष्टि कर दी।
रानी और उनके साथियो को कोट के बाहर की भूमि का राई रत्ती
पत्ता था। अन्धेरे में वह सहज ही बढती चली गईँ। बातचीत विलकुल
धीरे धीरे होती थी। अञ्जनी की टोरिया के पास ओर्छे की सेना का
पहरा था और एक अँग्रेजी छावनी का। यहाँ रोक टोक हुई। लड़ाई
भी। यहां से रानी के साथ केवल दस बारह सवार रह गये और मुन्दर।
आगे निर्गम मार्ग। अगाध अँधेरा। झींगुर झङ्कार रहे थे। उनके
ऊपर घोडो की टापो की आवाज हो रही थी। सब ओर सन्नाटा छाया
हुआ था। पीछे झांसी में आगें जल रही थी और आवाजे आ रही थी।
आगे अन्धकार मे जगल और गडमऊ का पहाड लिपटे हुये, दवे हुये से
दिखलाई पड़ रहे थे। चिडिया पेड़ो पर से भड-भडाकर उडती और घोड़ो
को चौंका देती। घोड़े जल्दी चलाये जाने के कारण ठोकर ले ले पड़ते
थे। आगे का मार्ग अन्धकार पूर्ण और भविष्य तिमिराच्छन्न। ज्यो त्यो
*यह फाटक ७५ वर्ष तक ज्यो का त्यो बन्द रहा। १९३३ के जाड़ो
में खोला गया।

रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजी सेना मे से माग बनाकर जवाहरसिंह, गुलमुहम्मद आदि
चुने हुये सरदारों के साथ झांसी छोड़ रही है।

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लक्ष्मीबाई ४२३

करके आरी नामक ग्राम के पास से यह टोली आगे गई। पहूज नदी
मिली। लोगो ने चुल्लुओ से पानी पिया और फिर आगे बढे। कभी
धीमी गति से कभी तेजी के साथ। जब दस बारह मील निकल आये तब
ये लोग कुछ क्षण के लिये ठहरे।
रानी ने जवाहरसिंह और रघुनाथसिंह से कहा, 'अब आप लोग
लौट जाओ और सेना एकत्र करके मुझे कालपी में आकर मिलो।'
रघुनाथसिंह ने तुरन्त कहा, 'यह कार्य दीवान जवाहरसिंह अच्छा
कर सकते है। मैं तो साथ चलूँगा।'
रानी मान गई। जवाहरसिंह ने उनके पैर छुये और कटीली की
ओर चला गया।
रानी की टोली आगे बढी। इसमें गुलमुहम्मद और उसके कुछ
पठान भी थे।
जनरल रोज को रानी के निकल जाने का पता बहुत शीघ्र लग
गया। उसने तुरन्त लैफ्टिनेण्ट बोकर नामक अफसर को कुछ गोरो और
निज़ाम हैदराबाद के एक दस्ते के साथ रानी का पीछा करने के लिये
भेजा।
मोरोपन्त भाडेरी फाटक से निकल कर अन्जनी की टौरिया तक
आया, परन्तु जैसे ही यहाँ लडाई छिडी, उसने समझ लिया कि हाथी
महान सकट का कारण होगा। उसने दतिया की दिशा मे हाथी को मोड
दिया और जितनी तेजी सम्भव थी उतनी तेजी के साथ भागा। कुछ अंग्रेज़
सवारो ने पीछा किया। उसकी जांघ मे किसी घुडसवार की तलवार का
घाव भी लगा, परन्तु वह निकल गया और सवेरे दतिया पहुँच गया।
एक तंबोली के यहा ठहरा। परन्तु छिपाये छिप नही सकता था।
राज्याधिकारियो को मालूम हो गया। राज्य ने हीरे जवाहर सब जब्त
कर लिये और मोरोपन्त को पकड़ कर तुरन्त झासी भेज दिया।
रोज़ ने दिन के दो बजे जलते हुये महल और भस्मीभूत पुस्तकालय
के वीचो बीच मोरोपन्त को फाँसी दे दी !

४२४ झांसी की रानी
[ ७७ ]
जैसे ही झलकारी को मालूम हुआ कि रानी भांडेरी फाटक से
बाहर निकल गयी, उसने चैन की साँस ली । घर के एक कोने में थोड़ी
देर पड़ी रही । पूरन बाहर से आया ।
बोला, 'अव इतै से भगने पर है ।'
झलकारी—'तुम चले जाओ । मै घरै हो । गोरा लुगाइयन से नईं
बोल है ।'
पूरन—'मै कहत इतै से चल । जिद्द जिन कर । तै मारी जैय और
मैं मारो जैंग्रो ।'
झलकारी—'देखो मोसे हठ न करो । कऊँ जा दुको । मैं घर न
छोड़ हो, न छोड़ हो, वालाजी की सौगन्ध ।'
पूरन उसके हठीले स्वभाव को जानता था । वह एक लोटा पानी
लेकर एक खण्डहल मे जा छिपा ।
थोड़ी देर में झलकारी को अपने दरवाजे के सामने घोडे की टाप का
शब्द सुनाहु पड़ा । झाँक कर देखा । बिना सवार का बढ़िया घोडा जीन
लगाम समेत । जीन से जान पडता था कि झाँसी की सेना का है ।
झलकारी समझ गई कि सवार,मारा गया और घोडा भाग खडा हुआ है ।
झलकारी ने किवाड खोले । घोडे को पकडा । और घर के पास
वाले पेड से बाँध दिया । फिर भीतर चली गयी ।
उसने एक योजना सोची और उसको कार्यान्वित करने का निश्चय
किया । जब उसने निश्चय किया तब वह सीधी तनकर खडी हो गयी थी ।
झलकारी ने अपना श्रृङ्गार किया । बढ़िया से बढ़िया कपडे पहिने
ठीक उसी तरह जैसे लक्ष्मीबाई करती थी । गले के लिये हार न था,
परन्तु काँच के गुरियो का कण्ठा था । उसको गले मे डाल लिया ।
प्रात काल की प्रतीक्षा करने लगी ।
प्रातःकाल के पहिले ही हाथ मुँह धोकर तैयार हो गई ।

[Page Header]
लक्ष्मीबाई ४२५

पौ फटते ही घोड़े पर बैठी और ऐंठ के साथ अङ्गरेज़ी छावनी
की ओर चल दी। साथ में कोई हथियार न लिया। चोली में केवल एक
छुरी रख ली।
थोड़ी ही दूर पर गोरो का पहरा मिला। टोकी गई।
झलकारी को अपने भीतर भाषा और शब्दो की कमी पहले पहल
जान पड़ी। परन्तु वह जानती थी कि गोरो के साथ चाहे जैसा भी बोलने
में कोई हानि न होगी।
झलकारी ने टोकने के उत्तर में कहा, 'हम तुम्हारे जडैल के पास
जाउता हैं।'
यदि कोई हिन्दुस्थानी इस भाषा को सुनता तो उसको हंसी बिना
आये न रहती।
एक गोरा हिन्दी के कुछ शब्द जानता था। बोला, 'कौन ?'
'रानी—झांसी की रानी, लक्ष्मीबाई,' झलकारी ने बड़ी हेकड़ी के
साथ जवाब दिया।
गोरो ने उसको घेर लिया।
उन लोगो ने आपस में तुरन्त सलाह की।
'जनरल रोज़ के पास अविलम्ब ले चलना चाहिये।'
उसको घेरकर गोरे अपनी छावनी की ओर बढे।
शहर भर के गोरो में हल्ला फैल गया कि झाँसी की रानी पकड़ ली
गई। गोरे सिपाही खुशी में पागल हो गये। उनसे बढकर पागल झलकारी
थी।
उसको विश्वास था कि मेरी जाच-पड़ताल और हत्या में जब तक
अङ्गरेज़ उलझेंगे तब तक रानी को इतना समय मिल जावेगा कि काफी
दूर निकल जावेगी और बच जावेगी।

४२६ झांसी की रानी
झलकारी रोज़ के सामने पहुंचाई गई । वह घोडे से नही उतरी ।
रानियो की सी शान, वैसा ही अभिमान, वही हेकड़ी । रोज़ भी कुछ देर
के लिये धोखे में आ गया ।
शकल सूरत वैसी ही सुन्दर । केवल रङ्ग वह नही था ।
रोज़ ने स्टुअर्ट से कहा, 'हाउ हैन्डसम, दो डार्क एण्ड टैरिबिल,
(कितनी सुन्दर है, यद्यपि श्यामल और भयानक)
स्टुअर्ट बोला, 'लैफ्टिनेंट बोकर को सदल व्यर्थ ही भेजा ।'
परन्तु छावनी में राव दूल्हाजू था । वह खबर पाकर तुरन्त एक
श्राड में आया । उसने बारीकी के साथ देखा ।
रोज़ के पास आकर दूल्हाजू बोला, 'यह रानी नही है जनरल
साहब । झलकारी कोरिन है । रानी इस प्रकार सामने नही आ सकती ।'
झलकारी ने दूल्हाजू को पहिचान लिया । उसको क्रोध आ गया
और वह अपना अभिनय नितान्त भूल गई ।
क्रुद्ध स्वर में बोली, 'अरे पापी, ठाकुर होकें तैंने जौ का करो ।'
दूल्हाजू जिमीन में गड सा गया ।
रोज़ को झलकारी की वास्तविकता समझाई गई ।
रोज़ के मुंह से निकला, 'यह औरत पागल हो गई है ।'
रोज़ ने झलकारी को घोडे पर से उतरवाया ।
रोज़—'तुम रानी नही हो । झलकारी कोरिन हो । तुमको गोली
मारी जायगी ।'
झलकारी ने निर्भय होकर कहा, 'मार दै, मैं का मरबे खो डरात हो ?
जैसे इत्ते सिपाही मरे तैमै एक मैं सही ।'
रोज ने झलकारी के पागलपने का कारण तलाश किया ।
मालूम होने पर दङ्ग रह गया ।
स्टुअर्ट बोला, 'शी इज मैड (वह पागल है) ।'

लक्ष्मीबाई ४२७
रोज़ ने सिर हिलाकर कहा, 'नो स्टुअर्ट । इफ़ वन परसेट आव
इण्डियन वीमन बिकम सो मैड एज़ दिस गर्ल इज वी विल हैव टु लीव
आल दैट वी हैव इन दिस कंट्री । (न स्टुअर्ट, यदि भारतीय स्त्रियो में
एक प्रतिशत भी ऐसी पागल हो जाये जैसी यह स्त्री है तो हमको
हिन्दुस्थान में अपना सब कुछ छोडकर चला जाना पडेगा ।' )
स्टुअर्ट की समझ में आया ।
रोज़ ने समझाया, 'यह स्त्री हम लोगो को अपने धोखे में उलझाकर
रानी के भाग निकलने का समय पाने के लिये यह प्रपञ्च रचकर आई है,
परन्तु बोकर पीछे पीछे गया है । आशा है कि वह इस धोखे से बच गया
होगा ।'
जनरल रोज़ ने झलकारी को तग नही किया । केवल कंद में डाल
दिया और एक सप्ताह उपरान्त छोड दिया ।

४२८ झाँसी की रानी

[ ७८ ]

सवेरा होते होते रानी भांडेर के नीचे बहने वाली पहूज नदी के
किनारे पहुँच गई । तुरन्त नहाया धोया, दामोदरराव को कलेवा करवाया ।
उनके साथियो ने भी थोडा-सा जलपान किया । रानी के केवल कुछ
अञ्जली पानी पिया । झासी की दुर्दशा और अपने स्नेहपात्रो के मारे
जाने के कारण, उनका कलेजा इतना भरा हुआ था कि कलेवा के नाम
से उनको अरुचि हुई ।
अन्तिम अञ्जनी का पानी मुह में डाला था कि झासी की ओर से
धूल उडती हुई दिखाई पडी । रानी ने समझ लिया कि पीछा करने वाले
लोग आ रहे हैं ।
गुलमुहम्मद ने दूरवीन से देखा । बोला, ‘ये अङ्गरेज लोग अमारा
इधर वी पिच्छा करता है । हुजूर आगे वढें । अम लोग देखता है ।’
‘नही,’ रानी ने कहा, और झटपट दामोदरराव को पीठ पर कसा,
घोडे पर सवार होकर बोली ।
‘इस तरह हम लोग बीन बीनकर मारे जायेगे । यहा आसपास
छोटो छोटी टोरिया हैं । इनके पीछे खड़े हो । जैसे ही वैरी का दस्ता
निकट आवे पिस्तौलें दागो । दस्ता बन्दूक या पिस्तोल से जवाब देगा,
जवाब चुकने पर तुरन्त तलवार से आक्रमण करो ।’
गुलमुहम्मद ने समझ लिया—थोड़े से आदमियो को लेकर रानी
कितने वडे दस्ते का मुक़ाबला कर सकती हैं !
रानी की टोली ने उसी आदेश के अनुसार काम किया ।
लैफ्टिनेट बोकर का दस्ता घुडसवारो का था । ठोस पात में वे लोग
घोड़े दौडाते हुये चले आ रहे थे । जैसे ही पिस्तौल की मार में आये रानी
की टोली ने आड से पिस्तोलो की बाढ दागी । वाढ का भयंकर प्रभाव
हुआ । बोकर के दल के पास पिस्तोले और बन्दूकें भी थी, परन्तु
बन्दूके श्रावरो में पडी हुई थी । उन्होने घबराकर पिस्तोलें खाली कर दी ।
रानी ने तुरन्त तलवार से हमला किया । अँग्रेज दस्ते के दो दो तीन तीन

लक्ष्मीबाई ४२६
सवार रानी के साथियो के पल्ले पडे। एक सवार को तो रानी ने कमाल
की सवारी करके घोडे समेत चीर दिया। बोकर रानी के ऊपर घोडे को
जोर की एड लगाकर लपका। रानी ने विलक्षण चतुरता के साथ अपने
घोडे को पीछे हटाकर बोकर के सपाटे को व्यर्थ कर दिया। फिर वह
उस पर झपटी और तलवार का वार किया।
बोकर घायल होकर गिरा। शेष दस्ता अपने प्राण लेकर भागा।
रानी पर भागते हुये सवारो में से एक ने गोली चलाई। रानी बच गयी,
गोली घोडे का पिछला हिस्सा छीलती हुई चली गई।
रानी की गाठ में अब केवल सुन्दर, गुलमुहम्मद, देशमुख और
रघुनाथसिंह बचे—बाकी सब मारे गये। परन्तु इन बहादुरो ने बोकर के
दस्ते को कुंठित कर दिया, लौटा दिया। बोकर को उसके सगी झासी
उठा ले गये। उसके लौटने पर रोज को झलकारी के कृत्य का पूरा मर्म
और अच्छी तरह समझ में आ गया।
रानी पहूज पार करके कालपी की ओर तेजी के साथ चल पडी।
मार्ग में उनका प्यारा घोडा यकायक रुका। उसके घाव से बहुत खून
निकल चुका था, और उसको दिल तोड परिश्रम करना पडा था। मर गया।
एक गाव वाले ने उनको अपना अच्छा घोडा दे दिया। रानी केवल पानी
पीती हुई आधीरात के लगभग कालपी पहुँची। एकसौ दो मील का
मार्ग तय करके। दिन भर कुछ भी न खाकर उस तेज धूप में इस पर भी
पहुँचते ही उन्होने काशीबाई और जूही के सम्बन्ध में तात्या से प्रश्न किया।
तात्या ने उत्तर दिया, 'काशीबाई झासी के संग्राम में मारी गई।
जूही बच गई। इस समय वह शिविर में रावसाहब के रनवास के साथ
है। आज्ञा हो तो बुलवाऊ ?'
'नही' रानी ने निषेध किया, 'कल सध्या समय मिलूँगी।'
इसके उपरान्त तात्या ने सविस्तार अपनी झासी वाली लडाई का
वृत्तान्त थोडे ही समय में सुना दिया। उन्होने धैर्य के साथ सुना।

४३० झाँसी की रानी
फिर उन्होने स्नान किया। कपडे बदले और केवल शर्बत पीकर
सो गयी।
इधर उस दिन झासी में जो कुछ हुआ वह एक अत्यन्त वीभत्स
काड है। इङ्गलेड के माथे का अमिट कलक। झासी उसको कभी न भूली।
किले पर अधिकार करने के बाद असख्य मकान जलाये गये।
बालक, युवा, वृद्ध गोलियो से उडाये गये। बेहद लूटमार की गई।
लाशो के ढेर लग गये। गाये और बछडे अनाथ होकर भटकने और
जलने लगे। सात दिन तक लाशे सडती रही। लगभग तीन सहस्त्र
निरपराध व्यक्तियो का वध किया गया।
महालक्ष्मी का मन्दिर लूटा गया।
अंग्रेजी सेना के नायको और ऊँचे अफसरो तक ने एक अत्यन्त
बर्बर कृत्य में भाग लिया। शेक्सपियर, मिल्टन, स्कॉट और बर्क के देश
के शिक्षित तथा विज्ञान विदग्ध अफसरो ने, मन्दिरो की मूर्तिया, सिंहासनो
पर से उठाईं, झोली मे रक्खी और अपने शराबखानो को सजाने के
लिये सदा के लिये ले गये और इस कुकृत्य को अंग्रेज़ इतिहास लेखक
ने इस प्रकार प्रकट किया, 'मूर्तियो का चुराना 'लूट' नही थी, यह तो
कुतूहल जनित जिज्ञासा की पूर्ति मात्र थी?'
मुरलीमनोहर के मन्दिर की मूर्ति बचा दी तो बुड्ढे पुजारी को
मन्दिर के भीतर ही मार डाला। उसके जवान लड़के को पकड़कर
मन्दिर के बाहर लाये। एक गोली चली। फिर उसकी बुड्ढी मा को, कभी
पता नही चला कि लडका कहा गया। *
पहले दिन अंग्रेजो ने लूटमार की। दूसरे दिन मद्रासी दस्ते को
अवसर दिया गया। तीसरे दिन निज़ाम हैदराबाद की पल्टन की बारी
आई। अनाज, बर्तन, कपडे तक न छोडे गये।

  • वृद्ध पुजारी का नाम रामचन्द्र गोलवलकर और लड़के का नाम
    कृष्णाराव था।

लक्ष्मीबाई ४३ .
केवल एक स्थान वध से बचा । वह था बिहारीलाल जी का
मन्दिर । कदाचित इस कारण कि वह एक कोने में था और उस पर कोई
शिखर न था ।
आरम्भ के कत्ल के बाद कुछ लोग माधवराव भिढे के बाग में आ
छिपे । एक अंग्रेज़ अफ़सर के हृदय के किसी कोने मे कुछ मानवता बाकी
थी । उसने इन लोगो का वध नही होने दिया । इस बाग की चौडी
दीवारे पोली थी । पूना के पास का एक शास्त्री उन दिनो अपने दुर्भाग्य
से झाँसी में आ फँसा था । वह दीवार की एक खोल मे रात भर ठुसा
रहा । पीठ से पीठ सटा कर वही एक स्त्री भी प्राणो की खैर मनाती
रही । समय पाकर शास्त्री किसी प्रकार अपने निवास स्थान पर पहुचा ।
तमाखू खाने की आदत थी, पर लुटेरे घर में से उसे भी गत दिवस की
लूट में उठा ले गये थे । उसी समय कुछ मदरासी दस्ते वाले फिर घुस
आये । उन्होने बचे खुचे बर्तन भी खसोटे । शास्त्री ने भी अपनी एक
ज़रूरत पूरी की ।
लुटेरो से कहा, 'थोडी खाने की तमाखू हो तो दिये जाओ ।'
बर्तनो के बदले में थोडी सी तमाखू मिल गई ! विदेशी होते तो
शायद खाने को संगीन मिलती ।
रोज का एक दस्ता घूमता भटकता, टक्करें लेता देता मऊरानीपुर
होकर निकला । झाँसी के पतन का समाचार पाने पर भी काशीनाथ
भैया और आनन्दराय इस दस्ते से भिड गये ।
मऊ की गढी छोटी सी थी । तोपे गाँठ में न थी । इसलिये ये लोग
अपना छोटा सा बन्दूकची दल लेकर मऊ के बाहर की टौरिया की आड
में पहुचे और मुकाबला किया । खूब डटकर लडे और सब मारे गये ।
आनन्दराय का लडका भी साथ था । मरने के पहले आनन्दराय ने
लडके से कहा,
'यदि कभी रानी साहब के दर्शन हो, तो कहना कि मऊ झाँसी से
पीछे नही रही ।'

४३२ झांसी की रानी
लड़का कुछ महीने बाद गिरफ्तार हो गया । परन्तु उन्ही दिनो
विक्टोरिया की क्षमा घोषणा हुई और वह फांसी से बच गया । इस
प्रकार की घटनाये झासी जिले के उन सब गावो में हुई जहां एक छोटी
मोटी भी गढी थी, और जनता को हथियार पकडने की सांस मिली थी ।
आठवे दिन झाँसी में रोज़ का एलान हुआ, 'खलक खुदा का,
मुल्क बादशाह का, अमल कम्पनी सरकार का।'
परन्तु इन सात दिनो हवा में जो स्तब्ध घोषणा घूमी थी यह थी,
'खलक शैतान का, मुल्क शैतान का, अमल शैतान का।'
रोज को झाँसी जिले में 'कम्पनी सरकार का अमल' कायम करने
में करीब एक महीना लग गया ।

लक्ष्मी बाई ४३३
[ ७६ ]
कालपी खासा नगर था । यमुना नदी के किनारे । एक और मजबूत
किला । तीन ओर परकोटा, और चौथी ओर यमुना नदी । किले के
पश्चिम की तरफ एक मैदान, उसके बाद नगर । नगर से कुछ दूर चौरासी
गुम्बज का क्षेत्र । छत्रसाल के पीछे कालपी का भूखंड गोविन्दपन्त के
अधिकार में आया। सन् १८०६ की सन्धि के द्वारा अंग्रेजो ने गोविन्दपन्त
के वंशजो से कालपी को पाया । सन् १८२५ में इसी वंश के एक नाना
पंडित ने कालपी को फिर अपने हाथ में कर लिया, परन्तु झाँसी के राजा
रामचन्द्रराव की सहायता से अंग्रेजो ने कालपी को वापिस ले लिया ।
सन् १८५७ के विप्लव में कालपी की छावनी ने कानपुर से आये हुये
विप्लवकारियो का साथ दिया । थोड़े समय उपरान्त रावसाहब अपनी
सेना यहा लेकर आगया और कालपी-नगर विल्पकारियो का एक प्रधान
अड्डा बन गया ।
जब रानी कालपी पहुँची रावसाहब-नाना का भाई-और तात्या
वही थे ।
दूसरे दिन रानी की इन लोगो से भेट हुई रानी का इन लोगो ने जी
खोलकर आदर सत्कार किया ।
परन्तु रानी आदर की भूखी न थी । वे काम चाहती थी । लेकिन
वह कालपी में अस्तव्यस्त था । तात्या सरीखे उत्कृष्ट सेनापति के होते
हुये भी सेना का प्रबन्ध अव्यवस्थित था । कारण तात्या का एक स्वभाव-
गत दोष था--वह था रावसाहब को अपने तनमन का सम्पूर्ण स्वामी
मानना और अपने सैनिको के व्यसनो को क्षमा करते रहना । रावसाहब
का और सैनिको का, वह अत्यन्त स्नेहभाजन था, परन्तु इससे सेना की
अनुशासनहीनता की पूर्ति नही हो सकती थी ।
रानी की सूक्ष्म दृष्टि ने इस बात को शीघ्र देख लिया ।
विश्राम करने के बाद सन्ध्या समय रानी उन लोगो से मिली ।

४३४ झाँसी की रानी

रानी ने सेना के अनुशासन, क़वायद-परेड और युद्ध सामग्री इत्यादि
प्रसङ्गो पर प्रश्न किये । सिवाय युद्ध सामग्री के और सब प्रसङ्गो पर
उनको असन्तोषजनक उत्तर मिले ।
रानी ने अन्त में कहा, 'बहुत कसर है, रावसाहब ।'
राव जल्दी से बोला, 'सब ठीक हो जायगा बाईसाहब, शीघ्र सब
ठीक हो जायगा । इन्ही सिपाहियो और इसी तात्या ने तीन वडे बड़े
जनरलो को हराया और बहुतसों को छकाया ।'
'चौथा भी हराया जा सकता था' रानी ने कहा, 'परन्तु हमारी ओर
से एक अनिवार्य गलती हुई ।'
तात्या उनके मुँह की ओर देखने लगा ।
रानी बोली, 'उस दिन मेरे गोलन्दाजो ने भरपूर गोलाबारी न करने
की सम्मति दी और मैने मान ली । एक भय था भी—कही हमारे किले
की गोलाबारी से आपकी सेना नष्ट न हो जाय । फिर भी चूक हुई ।
यह मानना पड़ेगा ।'
तात्या ने कहा, 'उस दिन आपकी सेना को कोट के बाहर निकलकर
अङ्गरेजी सेना पर छापा मारना था ।'
'टौरियो की ओट पड़ जाने से कालपी की सेना अदृश्य हो गई,'
रानी बोली, 'मालूम नही पड़ता था कि किस ओर से प्रकट होगी । फिर
सन्ध्या हो गई और प्रतीत हो गया कि कालपी की सेना लौट गई, और
झाँसी अकेली रह गई ।'
रावसाहब ने कहा, 'अब सब ठीक हो जायगा बाईसाहब । आप कुछ
चिन्ता न करे । नाना साहब लखनऊ की ओर प्रयत्नशील हैं । वानपूर
और शाहगढ के राजा तथा बादा के नवाब ससैन्य शीघ्र कालपी आ रहे
हैं । हम लोग यहा योजना तैयार कर के, फिर कानपुर और झासी को
हस्तगत करेगे ।'
सन्ध्या समय रानी को जूही मिली । वह फूट-फूटकर रोई । रानी ने
शान्त किया । समझाया ।

लक्ष्मीबाई ४३५
'जूही, तपस्या में क्षय पहले है और अक्षय पीछे। यह युद्ध स्वराज्य
की अन्तिम साधना नही है और न हम लोग उसके अन्तिम साधक ।'
फिर रानी ने अपने स्त्री-पुरुष वीरो के बलिदानो की कथा सुनाई।
जूही ने कहा, 'मोतीबाई के साथ में भी घायल होती तो इसी
गोद में प्राण जाते ।
'सहज ही प्राण त्याग मत न करो जूही, 'रानी बोली, 'अभी बहुत
काम करने को पडा है।'
दूसरे ही दिन पेशवा की सेना को व्यवस्थित करने की योजनाये
बनानी प्रारम्भ करदी, कुछ कार्यान्वित हुई । अनेक पेशवा की ढील-
ढाल में यो ही पडी रही ।
कालपी की सेना का शिथिल सङ्गठन देखकर रानी का जी दुख दुख
जाता था।

४३६ झांसी की रानी
[ ८० ] ,
अप्रैल के तीसरे सप्ताह मे बानपूर, शाहगढ और बादा की सेनाये
कालपी मे आगई । झांसी का कडा प्रबन्ध करके रोज़ ने अप्रैल की
पच्चीस तारीख को कालपी पर चढाई की आज्ञा दी । इसी समय उसको
खबर मिली कि रानी कोंच होती हुईं झांसी पर फिर आने वाली हैं ।
रोज़ का एक दस्ता पूँछ पहाडगाव पर पहुचा । विद्रोहियो से कर्री
मुठभेड़ हुई । अग्रेजी दस्ता सफल हुआ । फिर एक युद्ध सैदनगर कोटरा
पर हुआ । अग्रेजी दस्ता हारा ।
कोच पर अधिकार करने के लिये रोज़ ने लुहारी के किले को लेने
का पहले प्रयत्न किया । कोच में पेशवा की काफी सेना इकट्ठी हो गई ।
बानपूर और शाहगढ के राजा तथा बादा के नवाब भी यही आगये ।
पुनः बीस सहस्र सैनिक इकट्ठे हो गये । रानी और तात्या सरीखे
सेनापति । किस बात की कमी थी ? जिस बात की कमी थी उसको
रानी जानती थी । इस सेना में बहुत से लुटेरे और बदमाश भी इकट्ठे हो
गये थे । उनको स्वराज्य या युद्ध में उतनी रुचि न थी जितनी विजय या
पराजय के उपरान्त लूट खसोट करने में थी, वे इतने पतित थे कि मौका
मिलने पर अपनी ही छावनी को लूट सकते थे । इस सेना में बहुत से तो
कवायद परेड ही नही जानते थे और अनुशासन का नाम न सुना था ।
वे केवल अपने सरदारो का, यां जिन्होने उनको भर्ती किया था उनका,
आदेश मानने को तैयार थे । सो भी उतना, जितना उनके मन के
अनुकूल होता । रानी का बस चलता तो वे कम से कम आधी सख्या को
अपने अपने घर लौटा देती ।
केवल कल्पना में इस सेना का प्रधान संचालक रावसाहब था ।
वास्तव में अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग था । पूर्ण सत्ता एक
व्यक्ति के हाथ मे न थी । और युद्ध को सफलता-पूर्वक लडने के लिये,
सैन्य सचालन एकाधिपत्य चाहता है, वह इस सेना में न था ।

लक्ष्मीबाई ४३७
उधर रोज ल्हारी के किले को, कोच का पहला मोर्चा समझ कर
ले लेने के प्रयत्न में था, इधर कोच में रात को रावसाहब, बानपूर और
शाहगढ के राजा तथा बांदा के नवाब की इच्छा नाच देखने को हुई ।
इन लोगो ने सुना था कि झासी की जूही, जो उस समय कोच में रानी
के शिविर में थी, बहुत अच्छा नाचती है । इसलिये भंग पीने के उपरान्त
उसके बुलाने का हठ किया गया ।
रावसाहब को सरूर आ चुका था, परन्तु जवान ढीली नही हुई थी ।
तात्या को बुलाया । वह भङ्ग नही पिये था । न पीता था ।
रावसाहब ने कहा, 'आज दिन में बहुत गरमी रही । अब ठण्डक
है । सब लोग मजे में हैं । युद्ध पर युद्ध होते रहते हैं । बीच बीच में कुछ
आनन्द भी चाहिये ।'
तात्या ने खीज को दबा कर निवेदन किया, 'आज्ञा हो ।'
'अरे यार मेरे, बादा,के नवाब ने कहा, 'और आज्ञा होगी ही क्या ?
किसी को नाचने गाने के लिये बुला लाओ ।'
बानपूर का राजा बोला, 'सरदार साहब, माफ करना आप शंकर
की बूटी का सेवन नही करते, इसलिये इस मजे को नही जानते, परन्तु
हम लोगो के मन तो बढावे पर, इन्ही कमानो पर आते हैं ।'
शाहगढ का राजा जरा और अग्रसर हुआ, 'भाई टोपे साहब, वह
जो झाँसी का तुहफा छावनी में है, उसका नृत्यगान कब देखने को
मिलेगा ?'
तात्या सन्नाटे में आ गया ।
रावसाहब ने कहा, 'उसका नाम जूही है । बडा सुन्दर नाम है ।
सिपाहीगरी भी करती है और नृत्यगान भी । झाँसी की नाटकशाला में
बढिया अभिनय करती थी । बेढब हाव भाव । जब से यहा आई, उदास
बनी रही । मातमसा मानती रही । अब उसकी स्वामिनी आ गई, हैं
प्रसन्न है । नाचने गाने को नाही करने का कोई कारण नही । रात भी