रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
८४२ रामायणमीमांसा एकत्रिंश
इससे बढ़कर कौन सी कसौटी चाहिये, जगत् की असत्यता में और भगवान् की सत्यता में। इसके विरोध
में तुलसी, शिव, याज्ञवल्क्य, भुशुण्डि किसी ने कहीं भी कुछ नहीं कहा। फिर इन सिद्धान्त-वचनों को असत्य कैसे
कहा जा सकता है।
"सुनि शिव के भ्रमभंजन बचना। मिट गइ सब कुतर्क की रचना ॥" (रा० मा० १।११८।४)
भगवान् सिव के भवभञ्जन वचन में भी भ्रम की कल्पना सचमुच मोह एवं अहङ्कार रूपी भूत की ही
करामात है।
इसी प्रकार कर्मसिद्धान्त भी सिद्धान्त ही है।
"कर्मप्रधान विश्व रचि राखा। जो जस करइ सो तस फल चाखा ॥" (रा० मा० १।२१७।१)
गोस्वामीजी भी यही कहते हैं—
"यद्यपि सम नहिं राग न रोषू। गहहिं न पुन्य पाप गुन दोषू ॥
तदपि करहिं सम बिषम बिहारा। भक्त अभक्त हृदय अनुसारा ॥" (रा० मा० २।२१७।२, ३)
कर्मसिद्धान्त की व्यावहारिक स्थिति का सांकर्य करना असंगत ही है। भले ही किसी व्यक्ति को अपने
कर्म के अनुसार मरना हो तथापि मारनेवाला यह कहकर मुक्त नहीं हो सकता कि वह अपने कर्म के अनुसार मरा है।
इसमें हमारा दोष नहीं। किसी को फाँसी की सजा भी सुनायी गयी हो तथापि फांसी देने के लिए अधिकृत व्यक्ति
ही. उसे फाँसी दे सकता है। अनधिकृत व्यक्ति वैसा करेगा तो वह स्वयं ही दण्ड का भागी होगा। हर व्यक्ति के
सामने अपना कर्तव्य है।
भले ही व्यवहार में मुकाबले में प्रहार करनेवाले के प्रहार को विफल करने का एवं अपने रन्ध्रों के गोपन
पर रन्ध्रान्वेषण करके प्रहर्त्ता को दण्ड देने का प्रयास भी किया जाता है और वैसा करना नीतिशास्त्र से सम्मत है।
वैसा न करना ही दोष है। जैसा कि भगवान् ने कहा है कि—अर्जुन ! यदि तुम धर्मयुक्त संग्राम से मुँह मोड़ोगे तो
स्वधर्म एवं कीर्ति को त्यागकर पाप के भागी बनोगे—
"अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिञ्च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥" (गीता २।३३)
अतः वह विचार गलत है जो तुमने सोचा था कि यदि प्रतीकार न करनेवाले और शस्त्र न उठानेवाले
मुझपर शस्त्रपाणि दुर्योधनादि धार्तराष्ट्र प्रहार कर हनन करेंगे तो यह मेरे लिए अच्छा है—
"यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥" (गीता १।४६)
प्रारब्ध दैव और प्राक्तन कर्म सिद्धान्त को समझनेवाला व्यक्ति किसी भी इष्टानिष्ट घटनाओं के घट जाने
पर उन्हें प्रारब्धजनित जानकर शोक-मोहरहित होकर रागद्वेष से अलिप्त होकर कर्तव्य पालन में लगता है।
सामान्यतया दैव अदृष्ट प्रारब्ध कर्म अचिन्त्य होता है। फल के पहले उसका ज्ञान ही नहीं होता है। वह
फलबल से ही कल्प्य होता है। फल होने के बाद दैव का ज्ञान होता है। परन्तु तब वह रहता ही नहीं, फिर उससे
युद्ध कैसा ?
यही बात श्रीराम ने लक्ष्मण को समझाते हुए तब कही थी जब उन्होंने कहा था कि आज मेरे बाणों से
विदीर्ण हो रणाङ्गण में पड़े हुए दैव को लोग देखेंगे।
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८४३
"यदचिन्त्यं तु तद्देवम्......।।" (वा० रा० १।२२।२०)
तीव्रतम पुरुषार्थ करने पर भी सफलता नहीं मिलती तब फलबलकल्प्य प्रबल दैव को जानकर संतोष किया
जा सकता है। यही अभिप्राय निम्नोक्त वचनों का है—
"काहु न कोउ सुख दुःख कर दाता। निजकृत करम भोग सुन भ्राता।।"
"सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता। परो ददातीति कुबुद्धिरेषा।।" इत्यादि
अधिक सूक्ष्म विचार करने पर यह भी सिद्ध होता है कि संसार में वास्तव में कोई शत्रु या मित्र नहीं।
अपने आप ही प्राणी अपना मित्र है और वही अपना शत्रु है—"आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः"
(गीता ६।५) प्राणी का शुभ कर्म ही उसका मित्र बनकर सुख देता है। उसका अशुभ कर्म ही उसका शत्रु
बन उसे दुःख देता है। अतः व्यावहारिकरूप से धर्मशास्त्र तथा नीतिशास्त्र के अनुसार देश, काल तथा
परिस्थिति के अनुसार उचित कर्तव्य पालन करते हुए भी प्राणी राग-द्वेष से मुक्त होकर स्वस्थ शोकमोहातीत हो
सकता है।
यह कहना भी गलत है कि "कर्मसिद्धान्त अकाट्य प्रमाणित नहीं है। यह सिद्धान्त जितना शक्तिशाली
है मूलका प्रश्न आते ही इसकी निर्बलता उतनी ही प्रकट होती है। यदि कर्म के अभाव में सृष्टि संभव न हो तो
विश्वोद्भव के प्रथम अवसर पर कर्म का निर्माण कैसे हुआ ? यदि पूर्व में कर्म नहीं था तो सृष्टि कैसे बनी ? पर
यदि सृष्टि ही न होगी तो कर्म कैसे होगा ? अतः कर्म और सृष्टि के आदि का विचार करते हुए असंगति लगने
लगती है। अनादि कहकर मूल पर विचार करने की परिस्थिति से बचने की प्रवृत्ति यहाँ स्पष्ट हो जाती है।"
क्योंकि यह सब शास्त्रीय व्यवस्थाओं के न जानने का परिणाम है। सब ज्ञान मानस से ही नहीं होगा। शास्त्रों की
भी अपेक्षा है। विवाह, जनेऊ आदि संस्कार भी केवल मानस की चौपाइयों से ही कराने की कोशिश करना मानस-
भक्ति का दुरुपयोग ही है।
ब्रह्मसूत्र में विचार—श्रुति कहती है कि परमेश्वर जिसे उत्कृष्ट ब्रह्म, इन्द्र आदि लोकों में ले जाना चाहता
है उससे साधु कर्म कराता है। ईश्वर जिसे निकृष्ट लोकों में ले जाना चाहता है उसे निकृष्ट कर्मों में लगा देता
है—"एष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते एष उ एवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते"
(कौ० उ० ३।८) परन्तु ऐसी स्थिति में ईश्वर में वैषम्य और नैर्घृण्य दोष उपस्थित होते हैं। वह क्यों किसी से
साधु कर्म कराता है और क्यों किसी से असाधु कर्म कराता है ? क्यों किसी को उत्कृष्ट लोक में ले जाता है एवं क्यों
किसी को निकृष्ट लोकों में ले जाता है ? वह तो सर्वत्र समान है। उसका कोई द्वेष्य अप्रिय नहीं है। फिर ऐसी
विषम सृष्टि रचना से किसी को उन्नत और किसी को दीन-हीन, दरिद्र, दुःखी बनाने से तो उसमें विषमता, निर्दयता
आदि दोष उपस्थित होते ही हैं।
इन सब बातों का समाधान करते हुए कहा गया है कि "वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथाहि दर्शयति
(ब्र० सू० २।१।३४) ईश्वर में वैषम्य और नैर्घृण्य दोष नहीं होंगे, क्योंकि वह कर्मसापेक्ष होकर कर्मों के अनुसार
ही विषम सृष्टि की रचना करता है। प्राणियों के कर्मों की विषमता से ही सृष्टि में विषमता होती है। वृष्टि
होने पर धरित्री से विविध विलक्षण पौधे उत्पन्न होते हैं। बीजों की विलक्षणता से ही पौधों में विलक्षणता होती
है। शासन भी कर्मों के अनुसार ही निग्रहानुग्रह करता है। वैसे ही परमेश्वर भी कर्मों के अनुसार ही प्राणियों को
विविध देह तथा सुख, दुःख एवं तदनुगुण सामग्रियाँ प्रदान करता है। ऐसी स्थिति में विश्वोद्भव के प्रथम अवसर
का प्रश्न ही नहीं उठता है।
८४४ रामायणमीमांसा एकविंश
कर्म और सृष्टि की परम्परा को अनादि कहना मूल विचार से बचने की प्रवृत्ति नहीं है, किन्तु वस्तुस्थिति
है । आम की गुठली और आम के पौधे की धारा या किसी भी बीज और अङ्कुर की धारा को अनादि बिना स्वीकार
किये कैसे समाधान होगा ?
वहाँ अनादि कल्पना अन्धपरम्परा कही जाती है जहाँ कार्यकारणभाव के निर्णयार्थ अनादिता का सहारा
लेना पड़ता है । प्रकृत में तो स्पष्ट ही बीज से अङ्कुर और अङ्कुर से बीज उत्पन्न होते हुए दिखायी देते हैं । अतः
बीज एवं अङ्कुर की अनादि धारा मान्य ही हैं । जगने पर व्यक्ति के मन में सोने से पहले के संस्कार जग उठते हैं ।
पूर्व पूर्व दिनों के अनुसार ही उत्तरोत्तर दिनों के सब व्यवहार चलते हैं । अतएव सोने तथा जगने की धारा की
अनादिता स्पष्ट ही है ।
जन्म-मरण एवं सृष्टि-प्रलय भी एक प्रकार का सोना-जागना ही है । किसी कारण अत्यन्त विस्मृति होना
ही मृत्यु है और सर्वरूप से विषयों की स्वीकृति ही जन्म है—
“जन्तौर्वै कस्यचिद्धेतोर्मृत्युर्त्यन्तविस्मृतिः ।
जन्म त्वात्मतया पुंसः सर्वभावेन भूरिद ॥
विषयस्वीकृतिं प्राहुर्रथा स्वप्नमनोरथौ ॥”
अतः जब सोने और जगने की धारा अनादि हैं ही तब इसी तरह जन्म-मरण और सृष्टि-प्रलय की धारा
को भी अनादि मानना उचित ही है ।
अनादि पदार्थ नहीं हैं यह भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि जीव और ईश्वर अनादि रूप से सबको
मान्य हैं ही ।
‘ प्रकृतिं पुरुषञ्चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।’ ( गीता० १३।१९ )
उसी अनादि जीव के सम्बन्ध से अनादि जन्म-मरण की धारा चलती है । अनादि ईश्वर के आश्रित अनादि
सृष्टि से संहार की परम्परा मान्य है । जैसे कर्मों के अनुसार जन्म-मरण की धारा चलती है। वैसे कर्त्रों के अनुसार
ही सृष्टि-प्रलय की धारा भी चलती है । अनादि होने पर भी जैसे पाकज क्रिया से परमाणु की श्यामता नष्ट होती
है एवं बीज में अनादि परम्पराप्राप्त अङ्कुरोत्पादिनी शक्ति बीजाग्निसंयोग से नष्ट हो जाती है, वैसे ही अनादि
होने पर भी तत्त्वज्ञान के सम्बन्ध से अनादि सृष्टि कर्म की धारा तथा कर्म जन्म धारा बन्द हो जाती है। अतएव
माया, जीव आदि अनादि सान्त होते हैं । केवल एक परमेश्वर ही अनादि-अनन्त होता है। इसलिए अनादि
माया, अज्ञान एवं संसार की बाधसामग्री ब्रह्मात्मज्ञान है और अनादि ब्रह्म के बाध की सामग्री नहीं है । अतः वह
अनन्त है ।
सुख, दुःख, सम्पत्ति, विपत्ति सब व्यावहारिक लौकिक वस्तुएँ हैं उन्हीं की व्यवस्थाओं का नियामक कर्म
हैं । परन्तु तत्त्वज्ञान के द्वारा जैसे माया अज्ञान कार्य संसार बाधित हो जाता है। वैसे ही कर्म भी बाधित हो
जाता है—
“भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः ।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ।” ( मु० उ० २।२।८ )
परावर ब्रह्म का अपरोक्ष साक्षात्कार होने पर हृदयग्रन्थि ( आत्मा एवं अनात्मा का अन्योन्याध्यास )
भिन्न हो जाती हैं । सत्य रज्जु की ग्रन्थि तो ज्ञानमात्र से नहीं खुलती और खुलने पर भी दोनों रस्सियां विद्यमान
रहती हैं । परन्तु चिज्जड की ग्रन्थि तो सत्यानृत की ग्रन्थि है। यहाँ तो ग्रन्थि खुलने पर सत्य ही रह जाता है ।
अनृत मिट जाता है । तभी तो तुलसी ने इसे मृषा मिथ्या कहा है—
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८४५
“जड़ चेतनहि ग्रन्थि परि गयी। यद्यपि मृषा छूटत कठिनयी ॥
सब संशय छिन्न हो जाते हैं। प्रारब्ध से अतिरिक्त सब कर्म क्षीण हो जाते हैं। गीता भी कहती है—
“ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।” ( गीता ४।३७ )
जब सुख, दुःख, हानि लाभ नहीं तब कर्म का उपयोग भी क्या है ? इसी लिए लखनलाल ठीक ही
कहते हैं कि—
“योग वियोग भोग भल मन्दा । हित अनहित मध्यम भ्रम फन्दा ॥
जनम करम जहँ लगि जग जालू । संपति विपति करम अरु कालू ॥
देखिय सुनिय गुनिय मन माहीं । मोहमूल परमारथ नाहीं ।। (रा० मा० २।९१।३,४)
एक ब्रह्म ही भगवान् ही परमार्थ परम सत्य है । तद्भिन्न सब कुछ मोहमूलक है । परमार्थ नहीं है,
मिथ्या है, सीमित सत्य है। यह भी सृष्टि के मिथ्यात्व की कसौटी ही तो है।
“सपने होइ भिखारि नृप रङ्क नाकपति होइ ।
जागे हानि न लाभ कछु तिमि प्रपञ्च जग जोइ ।।” ( रा० मा० २।९१ )
इतने स्पष्ट रूप से प्रपञ्च का मिथ्यात्व परमेश्वर का परम सत्यत्व वर्णित होने पर भी मानस के नाम
पर सभी सत्यों को सीमित कहकर अव्यवस्था फैलाना अनुचित है ।
यदि ब्रह्मात्मसाक्षात्कार से सुख, दुःखादि प्रपञ्च बाधित हो सकते हैं तब यही तो उसका मिथ्यात्व है ।
वासनानिवृत्ति, वैराग्य आदि तो वास्तविक ज्ञानाभ्यास के सहभावी होते हैं । तत्त्वज्ञान, मनोनाश,
वासनाक्षय का सहाभ्यास हो लाभदायक होता है। जब तत्त्वज्ञान से दृश्य प्रपञ्च का मार्जन हो जाता है तब निर्दृश्य
विशुद्ध ब्रह्मात्मा का अवशेष रहता है । फिर चित्त की एकाग्रता या मनोनाश तथा वासनाक्षय होने से पूर्ण जीवन्मुक्ति
होती ही है । अतएव मिथ्यात्व सिद्धान्त के साथ वैराग्य के दृष्टिकोण को जोड़ लेने का प्रश्न ही नहीं उठता ।
“मोह निशा सब सोवनि हारा । देखिय सपन अनेक प्रकारा ॥
एहि जग जामिनि जागहिं योगी । परमारथी प्रपञ्च बियोगी ॥
जानिय तबहिं जीव जब जागा । जब सब विषय विलास बिरागा ॥
होइ बिबेक मोह भ्रम भागा । तब रघुनाथचरन अनुरागा ।।” (रा०मा०२।९२।१-३)
श्रीराम ही परमार्थ सत्य हैं। तद्भिन्न सब अपरमार्थ है। व्यावहारिक या सीमित सत्य है । वस्तुतः
शास्त्रों के प्रसिद्ध सिद्धान्तों का ही मानस में वर्णन है। राम ने, लक्ष्मण ने, भरत ने एवं शिवजी ने कोई नया
सिद्धान्त नहीं कहा ।-
राम ब्रह्म परमारथ रूपा । अबिगत अचल अनादि अनूपा ॥
सकल बिकार रहित गतभेदा । कहि नित नेति निरूपहिं बेदा ।।” (रा०मा०२।९२।३)
मिथ्यात्व सिद्धान्त किस कसौटी पर खरा नहीं उतरता, यह नहीं दिखलाया गया । प्रतिज्ञामात्र से वस्तु-
सिद्ध नहीं होती । उसके लिए प्रमाण की अपेक्षा होती है ।
कहा जाता है कि “बाह्य वर्णव्यवस्था के स्थान पर आन्तर मन की वर्णव्यवस्था को बनाकर विचार
करना चाहिये । बाह्य व्यवहार में हम अपने वर्गविशेष से इतने बँध चुके हैं कि सत्य भी हममें आक्रोश की सृष्टि
करता है। वह संघर्ष अपनों और परायों का भी बन जाता है। आन्तर में भी वही भेद हैं। पर वहाँ अपने पराये
[८४६ : रामायणमीमांसा : एकविंश]
का भेद नहीं है । सत्ता की भूख, ऐश्वर्य की भूख एवं शरीर की भूख यह तो जीवन के साथ जुड़ी हुई है। हमारा
मन अलग अलग समयों में किसी को महत्त्व देता रहता है । सत्ता की भूख ही मन का क्षत्रियत्व है। कभी वैभव
ऐश्वर्य के लिए योजना बनाता है तब मन का वैश्यत्व जाग उठता है । कभी शरीर की आवश्यकता की पूति के लिए
व्यग्र हो उठता है, यह मन का शूद्रभाव है। जब मन ऊँचे आदर्शों की ओर प्रेरित होता है। व्यक्तिगत स्वार्थों की
पूर्ति से हटकर समाज के कल्याण की भावना से भर उठता है। सुख-सुविधाओं को छोड़कर कष्ट और तप का
जीवन अपनाना चाहता है यही वृत्ति ब्राह्मण है।"
परन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त गुण तो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सब में ही समय समय पर
आविर्भूत होते ही रहते हैं। फिर तो इससे कोई व्यवस्था नहीं बनती है। आप स्वयं मानते हैं कि किसी भी व्यक्ति
के लिए एक सी मनःस्थिति न सदा सम्भव ही है न आवश्यक ही है। ऐसी स्थिति में व्यवहारतः किसको ब्राह्मण एवं
किसको क्षत्रियादि कहा जाय ? ब्राह्मण मनोवृत्ति आवश्यक है तो सभी के लिए आवश्यक है ।
वस्तुतः शास्त्रों में तो ब्राह्मणादि वर्णव्यवस्था संस्कारों एवं कर्मों के लिए अपेक्षित है। जैसे ब्राह्मण का
वसन्त में उपनयन किया जाय, क्षत्रिय का ग्रीष्म में एवं वैश्य का शरद् में। शूद्र का उपनयन संस्कार नहीं, जिनका
उपनयन संस्कार होगा वही वेदाध्ययन एवं वेदार्थानुष्ठान के अधिकारी होंगे। प्रश्न तो यह है कि यदि जन्मना शूद्र
में ब्राह्मण या क्षत्रिय की वृत्ति पैदा हो जाय तो उसे वेदाध्ययन, वेदार्थानुष्ठान का अधिकार है या नहीं ? निषाद में
बड़े उत्तम गुण आ गये थे । क्या उसको ब्राह्मण मान लिया गया था और उसे वेदाध्ययन एवं वेदोक्त यज्ञों के अनुष्ठान
का अधिकार मिल गया था ? शास्त्रों की दृष्टि से तो यह सब असम्भव ही है।
वाजपेय यज्ञ में ब्राह्मण और क्षत्रिय का ही अधिकार है। राजसूय में केवल क्षत्रिय का एवं जन्मना
क्षत्रिय का ही अधिकार है। वैश्यस्तोम में वैश्य का ही अधिकार है। किसी कर्म में निषाद का एवं किसी में रथकार
जाति का ही अधिकार है। इन सब बातों का वृत्ति और गुण से मुख्य सम्बन्ध नहीं है ।
जैसे सिंह से सिंही में उत्पन्न एवं शौर्य, क्रौर्यादि गुणों से युक्त मुख्य सिंह होता है । केवल गुण होने से
मनुष्य को भी सिंह कहा जा सकता है। परन्तु गुण न होने पर योनिमात्र सम्बन्ध से जातिसिंह का ही व्यवहार होता
है । निकृष्ट अधम यहाँ तक कि मृत सिंह को भी सिंह ही कहा जाता है। ठीक इसी तरह विद्या, तप और योनि तीनों
के होने पर मुख्य ब्राह्मण होता है । विद्या और तप न होने से तो केवल जातिब्राह्मण ही होता है। यह महाभाष्यकार
महर्षि पतञ्जलि का कहना है—
“विद्या तपश्च योनिश्च त्रयं ब्राह्मणकारणम् ।
विद्यातपोभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव सः ॥”
शास्त्रों में साङ्कर्य को महान् दोष माना गया है। अब यदि वृत्ति से ही ब्राह्मणादि वर्ण माने जायें तब तो
ब्राह्मण पति-पत्नी में भी समय समय पर वृत्ति एवं गुणों में रद्दोबदल होता ही है । इस स्थिति में यदि पत्नी में
ब्राह्मण गुण बढ़े हों पति में क्षत्रिय या शूद्रगुण आ गये हों तब तो आपके मत से चाण्डाल आदि प्रतिलोम सङ्करों की
सृष्टि सम्भव है ही ।
नामकरण में व्यवस्था है और जन्म से दस दिनों के बाद ही नामकरण संस्कार होता है। दस दिन के
बालक में ब्राह्मण, क्षत्रियादि वृत्तियों का निर्णय होना संभव ही न होगा। अतः शर्मा, वर्मा, गुप्त, दास आदि नाम-
करण कैसे होगा ? अतएव वेदों में जन्मना वर्णव्यवस्था का ही वर्णन है ।
“ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः ।
ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पद्भ्यां शूद्रोऽजायत ॥”
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८४७
यह मन्त्र ऋक्, यजु एवं अथर्व तीनों ही वेदों में आता है। साम तो ऋग्वेद के मन्त्रों का गीतिविशेष
ही है। इस मन्त्र में यह सन्देह हो सकता था कि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य भगवान् के मुख, बाहु और ऊरु रूप कहे
गये हैं। मन्त्र में यह नहीं कहा गया है कि भगवान् के मुख से ब्राह्मण उत्पन्न हुआ है। परन्तु "पद्भ्यां शूद्रोऽजायत"
इस अन्तिम पङ्क्ति से स्पष्ट निर्णय हो जाता है। जैसे शूद्र भगवान् के पैर से उत्पन्न हुआ है वैसे ही ब्राह्मणादि
भगवान् के मुखादि से ही उत्पन्न हुए हैं। जैसे मृद् (मिट्टी) से उत्पन्न घट के साथ मृद् का "मृद् घटः" इस प्रकार
सामानाधिकरण्य देखा जाता है। उसी तरह मुख से जन्म होने के कारण 'ब्राह्मणो मुखम्' यह सामानाधिकरण्य
है। इसी का स्पष्टीकरण करते हुए मनु ने "मुखबाहूरुपज्जानाम्" इस पद्य में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को
मुखबाहूरूपज्ज कहा है। अर्थात् ब्राह्मणादि भगवान् के मुखादि से उत्पन्न हुए हैं।
छान्दोग्य उपनिषद् में श्वयोनि, सूकरयोनि के समान ही ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि, शूद्रयोनि तथा चाण्डाल
योनि का वर्णन किया है।
"तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं क्षत्रिययोनिं वा
वैश्ययोनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा
चाण्डालयोनिं वा ।।" (छा० उ० ५।१०।७)
अतः जैसे श्वयोनि, सूकरयोनि में जन्म पाने पर जब तक वह देह रहता है जाति नहीं बदल सकती है वैसे
ही ब्राह्मणादि जातियों में भी यावत् देह जाति रहती है तब तक जाति नहीं बदल सकती है। जहाँ भी कहीं कर्म या
गुण से जाति का वर्णन है वह वैसे ही गौण ब्राह्मणादि का वर्णन है जैसे सिंह के गुण होने से मनुष्य को भी सिंह गौणी
वृत्ति से कहा जाता है। मनुष्य मुख्य सिंह नहीं ही कहा जाता है। अवश्य ही उत्तम गुण होने से उत्तम जाति में जन्म
होता है।
कुछ लोग कहते हैं कि हनुमान्जी ने रावण के बगीचों के फल खाये । रावण उसको चोरी कहता है ।
परन्तु हनुमान् की दृष्टि में सारी वस्तु-सम्पत्ति परमेश्वर की है, राम की है। रावण की सम्पत्ति ही नहीं थी ।
बलि ने वामन भगवान् को दान लेने को कहा, परन्तु यह उसका साहस था । उसकी वस्तु ही क्या थी
जो वह देता । वस्तु तो सब भगवान् की ही थी। परन्तु यह सब बुद्धि का अतिरेक ही है। यह बात पीछे भी कही
जा चुकी है कि व्यावहारिक सत्ता का अपलाप करने से शास्त्रीय व्यवहार भी बाधित होते हैं। अवश्य अनन्तकोटि
ब्रह्माण्डाधिपति परमेश्वर का ही सब कुछ है। तब भी शास्त्रों में जीवों के लिए यज्ञ, दान, व्रत आदि का विधान है
और वह सब धन-सम्पत्ति होने पर ही संभव है। यदि जीव का अपना कुछ है ही नहीं तो अन्नदान, अश्वदान आदि
कैसे बनेगा ?
भगवान् की ही दी हुई वस्तुओं को भगवान् में अर्पित करके भक्त निहाल होता है- "त्वदीयं वस्तु
गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये" सूर्य के दिये हुए जल से सूर्य भगवान् को जलाञ्जलि दी जाती है। सूर्य के ही अंश दीप
से सूर्य की आरती उतारी जाती है। जैसे सब भूमि राजा की होने पर भी अवान्तर स्वत्व करद राजाओं, जागीर-
दारों, काश्तकारों का भी उन उन भूमियों पर होता ही है।
राजा को कोई भूमि लेना हो तो उसका प्रतिकर या मुआवजा देना ही पड़ता है। मनमानी अपहरण की
बात नहीं चलती है। कई बार ऐसी कार्यवाहियाँ न्यायालयों से अवैध घोषित होती रहती हैं।
भले रावण भी भगवान् की शक्ति सीता को चुरानेवाला चोर था । फिर भी इतनेमात्र से चोर की वैध
सम्पत्ति भी अवैध नहीं हो जाती है। परन्तु यदि व्यक्तिगत सम्पत्ति मान्य ही नहीं तब जो चोर नहीं हैं उनकी भी
८४८ रामायणमीमांसा एकविंश
सम्पत्ति उनकी न मानी जायगी। फिर तो कोई डाकू और चोर भी किसी मालिक से कह सकता है कि तुम्हारी
सम्पत्ति ही नहीं है यह तो भगवान् की है। फिर तो यह जैसे तुम्हारी है वैसे ही हमारी है। पर क्या यह कथन
उचित होगा ?
वस्तुतः उक्त प्रसङ्ग में हनुमान् पर चौर्य का आरोप था भी नही ओर हो भी नहीं सकता था, क्योंकि
युद्ध ठन जाने पर एक राजा दूसरे की प्रभुसत्ता को अस्वीकार कर देता है। इसी दृष्टि से राजसूय यज्ञ में राजाओं
को जीतकर उनका धन लाकर यज्ञ के काम में लगाया जाता है। जैसे दाय से सम्पत्ति पर वैध अधिकार प्राप्त होता
है, वैसे ही जय के द्वारा भी सम्पत्ति पर वैध अधिकार प्राप्त होता है—
“सप्त वित्तागमा धर्म्या दायो लाभो जयः क्रयः ।” ( मनु १०।११५ )
रावण भी देवताओं को जीतकर उनके विविध रत्नों का स्वामी हुआ था। लङ्का भी तो कुबेर की ही
थी। उसने जय के द्वारा उसपर अधिकार प्राप्त किया था। अतः जब सीताहरण के कारण युद्ध छिड़ गया तब
आक्रामक राम के दूत हनुमान् को अधिकार है ही कि वे रावण की प्रभुसत्ता को अस्वीकार कर दें।
रावण का मुख्य प्रश्न यही था कि तू कौन है ? और किसके बलपर तूने बन उजाड़ा ? और किस अपराध
पर राक्षसों को मारा—
“कह लंकेश कौन तैं कीसा। केहिके बल घालेसि बन खीसा ।।
मारे निसचर केहि अपराधा ।” ( रा० मा० ५।२०।१,२ )
इसी का उत्तर हनुमान् ने दिया था—
“सुन रावन ब्रह्माण्डनिकाया। पाइ जासु बल विरचति माया ।।
जाके बल बिरञ्चि हरि ईसा । पालत सृजत हरत दससीसा ॥” (रा० मा० ३।२०।२,३)
जाके बल लवलेस ते जितैहु चराचर झारि ।
तासु दूत मैं जासु कर हरि आनेसि प्रिय नारि ॥” ( रा० मा० ५।२१ )
जिसके बल से माया अनन्त ब्रह्माण्डों का निर्माण करती है। जिसके बल से ब्रह्मादि विश्व की सृष्टि
आदि करते हैं। जिसके ही बल से लवलेश से तुमने चराचर को जीता है। मैं उसी का दूत हूँ, तुमने जिसकी प्रिय
नारी का अपहरण या चौर्य किया है।
प्रह्लाद ने भी हिरण्यकशिपु से कहा था कि राजन् ! मेरा ही नहीं आपका बल भी वही है और सभी
बलवानों का भी बल वही है।
केन उपनिषद् की आख्यायिका से यह सिद्ध ही है कि जिन अग्नि और वायु के सम्बन्ध से सभी देवता,
दानव और मानव बलवान् पहलवान् होते हैं एवं जिनका सम्बन्ध भङ्ग होने से सब ठण्डे निष्प्राण मुर्दे हो जाते हैं,
वे अग्नि और वायु भी भगवान् के अनुग्रह के बिना तृण भी जलाने और उड़ाने में समर्थ नहीं हो सके थे। अतः
उन्हीं के बल से सब बलवान् हैं, यह सिद्धान्त मानना चाहिये ।
मुझे भूख लगी थी, इसी लिए फल खाये। वानर-जाति के स्वभावानुसार मैंने कुछ वृक्षों को तोड़ डाला।
जिन लोगों ने मुझे मारा उन्हें मैंने भी मारा।
हनुमान् जी ने कहीं भी यह नहीं कहा कि यह सम्पत्ति तुम्हारी नहीं है, रामजी की सम्पत्ति है, मैंने
वाटिका की स्वामिनी से आज्ञा ले ली है—
अध्याय रामचरितसम्बन्धी लेख ८४९
“खायउँ फल प्रभु लागी भूखा । कपिस्वभाव तें तोरेउँ रूखा ॥
जिन मोहि मारा तिन मैं मारा” ( रा० मा० ४।२१।२,३ )
इतना ही नहीं वे यह भी कहते हैं कि तुम श्रीराम के चरणारविन्द को हृदय में धारण कर के लङ्का का
अचल राज्य करो—
“रामचरन पंकज उर धरहू । लंका अचल राज तुम करहू ।।” ( रा० मा० ५।२२।१ )
उधर भगवान् वामन भी विजय द्वारा प्राप्त बलि की त्रिभुवनसम्पत्ति को दान द्वारा प्राप्त कर के ही इन्द्र
को प्रदान करते हैं । यदि बलि की उसमें प्रभुता ही नहीं थी तो दान लेने की अपेक्षा भी क्यों होती । अतः शास्त्र-
विरुद्ध ऐसी सब कल्पनाएँ उपेक्ष्य ही समझनी चाहिये ।
यह तो दाता के सोचने की बात है । वस्तुतः भगवान् की सब वस्तुएँ हैं । उनको समर्पण का अर्थ है—
उनकी ही दी हुई वस्तु का उन्हें ही समर्पण करना । जैसा कि बलि की पत्नी विन्ध्यावलि ने कहा था—
“क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत् कृतं ते
स्वाम्यं च तत्र कुधियोऽपर ईश कुर्युः ।
कर्तुः प्रभोस्तव किमस्य त आवहन्ति
त्यक्तह्रियस्त्वदवरोपितकर्तृवादाः ॥” ( भाग० ८।२२।२० )
हे भगवन् ! आपने अपनी क्रीड़ा के लिए त्रिजगत् का निर्माण किया है। आपके निर्मित विश्व में कुबुद्धि
लोग अपना स्वामित्व जमा लेते हैं । वास्तव में सम्पूर्ण विश्व के परमकर्ता आपको वे लोग क्या दे सकते हैं । वे
निर्लज्ज हैं जो आपको देने का अभिमान करते हैं, क्योंकि कर्तृत्ववाद का आरोप भी तो आपमें ही है । अधिष्ठानभूत
परात्पर परब्रह्म में ही कर्तृत्वविशिष्ट जीव भी तो कल्पित ही हैं ।
पर इसका अर्थ यह नहीं है कि नीतिशास्त्र और धर्मशास्त्र द्वारा प्रतिपादित स्वत्व का अपलाप कर दिया
जाय । भले सब कुछ भगवान् का ही है तो भी जगत् के निर्माण में जहाँ भगवान् उपादान और निमित्त कारण हैं ।
वहीं जीव भी अपने शुभाशुभ कर्मों द्वारा विश्वप्रपञ्च के निर्माण में हेतु होता है । तभी वह विश्व के द्वारा सुख दुःख
का भोक्ता होता है और तभी ईश्वर विषम सृष्टि निर्माण करने पर भी नैर्घृण्य ( निर्दयता ) और विषमता रूप दोष
का भागी नहीं होता ।
जैसे स्वामी के द्वारा प्रदान की हुई वस्तु का सेवक स्वामी होता है, उसी तरह अपने कर्मों द्वारा और
वैध मार्ग दाय, जय, क्रय आदि द्वारा प्राप्त वस्तुओं का स्वामी जीव भी होता ही है । तभी तो भगवान् ने भी अदिति
की तपस्या से सन्तुष्ट होकर अदिति-पुत्रों देवताओं के हितार्थ बलि से दान के रूप में त्रिजगत् प्राप्त कर के देवताओं
को प्रदान किया था ।
“भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ ।”
इस प्रकार के वचनों से यह नहीं समझना चाहिये कि श्रद्धा और विश्वास ही भवानी और शङ्कर हैं ।
श्रद्धा और विश्वास से अतिरिक्त भवानी और शङ्कर नहीं हैं ।
श्रीराम, जानकी तथा लक्ष्मण के लिए जीव, ब्रह्म और माया का दृष्टान्त किया गया है—
“उभय मध्य सिय सोहै कैसी । जीव ब्रह्म बिच माया जैसी ॥
उपमा बहुरि कहहुँ जिय जोही । जिमि बिधु बुध बिच रोहिनि सोही ॥” (रा०मा० २।१२१।१,२)
१०७
८५० रामायणमीमांसा एकविंश
"लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत ।
सोह मदन मुनि बेष जनु रति ऋतुराज समेत ॥” (रा० मा० २।१३२)
स्पष्ट ही है। वस्तुतः जीव, ब्रह्म, माया या विधु, बुध, रोहिणी रूप ही राम, सीता और लक्ष्मण नहीं
हैं। इसी तरह मदन, रति और ऋतुराज भी वे नहीं हैं। वस्तुतः रति को तो गोस्वामीजी ने सीता की उपमा के
योग्य भी नहीं समझा—
“केहि पटतरिय तीय सम सीया। जग अस युवति कहाँ कमनीया ॥
गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी ॥
विष वारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिय रमा सम किमि वैदेही ॥”
(रा० मा० १।२४६।२,३)
fleuraron/divider/asterisk
द्वाविंश अध्याय
रामायण आदि का रचना-काल
कहा जाता है कि ईसा से एक शताब्दी पूर्व रामायण महाकाव्य पहले पहल पाश्चात्य देशों में विख्यात
होने लगा था। उस समय अनेक लोगों का मत था कि इसकी रचना अत्यन्त प्राचीन काल में हुई थी। ए० श्लेगल
के अनुसार ११ शती ई० पू० तथा जी० गोरेसियों के अनुसार लगभग १२ शती ई० पू० । इस मत के प्रतिक्रिया-
स्वरूप जी० टी व्हीलर तथा डाक्टर वेबर ने रामायण पर यूनानी तथा बौद्ध प्रभाव मानकर उसकी रचना अपेक्षा
कृत नवीन समझी है। इन दोनों मतों का खण्डन रामकथा के द्वितीय भाग में श्रीबुल्के ने किया है। आगे चलकर
रामायण के रचना-काल के विषय में लिखते हुए विद्वान् प्रायः आदिरामायण तथा प्रचलित बाल्मीकिरामायण का
अलग-अलग रचना-काल मानते हैं।
एम्० विंटरनित्स इस प्रश्न का विस्तृत विश्लेषण करने के बाद एच्० याकोबी के परिणाम पर पहुँचते
हैं। एच्० याकोबी पहली अथवा दूसरी शताब्दी ई० को प्रचलित रामायण का रचना-काल मानते हैं। एम्०
विंटरनित्स दूसरी शती ई० अधिक समीचीन समझते हैं। सी० वी० वैद्य इसका काल दूसरी शती ई० पू० तथा
दूसरी श० ई० के बीच में मानते हैं। यद्यपि वह पहली शती ई० पू० अधिक सम्भव समझते हैं। कालिदास के
समय में रामायण ने अपना प्रचलित रूप धारण कर लिया था तथा भारत के आरण्यक पर्व के रचना-काल में
बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड की कुछ सामग्री प्रचलित हो गयी थी, अतः अधिक सम्भव है कि प्रचलित-रामायण का
रूप दूसरी शती ई० के बाद का नहीं है। प्रामाणिक वाल्मीकिकृत रामायण में बौद्ध धर्म की ओर निर्देश नहीं है,
अतः इसकी रचना बुद्ध के पूर्व ही अथवा पाँचवीं शती ई० पू० में हुई होगी, यह एम्० मोनियर विलियम्स तथा
सी० वी० वैद्य का प्रधान तर्क प्रतीत होता है। डा० याकोबी रामायण का रचना-काल पाँचवीं शती ई० पू०
से छठी और आठवीं शती ई० पू० के बीच में मानते हैं। ए० ए० मैकडोनेल भी याकोबी के तर्क दुहराकर रामायण
की उत्पत्ति बौद्ध धर्म से पूर्व मानते हैं। ए० बो० कीथ डा० याकोबी के ग्रन्थ के बीस वर्ष बाद उनके तर्कों का
विस्तृत विश्लेषण तथा खण्डन करके रामायण की रचना चौथी शती ई० पू० में रखते हैं। श्रीबुल्के महाभारत
और रामायण शीर्षक में कहते हैं कि रामायण में महाभारत के वीरों का निर्देश नहीं मिलता दूसरी ओर महाभारत
में न केवल रामकथा का वरन् वाल्मीकिकृत रामायण का भी उल्लेख है इससे स्पष्ट है कि रामायण की रचना के
पश्चात् महाभारत को अपना वर्तमान रूप मिला हो। फिर भी बहुत सम्भव है कि भारत (अर्थात् महाभारत का
प्राचीन रूप) रामायण के पूर्व उत्पन्न हुआ हो। चतुर्विंशतिसाहस्री भारतसंहिता तथा शतसहस्र महाभारत इन दो
सोपानों का महाभारत में ही उल्लेख मिलता है। प्रायः समस्त विद्वानों की सम्मति से रामायण का रचनाकाल
भारत तथा महाभारत के बीच मे माना जाता है। शाङ्ख्यायन आदि सूत्रों तथा पाणिनि की अष्टाध्यायी में भारत के
विषय में निर्देश मिलते हैं, रामायण के विषय में नहीं। अतः ऐसा प्रतीत होता हैं कि भारत की रचना रामायण
पूर्व हो चुकी थी। यह निर्विवाद है कि भारत तथा रामायण स्वतन्त्ररूप से उत्पन्न हुए हैं, भारत पश्चिम में तथा
रामायण पूर्व में। दोनों के सम्पर्क के पश्चात् भारत ने महाभारत का रूप धारण कर लिया है।
आधुनिक विद्वानों के मतानुसार भारत और महाभारत के मध्य में ही रामायण का निर्माण हुआ है।
वस्तुतः यह मत सर्वथा असङ्गत तथा रामायण और महाभारत दोनों से ही विरुद्ध है।
then space then "हेगेन" (Copenhagen = Kopenhagen).
Line 31:
"भारत और भारतीय संस्कृति में उसका स्थान' में लिखा है कि महाभारत का मूल कोई पौराणिक गाथा रही होगी ।"
Line 32:
"उसकी एकता से उसका रचयिता कोई एक ही व्यक्ति रहा होगा । उसमें परस्परविरोधी सिद्धान्त, पुनरुक्ति और बिना"
Line 33:
"प्रसङ्ग की बातें नहीं आनी चाहिये । अतः ऐसे अंशों को प्रक्षिप्त ही मानना चाहिए । इस कसौटी पर उन्हें सात-आठ"
Line 34:
"हजार श्लोकों से अधिक नहीं मिले जिनको उपलब्ध महाभारत का मूल कहा जा सके ।"
Let's do a final review of each line against the image:
Top header:
८५२ रामायणमीमांसा द्वाविंश
Heading:
महाभारत और पाश्चात्य विद्वान्
Text:
महाभारत के आलोचनात्मक अध्ययन की ओर सर्वप्रथम क्रिश्चियन लासेन का ध्यान गया । सन् १८३७
Wait, let's look at the year again in :
Is it १७७३ or १८३७?
Look at:
First digit: १
Second digit: look at ८ in १८४२ (L5) vs this digit.
Wait, let's compare:
In L5: १८४२ -> the second digit has a top loop, bottom loop.
In L8: १८८४ -> the second and third digits are clearly ८.
In L8:
अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८५३
डालमान के 'जेनेसिस वे भारत' ( महाभारत का मूल ) में उन्होंने कहा है कि कई पीढ़ियों में धीरे-धीरे
इस महाकाव्य का विकास हुआ है, यह मत भ्रान्त है। उनके अनुसार वास्तविक युद्ध केवल कवि की कल्पना है ।
यदि कोई युद्ध हुआ होता तो उसका ऐतिहासिक प्रमाण मिलता । इसमें तो धर्म और अधर्म के ही संग्राम का वर्णन
है । विंटरनित्स का 'भारतीय साहित्य का इतिहास' जर्मन भाषा में प्राग से प्रकाशित हुआ । उसके अनुसार महा-
भारत को कला की कृति नहीं कहा जा सकता । महाभारत सचमुच एक साहित्यिक दानव है । यदि महाभारत का
रचयिता कोई एक ही व्यक्ति माना जाय तो यह भी मानना पड़ेगा कि वह एक साथ महाकवि और टुच्चा लेखक, एक
चतुर साधु और मूर्ख एवं सुयोग्य कलाकार तथा पक्का नक़्क़ाल रहा होगा। यह विचित्र व्यक्ति, अत्यन्त परस्पर विरोधी
धार्मिक भावों और दार्शनिक सिद्धान्तों में विश्वास रखता था फिर भी इस काव्य के जङ्गल में जिसको साफ करना
विद्वानों ने आरम्भ कर दिया है, घास-फूस और लता-पत्तों में छिपे हुए सच्ची कविता के भी कुछ पौधे मिल जाते
हैं। साहित्य के इस बेतुके ढेर में अमर कलाकृति और गम्भीर बुद्धि के कुछ रत्न भी चमकते हैं ।
सर मोनियर विलियम्स हापकिन्स, ग्रियर्सन आदि ने भी मनमाने विचार प्रकट किये हैं ।
वस्तुतः जैसे बादलों द्वारा लाया हुआ ही समुद्र का पानी मधुर और तृप्ति का हेतु होता है । स्वतः ग्रहण
करने पर वह खारा ही रहता है । उसी तरह भारतीय आचार, विचार, संस्कार तथा गुरुपरम्पराओं से ही भारतीय
शास्त्रों के रहस्य विदित होते हैं । वैसा न होने पर उनका उलटा ही अर्थ भासित होता है। पाश्चात्यों का विद्या-
व्यसन, अनुसन्धान तथा अनोखी सूझ किसी अंश में प्रशंसनीय हैं, परन्तु उनका यह परिश्रम किसी गूढ़ उद्देश्य से ही
है और वह है भारतीयों को अपने धर्म से विमुख करना !
उनकी प्रवृत्ति ज्ञान की उच्च भावना से प्रेरित नहीं है। भारत में अंग्रेजी शिक्षा के प्रबल प्रचारक लार्ड
मैकाले ने कहा था कि हिन्दुओं को ईसाई बनाने के लिए हिन्दू-धर्म के खण्डन की आवश्यकता नहीं है। पाश्चात्य
शिक्षा में आये हुए हिन्दू का मूर्तिपूजा में विश्वास नहीं रह जायगा। स्वयं मैक्समूलर, जो भारत-प्रेम के लिए प्रसिद्ध
हैं, ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि वेदमन्त्र दकियानूसी और निरर्थक हैं। जिस वातावरण में हम रह रहे हैं,
उसमें मँडराते रहने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है । उन्हें अजायबघरों में प्रतिष्ठित पद देने के लिए हम तैयार हैं,
परन्तु हम कभी अपने जीवन को उनके द्वारा प्रभावित नहीं होने दे सकते । दूसरी पुस्तक 'चिप्स फ्राम दि जर्मन
वर्कशाप' में उन्होंने और खुलकर कहा है—वेद हिन्दू-धर्म की चाभी हैं। उनका अच्छा ज्ञान, उनके दृढ़ तथा
दुर्बल स्थानों का ज्ञान धर्म के विद्यार्थियों के लिए विशेषतः ईसाई मिशनरियों के लिए अनिवार्य है। ऐसी दशा में
यही बात मन में आयी कि भारतवर्ष में ईसाई धर्म-प्रचारकों के काम की चीज वेद के एक संस्करण से बढ़कर और
कुछ न होगी । इससे पाश्चात्य विद्वानों के मानसिक भावों का पता चलता है । भारतीय शास्त्रों के अनुवाद एवं
लम्बी चौड़ी समालोचनाओं के पीछे उनकी यही दुरभिसन्धि रहती है । भारत में अंग्रेजीराज पुस्तक में भी
पाश्चात्यों द्वारा ही पाश्चात्यों के इतिहाससम्बन्धी दुरभिसन्धियों का भण्डाफोड़ किया गया है ।
डॉ० वेबर के अनुसार महाभारत में वर्णित नारायणीय भागवत-धर्म में जो भक्तिपक्ष है वह श्वेतद्वीप से
अर्थात् हिन्दुस्थान के बाहर से आया है । अर्थात् ईसाई-धर्म से भागवत-धर्म में भक्ति का प्रवेश हुआ है । परन्तु पाणिनि
जो कि ईसा से बहुत पहले हुए थे । उनको वासुदेवभक्ति का तत्त्व मालूम था । इतना ही नहीं बौद्ध तथा जैन धर्मों
में भी भागवत-धर्म तथा भक्ति के उल्लेख पाये जाते हैं ।
राघव चिन्तामणिराव वैद्य ने कहा है कि श्रीकृष्ण, यादव, पाण्डव तथा भारतीय युद्ध का एक ही काल
है और वह कलियुग का आरम्भ है । पुराणों के अनुसार पांच हजार वर्ष से भी अधिक काल बीत गया है। भागवत
और विष्णुपुराण के अनुसार परीक्षित् राजा के जन्म से लेकर नन्द के अभिषेक तक १११५ या १०१५ वर्ष होते
८५४ रामायणमीमांसा द्वाविंश
हैं ( भाग० १२।२।२६ ), ( वि० पु० ४।२४।३२ ) । पाश्चात्य विद्वानों ने माना है कि ईसवी सन् से लगभग
१४०० वर्ष पूर्व भारतीय युद्ध और पाण्डव हुए होंगे । अतः कृष्ण का भी वही काल है । कुछ लोगों के अनुसार कृष्ण
एक क्षत्रिय योद्धा थे । उनको पहले महापुरुष पद प्राप्त हुआ, पश्चात् विष्णुपद मिला । अन्त में परब्रह्म का रूप मिला ।
इन अवस्थाओं के आरम्भ से अब तक बहुत सा काल चाहिये । अतः भारतीय धर्म का उदय और भारतीय
युद्ध का एक ही काल नहीं, परन्तु यह शङ्का ठीक नहीं है । क्योंकि उपनिषदों में ज्ञानी को ब्रह्मरूप कहा है
( बृ० उ० ४।४।६ ) । मैत्रायणी उपनिषद् में रुद्र, विष्णु, नारायण ये सब ब्रह्म ही हैं यह कहा गया है । बुद्ध
भी अपने को ब्रह्मभूत कहते हैं ( सेलमुत्त १४ तथा थेरगाथा ८३१ ) । वस्तुतः ये सब विचार-सरासर गलत हैं ।
क्योंकि वेदादि प्रमाणों के आधार पर कृष्ण वस्तुतः परब्रह्म थे । उनको किसी ने ब्रह्मपद प्रदान नहीं किया
था । पश्चिमी पण्डितों में अधिकांश का मत है कि ऋग्वेद का काल ईसा से पूर्व १५०० वर्ष या बहुत हुआ तो
२००० वर्ष पूर्व का है। इसी लिए उनकी दृष्टि में ईसा से १४०० वर्ष पूर्व भागवत-धर्म मानने में झिझक होती
है । क्योंकि उनके अनुसार ऋग्वेद के बाद यज्ञादिप्रतिपादक यजुर्वेद और ब्राह्मणग्रन्थ बने । तदनन्तर ज्ञानप्रधान
उपनिषद्, सांख्यशास्त्र और अन्त में भक्तिप्रधान ग्रन्थ बने । उनके अनुसार भागवत-धर्म के उदय से पहले इन धर्माङ्गों
की उत्पत्ति और वृद्धि के लिए कम से कम तो दस बारह शतक अवश्यक लगने चाहिये । अतः भागवत-धर्म का उदय
बुद्ध के बाद हुआ होगा । परन्तु जब बौद्ध और जैन धर्मों में भी भागवत-धर्म (भक्ति) मिलते हैं तो यही कहना उचित
है कि ओरायन आदि के अनुसार वेदकाल को ही और प्राचीन मानना चाहिये । वैदिक काल की पूर्व मर्यादा ईसा
पूर्व ४५०० वर्ष होनी चाहिये । यह भी आधुनिक दृष्टि है ।
भाषा की दृष्टि से वेदकाल
मैत्रायणी उपनिषद् पाणिनि से भी प्राचीन है । उसके अनुसार ऐसी कई शब्दसन्धियों के प्रयोग हैं जो
केवल मैत्रायणीसंहिता में ही पाये जाते हैं और जिनका प्रचार पाणिनि के समय बन्द हो गया था । ज्योतिर्गणित
से यह सिद्ध होता है कि वेदाङ्गज्योतिष में कही गयी उदगयनस्थिति ई० सं० के लगभग १२०० या १४०० वर्ष
पहले की है । मैत्रायणी उपनिषद् में—'मघाद्यं श्रविष्ठार्धमाग्नेयं क्रमेणोत्क्रमेण सार्पाद्यं श्रविष्ठार्धन्तं सौम्यम्'
( ६।१४ ) में काल रूपी या संवत्सररूपी ब्रह्म का विवेचन करते हुए यह वर्णन मिलता है कि मघा नक्षत्र के आरम्भ
से क्रमशः श्रविष्ठा अर्थात् धनिष्ठा नक्षत्र के आधे भाग पर पहुँचने तक दक्षिणायन रहता है और सार्प अर्थात्
आश्लेषा नक्षत्र से विपरीत क्रमेण आश्लेषा, पुष्य आदि क्रम से पीछे गिनते हुए धनिष्ठा नक्षत्र के आधे भाग तक
उत्तरायण रहता है । उदगयनस्थिति के दर्शक वचन तत्कालीन उदगयनस्थिति को लक्ष्य कर कहे गये हैं । पर उसी
से इस उपनिषद् का कालनिर्णय भी गणितरीति से सहज ही में किया जा सकता है । यह स्थिति वेदाङ्गज्योतिष
की उदगयनस्थिति से पहले की है । उसका आरम्भ धनिष्ठा नक्षत्र के आरम्भ से होता है । मैत्रायणी उपनिषद् के
'श्रविष्ठार्ध' इस पद का अर्थ धनिष्ठार्ध किया गया है । इस तरह वेदाङ्गज्योतिष की उदगयनस्थिति जब ई० सन्
से १२०० या १४०० वर्ष पहले की है तो आधे नक्षत्र से उदगयन के पीछे हटने में लगभग ४८० वर्ष लग जाते
हैं । इस तरह गणित से विदित होता है कि मैत्रायणी उपनिषद् ई० पूर्व १८८० से १६८० के बीच कभी बनी
होगी । छान्दोग्य आदि के अवतरण उसमे दिये जाने के कारण वे उससे भी प्राचीन हैं । वस्तुतः वेद, उपनिषद् सब
अनादि अपौरुषेय ही हैं ।
भारत
लोकमान्य के अनुसार वैशम्पायन ने जनमेजय को गीतासहित भारत सुनाया, आगे चलकर जब सौति ने
शौनक को सुनाया तब से भारत प्रचलित हुआ ।
अध्याय रामायण आदि का रचनाकाल ८५५
भारतीय युद्ध से ५०० वर्ष के भीतर आर्ष महाकाव्यात्मक भारत का निर्मित होना सम्भव है, क्योंकि
बौद्ध धर्म के ग्रन्थ बुद्ध की मृत्यु के बाद इससे भी जल्दी तैयार हुए थे। नायकों के कार्यों का धार्मिक तथा नैतिक
दृष्टिकोण से समर्थन करना महाकाव्य का मुख्य विषय होता है। इस दृष्टि से तत्काल प्रचलित भागवत-धर्म से उनका
सम्बन्ध और तदनुकूल व्यवहार-वर्णन आवश्यक है। उसका तर्कपूर्ण वर्णन गीता में हुआ है, अतः गीता कम से कम
ईसा से ९०० वर्ष पूर्व की होनी चाहिये।
लोकमान्य की दृष्टि से महाभारत-कालनिर्णय
महाभारत लक्षश्लोकात्मक बड़ा ग्रन्थ है। राव बहादुर चिन्तामणि के अनुसार उस संख्या में कुछ
न्यूनाधिकता भी है। हरिवंश के श्लोक यदि मिला दिये जायें तो भी एक लाख योगफल नहीं होता।
इस महाभारत में यास्क के निरुक्त, मनुसंहिता और गीता में ब्रह्मसूत्रों का भी उल्लेख है। अतः इनके
पीछे का ही महाभारत होगा।
प्रमाण (१) अठारह पर्वों का भारत तथा हरिवंश ये दोनों ही संवत् ५३५ और ६३५ के मध्य में
जावा और वाली के द्वीपों में थे तथा वहाँ की प्राचीन कवि नाम की भाषा में उनका अनुवाद हुआ है। इस अनुवाद
के आदि, विराट, उद्योग, भीष्म, आश्रमवासिक, मुसल, प्रास्थानिक और स्वर्गारोहण ये आठ पर्व वालीद्वीप में
उपलब्ध हैं। अनुवाद यद्यपि कविभाषा में है, तथापि स्थान-स्थान पर महाभारत के मूल संस्कृत श्लोक ही रखे
गये हैं।
अतः लक्षश्लोकात्मक महाभारत संवत् ४३५ के लगभग दो सौ वर्ष तक हिन्दुस्तान में प्रमाणभूत माना
जाता था। अन्यथा जावा तथा वाली वाले उसे न ले गये होते। तिब्बत की भाषा में भी महाभारत का अनुवाद है।
परन्तु वह बाद का है। (२) गुप्त राजाओं का लेख हाल में उपलब्ध हुआ है जो कि चेदि संवत् १९७ विक्रमी
सं० ५०२ में लिखा गया था। उसमें यह स्पष्टरूप से निर्देश है कि महाभारत ग्रन्थ एक लाख श्लोकों का था।
संवत् ५०२ के लगभग दो सौ वर्ष पहले उसका अस्तित्व अवश्य रहा होगा।
भास कवि के नाटकों में जो कि भारत के आधार पर लिखे गये थे, बालचरित नाटक में श्रीकृष्ण की
शिशु अवस्था की बातों एवं गोपियों का उल्लेख पाया जाता है। इसी से हरिवंश का भी उस समय अस्तित्व सिद्ध
होता है। भास कवि का समय ई० सन् के दूसरे तीसरे शतक के इस ओर का नहीं माना जा सकता। बौद्ध ग्रन्थों
के अनुसार अश्वघोष कवि शालिवाहन शक संवत्सर के आरम्भ में हुआ है। उसके बुद्धचरित्र और सौन्दरनन्द में
भारतीय कथाओं का उल्लेख है।
महाभारत के नारायणीयाख्यान में विष्णु के अवतारों में बुद्ध का नाम नहीं है। महाभारतशान्ति पर्व
३६९।१०० में दस अवतारों में हंस से लेकर कल्कि तक को दस अवतारों में गिना जाता है। पर वनपर्व में कलियुग
के भविष्य का वर्णन करते हुए कहा है—
"एडूकचिह्ना पृथिवी न देवगृहभूषिता।"
अर्थात् कलियुग में देवगृहों के स्थान पर एडूक होंगे (म० भा० ३।१९०।६८)। बुद्ध के बाल, दाँत
आदि स्मारक वस्तुओं को जमीन में गाड़कर उसके ऊपर बने हुए स्तम्भ या मीनार को ही एडूक कहा जाता
है। आजकल उसे डागोवा कहते हैं। इससे मालूम होता है कि बुद्ध के बाद किन्तु उनकी अवतारों में गणना होने के
पहले महाभारत रचा गया होगा। महाभारत में यद्यपि बुद्ध तथा प्रतिबुद्ध का वर्णन (शा० प० १९४।५९; ३०७।
४९; ३४३।५३) में है तथापि वह ज्ञानी के अर्थ में ही है। बौद्धों ने इन शब्दों को वैदिक धर्म से लिया होगा।
८५६ रामायणमीमांसा द्वाविंश
महाभारत में काल-गणना अश्विनी आदि नक्षत्रों से न होकर कृत्तिका आदि से है । ( म० भा० अनु०
६४ और ८९) । मेष, वृषभ आदि राशियों का महाभारत में कहीं उल्लेख नहीं है । इससे यह समझा जाता है कि
यूनानियों के सहवास से हिन्दुस्तान में मेष, वृष आदि राशियों के आने से पहले अर्थात् सिकन्दर से पहले ही महाभारत
रचा गया होगा ।
इससे भी अधिक महत्त्व की बात है श्रवण आदि नक्षत्र-गणना के विषय की । महाभारत आदि पर्व
( ७१।३४) में कहा है कि विश्वामित्र ने श्रवण आदि की नक्षत्र-गणना आरम्भ की थी । टीकाकारों के अनुसार उस
समय श्रवण से उत्तरायण का आरम्भ होता था । वेदाङ्गज्योतिष के समय धनिष्ठा से उत्तरायण आरम्भ होता था ।
वह काल शकसंवत्सर से १५०० वर्ष पूर्व होता है । ज्योतिर्गणित के अनुसार एक नक्षत्र पीछे हटने में उदगयन होने
का काल शक के पहले ५०० वर्ष पूर्व आता है । उसी समय महाभारत बना होगा । भारतीय ज्योतिःशास्त्र में यही
अनुमान किया गया है ( पृ० ८७-९०, १११।१४७ ) । किन्तु महाभारत में मेष, वृषभ आदि राशियों का उल्लेख
नहीं है, अतः महाभारत बौधायन के पहले का ही है ।
बौद्ध धर्म
बौद्ध ग्रन्थों से यह स्पष्ट है कि बुद्ध के समय चार वेद, वेदाङ्ग-व्याकरण, ज्योतिष आदि, इतिहास,
निघण्टु आदि धर्मग्रन्थ प्रचलित हो चुके थे । बुद्ध अध्यात्मदृष्टि से अनात्मवादी थे । तथापि आचरण की दृष्टि से
उपनिषदों के संन्यास धर्म से प्रभावित थे । पर अशोक के समय से बौद्ध भिक्षु जङ्गल में रहना छोड़कर प्रचार और
परोपकार में लगे थे । महावग्ग ( ५।१।२७ ) में बुद्ध के एक शिष्य सोनकोलीविस की कथा में कहा है कि जो भिक्षु
निर्वाणपद तक पहुँच चुका है उसके लिए न तो कोई काम ही अवशिष्ट रहता है और न किया हुआ कार्य ही भोगना
पड़ता है । यह शुद्ध संन्यासमार्ग है “तस्य कार्यं न विद्यते” इस गीतावचन के समानार्थक है । बौद्धों के नये मत के
प्रकट होने पर पुराने मत से झगड़ा हो गया । पुराने लोग अपने को थेरवाद स्थविर या वृद्ध पन्थ कहने लगे । नवीन
पन्थ के लोग अपने मत को महायान तथा पुराने को हीनयान कहने लगे ।
अश्वघोष महायानपन्थ का था । इसलिए उसने सौन्दरनन्द ( १८।५४ ) में वर्णन किया है कि जब नन्द
अर्हत् अवस्था में पहुँच गया तब बुद्ध ने उपदेश दिया था-
“अवाप्तकार्योऽसि परां गतिं गतो न तेऽस्ति किञ्चत् करणीयमण्वपि ।
विहाय तस्मादिह कार्यमात्मनः कुरु स्थिरात्मन् परकार्यमप्यथो ॥”
तेरा कार्य हो चुका, तुझे उत्तम गति मिल गयी । अब तेरे लिए तिल भर भी कर्म नहीं रहा, अतः अब तू
अपना कार्य छोड़कर परकार्य कर ।
“तस्य कार्यं न विद्यते ॥” (गीता ३।१७)
और “तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचार ।” (गीता ३।१९)
इन गीतावचनों से मेल मिलता है । अतः मानना होगा कि अश्वघोष को ये सब तर्क गीता से ही मिले ।
बुद्धधर्मानुयायी तारानाथ ने अपने बुद्धधर्मविषयक इतिहाससम्बन्धी ग्रन्थ में, जो तिब्बती भाषा में लिखा है,
कहा है-बौद्धों के पूर्वकालीन संन्यासमार्ग में महायान पन्थ ने जो कर्मविषयक सुधार किया था, उसे ज्ञानी श्रीकृष्ण
और गणेश से महायान के पुरस्कर्ता नागार्जुन के गुरु राहुलभद्र ने जाना । इस ग्रन्थ का अनुवाद रूसी भाषा से
जर्मनी भाषा में किया गया है । डा० केर्न ने १८९९ ई० में बुद्धधर्म पर एक पुस्तक लिखी थी । उसी से लोकमान्य
तिलक ने यह अंश गीतारहस्य में लिखा है । संन्यासधर्मप्रधान बौद्धधर्म में कर्मप्रधान तथा भक्तिप्रधान महायान
पन्थ की उत्पत्ति गीता से हुई थी ।
जैन और बौद्ध दोनों ही धर्म वैदिक धर्म के पुत्र
लोकमान्य के अनुसार यह बात निर्विवाद सिद्ध हो चुकी है कि जैनधर्म के समान ही बौद्धधर्म भी अपने
वैदिक धर्म पिता का ही पुत्र है। अपनी सम्पत्ति का हिस्सा लेकर ये किसी कारण विभक्त हो गये। बुद्ध के अनुसार
आत्मा ब्रह्म यथार्थ में कुछ नहीं है। केवल भ्रम है। इसलिए आत्मा अनात्मा के विचार या ब्रह्मचिन्तन के पचड़े में
पड़कर किसी को अपना समय न खोना चाहिये। सब्बास्रवसूत्र (९।१३) बुद्ध के सिद्धान्त में दुःख, समुदय, निरोध
और मार्ग ये चार आर्य सत्य मान्य हैं। संसार छोड़कर मन को निर्विषय तथा निष्काम करना ही मनुष्य का
कर्तव्य है। बृहदारण्यक उपनिषद् (४।४।६) के इसी अंश को बुद्ध ने स्वीकार किया है। महानिर्वाणसुत्त (१-२४)
के अनुसार सिद्ध है कि वैदिक हिंसात्मक यज्ञ आदि धर्म बुद्ध को अग्राह्य थे। केवल स्मार्त पञ्चमहायज्ञ, दान,
परोपकार आदि आचरण गृहस्थ के धर्म ही बुद्ध को ग्राह्य थे। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, सर्वभूतानुकम्पा, आत्मौपम्य,
शौच तथा मन की पवित्रता आदि मान्य थे। जैनों के मतानुसार अन्तिम तीर्थङ्कर महावीर थे, पर वे अध्यात्मवादी
थे। लोकमान्य कहते हैं खाने की ही दृष्टि से जो प्राणी मारे न गये हों उनके पवत्त (संस्कृत प्रवृत्त) अर्थात् तैयार
किये हुए मांस को स्वयं बुद्ध खाते थे और पवत्त मांस तथा मछलियाँ खाने की आज्ञा बौद्ध भिक्षुओं को भी दी गयी
है। जैन और बौद्ध के पुराणादि वैदिक कथाओं के ही विकृत रूप हैं। अहिंसा, सत्य, दम आदि बहुत से ऐसे
निवृत्तिमार्गीय धर्म वैदिक संन्यासियों और बौद्ध भिक्षुओं के समान रूप से वर्णित हैं। इसका कारण यही है कि
वे सब अंश वैदिक धर्म के ही हैं। इतना ही नहीं दशरथजातक के समान वैदिक पुराण तथा इतिहास की सभी
कथाओं का बौद्धधर्म के अनुसार रूपान्तर तैयार किया गया है। जैनों ने भी अपने अभिनव पुराणों में वैदिक कथाओं
के ऐसे ही रूपान्तर किये हैं। सेल साहब ने लिखा है ईसा के अनन्तर प्रचलित मोहम्मदी धर्म में ईसा के चरित्र का
इसी तरह विपर्यास किया गया है। पुरानी बाइबिल में सृष्टि की उत्पत्ति, प्रलय तथा नूह आदि कथाएँ प्राचीन
खाल्दीजाति की धर्म-कथाओं के रूपान्तर हैं। उपनिषद्, प्राचीन धर्मसूत्र तथा मनुस्मृति में वर्णित कथाएँ तथा
विचार बौद्ध ग्रन्थों में पाये जाते हैं। कई बार तो बिल्कुल शब्दशः वही के वही होते हैं। जय से वैर की वृद्धि होती
है, वैर से वैर शान्त नहीं होता (म० भा० उद्योग० ६१।५९-६३)। क्रोध को शान्ति से जीतना चाहिये,
विदुरनीति तथा महाभारत उद्योगपर्व (३८।७३)।
यदि मेरी एक भुजा में चन्दन लगाया जाय और दूसरी काटकर अलग कर दी जाय तो मुझे दोनों बातें
समान ही हैं (म० भा० ३२०।२६)। ये ही सब बातें धम्मपद (५।२२३) तथा मिलिन्दप्रश्न (७।३।५) में हैं।
गीता और ईसाई-धर्म
डॉक्टर लरिनसर ने गीता के जर्मन भाषानुवाद के अन्त में लिखा है कि गीता में नयी बाइबिल के एक
सौ से अधिक शब्दसादृश्य पाये जाते हैं। जैसे उस दिन तुम जानोगे कि तुम अपने पिता में, तुम मुझमें और मैं
तुम में हूँ (जान्० १४।२०)।
"येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि।" (गीता ४।३५)
वे कहते हैं गीताकार बाइबिल से प्रभावित थे। ईसा से लगभग ५०० वर्षों बाद गीता बनी (इण्डियन
एण्टीक्वेरी)। परन्तु जब पूर्वोक्त प्रमाणों से गीता का काल ईसा से ५०० वर्ष पूर्व सिद्ध होता है तो यही
मानना होगा कि गीता से ही बाइबिलकार ने उन अंशों को बाइबिल में सङ्गृहीत किया है। अंग्रेजी
ग्रन्थकार लिलि तथा फ्रेञ्च पण्डित एमिल बुर्नफ ने भी यही अनुमान किया है।
बाइबिल में इस बात का कहीं भी वर्णन नहीं मिलता कि ईसा अपनी आयु के बारहवें वर्ष
से तीस वर्ष तक क्या करता था और कहाँ था। इससे प्रकट है कि उसने यह समय धर्मचिन्तन और
प्रवास में ज्ञानार्जन में बताया होगा।
अतएव विश्वासपूर्वक यह कौन कह सकता है कि आयु के इस भाग में उनका बौद्ध भिक्षुओं
से प्रत्यक्ष या पर्याय से कुछ भी सम्बन्ध हुआ न होगा। क्योंकि उस समय बौद्ध यतियों का दौरदौरा
यूनान तक हो चुका था। नेपाल के बौद्धमठ के ग्रन्थ में स्पष्ट वर्णन है कि उस समय ईसा हिन्दुस्थान में
आया था और वहाँ उसे बौद्धों से ज्ञान प्राप्त हुआ था। यह ग्रन्थ निकोलुसनोटोविश नाम के एक रूसी
के हाथ लग गया था। उसने फ्रेञ्च भाषा में इसका अनुवाद सन् १८९४ ई० में प्रकाशित किया था।
ईसाई पण्डित कहते हैं कि नोटोविश का अनुवाद भले ही सच हो, परन्तु मूल ग्रन्थ का प्रणेता
लफङ्गा था। जो भी हो, परन्तु ईसाई-धर्म का मूल बौद्ध धर्म और परम्परा से गीता और वैदिक धर्म
ही हो सकता है।
जब दो ग्रन्थों के सिद्धान्त एक से होते हैं तो समानता के बल पर यह कहना सम्भव नहीं होता कि
अमुक ग्रन्थ पहले रचा गया और अमुक बाद में। क्योंकि यहाँ दो बातें सम्भव हो सकती हैं। इन दोनों ग्रन्थों में से
पहले ग्रन्थ के विचार दूसरे ग्रन्थ से लिये गये हों अथवा दूसरे ग्रन्थ के विचार पहले से। अतएव जब दोनों ग्रन्थों के
काल स्वतन्त्ररूप से निश्चित कर लिये जायँ तभी यह सम्भव है।
दूसरे यह भी होता है कि दो विभिन्न देशों में दो ग्रन्थकारों को एक ही से विचारों का एक ही समय में
अथवा आगे पीछे स्वतन्त्र रीति से सूझ पड़ना कोई अशक्य बात नहीं है। अतः वहाँ यह भी विचार करना पड़ता है
कि वे स्वतन्त्ररूप से आविर्भूत होने योग्य हैं या नहीं और उन दोनों देशों में आवागमन द्वारा एक देश के विचारों का
दूसरे देश में पहुँचना सम्भव था या नहीं।
इस तरह चारों तरफ से विचार करने पर स्पष्ट विदित होता है कि ईसाई-धर्म से किसी भी
बात का लिया जाना सम्भव नहीं। बल्कि गीता से ही बाइबिल में अनेक अंशों का सङ्कलन सम्भव है।
ईसाई-धर्म का मूल यहूदियों की पुरानी बाइबिल है। अग्नि में पशु या अन्य वस्तुओं का हवन करना और
ईश्वर के बनाये हुए नियमों का पालन कर के जिह्नोवा को सन्तुष्ट करना आदि से वह कर्म-प्रधान था। नयी बाइबिल
उसका ही सुधारा हुआ रूपान्तर है।
जैसे वैदिक यज्ञादि धर्मों के अनन्तर अहिंसा तथा ज्ञानप्रधान संन्यासधर्म का प्रादुर्भाव हुआ ऐसी पाश्चात्यों
की धारणा है वैसे ही कर्म-प्रधान यहूदियों के धर्म में भी अहिंसा तथा ज्ञानप्रधान ईसाई-धर्म का उद्भव हुआ है ऐसा
क्यों न माना जाय ? कई लोग पाईथा गोरस के तत्त्वज्ञान का प्रभाव बाइबिल पर मानते हैं। परन्तु उसकी अपेक्षा
बौद्ध धर्म से ही इसमें समता है।
जैसे ईसा को भ्रम में फँसाने का शैतान ने प्रयत्न किया वैसे ही बुद्ध को सिद्धावस्था प्राप्ति में अनेक विघ्न
उत्पन्न हुए। जैसे ईसा ने ४० दिन तक उपवास किया, वैसे ही ४९ दिन तक बुद्ध निराहार रहे।
जब बौद्ध धर्म की निर्विवाद प्राचीनता सिद्ध है। तब ईसाई तथा बौद्ध धर्म में दिखनेवाले साम्य के सम्बन्ध
में दो ही पक्ष रह जाते हैं। वह साम्य स्वतन्त्र रीति से दोनों ओर उत्पन्न हो अथवा इन तत्त्वों को ईसा ने या ईसा
के शिष्यों ने बौद्धधर्म से लिया हो। प्रो० हिसडेविड्स के अनुसार बुद्ध और ईसा की परिस्थिति एक सी होने के कारण
दोनों ओर यह सादृश्य अपने आप स्वतन्त्र रीति से हुआ है।
परन्तु विचार करने से यह ठीक नहीं प्रतीत होता, क्योंकि जब कोई बात किसी स्थान में स्वतन्त्ररूप से
उत्पन्न होती है, तब उसका प्रचार सदैव क्रमशः होता है। उदाहरणस्वरूप जैसे वैदिक कर्मकाण्ड से ज्ञानकाण्ड, भक्ति,
पातञ्जलयोग, अन्त में बौद्धधर्म का उदय हुआ। परन्तु कर्ममय यहूदी-धर्म से एकाएक संन्यासप्रधान ईसाई-धर्म का
अध्याय रामायण आदि का रचना-काल ८५९
उदय कैसे हो सकता है ? अतः उसमें किसी बाहरी शक्ति का हाथ अवश्य ही मानना चाहिये । बौद्ध धर्म के साथ
ईसाई-धर्म की पूर्ण समता दिखायी देती है । वैसी समता का स्वतन्त्र रीति से उत्पन्न होना सम्भव नहीं है । यदि बौद्ध
धर्म से उसका सम्बन्ध होना असम्भव होता तो दूसरी बात थी । परन्तु प्रकृत में तो इतिहास से सिद्ध होता है कि
सिकन्दर के समय ही नहीं, अशोक के समय भी यूनान तक बौद्ध भिक्षुओं का सञ्चार हो रहा था ।
बाइबिल-काल
मेथ्यू (२।१) में यह वर्णन है कि जब ईसा पैदा हुआ तब पूर्व की ओर से कुछ ज्ञानी पुरुष यरूशलम गये
थे । उस समय बौद्ध धर्म काश्मीर, काबुल, ईरान तथा तुर्किस्तान तक पहुँचा था । अतः वे ज्ञानी बौद्ध ही हो सकते
हैं । अतः भक्तियुक्त संन्यास प्रधान बौद्धधर्म से ही ईसाई धर्म का विकास होना सम्भव है ।
बौद्ध धर्म का मुख्य स्रोत वैदिक धर्म है । यह भी स्पष्ट ही है, अतः वैदिक धर्म उपनिषद्, गीता आदि से
ही बौद्ध धर्म एवं बौद्ध धर्म से ही ईसाई-धर्म में भक्ति, ज्ञान आदि का आविर्भाव हुआ है। पूर्वोक्त उद्धरणों से स्पष्ट
ही प्रतीत होता है कि बौद्ध धर्म के आचरण-सम्बन्धी आधार वैदिक ही हैं ।
लोकमान्य तिलक ने अपने गीता-रहस्य ग्रन्थ में पूर्वोक्त रीति से पाश्चात्यों की शैली से गीता का काल
ईसा से ५०० वर्ष पूर्व बतलाया है । उनके अनुसार बुद्ध-निर्वाण के बाद तथा शक से ५०० वर्ष पहले महाभारत का
निर्माण हुआ था ।
किन्तु उनका यह निर्णय भी पाश्चात्य-प्रभाव से ही प्रभावित है । भारतीय शास्त्रीय दृष्टिकोण
से महाभारत का ही काल ईसा से तीन हजार वर्ष से भी प्राचीन है । गीता का तो सुतरां महाभारत से भी प्राचीन
काल है ।
सर विलियम जोन्स, जनरल प्रिंसेप, जनरल कनिङ्घम आदि पाश्चात्य विद्वानों ने महाभारत का युद्धकाल
लगभग १७०० वर्ष पीछे हटाया है । पर यह विचार भ्रमपूर्ण ही है । उसका आधार है मेगस्थनीज की पुस्तक में
लिखित सैण्ड्राकोटस को मौर्य चन्द्रगुप्त और उसकी राजधानी पालिबोथ्रा को पाटलिपुत्र मान लेना और उसी के
समर्थन के लिए अशोक की धर्मलिपियों के प्रज्ञापन दूसरे और तेरहवें में अन्तियोकस आदि पश्चिम भारत के पाँच
राज्यों में यूनान देश के पाँच राजाओं के नामों की कल्पना की गयी है । इस भ्रान्ति के पोषण के लिए महाभारत
के युद्धकाल से लेकर मौर्य चन्द्रगुप्त अथवा अशोकवर्धन के समय तक जितने राजा हुए हैं, जिनकी राजवंशावलियाँ
उनके राजत्वकाल के सहित हमारे पुराणों में स्पष्ट पायी जाती हैं, उन राजवंशावलियों के राजत्वकालों के अशुद्ध
पाठों के आधार पर मनमाना अर्थ किया गया है। उनके अनुयायी भारतीय विद्वानों ने भी उसी का समर्थन किया है।
परीक्षित् के जन्म से महापद्म के अभिषेक तक बार्हद्रथों के १००० वर्ष, प्रद्योतों के १३८ वर्ष और
शिशुनाकों के ३६२ वर्ष सब मिलाकर १५०० वर्ष होते हैं ।
"महापद्माभिषेकात्तु यावज्जन्म परीक्षितः ।
एकवर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पञ्चशतोत्तरम् १ ।। (म० पु० १७२।४५)
कलियुगारम्भ विक्रम संवत् पूर्व ३०४५ और ईसवी सन् पूर्व ३१०२ का समय है। महापद्मनन्द का
अभिषेक काल युधिष्ठिर स० १५०१, विक्रम पूर्व १५४५ एवं ई० सन् पू० १६०२ प्रमाणित होता है । चन्द्रगुप्त मौर्य
का राजत्वकाल कलि सं० १६०१, विक्रम पूर्व १४४५, ई० पू० १५०२ से कलि सं० १६२५ विक्रम सं० पु० १४२१
१. पञ्चाशदुत्तरमित्येव पाठो लभ्यते ।
तक एवं अशोक का राजत्वकाल कलि सं० १६५०, वि० पू० १३९६ से २६ वर्षों तक ई० पू० १४२७ तक प्रमाणित
होता है ।
सेण्ड्राकोट्स
ऐसी स्थिति में जिस सैण्ड्राकोट्स (चन्द्रगुप्त) का शासनारम्भ विलियम जोन्स आदि विद्वानों ने ई० पू०
३२३ वर्ष के आसपास माना है उसे चन्द्रगुप्त मानना भ्रम है । शिलालेखों के अनुसार मौर्य अशोक का शासनकाल
यूनान के पाँच राजाओं के समसामयिक ई० पू० २५८ की कल्पना करना भी साहस ही है। शिलालेखों में पश्चिम-
भारतीय राजाओं के यवनादि पञ्च गणराज्यों को यूनान के पाँच राजाओं के नाम पढ़ना भी साहस ही है ।
श्रीजोन्स आदि विद्वानों के अनुसार यूनानी लेखकों की दृष्टि में पालिबोथ्रा नगरी को पाटलिपुत्र और सैण्ड्रा
कोट्स को मौर्य चन्द्रगुप्त का अपभ्रंश माना जाता है। यूनानी इतिहास के आधार पर उसका काल ई० पू० ३२२ है ।
यह सब सिद्ध किया जाता है मेगस्थनीज की उक्त पुस्तक के आधार पर जिसे उसने पाँच वर्ष तक सेल्यूकस राजा के
राजदूत के रूप में सैण्ड्राकोट्स के दरबार में उसकी राजधानी पालिबोथ्रा में रहकर लिखा था और अब वह कहीं नहीं
मिलती । उसके कुछ प्रकीर्ण अंश यूनानी इतिहासकारों की पुस्तकों में मिलते हैं। जिनको पाश्चात्य विद्वानों ने
एकत्रित किया था जिनका अंग्रेजी अनुवाद वेक साहब ने किया है।
पं० रामचन्द्र शुक्ल द्वारा अनूदित मेगस्थनीज का भारतभ्रमण (हिन्दी) में उल्लेख है कि डायनुशस्
पश्चिम से आया था। उसी वंश में हेराक्लीज हुआ था जो साधारण मनुष्यों से बल और बुद्धि में बड़ा था। उसने
बहुत-सी स्त्रियों से विवाह कर के बहुत से पुत्र उत्पन्न किये और बहुत से नगर बसाये, जिनमें सबसे बड़ा पालिबोथ्रा
है । मेगस्थनीज की पुस्तक का जो अवतरण ओरायन ने दिया है उसमें हेराक्लीज से सैण्ड्राकोट्स तक १३६ पीढ़ियाँ
दी हैं। देखो महाभारतमीमांसा (पृ० ९१ प्रकरण ४)। इससे यह सिद्ध होता है कि सैण्ड्राकोट्स से
१३८ पीढ़ी पहले पालिबोथ्रा नगरी बसी थी। इतिहासविशारद प्लायनी के अनुसार पालिबोथ्रा नगर गङ्गा और
ईरानाबोअस के सङ्गम से २०० मील ऊपर की ओर स्थित है। प्लायनी फ्रैगमेन्ट्स आफ इण्डिया (पृ० १३०)।
एम० डी० आनविल्ले के अनुसार ईरानाबोअस यमुना नदी है । इससे गङ्गा और यमुना के सङ्गम से २०० मील
ऊपर पालिबोथ्रा का होना सिद्ध होता है। प्लायनी फ्रैगमेंट्स आफ इण्डिया (पृ० १३०) । जोन्स के वक्तव्य
में ओरायन के मत से गङ्गा और ईरानाबोअस का सङ्गम प्रसई (प्रस्सी) जनपद में था। कर्टियस का मत
है कि मेगस्थनीज का पालिबोथ्रा प्रभद्रक या पारिभद्रक जनपद में है। इस तरह यदि प्रति पीढ़ी बीस वर्ष का समय
मानें तो सैण्ड्राकोट्स द्वारा २७६० वर्ष पूर्व पालिबोथ्रा का बसाया जाना सिद्ध होता है। इधर वायुपुराण के अनुसार
पाटलिपुत्र नगर शिशुनाक-वंश के आठवें राजा उदायी ने अपने अभिषेक से चौथे वर्ष में बसाया था—
“उदायी भविता तस्मात् त्रयस्त्रिशत् समा नृपः ।
स वै पुरवरं राजा पृथिव्यां कुसुमाह्वयम् ॥
गङ्गाया दक्षिणे कूले चतुर्थेऽब्दे करिष्यति ।।” (वायु० पृ० ९९।३१८, ३१९)
दर्शक का पुत्र उदायी ३३ वर्ष तक राज्य करेगा । वह अपने अभिषेक से चौथे वर्ष में गङ्गा के तट पर
कुसुम नामक नगर बसायेगा । ब्रह्माण्डपुराण उपोद्घात ३ पा० १३२ श्लोक में भी उदायी का अभिषेक कलि सं०
१३८५, विक्रम पूर्व १६५७, ई० पू० १७१६ से चौथे वर्ष ई० पू० १७१३ के कुसुमपुर बसाया गया । जैनपुस्तक
'पटवन' में भी पाटलिपुत्र को शिशु नामक वंश में आठवें राजा ने बसाया लिखा है। परन्तु पालिभाषा के बौद्ध ग्रन्थ
महामग्ग सुत्तनिपात में लिखा है कि शिशुनामक वंश में छठे राजा अजातशत्रु ने कुसुमपुर बसाया। देखो भारत के
प्राचीन नगर पुस्तक पृष्ठ ३२ । कुसुमपुर, पुष्पपुर, पाटलिग्राम, पाटलिपुत्र, पाटलिनगरी ये सब पर्यायवाची शब्द हैं ।
Here is the line-by-line transcription of the text from the provided image:
अध्याय रामचरित आदि का रचना-काल ८६१
इन सब प्रमाणों से जोन्स का यह मत खण्डित हो जाता है कि पालिबोश्रा पाटलिपुत्र का अपभ्रंश है। मेगस्थनीज के
किसी भी अवतरण में पालिबोश्रा का मगध देश में होने का वर्णन नहीं है । पाटलिपुत्र उदायी द्वारा ई० पू० १७१३
में बसाया गया और पालिबोश्रा ई० पू० ३०८२ वर्ष में हेराक्लीज द्वारा बसाया गया ।
इसी तरह पालिबोश्रा का राजा सैण्ड्राकोट्स पौराणिक मौर्य चन्द्रगुप्त नहीं हो सकता । मौर्य चन्द्रगुप्त के
शासनाारम्भकाल से ११८० वर्ष पीछे सैण्ड्राकोट्स का शासनाारम्भ हुआ ।
हो सकता है शूरसेन देश के पुसई जनपद के प्रभद्रनगर का कोई दूसरा चन्द्रगुप्त या चन्द्रकेतु रहा हो या
इसी से मिलते जुलते नाम का शासक रहा हो ।
जोन्स के वक्तव्य के समर्थन में प्रिसेप बकिङ्घम, ने जिन गुहाभिलेखों और स्तम्भाभिलेखों को खोज
निकाला है । उनको बड़े परिश्रम से पढ़कर यह प्रतिपादित किया गया है कि ये सब अशोक के हैं । चौदह प्रज्ञापन-
वाले लेख में भी अन्तियोकस, मग, अन्तेकिन, तुरमय और अलीकसिन्धुर पाँच नामों के विषय में यूनान के भिन्न-भिन्न
भागों के राजाओं के नामों की कल्पना की है। तथा उन सब राजाओं के समसामयिक ई० पू० २५८ वर्ष पर उन
प्रशासनों को अङ्कित होना मानकर अभिलेखों के लिखनेवाले राजा को मौर्य अशोक प्रतिपादित किया गया है।
उसी के आधार पर अशोक के पितामह चन्द्रगुप्त का राजत्वकाल वही लिखा है जो जोन्स के अनुसार मान्य
होता है ।
परन्तु ये सब कल्पनाएँ भी भ्रान्तिमूलक ही हैं । वस्तुतः अशोक के नाम से प्रख्यात—'‘देवांनांप्रियः
प्रियदर्शी राजा’’ देवानां प्रिय एवं बिना नाम के किसी व्यक्ति के लिखाये गये जितने धर्मलेख गुहाओं, स्तम्भों
और शिलाओं के पाये गये हैं, वे धर्मलेख कब लिखे गये इसका कोई उल्लेख नहीं है, केवल इतना ही उल्लेख है कि
प्रज्ञापन लिखानेवाले व्यक्ति के अभिषेक से कितने वर्ष पर लिखे गये हैं।
अतएव जबतक लिखानेवाले राजा का अभिषेक का काल ज्ञात न हो तब तक उन लेखों का समय
नहीं जाना जा सकता । म० म० पं० हीराचन्द्र ओझा के अनुसार किसी लेख या दानपत्र का निश्चित संवत् न होने
पर उसकी लिपि के आधार पर समय स्थिर करना चाहिये । पर उसमें भी सैकड़ों वर्षों की चूक होना सम्भव है ।
प्रथम लघु शिलालेख में जो २५६ वाँ अङ्क है उसको बहुत से इतिहासज्ञ बुद्ध-निर्वाण संवत् मानते थे । हिन्दी टॉड
राजस्थान के सम्पादक ओझाजी ने भो प्रकरण ६ की टिप्पणी ४४ में इसका समर्थन किया है, किन्तु पं० जनार्दन-
भट्ट ने अशोक के धर्मलेख पृष्ठ ७९ की टिप्पणी १२ में कहा है कि आजकल इस मत का पूरा पूरा खण्डन हो गया
है । अतः धर्मलेखों का निश्चित समय निरूपण करना सम्भव नहीं । कहा जाता है उपलब्ध समस्त अभिलेख अशोक के
हैं । पर यह असंदिग्ध नहीं है, क्योंकि केवल मासकी के खण्ड प्रथम लघु शिलालेख से अशोकस्तम्भ में अशोकस ये चार
अक्षर मिले हैं । शेषों में अशोक का नाम नहीं है । इन अभिलेखों में ‘'देवानांप्रियः प्रियदर्शी राजा” की द्विरुक्ति त्रिरुक्ति
तो की गयी है, पर ‘अशोक' ये तीन अक्षर नहीं लिखे गये । अतः इन अभिलेखों को मौर्य अशोकवर्धन के मानना
युक्तिसङ्गत नहीं है, क्योंकि जिन विषयों का वर्णन सातवें स्तम्भाभिलेख और तेरहवें विज्ञापन में है । ठीक उसी
प्रकार का वर्णन चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने भारत के वर्णन प्रसङ्ग में अपने आश्रयदाता हर्षवर्धन ( शिलादित्य
द्वितीय ) के विषय में किया है। देखिये रमेशचन्द्रदत्तकृत प्राचीन भारत की सभ्यता भाग ४ अ० २ पृ० २६ ।
ऐसी स्थिति में देवानांप्रियः प्रियदर्शी राजा शब्दों को, जो बौद्ध राजाओं की उपाधियां थीं, राजा हर्षवर्धन के लिए
भी उपयुक्त मान सकते हैं। देखिये अशोक की लिपियां पृ० ७ की टिप्पणी । यदि उक्त धर्मलेख अशोकवर्धन के मान-
कर पौराणिक राजवंशवलियों के राजत्वकालों के आधार पर विचार करें तो मौर्य अशोकवर्धन का राजत्वकाल कलि
संवत् १६५०, विक्रम संवत् पूर्व १३९६, ई० पू० १४५३ से कलि संवत् १६७६, वि० पू० १३७०, ई० पू० १४२७