झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई (१८५७ स्वातन्त्र्य समर की अमर वीरांगना शौर्य इतिहास)
Rani Lakshmibai of Jhansi Historical Biography
वृन्दावनलाल वर्मा / ऐतिहासिक शोध द्वारा
पृष्ठ 444, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्मीबाई ४३ .
केवल एक स्थान वध से बचा । वह था बिहारीलाल जी का
मन्दिर । कदाचित इस कारण कि वह एक कोने में था और उस पर कोई
शिखर न था ।
आरम्भ के कत्ल के बाद कुछ लोग माधवराव भिढे के बाग में आ
छिपे । एक अंग्रेज़ अफ़सर के हृदय के किसी कोने मे कुछ मानवता बाकी
थी । उसने इन लोगो का वध नही होने दिया । इस बाग की चौडी
दीवारे पोली थी । पूना के पास का एक शास्त्री उन दिनो अपने दुर्भाग्य
से झाँसी में आ फँसा था । वह दीवार की एक खोल मे रात भर ठुसा
रहा । पीठ से पीठ सटा कर वही एक स्त्री भी प्राणो की खैर मनाती
रही । समय पाकर शास्त्री किसी प्रकार अपने निवास स्थान पर पहुचा ।
तमाखू खाने की आदत थी, पर लुटेरे घर में से उसे भी गत दिवस की
लूट में उठा ले गये थे । उसी समय कुछ मदरासी दस्ते वाले फिर घुस
आये । उन्होने बचे खुचे बर्तन भी खसोटे । शास्त्री ने भी अपनी एक
ज़रूरत पूरी की ।
लुटेरो से कहा, 'थोडी खाने की तमाखू हो तो दिये जाओ ।'
बर्तनो के बदले में थोडी सी तमाखू मिल गई ! विदेशी होते तो
शायद खाने को संगीन मिलती ।
रोज का एक दस्ता घूमता भटकता, टक्करें लेता देता मऊरानीपुर
होकर निकला । झाँसी के पतन का समाचार पाने पर भी काशीनाथ
भैया और आनन्दराय इस दस्ते से भिड गये ।
मऊ की गढी छोटी सी थी । तोपे गाँठ में न थी । इसलिये ये लोग
अपना छोटा सा बन्दूकची दल लेकर मऊ के बाहर की टौरिया की आड
में पहुचे और मुकाबला किया । खूब डटकर लडे और सब मारे गये ।
आनन्दराय का लडका भी साथ था । मरने के पहले आनन्दराय ने
लडके से कहा,
'यदि कभी रानी साहब के दर्शन हो, तो कहना कि मऊ झाँसी से
पीछे नही रही ।'