रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 933, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें८५६ रामायणमीमांसा द्वाविंश
महाभारत में काल-गणना अश्विनी आदि नक्षत्रों से न होकर कृत्तिका आदि से है । ( म० भा० अनु०
६४ और ८९) । मेष, वृषभ आदि राशियों का महाभारत में कहीं उल्लेख नहीं है । इससे यह समझा जाता है कि
यूनानियों के सहवास से हिन्दुस्तान में मेष, वृष आदि राशियों के आने से पहले अर्थात् सिकन्दर से पहले ही महाभारत
रचा गया होगा ।
इससे भी अधिक महत्त्व की बात है श्रवण आदि नक्षत्र-गणना के विषय की । महाभारत आदि पर्व
( ७१।३४) में कहा है कि विश्वामित्र ने श्रवण आदि की नक्षत्र-गणना आरम्भ की थी । टीकाकारों के अनुसार उस
समय श्रवण से उत्तरायण का आरम्भ होता था । वेदाङ्गज्योतिष के समय धनिष्ठा से उत्तरायण आरम्भ होता था ।
वह काल शकसंवत्सर से १५०० वर्ष पूर्व होता है । ज्योतिर्गणित के अनुसार एक नक्षत्र पीछे हटने में उदगयन होने
का काल शक के पहले ५०० वर्ष पूर्व आता है । उसी समय महाभारत बना होगा । भारतीय ज्योतिःशास्त्र में यही
अनुमान किया गया है ( पृ० ८७-९०, १११।१४७ ) । किन्तु महाभारत में मेष, वृषभ आदि राशियों का उल्लेख
नहीं है, अतः महाभारत बौधायन के पहले का ही है ।
बौद्ध धर्म
बौद्ध ग्रन्थों से यह स्पष्ट है कि बुद्ध के समय चार वेद, वेदाङ्ग-व्याकरण, ज्योतिष आदि, इतिहास,
निघण्टु आदि धर्मग्रन्थ प्रचलित हो चुके थे । बुद्ध अध्यात्मदृष्टि से अनात्मवादी थे । तथापि आचरण की दृष्टि से
उपनिषदों के संन्यास धर्म से प्रभावित थे । पर अशोक के समय से बौद्ध भिक्षु जङ्गल में रहना छोड़कर प्रचार और
परोपकार में लगे थे । महावग्ग ( ५।१।२७ ) में बुद्ध के एक शिष्य सोनकोलीविस की कथा में कहा है कि जो भिक्षु
निर्वाणपद तक पहुँच चुका है उसके लिए न तो कोई काम ही अवशिष्ट रहता है और न किया हुआ कार्य ही भोगना
पड़ता है । यह शुद्ध संन्यासमार्ग है “तस्य कार्यं न विद्यते” इस गीतावचन के समानार्थक है । बौद्धों के नये मत के
प्रकट होने पर पुराने मत से झगड़ा हो गया । पुराने लोग अपने को थेरवाद स्थविर या वृद्ध पन्थ कहने लगे । नवीन
पन्थ के लोग अपने मत को महायान तथा पुराने को हीनयान कहने लगे ।
अश्वघोष महायानपन्थ का था । इसलिए उसने सौन्दरनन्द ( १८।५४ ) में वर्णन किया है कि जब नन्द
अर्हत् अवस्था में पहुँच गया तब बुद्ध ने उपदेश दिया था-
“अवाप्तकार्योऽसि परां गतिं गतो न तेऽस्ति किञ्चत् करणीयमण्वपि ।
विहाय तस्मादिह कार्यमात्मनः कुरु स्थिरात्मन् परकार्यमप्यथो ॥”
तेरा कार्य हो चुका, तुझे उत्तम गति मिल गयी । अब तेरे लिए तिल भर भी कर्म नहीं रहा, अतः अब तू
अपना कार्य छोड़कर परकार्य कर ।
“तस्य कार्यं न विद्यते ॥” (गीता ३।१७)
और “तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचार ।” (गीता ३।१९)
इन गीतावचनों से मेल मिलता है । अतः मानना होगा कि अश्वघोष को ये सब तर्क गीता से ही मिले ।
बुद्धधर्मानुयायी तारानाथ ने अपने बुद्धधर्मविषयक इतिहाससम्बन्धी ग्रन्थ में, जो तिब्बती भाषा में लिखा है,
कहा है-बौद्धों के पूर्वकालीन संन्यासमार्ग में महायान पन्थ ने जो कर्मविषयक सुधार किया था, उसे ज्ञानी श्रीकृष्ण
और गणेश से महायान के पुरस्कर्ता नागार्जुन के गुरु राहुलभद्र ने जाना । इस ग्रन्थ का अनुवाद रूसी भाषा से
जर्मनी भाषा में किया गया है । डा० केर्न ने १८९९ ई० में बुद्धधर्म पर एक पुस्तक लिखी थी । उसी से लोकमान्य
तिलक ने यह अंश गीतारहस्य में लिखा है । संन्यासधर्मप्रधान बौद्धधर्म में कर्मप्रधान तथा भक्तिप्रधान महायान
पन्थ की उत्पत्ति गीता से हुई थी ।