झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
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जैसे ही झलकारी को मालूम हुआ कि रानी भांडेरी फाटक से
बाहर निकल गयी, उसने चैन की साँस ली । घर के एक कोने में थोड़ी
देर पड़ी रही । पूरन बाहर से आया ।
बोला, 'अव इतै से भगने पर है ।'
झलकारी—'तुम चले जाओ । मै घरै हो । गोरा लुगाइयन से नईं
बोल है ।'
पूरन—'मै कहत इतै से चल । जिद्द जिन कर । तै मारी जैय और
मैं मारो जैंग्रो ।'
झलकारी—'देखो मोसे हठ न करो । कऊँ जा दुको । मैं घर न
छोड़ हो, न छोड़ हो, वालाजी की सौगन्ध ।'
पूरन उसके हठीले स्वभाव को जानता था । वह एक लोटा पानी
लेकर एक खण्डहल मे जा छिपा ।
थोड़ी देर में झलकारी को अपने दरवाजे के सामने घोडे की टाप का
शब्द सुनाहु पड़ा । झाँक कर देखा । बिना सवार का बढ़िया घोडा जीन
लगाम समेत । जीन से जान पडता था कि झाँसी की सेना का है ।
झलकारी समझ गई कि सवार,मारा गया और घोडा भाग खडा हुआ है ।
झलकारी ने किवाड खोले । घोडे को पकडा । और घर के पास
वाले पेड से बाँध दिया । फिर भीतर चली गयी ।
उसने एक योजना सोची और उसको कार्यान्वित करने का निश्चय
किया । जब उसने निश्चय किया तब वह सीधी तनकर खडी हो गयी थी ।
झलकारी ने अपना श्रृङ्गार किया । बढ़िया से बढ़िया कपडे पहिने
ठीक उसी तरह जैसे लक्ष्मीबाई करती थी । गले के लिये हार न था,
परन्तु काँच के गुरियो का कण्ठा था । उसको गले मे डाल लिया ।
प्रात काल की प्रतीक्षा करने लगी ।
प्रातःकाल के पहिले ही हाथ मुँह धोकर तैयार हो गई ।