रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
"बिभेत्यल्पश्रुताद् वेदो मामयं प्रहरिष्यति ।"
फिर वे कहते हैं कि पहले पहल विष्णुपुराण ( १। अध्याय १७-२०) में हिरण्यकशिपु एवं उसके
विष्णुभक्त पुत्र प्रह्लाद के संघर्ष की कथा मिलती है और यह भी वर्णन है कि हिरण्यकशिपु ने पहले रावण पश्चात्
शिशुपाल के रूप में जन्म लिया । यह उनका प्रलाप मात्र है, क्योंकि जैसे वेदों की विभिन्न शाखाएँ अनादि हैं।
उनमें कोई पहली और कोई पिछली नहीं है । वैसे ही पुराण सभी अनादि हैं। उनमें कोई पहला और कोई पिछला
नहीं, अतः सबका समन्वय करके यह निश्चित होता है कि हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष दोनों कश्यप एवं दिति के
पुत्र थे। दोनों सगे भाई थे। प्रह्लाद हिरण्यकशिपु का पुत्र था। वह महान् विष्णुभक्त था। उसकी रक्षा के लिए
विष्णु ने नृसिंहरूप धारण कर हिरण्यकशिपु को मारा। हिरण्याक्ष को वारहरूप धारण कर के विष्णु ने मारा था।
वे दोनों विष्णु के द्वारपाल जय और विजय थे। सनकादि के शाप से तीन जन्म के लिए उन्हें आसुरी योनि
प्राप्त हुई थी।
ये सब बातें भागवतपुराण ( ३। अध्याय १५-१९) से भी सिद्ध हैं। ब्रह्मवैवर्तपुराण (कृष्णजन्मखण्ड
५६।४६-४९), पद्मपुराण (उत्तरखण्ड २६९।४) आदि में भी यही बात स्पष्ट है।
किसी समय विष्णु के द्वारपाल चण्ड और प्रचण्ड ने लक्ष्मी को नारायण की सभा में जाने से रोका था ।
अतः क्रुद्ध होकर लक्ष्मी के शाप से वे दोनों राक्षस बने । नारायण ने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—तुम पृथ्वी को
जीत कर जय और विजय नामों से प्रसिद्ध होओगे। लक्ष्मी को सीता के रूप में जन्म लेना पड़ेगा। कहीं कहीं
वृन्दा ने जय और विजय को राक्षस बनने का शाप दिया था, ऐसी कथा उल्लिखित है। इसी तरह शापों के योग
भी उक्त हैं।
बलरामदास के अनुसार दुर्वासा नारायण से मिलना चाहते थे। नारायण लक्ष्मी के साथ एकान्त में थे।
दुर्वासा ने हठ किया। द्वारपालों ने उन्हें गला पकड़ कर हटा दिया। उन्होंने १०० जन्मों तक राक्षस होने का उन्हें
शाप दे दिया । नारायण ने उसे तीन जन्मों तक ही सीमित कर दिया । अन्य कथाएँ भी कल्पभेद से सङ्गत हैं।
शिवपुराण के अनुसार दो शिवगण नारद के शाप से रावण, कुम्भकर्ण बने थे। वह्निपुराण में वर्णित है
कि मधु और कैटभ ही हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष बने थे । रामचरितमानस के अनुसार एक बार जलन्धर रावण
बना था तथा किसी कल्प में रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण क्रम से पूर्व जन्म के प्रतापभानु, अरिमर्दन और धर्म-
रुचि थे । रामकियेन के अनुसार नन्दक ने रावण के रूप में जन्म लिया, जो शिव के गणों में एक था। उसने ईश्वर
से वरदान प्राप्त किया था कि वह जिसकी ओर इशारा करे वह मर जाय । उसने उक्त वर के प्रभाव से बहुत देवताओं
का वध किया । अन्त में नारायण अप्सरा का रूप धारण कर नन्दक को नृत्य सिखाने लगे । जिसमें नन्दक अंगुली से
अपने शरीर की ओर इशारा करके मर गया था। वही दशग्रीव बना था। अप्रतिषिद्ध अन्य मत भी अनुमत होता है।
अतः वाल्मीकिरामायण द्वारा अप्रतिषिद्ध उक्त मत भी किसी कल्प के अनुसार सत्य है ही। ऐसे ही अन्य जैन, बौद्ध
आदि ग्रन्थों में उनके पूर्व जन्म के नामान्तर भी प्रसिद्ध हैं। किन्तु उनमें साम्प्रदायिक दुराग्रह तथा मिथ्या आडम्बरों
का प्राधान्य है।
तप और वर
वाल्मीकिरामायण के अनुसार वैश्रवण ने तपस्या कर चतुर्थ लोकपाल का पद तथा पुष्पक विमान प्राप्त
किया था । विश्रवा के आदेशानुसार वे लङ्का में रहते थे। वैश्रवण का वैभव देखकर विश्रवा की द्वितीय पत्नी कैकसी
ने उस ओर रावण का ध्यान आकर्षित किया। दशग्रीव माता की प्रेरणा से तप करने गोकर्ण गया ( वा० रा०
७।९।४७ ) । वहाँ तीनों भाई १०००० वर्ष तक घोर तप करते रहे । दशग्रीव प्रति हजारवर्षों के अन्त में अपना सिर
अग्नि में अर्पित करता था । उसने नौ हजार वर्ष तक नौ सिरों का अग्नि में होम कर दिया। दसवें हजार वर्ष में
दसवाँ सिर काटनेवाला ही था कि ब्रह्मा संतुष्ट होकर प्रकट हुए । उन्होंने उसे सुपर्ण, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस
और देवताओं द्वारा अवध्य होने का वरदान दिया एवं उसके नौ सिर लौटाकर उसे कामरूपी होने का भी वरदान
दिया । विभीषण ने धार्मिक होने का वर माँगा, कुम्भकर्ण ने सरस्वती की प्रेरणा से निद्रा माँग ली। रावण ने
सुमाली की प्रेरणा से प्रहस्त को भेजकर लङ्का की माँग की । पिता के परामर्श से वैश्रवण लङ्का छोड़कर कैलास
चले गये ।
वाल्मीकिरामायण ( युद्धकाण्ड अध्याय ६१ ) के अनुसार ब्रह्मा ने कुम्भकर्ण के अत्याचार के कारण उसे
शाप दिया था कि वह छः महीने सोयेगा और एक ही दिन जागेगा । उसी दिन वह पृथ्वी पर विचरता हुआ बहुत
लोगों को खा जायगा ।
बुल्के कहते हैं कि महाभारत ( ३।२५९।२८ ) के अनुसार कुम्भकर्ण ने सरस्वती की प्रेरणा से नहीं वरन्
अपनी ही तामसी दुर्बुद्धि के कारण दीर्घ नींद का वरदान माँग लिया था—
“स वव्रे महतीं निद्रां तमसा ग्रस्तचेतनः ।।” ( ३।२५९।२८ )
परन्तु इसमें कोई विरोध नहीं है । सरस्वती की प्रेरणा से ही तामसी शक्ति का विकास मानना चाहिये ।
अतएव आनन्दरामायण ( १।१३।५५ ) में कहा गया है कि सरस्वती से मोहित होकर कुम्भकर्ण ने छः महीने की
निद्रा माँगी ।
कृत्तिवासरामायण के अनुसार ब्रह्मा ने कहा था कि नर और वानरों के सिवा कोई भी तुम्हें न मार
सकेगा । सिर कटने पर तुम न मर सकोगे ।
रावण की शिवभक्ति प्रसिद्ध है । स्कन्दपुराण ( माहेश्वरखण्ड अ० ८ ) तथा पद्मपुराण ( उत्तरख० अ०
२६९ ) के अनुसार शिव ही रावण तथा उसके भाइयों को वर देते हैं ।
पउमचरियं के अनुसार तपस्या द्वारा रावण ने ५५ विद्याएँ, भानुकर्ण ने ५ विद्याएँ एवं विभीषण ने
४ विद्याएँ सिद्ध कर लीं तथा आकाशगामिनी विद्या तीनों भाइयों ने प्राप्त की थी ।
सेरीराम के अनुसार केवल रावण ने ही घोर तप किया था । अल्लाह ने नवी आदम का निवेदन स्वीकार
कर रावण को चार ( १ स्वर्ग, २ पृथ्वी, ३ पाताल और ४ महासागर ) लोकों में राज्यस्थापन का अधिकार दिया
बशर्ते कि वह न्यायपूर्वक शासन करे ।
रामकियेन ( अध्याय ९ ) के अनुसार रावण ने अपने गुरु के परामर्श से ऐसा यज्ञ किया था जिसके
फलस्वरूप वह जीवित रहते हुए अपना जीवन शरीर से अलग करने में समर्थ हुआ था । रावण अपना जीव गुरु की
रक्षा में छोड़कर अत्याचार करता हुआ भी अवध्य रहा ।
विवाह और सन्तति
वाल्मीकिरामायण ( उत्तरकाण्ड सर्ग १२ ) के अनुसार रावण ने मृगया के समय अपनी पुत्री के साथ
टहलते हुए मय को देखा । परस्पर परिचय के बाद मय ने रावण को कन्यादान के साथ एक अमोघ शक्ति भी दी ।
जिससे उसने लक्ष्मण को आहत किया था ।
आनन्दरामायण के अनुसार रावण ने गान द्वारा शिव को प्रसन्न कर अपनी माता कैकसी के लिए शिव-
लिङ्ग और अपने लिए पार्वती को माँग लिया । शिव ने सावधान करके कैकसी के लिए पूजनार्थं शिवलिङ्ग देकर कहा
५९८ रामायणमीमांसा एकोनविंश
कि कहीं पृथ्वी पर रख देने पर यह अटल हो जायगा । रावण लिङ्ग एवं पार्वती को लेकर चला । पार्वती ने विष्णु
का स्मरण किया । विष्णु ने अपने अंग के चन्दन से सुन्दरी मन्दोदरी की सृष्टि कर उसे मय के घर धर दिया ।
स्वयं ब्राह्मण वेष में रावण से कहा शिव ने धोखा देकर वास्तविक पार्वती को पाताल में मय के यहाँ छिपा दिया है ।
यह सुनकर रावण वास्तविक पार्वती को लौटा कर पाताल जाने लगा । रास्ते में लघुशङ्का करने के लिए आत्मलिङ्ग
उस विष्णुरूपी ब्राह्मण को दे दिया । देर तक लघुशङ्का होती रही । ब्राह्मण आत्मलिङ्ग को गोकर्ण में भूमि पर रख
कर अन्तर्धान हो गये । रावण आत्मलिङ्ग उठाने में समर्थ नहीं हुआ तब उसने पाताल से मन्दोदरी को प्राप्त किया ।
रामकियेन (अध्याय ५) के अनुसार कोई मण्डूकी चार ऋषियों के पास रहती थी । कोई गाय वहीं
एक पात्र में दूध दे जाती थी । ऋषि लोग स्वयं पीकर कुछ मण्डूकी को दे देते थे । किसी दिन सर्पिणी ने अपना विष
डाल दिया । मण्डूकी ने सोचा ऋषि लोग मर जायेंगे ! अतः उनके प्राण बचाने के लिए वह स्वयं दूध में कूदकर मर
गयी । ऋषियों को रहस्य विदित हुआ । उन्होंने उसे दिव्य सुन्दरी युवती बनाकर ईश्वर को समर्पित कर दिया ।
ईश्वर ने उमा को दे दिया । रावण ने ईश्वर को प्रसन्न कर उमा को प्राप्त कर लिया किन्तु उमा स्वयं तप्त लोहप्रतिमा
के तुल्य हो गयीं । रावण स्पर्श करने में असमर्थ होकर उन्हें सिर पर धारण कर ले चला । नारायण माली का रूप
धारण कर उल्टे ढंग से वृक्ष का रोपण कर रहे थे । रावण माली की मूर्खता पर हँसने लगा तो माली ने कहा—तुम
मन्दोदरी को छोड़कर इस तप्त प्रतिमा को सिर पर ढो रहे हो, अतः तुम हमसे भी अधिक मूर्ख हो, सुनकर रावण
ने ईश्वर के पास जाकर उमा को लौटाकर मण्डो को ले लिया ।
अतिकाय की माता धान्यमालिनी भी रावण की एक और पत्नी थी एवं अनेक और भी उसकी पत्नियाँ
थी । जैन कथाओं के अनुसार सुग्रीव की बहन श्रीप्रभा भी रावण की पत्नी थी । इनके अतिरिक्त ६०० विद्याधरियाँ
उसकी पत्नियाँ थीं । पुत्रों में इन्द्रजित् सर्वाधिक प्रसिद्ध था । अक्षकुमार, अतिकाय आदि तथा देवान्तक, नरान्तक
अन्य भी अनेक उसके पुत्र थे । पाताल का महीरावण, गङ्गामहासूरा आदि भी उसके पुत्र थे । कुछ ग्रन्थों में सीता को
रावण की पुत्री माना गया है ।
वाल्मीकिरामायण (सर्ग ९) के अनुसार रावण वर प्राप्त कर देव, ऋषि, गन्धर्व और यक्षों को सताता
था । कुबेर ने दूत भेजकर सदुपदेश दिया, पर उसने दूत को ही मार डाला । कुबेर पर आक्रमण कर पुष्पक छीन
लिया । वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार रावण ने मरुत्त, दुष्मन्त, सुरथ, गाधि, मय, पुरूरवा, अनरण्य आदि
को जीत लिया । अन्त में नारद के परामर्श से उसने यम पर आक्रमण किया । यम ने रावण का वध करना चाहा,
किन्तु ब्रह्मा का अनुरोध मानकर अन्तर्धान हो गये । रावण ने यमलोक जीत कर वरुणालय के वासुकि को परास्त
किया । दैत्यों से सन्धि कर ली । विद्युज्जिह्व का वध कर वरुण की सेना को हराया ।
रावण की अन्य विजय-यात्राएँ
रावण की अनुपस्थिति में मधु ने कुम्भीनसी का अपहरण किया । रावण ने मधु पर आक्रमण किया ।
किन्तु कुम्भीनसी ने रावण का स्वागत करके मधु के लिए अभयदान माँग लिया । रावण कुम्भीनसी की प्रार्थना
मानकर कैलास की ओर बढ़ा । मार्ग में रम्भा के साथ बलात्कार करने के कारण नलकूबर के शाप का भागी हुआ ।
इन्द्रलोक में राक्षसों और देवताओं का घोर युद्ध हुआ । वहाँ सुमाली मारा गया । तब मेघनाद जयन्त को परास्त कर
इन्द्र को वन्दी बनाकर लङ्का ले आया । ब्रह्मा ने इन्द्रजित् नाम देकर इन्द्र को छुड़ाया । प्रक्षिप्त सर्गों में रावण की
सूर्यलोक तथा चन्द्रलोक की यात्रा भी वर्णित है ।
पउमचरियं के अनुसार यम, सहस्रकिरण, इन्द्र, वरुण आदि देवता न होकर राजा ही थे, पर यह सब
वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध है ।
अध्याय उत्तरकाण्ड ५९९
वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड के अनुसार रावण कैलास के ऊपर जा रहा था तो पुष्पक अचानक रुक
गया। रावण पुष्पक से उतरा, नन्दी का उपहास करके उसने कैलास पर्वत उठाया। पर्वत हिलने लगा। महादेव ने
पादाङ्गुष्ठ से पर्वत को दबाया। रावण की भुजाएँ कैलास के नीचे जकड़ गयीं। वह क्रोध और पीड़ा से चिल्लाने
लगा। मन्त्रियों के परामर्श से वह विविध स्तोत्रों से महादेव को सन्तुष्ट करने लगा। सहस्र वर्ष तक विलाप करता
रहा तब भगवान् प्रसन्न हुए। उन्होंने दशग्रीव की भुजाएँ मुक्त कर दीं। उसका नाम रावण रखा, क्योंकि उसने पर्वत
से आक्रान्त होकर दारुण राव किया था। दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार शिव ने उसको चन्द्रहासनामक खड्ग दिया था
(सर्ग १६)। उत्तरकाण्ड (सर्ग ३१) में यह भी मिलता है कि रावण सदा ही सुवर्णलिङ्ग अपने पास रखता था और
उसकी पूजा करता था।
पउमचरियं के अनुसार रावण ने उस चन्द्रहासनामक खड्ग से भुजा काटकर उसकी शिराओं से वीणा का
तार बनाकर जिन की स्तुति की थी। यह देखकर धरणेन्द्र मुनि ने रावण को अमोघविजया शक्ति का वर दिया था।
अन्य रचनाओं के अनुसार शिव ने रावण को अपनी अँगुली से दबा लिया था। इसपर रावण ने एक सिर तथा एक
भुजा मुक्त कर उस सिर से वीणा बनाकर शिव को अपने गायन से प्रसन्न किया था। इस तरह रावण को त्रिलोक पर
अधिकार मिला।
रामकियेन के अनुसार एक देवता ने किसी दिन कैलास पर एक छिपकली पर इतना प्रबल प्रहार किया
कि पर्वत एक ओर झुक गया। देवता कैलास सीधा करने में असमर्थ रहे। तब ईश्वर ने रावण को बुलाया। उसने
कैलास को उठाकर पूर्ववत् सीधा कर दिया। वर पाकर रावण ने उमा को माँग लिया और विष्णु की माया से उसने
उमा को छोड़कर मण्डो को प्राप्त किया।
बुल्के कहते हैं कि रामायण के प्रामाणिक सर्गों में कहीं भी रावण के प्रति किसी शाप का उल्लेख नहीं है,
परन्तु शापबोधक सर्गों को अप्रामाणिक कहना सर्वथा निराधार ही है। युद्धकाण्ड (सर्ग ९४।३५) के अनुसार महादेव
ने देवताओं को आश्वासन दिया था कि एक स्त्री के कारण रावण का नाश होगा। महाभारत का रामोपाख्यान बुल्के
की दृष्टि से रामायण के प्रक्षेपों की कसौटी है। परन्तु उसमें भी नलकुबर के शाप का उल्लेख है। इससे स्पष्ट है कि
उनकी कसौटी भी तभी तक कसौटी है जब तक उनके मत की वह पोषक है।
सुन्दरकाण्ड में त्रिजटा कहती है कि रम्भा के कारण अभिशप्त रावण किसी अनिच्छुक नारी का कुछ
बिगाड़ नहीं सकता (म० भा० ३।२६४।५९)। रावण-वध के बाद राम को सीता के विषय में सन्देह होता है और
उसी समय देवता प्रकट होते हैं। ब्रह्मा कहते हैं कि मैंने नलकूबर-शाप के द्वारा सीता की रक्षा का प्रबन्ध कर लिया
था। नलकूबर-शाप यह था कि उसे न चाहनेवाली पराई स्त्री का सेवन करने पर रावण के सिर के सैकड़ों टुकड़े
हो जायेंगे—
“यदि ह्यकामामासेवेत् स्त्रियमन्यामपि ध्रुवम् ।
शतधाऽस्य फलेन्मूर्धा इत्युक्तः सोऽभवत् पुरा ॥” (म० भा० ३।२९१।३४)
वाल्मीकिरामायण (७। सर्ग २६) में इसका विस्तृत वर्णन है। रम्भा को देखकर रावण उसपर आसक्त
हुआ। रम्भा ने कहा-मैं आपकी पुत्रवधू नलकूबर की पत्नी हूँ। रावण ने कहा-अप्सराओं का कोई पति नहीं
होता। बाद में नलकूबर ने कहा था—
“यदि ह्यकामां कामार्त्तो धर्षयिष्यति योषितम् ।
मूर्धा तु सप्तधा तस्य शकलीभविता तदा ॥”
इस प्रकार बुल्के के माने हुए युद्धकाण्ड में भी शाप का उल्लेख होने पर भी बुल्के झूठ बोलने में कितने
निपुण हैं, यह पाठक विचार करें ।
पउमचरियं के अनुसार रावण ही उपरम्भा का प्रेम-प्रस्ताव अस्वीकार करता है, क्योंकि अनन्तवीर्य का
उपदेश सुनकर विरक्त हुए उसने परनारी के साथ रमण न करने का व्रत लिया था । जैनों और बौद्धों के अनुसार
रावण पक्का धर्मभीरु जैनी या बोधिसत्त्व है । परन्तु यह सब उनके वैदिकधर्मविरोधी होने का ही दुष्परिणाम है ।
वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड ( सर्ग १६ ) के अनुसार रावण ने नन्दी को वानरमुख देखकर उसका
उपहास किया था । नन्दी ने यह शाप दिया था कि तुम्हारे कुल के नाश के लिए मेरे समान रूप और बल से
सम्पन्न वानर होंगे ( वा० रा० ७ । सर्ग १६, १७ )। वेदवती का शाप भी उत्तरकाण्ड में उल्लिखित है।
उत्तरकाण्ड ( सर्ग १९ ) के अनुसार अयोध्या के राजा अनरण्य द्वन्द्वयुद्ध में रावण द्वारा मारे गये थे ।
उन्होंने शाप दिया था कि इक्ष्वाकु-कुल में उत्पन्न राम तुम्हारा वध करेंगे । पुञ्जिकस्थला अप्सरा से उसकी इच्छा
के विरुद्ध रावण ने रमण किया था । ब्रह्मा ने सारा हाल जानकर शाप दिया था कि आज से यदि बलात् किसी नारी
का गमन करोगे तो तुम्हारा सिर शतधा फट जायगा ( वा० रा० ६।१३।१४ ) । यह शाप भी बुल्के के मान्य काण्ड
का है । फिर बुल्के किस मुँह से कहते हैं कि वाल्मीकिरामायण में शाप नहीं है । कैलास-शिखरचालन के समय उमा
ने भी कहा कि स्त्रीनिमित्त से ही रावण का मरण होगा ( वा० रा० ७।१६।२६ ) ।
रावण-पराजय
महाभारत में परशुराम द्वारा कार्तवीर्य के वध का उल्लेख है ( अध्याय १३३ ) । हरिवंश के अनुसार
कार्तवीर्य ने उग्र तप द्वारा सहस्र भुजाएँ प्राप्त कीं और सबको जीत लिया । कीर्तवीर्य ने सेना सहित रावण को परास्त
किया था और उसे बन्दी बना लिया था । पुलस्त्य ने जाकर उसे छुड़ाया । उत्तरकाण्ड ( सर्ग ३४ ) कार्तवीर्य के
कारावास से मुक्त होकर योग्य प्रतिद्वन्द्वियों की खोज में रावण पृथ्वी पर भ्रमण कर रहा था । किष्किन्धा पहुँचकर
उसने सुना वाली दक्षिणी समुद्र पर सन्ध्या कर रहा है। रावण पुष्पक द्वारा वाली के पास गया । वाली रावण
को अपनी काँख में दबाकर आकाश-मार्ग से पश्चिम सागर और उत्तर सागर पर गया, सन्ध्या समाप्त कर
किष्किन्धा लौटा तभी उसने रावण को मुक्त किया। रावण ने वाली के पराक्रम की प्रशंसा की और उससे सख्य
करने की प्रतिज्ञा की ।
आनन्दरामायण ( सर्ग १।१३।१०० ) में अङ्गद के पालने के नीचे बद्ध रावण—‘‘अङ्गदस्य मूत्रधारा-
धोताननः'' होता है। सेरीराम के अनुसार वाली अपने राज्य पर पुष्पक को उड़ते देख रावण पर आक्रमण करता
है तथा मन्दूदा ( मन्दोदरी ) को छीनकर पुष्पक सहित रावण को समुद्र में फेंक देता है। मन्दूदा से विवाह कर लेता
है । कुछ दिनों बाद उसने हनुमान् को आदेश दिया कि गर्भवती मन्दूदा की सेवा के लिए २४ राजकुमारियों को
लायें । रावण ने वाली के गुरु के पास जाकर मन्दूदारी के हरण का समाचार बताया । गुरु ने आश्वासन दिया
कि वह तुमको वापस मिल जायगी, पर तुम तपस्वियों के आश्रमों को नष्ट न करो । गुरु के अनुरोध से वाली
ने कहा—वह गर्भवती है। गुरु ने गर्भ निकाल कर बकरी के शरीर में रख दिया। रावण मन्दूदा को पाकर घर
चला गया ।
गुरु ने हनुमान् से इन्द्रपवानम पर्वत से फूल लाने को कहा—वे समस्त पर्वत उठा लाये । गुरु ने मन्त्रों
की सहायता से उन फूलों से एक मण्डूक की सृष्टि की और मण्डूक से सुन्दर स्त्री की सृष्टि की। गुरु ने उसका नाम
देवीवरमाकोमाल रखा। उसे वाली को पत्नी के रूप में प्रदान किया। बकरी से उत्पन्न पुत्र का नाम अंग्गाद रखा
गया। वरमाकोमाल ने अनूल नामक पुत्र उत्पन्न किया । अन्त में हनुमान् और वाली दोनों तप के लिए चले गये ।
अध्याय उत्तरकाण्ड ६०१
सेरीराम के पातानी पाठ के अनुसार रावण वाली के भवन में कैदी के रूप में रखा गया था। महासिकुल
के अनुरोध से वाली ने मुक्त किया। जब अङ्गद की अवस्था दस वर्ष की थी, रावण उसे मारना चाहता था; क्योंकि
अङ्गद मण्डो के अपमान का स्मरण दिलाता था। रावण छिपकर किष्किन्धा आया, किन्तु सैनिकों ने उसे पकड़
लिया। वाली ने द्वन्द्वयुद्ध में उसे परास्त कर अपने यहाँ बन्दी बनाकर रखा।
उत्तरकाण्ड (सर्ग २३) के बाद प्रक्षिप्त सर्ग में रावण यमलोक से बलि के भवन पहुँचा। बलि ने रावण
को बता दिया कि भवन के द्वार पर जिस श्याम पुरुष से तुम्हारी भेंट हुई थी वही विष्णु हैं। यह सुनकर रावण लड़ने
गया। किन्तु ब्रह्मा के वर का ध्यान रखकर विष्णु अन्तर्धान हो गये। दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार बलि ने अपने यहाँ
पड़े चक्र को दिखाकर रावण से कहा, उसे उठाकर मेरे पास लाओ। रावण उसे हिलाने में समर्थ नहीं हुआ। अन्त
में सारी शक्ति लगाकर उसे उठाया किन्तु मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। बलि ने कहा—यह चक्र मेरे पूर्वज का कुण्डल
है तुम जिसे उठा नहीं सके। विष्णु ने उस महाशक्तिशाली को भी मार दिया था, जिसने इस कुण्डल को कान में
पहना था।
अध्यात्मरामायण (सर्ग १।१३।१०७-११५) के अनुसार बलि पत्नी के साथ चौसर खेलता था। बलि
के हाथ से पासा गिर गया। बलि ने रावण से उठाने को कहा, वह रावण से उठा ही नहीं। दासी ने झट उठा
दिया। भवन से रावण के निकलने पर बलि के अनुचरों ने उसे पकड़ लिया। घोड़े की लीद फेंकने का रावण से
काम लिया। कुछ समय बाद द्वारस्थित विष्णु से उसने प्रार्थना की। विष्णु ने उसे पादाङ्गुष्ठ से आकाश में उछाल
दिया और वह लङ्का पहुँच गया।
रावण ने किसी दिन पश्चिम सागर में भीषणाकार कपिल को देखा। उनसे युद्ध करने की इच्छा की।
कपिल ने प्रहार कर रावण को भूमि पर गिरा दिया और पाताल चले गये। रावण ने पीछा किया। वहाँ कपिल के
समान तीन कोटि पुरुषों को देखकर वह वहाँ से शीघ्रता से निकल गया।
एक अन्य स्थल पर रावण ने शयन कर रहे विष्णु के पास बैठी लक्ष्मी को देखा। लक्ष्मी को पकड़ने के
लिए हाथ बढ़ाना चाहा। विष्णु हँस पड़े और वह भूमि पर गिर पड़ा। विष्णु ने रावण को अभयदान दिया एवं
परिचय पूछने पर अपना विराट् रूप दिखा दिया (सर्ग २३ के बाद पञ्चम प्रक्षिप्त सर्ग)।
रावण किसी दिन श्वेतद्वीप गया। वहाँ की युवतियों ने उसे लीलापूर्वक एक दूसरे के पास फेंक दिया।
भयातुर रावण सागर मध्य में गिर गया। आनन्दरामायण के अनुसार श्वेतद्वीप की एक स्त्री ने रावण को परलङ्का
तक फेंक दिया एवं वह अपनी बहन क्रौञ्चा के शौचकूपक में जा गिरा। भविष्यपुराण में हनुमान् द्वारा भी रावण की
पराजय वर्णित है।
उत्तरकाण्ड की कथा वस्तु
वैश्रवण—विश्रवा और देववर्णिनी के पुत्र वैश्रवण का चतुर्थ लोकपाल तथा धनेश बनना एवं पुष्पक
विमान प्राप्त कर लङ्का निवास (सर्ग १-३)।
प्रहेति के वंश और हेति के वंश में उत्पन्न राक्षसों का लङ्का में निवास तथा विष्णु द्वारा पराजित होकर
पाताल प्रवेश। रावण का जन्म, विश्रवा और कैकसी से दसग्रीव, कुम्भकर्ण, शूर्पणखा और विभीषण का जन्म।
तीनों भाइयों की तपस्या तथा ब्रह्मा से वरप्राप्ति (सर्ग ९, १०) रावण की आशङ्का से वैश्रवण का लङ्का त्याग तथा
कैलास पर निवास। राक्षसों का लङ्का में प्रवेश तथा मन्दोदरी के साथ रावण का विवाह (सर्ग ११-१२)।
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६०२ रामायणमीमांसा एकोनविंश
रावण की विजय-यात्रा—वैश्रवण को पराजित कर पुष्पक-प्राप्ति (सर्ग १३-१५)। रावण को नन्दी
का शाप, रावण का कैलास उठाना, शिव से रावण नाम तथा चन्द्रहास खड्ग की प्राप्ति (सर्ग १६)। वेदवती का
रावण को शाप प्रदान (सर्ग १७)। रावण द्वारा अनेक राजाओं को पराजित करना तथा राजा अनरण्य का रावण
को शाप देना (सर्ग १८, १९)। रावण का यम पर आक्रमण तथा ब्रह्मा द्वारा उनकी रक्षा (सर्ग २०-२२)।
शूर्पणखा के पति विद्युज्जिह्व का रावण द्वारा वध तथा वरुण-पुत्रों की पराजय (सर्ग २३)।
रावण द्वारा अनेक कन्याओं और पत्नियों का हरण, नलकूबर का रावण को शाप देना (सर्ग २४-२६)।
मेघनाद द्वारा इन्द्रबन्धन, देवताओं की प्रार्थना से मुक्ति और देवताओं से मेघनाद को वरप्राप्ति।
हनुमत्कथा—हनुमान् की जन्मकथा और चरित्र (सर्ग ३५, ३६), सीतातयाग (सर्ग ३७), अतिथियों
का प्रस्थान (सर्ग ३८-४०), नृग, निमि ययाति की कथाएँ (सर्ग ५३-५९)। शत्रुघ्न चरित्र (सर्ग ६०-७२),
शम्बूक-वध (सर्ग ७३-८२), अश्वमेध और उसका माहात्म्य (सर्ग ८३-९०), नैमिषारण्य में अश्वमेध के अवसर
पर लव-कुश का राम की सभा में रामायण का गान करना, कुशलव को सीता-पुत्र जान कर राम का वाल्मीकि के
पास सन्देश भेजना, सभा के सम्मुख अपनी शुद्धि का साक्ष्य देने के लिए सीता से अनुरोध करना, सीता का शपथ-
ग्रहण, पृथिवी का सीता को अपने साथ ले जाना (सर्ग ९१-९५), राम द्वारा सीता को लौटाने का पृथिवी से
अनुरोध (सर्ग ९६-९८), कुश और लव द्वारा उत्तरकाण्ड का गान, सभाविसर्जन, माताओं का देहान्त (सर्ग ९९)।
विजय-यात्राएँ—भरत-पुत्रों (तक्ष और पुष्कल) के तक्षशिला, पुष्कलावती में राज्यों की स्थापना,
लक्ष्मण-पुत्रों (अङ्गद और चन्द्रकेतु) के अङ्गद्वीप और चन्द्रकान्त में राज्यों की स्थापना, काल का राम को विष्णु-
रूप में आने का स्मरण कराना, दुर्वासा के आग्रह से लक्ष्मण का राम और काल के पास जाना, इसके कारण, काल के
साथ हुई शर्त के अनुसार राम द्वारा लक्ष्मण का त्याग और लक्ष्मण का देह त्याग कर शेषरूप में व्यक्त होना, राम का
कुशावती में कुश एवं श्रावस्ती में लव को प्रतिष्ठित करना, अपने पुत्रों (सुबाहु तथा शत्रुघाती) को राज्य देकर
शत्रुघ्न का अयोध्या आना, सुग्रीव और वानरों का आना, राम द्वारा विभीषण एवं हनुमान् को अमरत्व का वरदान
देना, राम का अपने भाइयों सहित विष्णुरूप में तथा वानरों का अंशानुसार देवताओं में प्रवेश करना एवं नागरिकों
की सगुण ब्रह्मलोक की प्राप्ति। फलश्रुति (सर्ग १०९-१११)।
उत्तरकाण्ड का विश्लेषण
उत्तरकाण्ड के विश्लेषण में बुल्के कहते हैं कि "तीनों पाठों में इतनी ही विभिन्नता है कि दाक्षिणात्य
पाठ में भृगु द्वारा विष्णु को प्रदत्त शाप सीता-त्याग का कारण माना गया है।" इतनी कम विभिन्नता से भी वे
इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि इसकी रचना अन्य काण्डों के बाद में हुई थी। यद्यपि यह स्वाभाविक ही है कि अन्तिम
चरित्र की रचना अन्त में होती है तथापि उनका आशय इतना ही नहीं है। उनका अभिप्राय तो यह है कि उत्तर-
काण्ड महर्षि वाल्मीकि की कृति ही नहीं है। यह तो किन्हीं अन्य व्यासों ने पीछे से जोड़ दिया है। परन्तु यह कथन
अशुद्ध एवं दुरभिसन्धिपूर्ण है। क्योंकि पाठों एवं टीकाकारों की परम्पराओं में बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड भी
सम्मिलित हैं ही। टीकाकारों ने समानरूप से सब पर टीकाएँ भी लिखी हैं। उत्तरकाण्ड के प्रक्षिप्त होने के तर्कों का
पीछे खण्डन किया जा चुका है।
बुल्के कहते हैं कि "वाल्मीकिरामायण में दो ही विस्तृत अंश हैं, जिनमें अशुद्ध श्लोकों का बाहुल्य पाया
जाता है। विश्वामित्र की कथा (बालकाण्ड सर्ग ५७-६५) तथा रावणचरित (उत्तरकाण्ड सर्ग १-३६)।
अशुद्धियों का बाहुल्य इन दोनों वृत्तान्तों को प्रक्षेप सिद्ध करता है।" परन्तु बुल्के के ये तर्क बिलकुल गलत हैं। वस्तुतः
जिन अंशों को बुल्के अशुद्धियाँ कहते हैं वे आर्ष पाठ हैं, अशुद्धियाँ नहीं हैं। अन्यथा रघुवंश, माघ, किरात आदि में
अध्याय उत्तरकाण्ड ६०३
बिल्कुल अशुद्धियाँ न होने से उन्हें वेदों से भी प्राचीन मानना पड़ेगा और वेदों में वैसी अशुद्धियाँ होने से उन्हें
अत्यन्त अर्वाचीन कहना होगा, परन्तु यह सब वस्तुस्थिति के बिलकुल विरुद्ध है ।
'वधंसे' के स्थान में 'वधंसि' प्रयोग कर ( १।२८ इत्यादि स्थानों में ) टीकाकारों ने समाधान भी किया
है । विशेषकर 'तिलक' व्याख्याकार तो महावैयाकरण नागेश भट्ट हैं । अतिथियों की पुनः विदाई का वैसा ही
समाधान है जैसा कि पहले संक्षेप में वर्णनीय विषय का वर्णन कर उसका विस्तृत रूप में पुनः वर्णन किया जाता है ।
इतना ही नहीं सम्पूर्ण उत्तरकाण्ड को प्रक्षेप मानकर भी उस प्रक्षेप में भी प्रक्षेप की वे कल्पना करते हैं ।
अतएव रावणचरित आदि को वे प्रक्षेप में प्रक्षेप मानते हैं । उनकी दृष्टि में "उत्तरकाण्ड का मूल रूप सीता-त्याग के वर्णन
से प्रारम्भ हुआ होगा ( सर्ग ४२-५२ ) । शेष सामग्री से पौराणिक कथाओं को तथा शम्बूकवध की कथा को हटाने
पर जो वृत्तान्त रह जाता है वही प्रारम्भिक उत्तरकाण्ड रहा होगा । अर्थात् शत्रुघ्नचरित, कुश और लव का जन्म,
राम का अश्वमेध, कुश तथा लव द्वारा रामायणगान, सीता का भूमि-प्रवेश, रामादि के पुत्रों की राज्य-स्थापना,
लक्ष्मण का देहान्त, राम का स्वर्गारोहण ।” परन्तु यह सब बुल्के की अटकलमात्र है । कोई ठोस आधार और प्रमाण
उनकी इस कल्पना में नहीं है । परम्परा एवं टीकाएँ तो प्रचलित सम्पूर्ण उत्तरकाण्ड की प्रामाणिकता ही सिद्ध करती
हैं । उत्तरकाण्ड का अर्थ ही यह है कि जो वस्तु छः काण्डों में अपेक्षित थी, उसका वर्णन किया जाय । रावण,
मेघनाद आदि का जन्म, कार्य तथा हनुमान् आदि का भी जन्म तथा चरित आदि का वर्णन प्रासङ्गिक ही है ।
परस्पर विचारविनियम के प्रसङ्ग में निमि, नृग, ययाति आदि का वर्णन भी अत्यन्त प्रासङ्गिक है, अतः इतने बड़े
अंशों को प्रक्षेप कहना अवश्य ही साहस है । शत्रुघ्न-चरित प्रचलित रामायण में वर्णित ज्यों का त्यों प्रामाणिक ही है।
सौदास की कथा
वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड ( सर्ग ६५ ) में वाल्मीकि ने शत्रुघ्न को सौदास की कथा सुनायी थी ।
सौदास ने मृगया के समय व्याघ्ररूपधारी दो राक्षसों को देखकर एक को मार डाला । प्रतीकार करने का संकल्प
लेकर दूसरा राक्षस अन्तर्हित हो गया । कालान्तर में सौदास वसिष्ठ के नेतृत्व में अश्वमेध यज्ञ करते हैं । यज्ञान्त में राक्षस
ने वसिष्ठरूप धारण कर सामिष भोजन माँगा । राजा ने तैयार करने का आदेश दिया । राक्षस नरमांस का भोजन
हाथ में लेकर रसोइये के रूप में राजा के सामने उपस्थित हुआ । राजा ने अपनी पत्नी मदयन्ती के साथ यह भोजन
परोस दिया । मानुष्यामिष भोजन समझ कर वसिष्ठ ने राजा को यह शाप दे दिया कि यही तुम्हारा भोजन होगा ।
शाप सुनकर क्रोधवश सौदास भी प्रतिशाप देने के लिए प्रस्तुत हुए, किन्तु मदयन्ती के रोकने से सौदास ने क्रोधमय
शाप-जल को अपने पैर पर ही डाल दिया जिससे उसके पैर पर काले धब्बे पड़ गये । इसी लिए कल्माषपाद नाम से
उसकी प्रसिद्धि हुई । अन्त में राक्षस का कपट जानकर वसिष्ठ ने शाप १२ वर्ष के लिए सीमित कर दिया । फलतः
१२ वर्ष के बाद कल्माषपाद शापमुक्त होकर पुनः राज्याधिकारी होकर प्रजापालन करने लगे ।
विष्णुपुराण ( ४।४।३८-५८ ); भागवत ( ९।९।२०-२५ ) तथा स्कन्दपुराण ( ३।३।२ ) में भी यह
कथा है । स्कन्दपुराण के अनुसार वसिष्ठ द्वारा सन्तति प्राप्त कर वह तपस्या के लिए बन जाता है । वहाँ ब्रह्महत्या
सामने आती है । उससे मुक्ति के लिए वह तीर्थों में भ्रमण करता है । अन्त में वह गौतम के आदेशानुसार गोकर्ण में
शिवलिङ्ग के दर्शन कर मुक्त होता है । कृत्तिवासरामायण के अनुसार वह गङ्गाजल से मुक्त होता है ।
बुल्के के अनुसार “रामकथासाहित्य में इस कथा के तीन रूप मिलते हैं । कोई व्यक्ति अनजान में मांसाहार
परोसने के कारण ब्राह्मण-शाप का भाजन बनता है और वह राम द्वारा मुक्त होता है । अन्तिम दो कथाओं में किसी
शत्रु के षड्यन्त्र के कारण नरमांस परोसा गया था तथा तीसरी कथा के अनुसार राजा प्रतापभानु ब्राह्मणों का
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६०४ रामायणमीमांसा एकोनविंश
कोपभाजन बनकर रामायण का प्रतिनायक राक्षस रावण के रूप में प्रकट होता है।" परन्तु उनकी यह कल्पना
निराधार है। प्रतापभानु की कथा सौदाश की कथा से सर्वथा भिन्न है। दोनों के नामों एवं रूपों में भी भिन्नता
है। संसार में मांसभक्षण, सुरापान की सैकड़ों समान घटनाएँ घटती हैं। किन्तु सब की अभिन्नता नहीं कही जा
सकती।
वाल्मीकिरामायण के उत्तरकाण्ड के सर्ग ५९ के अनन्तर प्रक्षिप्त सर्ग के अनुसार गौतम नामक ब्राह्मण ने
किसी दिन राजा ब्रह्मदत्त के यहाँ भोजन माँगा। संयोग वश आहार में कुछ मांस पड़ गया जिससे गौतम ने राजा को
गीध बन जाने का शाप दिया। राजा के विनय से गौतम ने कहा कि राम के स्पर्श से तुम मुक्त होओगे। ब्रह्मदत्त
गीध बन गया। वह राम का स्पर्श कर दिव्य रूपधारी पुरुष बन गया। इस कथा का भी सौदाश के साथ सम्बन्ध
जोड़ना निराधार है। नामभेद तथा परिणामभेद भिन्नता के हेतु स्पष्ट ही हैं। मनुष्यमांस का निषेध सदा ही था।
ज्ञानाज्ञानवश उसके प्रयोग से अनेक स्थलों पर अनर्थ संभावित हैं ही।
अध्यात्मरामायण (६।५।५-५४) तथा आनन्दरामायण (१।१०।२१५-२१९) में रावण के गुप्तचर
शुक के पूर्वजन्म के विषय में कथा मिलती है कि शुक नामक वनवासी ब्राह्मण देवताओं का हितकारी होने के कारण
राक्षसों का शत्रु बन गया। एक दिन अगस्त्य उसके आश्रम में आये तो अवसर का लाभ उठाकर वज्रदंष्ट्र नामक
राक्षस ने अगस्त्य का रूप धारण कर लिया और शुक से सामिष भोजन माँगा। वज्रदंष्ट्र ने शुक की पत्नी को
मूच्छित कर दिया और स्वयं उसी का रूप धारण कर नरमांस परोसा और अन्तर्हित हो गया। इसपर अगस्त्य
ने शाप दिया कि तुम नरमांसभक्षी राक्षस बन जाओ। शुक के द्वारा कारण पूछे जाने पर मुनि ने राक्षस की करतूत
जान ली और शुक को आश्वासन दिया कि राम के आगमन पर तुम रावण-दूत बनकर राम का दर्शन पाओगे।
रावण को तत्त्वज्ञान का उपदेश कर परम पद पाओगे। इस कथा का भी सौदाश के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है।
बुल्के ने सौदाश या सुदास नाममात्र के आधार पर ६२१ वें अनु० में अनेक व्यक्तियों का सम्बन्ध जोड़
लिया है। ऋग्वेद के अनुसार सुदास नामक राजा के दो पुरोहित थे। विश्वामित्र और वसिष्ठ। उन दोनों में वैर
उत्पन्न हुआ। वैदिक साहित्य में (विश्वामित्र की प्रेरणा से) सौदासों द्वारा वसिष्ठ-पुत्र का वध तथा यज्ञ के प्रभाव से
सौदासों पर वसिष्ठ की विजय उल्लिखित हैं। यहाँ भी सुदास पुरोहित ब्राह्मण थे। सौदाश राजा से उनका सम्बन्ध
जोड़ना व्यर्थ है। जब वसिष्ठ और विश्वामित्र दोनों ही सुदास थे तब वसिष्ठ का सौदासों पर विजय की कहानी भी
कल्पनामात्र ही है।
बृहद्देवता में अध्याय ६ में कहा गया है कि वसिष्ठ ने सुदास को राक्षस बन जाने का शाप दिया था।
इसी से यह क्यों न समझा जाय कि वसिष्ठ सुदास या सुदासों से भिन्न थे।
बुल्के कहते हैं कि "इस कथा पर बौद्ध संसार में प्रसिद्ध सुतसोमजातक का प्रभाव पड़ा है। ब्राह्मण-धर्म के
ग्रन्थों में सौदाश की कथा के दो रूप मिलते हैं। एक महाभारत का रूप, जिसमें वसिष्ठ दूसरों द्वारा अभिशप्त सौदाश
को मुक्त करते हैं और दूसरा रामायण का रूप जिसके अनुसार वसिष्ठ ने सौदाश को राक्षस बन जाने का शाप दिया
था। दोनों में समान रूप से यह तत्त्व विद्यमान है कि नरमांसाहार प्रदान करने के कारण सौदाश को १२ वर्ष तक
राक्षस बनना पड़ा था।" सौदासीय कथा के रूपान्तर भी मिलते हैं। जिनके द्वारा राम का महत्त्व तथा उनकी
दयालुता का भी प्रतिपादन है।
महाभारत और रामायण के दोनों सौदासों पर विचार आगे किया जायगा। दोनों में तुल्यता होने पर
भी उसका आधार बौद्ध साहित्य नहीं माना जा सकता है, क्योंकि ऐतिहासिक दृष्टि से महाभारत और रामायण
दोनों ही बौद्ध साहित्य के पूर्ववर्ती हैं। बुद्ध के जन्म से बहुत पहले महाभारत की रचना हो चुकी थी। रामायण तो
बुद्ध एवं बौद्ध साहित्य से लाखों वर्ष पहले निर्मित हो चुकी थी। यह इतिहास-विवेचन में देखें। इसके अतिरिक्त बौद्ध
साहित्य के महासुतसोम की इनसे भिन्नता भी है।
५२२ वें अनु० में सुतसोम के सम्बन्ध में कहा गया है कि सुतसोम इन्द्रप्रस्थ के राजा कौरव्य का राज-
कुमार था। जो तक्षशिला में ब्रह्मदत्त के रूप कल्माषपाद का सहपाठी था। बाद में अपने पिता के स्थान पर राजा
बन गया था। कल्माषपाद भी वाराणसी का राजा था। वह पूर्व जन्म में नरभक्षक यक्ष था। अतः वह प्रतिदिन मांस
खाता था। किसी दिन कुत्ते राजा का मांसाहार ले गये। रसोइये ने मनुष्य मांस बनाकर परोस दिया। राजा ने
उसे पसन्द किया। तब रसोइये ने रहस्य खोला। राजा ने प्रतिदिन के लिए नरमांस तैयार करने का आदेश
दिया। राजा ने सब कैदियों को खा लिया। बाद में नागरिकों का भी वध होने लगा। जनता में खलबली
मच गयी। रसोइया रँगे हाथ पकड़ा गया। उसने कहा—राजा को नरमांस अपेक्षित होता है। राजा तथा
रसोइया दोनों निर्वासित कर दिये गये। राजा वन में मनुष्य-वध किया करता था और रसोइया उनका मांस भूनकर
परोसता था। किसी दिन राजा रसोइये को भी खा गया। एक ब्राह्मण के अपहरण के कारण लोगों ने राजा का
पीछा किया। राजा के पैर में चोट आ गयी। राजा ने एक वृक्ष-देवता से यह प्रतिज्ञा की कि अच्छा होने पर मैं तुम्हें
भारतवर्ष भर के १०१ राजकुमारों को अर्पित करूँगा। सात दिन भोजन न करने के कारण उसका घाव भर गया।
उसने समझा कि यह देवता की कृपा है। वह पूर्व जन्म के अपने साथी यक्ष से मन्त्र पाकर शीघ्रगामी यक्ष बन गया
और उसने एक सो राजाओं को कैद कर लिया। इसके बाद उसने देवता के आदेश से सुतसोम को भी पकड़ लिया।
सुतसोम ने उस दिन पूजा करते समय किसी ब्राह्मण को आश्वासन दिया था कि स्नान से लौटकर आपकी बात सुनूँगा,
इसलिए उसने नरभक्षक से निवेदन किया मुझे ब्राह्मण के प्रति अपनी प्रतिज्ञा पूरा करने का अवसर दिया जाय।
नरभक्षक ने उसे अनुमति दे दी। सुतसोम ब्राह्मण के पास जाकर चार गाथाएं सीखकर और बदले में उसे चार हजार
मुद्राएँ देकर कल्माषपाद के पास लौटा। वह इन चार गाथाओं को सुनकर प्रसन्न हुआ और उसने सुतसोम से चार
वर माँगने को कहा। सुतसोम ने कहा—१. मैं आपको सौ वर्ष तक जीवित देखना चाहता हूँ। २. आप उन एक
सौ राजकुमारों को न खायें। ३. आप उनका राज्य वापस कर दें। ४. आप नरभक्षण त्याग दें। दोनों में देर
तक वार्तालाप होता रहा। फलतः कल्माषपाद ने अपनी आदत को छोड़ना स्वीकार कर लिया। राजकुमारों को छोड़
दिया और उनके राज्य भी वापस दे दिये। जिस स्थान पर नरभक्षक का हृदय-परिवर्तन हुआ, वहाँ कम्मासदम्भ
नामक नगर बस गया।
बौद्ध साहित्य की परवर्ती रचनाओं में मांसाहारी कल्माषपाद को तथा सौदास को अभिन्न माना गया है
और सौदास के मांसाहारी बनने का कारण यह बताया गया है कि वह सिंहिनी की सन्तान था। कथा का यह रूप
जातकमाला के सुतसोमजातक, लङ्कावतारसूत्र, सिंहसौदासमांसभक्षणनिवृत्ति के चीनी अनुवाद, भद्रकल्पावदान आदि
में सुरक्षित है। जैनी ग्रन्थों में इसकी चर्चा है (पउमचरियं २२।७२-९५) ।
महाभारत अश्वमेधपर्व (अध्याय ५६-५८) में सत्यसन्ध उत्तंक तथा सौदास के विषय में जो कथा मिलती
है उसपर बौद्ध जातक की छाप स्पष्ट है। किन्तु बुल्के का यह अनुमान सही नहीं है कि बौद्ध साहित्य का प्रभाव
रामायण या महाभारत पर पड़ा है। जैसा कहा जा चुका है कि महाभारत और रामायण उससे पूर्ववर्ती हैं। बौद्ध-
कथा तो अहिंसा एवं मांसभक्षणनिवृत्ति के उद्देश्य से लिखी गयी है। वह ऐतिहासिक ही हो यह आवश्यक नहीं है।
सुखावबोधार्थ आख्यायिकाएँ कल्पित भी होती हैं। कल्माषपाद नाम और नरमांसभक्षण तुल्य होने पर भी रामायण
के अनुसार यह अनजान में हुए अपराध के कारण वसिष्ठ-शाप से १२ वर्ष के लिए राक्षस हुआ था। उसके कल्माषपाद
होने का हेतु भी क्षमा एवं सहिष्णुता का महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। उसके विपरीत सुतसोमजातक के कल्माषपाद की
कथा में कहीं अधिक नरमांसभक्षण की उद्दाम प्रवृत्ति है। दोनों कथाओं में एकता का परिचायक कोई सूत्र नहीं है।
बौद्धों का कल्माषपाद सौदास से भिन्न है। विकासवाद एवं ऐतिहासिकों के अनुसार विकसित कथा को नवीन एवं
संक्षिप्त को प्राचीन माना जाता है। क्योंकि पूर्व की बातों को जानकर और परिष्कृत एवं रोचक बनाकर उनका
निरूपण करना उत्तर वक्ता के लिए स्वाभाविक ही है। रामायण और महाभारत दोनों की अपेक्षा बौद्धों की कथा
कहीं अधिक विकसित है, अतः उसकी नवीनता ही सिद्ध होती है।
महाभारत आदिपर्व (अध्याय १७६–१७८) के अनुसार राजा कल्माषपाद किसी दिन मृगया के समय
वन में वसिष्ठपुत्र शक्ति से मिलते हैं। मार्ग देने के प्रश्न पर विवाद छिड़ जाने पर राजा शक्ति पर कोड़े का प्रहार
करते हैं। जिस पर शक्ति राजा को पुरुषाद बन जाने का शाप देते हैं। दोनों का विवाद सुनकर वसिष्ठ का अनर्थ चाहने-
वाले विश्वामित्र किंकर राक्षस को आदेश देते हैं कि वह कल्माषपाद के शरीर में प्रवेश करे। बाद में किसी दिन एक
ब्राह्मण ने कल्माषपाद से सामिष भोजन माँगा। राक्षसग्रस्त राजा ने अन्य मांस अप्राप्त होने के कारण ब्राह्मण को
नरमांस खिलाने का आदेश दिया। पाचक ने वैसा ही किया, जिससे ब्राह्मण ने शक्ति के शाप का स्मरण दिलाकर
राजा को पुरुषाद बनने का पुनः शाप दिया। राक्षस के आवेश तथा उपर्युक्त दो शापों के कारण कल्माषपाद वास्तव
में नरभक्षक बन गया। उसने सर्वप्रथम शक्ति का ही भक्षण किया। अनन्तर विश्वामित्र के आदेश से किंकर राक्षस ने
राजा को वसिष्ठ के १०० पुत्रों को खाने के लिए प्रेरित किया। पुत्रों की मृत्यु से वसिष्ठ आत्महत्या का असफल प्रयत्न
करते हैं। बहुत समय बाद वन में कल्माषपाद वसिष्ठ के सामने आता है। अभिमन्त्रित जल द्वारा वसिष्ठ राक्षसत्व
एवं शापों से उसे मुक्त कर देते हैं। इतना ही नहीं कल्माषपाद की प्रार्थना पर उसके लिए सन्तति भी उत्पन्न करते
हैं। १२ वर्ष तक गर्भधारण करने के बाद अश्म से उदर खोलने से उसका जन्म होने से उसका नाम अश्मक हुआ।
बुल्के कहते हैं कि “वैदिक साहित्य में वसिष्ठ और विश्वामित्र का वैर प्रसिद्ध है। महाभारत की और वैदिक
साहित्य की कथा में मुख्य अन्तर यह है कि महाभारत के अनुसार वसिष्ठ शाप नहीं देते उल्टे वह कल्माषपाद को
शाप से मुक्त कर देते हैं। अतएव कल्माषपाद के राक्षस बनने के शक्ति का शाप, किंकर राक्षस का प्रवेश एवं नरमां-
साहार देने के कारण किसी ब्राह्मण का शाप इत्यादि अन्य कारण बताये गये हैं। अन्तिम कारण में सुतसोमजातक
का प्रभाव देखा जा सकता है। सुतसोम में साधारण मांस के अभाव में राजा को नरमांस परोसा जाता है जैसा कि
यहाँ अन्य मांस अप्राप्य होने से ब्राह्मण को नरमांस दिया जाता है।” परन्तु यह भी सङ्गत नहीं है, क्योंकि प्रमेयत्व
और वाच्यत्व रूप से तो सर्वत्र साम्य होता ही है, पर कथा में वह सादृश्य अभेद का प्रयोजक नहीं होता। सुतसोम-
जातक एवं महाभारत की परस्पर अत्यन्त विलक्षणता उसकी भिन्नता ही सिद्ध करती है। "आत्मा वै पुत्रनामासि"
आत्मा ही पुत्र होता है। इस दृष्टि से वसिष्ठ-पुत्र शक्ति का शाप भी वसिष्ठ का ही शाप माना जा सकता है। वसिष्ठ
शापमुक्त होने की बात तो रामायणसम्मत है ही। वैदिक साहित्य का सौदास या सुदास पुरोहित होने से ब्राह्मण है।
रामायण तथा महाभारत का सौदास क्षत्रिय राजा है। सुतसोमजातक का कल्माषपाद तो सौदास से भिन्न ही है।
परवर्ती कथाओं में उन दोनों का अभेद पूर्णतया विरुद्ध होने से काल्पनिक ही है।
बुल्के कहते हैं कि "बृहद्देवता के अनुसार वसिष्ठ ने सौ पुत्रों के वध के कारण सुदास को शाप
दिया था। किन्तु महाभारत में सौदास शापग्रस्त होने के पश्चात् ही वसिष्ठ-पुत्रों का भक्षण करता है जैसा कि
सुतसोमजातक में कल्माषपाद नरभक्षक बनने के बाद ही १०१ राजाओं का बलिदान तैयार करता है।
जातक में बोधिसत्त्व सुतसोम नरभक्षक को उपदेश देकर व्यसन छोड़ने को प्रेरित करता है। जैसा कि महाभारत
के अनुसार वसिष्ठ अभिमन्त्रित जल से कल्माषपाद को मुक्त करते हैं। इस प्रकार महाभारत की कथा पर सुतसोम की
गहरी छाप है।” परन्तु यह भी संगत नहीं, क्योंकि कहा जा चुका है कि महाभारत प्राचीन है। सुतसोमजातक उसकी
अपेक्षा अर्वाचीन है। इसके अतिरिक्त महाभारत का कल्माषपाद शाप आदि वश ही नरभक्षक बनता है, किन्तु सुत-
सोम का कल्माषपाद प्राचीन संस्कार वशात् पहले मांसभक्षक और फिर शाप आदि के बिना ही नरभक्षक बनता है।
महाभारत का कल्माषपाद १०० ब्राह्मणों को खाता है, किन्तु सुतसोम जातक का कल्माषपाद देवता को बलिदान
करने के लिए १०१ राजकुमारों को बटोरता भर है, खाता नहीं और बाद में उनको छोड़कर उनका राज्य लौटा देता
है। महाभारत का कल्माषपाद शाप से एवं राक्षसावेश से नरभक्षक बनता है और अभिमन्त्रित जलप्रोक्षण कर वसिष्ठ
के अनुग्रह वश मुक्त होता है। जातक का कल्माषपाद सुतसोम के उपदेश से ही आदत छोड़ता है। इस तरह दोनों में
महान् अन्तर है। सुतसोमजातक का आख्यान लौकिक स्वाभाविक होने से भी अर्वाचीन प्रतीत होता है, किन्तु
महाभारत और रामायण के दोनों आख्यान वर, शाप आदि अलौकिकता से सम्बन्ध रखते हैं, अतः वे प्राचीन हैं।
महाभारत और रामायण की कथा संक्षिप्त है तथा सुतसोमजातक की कथा सविस्तर है। इस तरह दोनों में महान्
अन्तर है। वेद के उपबृंहणार्थ ही महाभारत तथा रामायण का आविर्भाव है, अतः वैदिक साहित्य की कथा से
उनका मेलजोल हो सकता है। बृहद्देवता की कथा का सुतसोमजातक की कथा से साम्य नहीं है, यह बुल्के भी
मानते हैं।
महाभारत में दो शापों का उल्लेख है। बुल्के कहते हैं कि "कल्माषपाद नाम का वैदिक साहित्य में सर्वथा
अभाव है। महासुतसोमजातक गाथा ४७२, महाभारत तथा रामायण तीनों में समानरूप से मिलता है। इनमें
सुतसोमजातक सबसे प्राचीन है। अतः पहले पहल यह नाम बौद्ध साहित्य में ही प्रयुक्त हुआ है। महाभारत, रामायण
तथा पुराणों में सौदास, मित्रसह तथा कल्माषपाद तीनों नाम दिये हैं", पर यह सभी कुशकाशावलम्बन है। महाभारत
और रामायण की बुद्ध से भी प्राचीनता सिद्ध की जा चुकी है। हरिवंशपुराण भी महाभारत समकालीन ही है।
उसमें स्पष्ट उल्लेख है—
"सुदासस्य सुतस्त्व्वासीत् सौदासो नाम पार्थिवः ।
ख्यातः कल्माषपादो वै नाम्ना मित्रसहस्तथा ॥" (हरिवं० १।५५।२१)
अतः बुल्के का यह कहना "एक दीर्घकालीन विकास के अन्त में सौदास की कथा भक्तवत्सल भगवान् राम
के गुणगान में परिणत हो गयी।" कथमपि सङ्गत नहीं है, अवश्य ही सौदास की कथा प्राचीन ही नहीं अतिप्राचीन
है। परन्तु वह अतिप्राचीन काल से ही रामायण के अन्तर्गत होने से राम गुणगान के रूप में स्वीकृत है, पर बुल्के के
विकासक्रम से नहीं। महाभारत, रामायण तथा पुराण सभी वेद के उपबृंहणार्थ ही निर्मित हैं। अतः वैदिक साहित्य
से ही उनका सम्बन्ध है। किञ्चित् भेद होने पर कल्पभेद से समाधान है ही।
आश्चर्य है कि बुल्के वेद में आनेवाले राम, सीता, दशरथ, जनक आदि का सम्बन्ध रामायण के राम,
सीता, दशरथ आदि से मानने में आनाकानी करते हैं। वेदप्रातिशाख्य के वाल्मीकि से रामायण के वाल्मीकि का
सम्बन्ध वे नहीं मानते हैं। वैदिक सौदास से सुतसोमजातक के सौदास का अत्यन्त वैलक्षण्य होने पर भी वे यथा-
कथञ्चित् बादरायणसम्बन्ध-स्थापना का हठ करते हैं। 'किमाश्चर्यमतः परम् ।'
शम्बूक-वध
६२८ वें अनु० में शम्बूक-वध के सम्बन्ध में उत्तरकाण्ड के अनुसार कहा गया है कि राम नारद से यह
जान लेते हैं कि एक शूद्र का तपस्या करना ही ब्राह्मण-पुत्र की अकाल मृत्यु का हेतु है। राम पुष्पक पर आरूढ़ होकर
शूद्र का पता लगाकर उसका वध करते हैं। राम के इस कार्य से वह स्वर्ग प्राप्त न कर सकेगा। इस कथन का इतना
ही अभिप्राय है कि शम्बूक जो सदेह स्वर्ग प्राप्त करना चाहता था वह न कर सकेगा। किन्तु राजदण्ड से मृत्यु प्राप्त
कर तो वह स्वर्गभागी होगा ही, अतः इसका अन्य वचनों के साथ समन्वय ही है, विरोध नहीं है। राम मृत पुत्र के
पुनर्जीवन का वरदान माँग लेते हैं। अगस्त्य राम को श्वेत राजा और दण्डकारण्य की कथा सुनाते हैं।
६०८ रामायणमीमांसा एकोनविंश
पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड अध्याय ३२।८९ तथा उत्तरखण्ड अध्याय २३०।४७) में भी देवताओं के वरदान से
द्विज-पुत्र के जीवित होने का उल्लेख है। महाभारत शान्तिपर्व में कहा गया है कि—
“श्रूयते शम्बुके शूद्रे हते ब्राह्मणदारकः।
जीवितो धर्ममासाद्य रामात् सत्यपराक्रमात् ॥” (म० भा० १२।१४९।६२)
इसमें देवताओं के वरदान से नहीं, किन्तु राम के धर्म से द्विजपुत्र का पुनर्जीवन होना माना गया है।
वस्तुतः बुल्के समन्वय की बात सोचते ही नहीं। उन्हें सर्वत्र विरोध ही दिखायी देता है। अन्यथा देवताओं के प्रसाद
या धर्म से पुनर्जीवन में विरोध ही क्या है। धर्म भी तो देवता-प्रसाद का साधन है, अतः राम के धर्म से देवता-प्रसाद
और उससे द्विजपुत्र का पुनर्जीवन होने में विरोध का लेश भी तो नहीं है। यही श्लोक इस बात का भी परम प्रमाण
है कि रामायण महाभारत की अपेक्षा अति प्राचीन है। अतः रामकथा पर कृष्णकथा का प्रभाव अथवा महाभारत के
रामोपाख्यान को वाल्मीकिरामायण का मूल मानना सर्वथा भ्रान्ति ही है।
कालिदास के रघुवंश एवं उत्तररामचरित के अनुसार शम्बूक-वध के द्वारा ही ब्राह्मण पुत्र पुनर्जीवन
प्राप्त करता है—
“कृतदण्डः स्वयं राज्ञा लेभे शूद्रः सतां गतिम् ।
तपसा दुश्चरेणापि न स्वमार्गविलङ्घिना ॥” (र० वं० १५।५३)
राजा के द्वारा दण्ड दिये जाने के कारण शूद्र को उत्कृष्ट सद्गति मिल गयी, जो कि स्वमार्गविपरीत दुश्चर
तप से भी नहीं मिल सकती थी।
उत्तररामचरित के अनुसार शम्बूक, वध के बाद, दिव्य रूप में प्रकट होकर राम से कहता है, मैं आपके
प्रसाद से शाश्वत पद प्राप्त करूँगा।
बुल्के कहते हैं कि परवर्ती राम-कथाओं में देवताओं के वरदान का उल्लेख नहीं है, किन्तु राम द्वारा
शम्बूक-वध की क्रिया ही ब्राह्मण-पुत्र के पुनर्जीवन एवं शम्बूक की स्वर्गप्राप्ति दोनों घटनाओं की कारण मानी गयी है।
किन्तु बुल्के यह नहीं समझते कि मीमांसकों के अनुसार कर्म ही फल देता है। उत्तरमीमांसा के अनुसार
देवताप्रसाद द्वारा कर्म फल देता है। परिणाम दोनों का एक ही है। देवताओं का वरदान भी सत्कर्म द्वारा होता है।
इसी लिए कहा गया है कि—
‘कर्मप्रधान विश्व रचि राखा।
जो जस करै सो तस फल चाखा॥’ (रा० मा० २।२७।२)
अतः प्रकृत में दोनों का समन्वय ही है।
आनन्दरामायण के अनुसार मृत ब्राह्मण-बालक के माता-पिता को प्रीतिपूर्वक कहा गया था कि यदि
उनका पुत्र पुनर्जीवित न होगा तो उन्हें कुश और लव मिल जायेंगे। ब्राह्मण ही नहीं अयोध्या में पाँच शव और
एकत्रित हो गये थे : एक क्षत्रिय, एक वैश्य, एक तेली, एक लुहार की पुत्र-वधू एवं एक चमार। राम ने जैसे शूद्र को
मारा सब जीवित हो गये। राम ने पहले शूद्र को वरदान दिया। उसने अपने उद्धार के अतिरिक्त अपनी जाति के
लिए सद्गति माँगी। राम ने रामनाम का जप और कीर्तन शूद्रों की सद्गति का उपाय बताया। यह भी कहा कि
शूद्र लोग आपस में मिल कर एक दूसरे से मिलते हुए नमस्कार के रूप में राम राम कहेंगे। इसी से उनका उद्धार
होगा। तुम भी मेरे हाथ से मरकर वैकुण्ठ जाओगे।
अध्याय उत्तरकाण्ड ६०९
कुछ अनभिज्ञ इसे राम की क्रूरता कह सकते हैं और स्वयं राम भी अपने दक्षिण हाथ को क्रूर कहते
हैं—हे दक्षिण हस्त ! तुम ब्राह्मण-पुत्र के जीवन के लिए शूद्र मुनि पर कृपाण चलाओ, कतराते क्यों हो,
तुम तो उस राम के बाहु हो जिसने निर्भरगर्भखिन्ना सीता के निर्वासन में अपनी पटुता दिखायी थी, फिर तुम्हें
करुणा कैसी ?
'हे हस्त दक्षिण मृतस्य शिशोद्विजस्य्
जीवातवे विसृज शूद्रमुनौ कृपाणम् ।
रामस्य बाहुरसि निर्भरगर्भखिन्न-
सीताविवासनपटोः करुणा कुतस्ते ।।” ( उ० रा० च० )
वेदादि शास्त्रोक्त कर्म ही धर्म है। यह—
“तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।” ( गीता १६।२४ )
“चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः ।” ( मी० द० १।१।१२ )
आदि से स्पष्ट है । तदनुसार चातुर्वर्ण्यधर्म के विपरीत आचरण अधर्म है। राम ने शम्बूक शूद्र को ही
नहीं धर्मविपरीत ब्राह्मण रावण को भी प्राणदण्ड दिया था। अतः उनकी निष्पक्षता स्पष्ट है । धर्म पर चलनेवाले
वानरों, भालुओं, गीध, काक तथा कोल, भिल्ल, किरात, निषाद आदि सबका ही आदर किया था। कोई भी कर्म
अधिकारानुसार ही पुण्य हो सकता है। अनधिकारी का वेदाध्ययन, यज्ञ और तप भी पाप ही हो सकता है । यति को
काञ्चन, ब्रह्मचारी को ताम्बूल तथा चोर को अभय का दान पाप ही है—
“यतये काञ्चनं दत्त्वा ताम्बूलं ब्रह्मचारिणे ।
चोराय चाभयं दत्त्वा दातापि नरकं व्रजेत् ॥”
एक यातायातनियामक का अपना काज छोड़कर किसी शिष्ट की रक्षा जैसे अच्छे काज में लगना भी
अपराध है । स्वकर्तव्य में निष्ठा ही धर्म है—
“स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।” ( गीता० १८।४५ )
“स्वे स्वेऽधिकारे या निष्ठा स गुणः परिकीर्तितः ।
विपरीत्तस्तु दोषः स्यादुभयोरेष निश्चयः ॥” ( पुराणवचन )
यातायातनियामक के अन्यकार्याभिमुख होने पर यदि मोटर आदि का एक्सीडेंट हो जाय तो इसका
उत्तरदायित्व सिवा नियामक के किसके ऊपर होगा ? वह एक मनुष्य को बचाने के लिए अपने कर्तव्य से विमुख
होता है तो नियन्त्रण न-होने से अनेक एक्सीडेंट हो सकते हैं । सैकड़ों शिष्टों का जीवन संकटग्रस्त हो सकता है।
अतः स्वधर्मविमुख अवश्य ही दण्डनीय है ।
एक न्यायाधीश के सामने किसी हत्यारे का हत्या का अपराध सिद्ध हो जाने पर न्यायाधीश का कर्तव्य है
कि उसे प्राणदण्ड का आदेश दे, फिर भले ही उसके बूढ़े माँ, बाप तथा युवती स्त्री एवं दुधमुंहे बालकों का जीवन
खतरे में पड़ जाय । यदि शम्बूक के समान कोई स्वास्थ्य अधिकारी (हेल्थ डिपार्टमेण्ट का अधिकारी ) सफाई का
इन्चार्ज अपने पद का चार्ज बिना दिये तपस्या में बैठ जाय और सफाई की गड़बड़ी से प्लेग, कालरा आदि फैलने से
ब्राह्मण आदि वर्णों के बालक मर जायें तो स्पष्ट ही इसका उत्तरदायित्व उसी पर है। जो अपना काम छोड़कर तप
में बैठा है। हरएक समझदार उसके लिए प्राणदण्ड उचित ही समझेगा । कर्तव्यपालन की उपेक्षा का दुष्परिणाम
सर्वप्रसिद्ध ही है। शास्त्रों में तप का विधान चतुर्थ वर्ण के लिए नहीं है । वैदिक चातुर्वर्ण्यधर्म का उल्लङ्घन करने के
७७
६१० रामायणमीमांसा एकोनविंश
कारण ही ब्राह्मण रावण और शूद्र शम्बूक दोनों को दण्ड दिया गया था। कोई भी बुद्धिमान् यह भलीभाँति समझ
सकता है कि जैसे ब्राह्मण अपना कर्म छोड़कर शूद्र का कर्म करे तो अवश्य अपराधी होगा वैसे ही शूद्र अपना कर्म
छोड़कर ब्राह्मण का कर्म करने पर अपराधी क्यों न होगा ?
पउमचरियं (पर्व ४३) के अनुसार खरदूषण-पत्नी शूर्पणखा का पुत्र शम्बूक सूर्यहास खड्ग प्राप्त करने
के लिए १२ वर्ष तप करता है। खड्ग प्राप्त होता है। संयोग से उसी समय लक्ष्मण पहुँच जाते हैं। खड्ग को देख
उठाकर बाँस काटते हैं और शम्बूक का सिर भी काटते हैं। चन्द्रनखा (शूर्पणखा) पुत्र से प्रतिदिन मिलने आती थी।
उसे मरा देखकर विलाप करती है। वन में भटकती हुई राम और लक्ष्मण को देखकर उनपर आसक्त होती है। दोनों
से अस्वीकृत होकर खर, दूषण एवं रावण को शम्बूक-वध की सूचना देती है। इस प्रकार शम्बूक-वध के कारण ही
सीताहरण और राम-रावण-युद्ध होता है। किन्तु यह सब विकृत कल्पनामात्र है।
तेलगू द्विपदरामायण के अनुसार शूर्पणखा का पति विद्युज्जिह्व रावण के विरुद्ध विद्रोह करने के कारण
रावण द्वारा मारा जाता है। उसका पुत्र जम्बूमाली या जम्बुकुमार माता से पिता के वध का वृत्तान्त सुनकर खड्ग
की प्राप्ति के उद्देश्य से साधना करता है और लक्ष्मण द्वारा मारा जाता है (अरण्यकाण्ड १०)।
आनन्दरामायण में शूर्पणखा-पुत्र साम्ब राक्षस है। वह ब्रह्मा से दिव्य खड्ग प्राप्त करता है। लक्ष्मण
द्वारा मारा जाता है (आ० रा० १।७।४१-४३)।
कन्नड़ तोरवेरामायण के अनुसार शम्बूक राक्षस इन्द्रपद प्राप्त्यर्थ तपस्या करता है। उसके चारों ओर
वाल्मीक बन गया। इन्द्र और नारद व्याध के रूप में मिलकर लक्ष्मण को मृगया का निमन्त्रण देते हैं। इन्द्र एक
वराह की सृष्टि करते हैं जो वल्मीक की ओर जाता है। लक्ष्मण के बाण से वराह और शम्बूक दोनों का वध
होता है।
सेरतकाण्ड के अनुसार शूर्पणखा का दर्सासींगा तपस्या से चन्द्रवाली नामक खड्ग प्राप्त करता है।
संयोग से वह लक्ष्मण द्वारा मारा जाता है।
रामकियेन के अनुसार रावण-भगिनी सम्मनखा थी। जिसका पति जिह्व तथा पुत्र कुम्भकश था। कुम्भ-
कश ने गोदावरी के तट पर एक दिव्य खड्ग प्राप्त किया। परन्तु ब्रह्मा ने कुम्भकश को वह खड्ग हाथ में न देकर
सामने गिरा दिया। उसने हाथ में न देने के कारण अपमान समझकर उसे नहीं लिया। लक्ष्मण आकर उसे उठाते
हैं। कुम्भकश उनसे युद्ध करता है और मारा जाता है। रावण बाद में जिह्व का भी वध करता है। ब्रह्मचक्र में
लक्ष्मण द्वारा शूर्पणखा की दो पुत्रियों का वध वर्णित है।
वस्तुतः जम्बूक, जम्बुमाली, शम्बूक राक्षस आदि शूर्पणखा सम्बन्धी व्यक्ति पृथक् है एवं वाल्मीकिरामायण
का शम्बूक शूद्र पृथक् है। नामसाम्य से ही दोनों की एकता की भ्रान्ति हुई है।
राम का अश्वमेध
राम ने पहले राजसूय यज्ञ करने का विचार किया था, किन्तु भरत के विरोध करने पर लक्ष्मण के
प्रस्तावानुसार अश्वमेध किया। उसी के प्रसङ्ग से सीता ने सतीत्व का प्रत्यय दिया और प्रकट दिव्य सिंहासन पर
बैठकर भूमि में प्रविष्ट हो गयीं। राम ने बाद में भी बहुत से यज्ञ किये, किन्तु सर्वत्र काञ्चनी सीता ही उनके साथ
रहीं। उन्होंने दूसरा विवाह नहीं किया—
"न सीतायाः परां भार्या वव्रे स रघुनन्दनः ।
यज्ञे यज्ञे च पत्न्यर्थं जानकी काञ्चनी भवत् ॥" ९९।७
अध्याय उत्तरकाण्ड ६११
रघुवंश आदि में भी काञ्चनी सीता का उल्लेख है।
यह शङ्का होती थी कि राम तो स्वयं ही सर्वदेव विष्णु थे फिर उन्होंने किस अन्य देव का यजन किया
होगा ? उसी का समाधान करते हुए अग्निपुराण ने कहा है—“राम वासुदेव स्वरूप ही थे। अश्वमेध से उन्होंने ब्रह्म-
स्वरूप स्वात्मा का ही यजन किया था—
“वासुदेवं स्वमात्मानमश्वमेधैरथायजत् ।” ( अ० पु० १०।३३ )
आनन्दरामायण के अनुसार राम ने १०० अश्वमेध किये ।
रामचरितमानस के अनुसार राम ने कोटि अश्वमेध किये थे—
“कोटिन वाजिमेध प्रभु कीन्हे।
अमित दान विप्रन कहँ दीन्हे॥
कल्पभेद से स्वयं किये अथवा अन्य अधिकारियों को प्रेरणा देकर राम ने साक्षात् एवं परम्परा से कोटि-
कोटि अश्वमेध किये। कोटि-कोटि शिवलिङ्गों की स्थापना भी राम ने की थी—
“कोटिशः स्थापयामास शिवलिङ्गानि सर्वशः।
६३६ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण में राम के लिए ब्रह्महत्या का उल्लेख नहीं है।
परन्तु पुराणों में इसका उल्लेख है। उसके प्रायश्चित्तस्वरूप राम ने अश्वमेध किया था ।” वाल्मीकिरामायण से अविरुद्ध
होने के कारण यह भी ठीक ही है।
स्कन्दपुराण सेतुमाहात्म्य के अनुसार रावण-वधजन्य ब्रह्महत्या का प्रायश्चित्त करने के लिए राम ने कोटि-
तीर्थ में ( अध्याय २७ ) तथा गन्धमादन में ( अध्याय ४४ ) शिवलिङ्गों की स्थापना की थी। ब्राह्मखण्ड में राम
ने वसिष्ठ से कहा था कि मेरे द्वारा बहुत से ब्रह्मराक्षसों की हत्या हुई है। उसके प्रायश्चित्तार्थ उत्तम तीर्थ का आप
निर्देश करें—
“मया तु सीताहरणे निहता ब्रह्मराक्षसाः।
तत्पापस्य विशुद्ध्यर्थं वद तीर्थोत्तमोत्तमम् ॥”
वसिष्ठ धर्मारण्य की यात्रा और उस तीर्थ के जीर्णोद्धार का उपदेश करते हैं ( धर्मारण्यखण्ड अध्याय ३१ )।
जैमिनीय अश्वमेध ( अ० २९ ) के अनुसार राम ने प्रायश्चित्तस्वरूप अश्वमेध किया था। पद्मपुराण
( अध्याय ४४ ) में राम के अश्वमेध का विस्तृत वर्णन है। उसमें हनुमान् का शिव एवं इन्द्र आदि देवताओं के
साथ युद्ध वर्णित है।
राम की यात्राएँ
राम की लङ्कायात्रा सब से अधिक महत्त्वपूर्ण है। नृसिंहपुराण ( अध्याय २७ ) के अनुसार राम ने
उस अवसर पर लङ्का में पुण्यारण्य की स्थापना की थी। स्कन्दपुराण ( नागरखण्ड अध्याय १०१ ) के अनुसार
लक्ष्मण के परमधाम प्रस्थान के बाद सुग्रीव को लेकर राम ने लङ्का-यात्रा की थी एवं विभीषण को देवपूजा का
आदेश दिया था।
वस्तुतः रामायण और पुराणों का समन्वय ही है। रामायण के अनुसार ही पुराणों की संगति लगानी
उचित है। राम मर्यादापुरुषोत्तम थे। रावण ब्राह्मण था। भले ही वह अधम ब्राह्मण हो, पर उसके वध से भी
धर्मशास्त्रानुसार ब्रह्महत्या होती ही है, क्योंकि “ब्राह्मणो न हन्तव्यः” इस वचन में ब्राह्मणजाति के हनन का निषेध
है। ब्राह्मण जाति में उत्तम, अधम, स्त्री, पुरुष सब आ जाते हैं। ब्राह्मण शब्द उद्देश्य है। उद्देश्यगत लिङ्ग और
संख्या विवक्षित नहीं होती ।
स्कन्दपुराण नागरखण्ड के अनुसार विभीषण के अनुरोध से राम ने सेतु नष्ट कर दिया था। पद्मपुराण
( सृष्टिखण्ड अध्याय ३५ ) के अनुसार सीता के भूमिप्रवेश के बाद राम ने लक्ष्मण को अयोध्या का राज्यभार सौंपकर
भरत के साथ पुष्पक पर चढ़कर पश्चिम में भरत के पुत्रों तथा लक्ष्मण के पुत्रों से मिलकर दक्षिण की ओर प्रस्थान
किया और सुग्रीव को साथ लेकर लङ्का पहुँच गये ।
विभीषण ने राम को वामन की वैष्णवी मूर्ति प्रदान की तथा राम ने सेतुभङ्ग किया । शत्रुघ्न से मिलकर
कान्यकुब्ज देश में जाकर राम ने वामन की मूर्ति स्थापित की ।
नारदपुराण ( पूर्वखण्ड ७९।२९ ) के अनुसार राम ने द्रविड़ देश में विभीषण को मुक्त किया था । किन्तु
पद्मपुराण ( पातालखण्ड अध्याय १०० ) में यह उल्लेख है कि भगवान् शङ्कर शम्भु नामक ब्राह्मण के रूप में किसी
दिन अयोध्या आये थे । राम को समाचार मिला कि द्रविड़ों ने विभीषण को कैदी बना लिया है । राम शम्भु के साथ
दक्षिण जाकर श्रीरङ्गम् के कारावास में विभीषण से मिले । वहाँ पता लगा कि विभीषण ने अनजाने एक विप्र
को पैरों तले कुचलकर मार डाला था । उसके बाद विभीषण एक पग भी आगे नहीं बढ़ सका, पर ब्राह्मणों द्वारा
मारे जाने पर भी वह नहीं मर सका । ब्राह्मणों ने उसके वध के लिए राम से आग्रह किया। राम ने विभीषण को
अपना भक्त कहकर उसे छुड़ाया तथा विभीषण अज्ञान से हुई ब्रह्महत्या का उचित प्रायश्चित्त कर के अपनी राजधानी
में लौटा ।
आनन्दरामायण के अनुसार राम तथा सीता ने शतस्कन्ध रावण तथा मूलकासुर द्वारा पराजित विभीषण
की सहायता के लिए लङ्का-यात्रा की थी।
वाल्मीकिरामायण में भरत की गन्धर्वदेश की विजययात्रा का वर्णन है ( सर्ग १००,१०१ ) । इसके बाद
उन्होंने लक्ष्मण के पुत्रों के लिए कारुपथ तथा मल्लदेश को वश में किया था ।
आनन्दरामायण ( राज्यकाण्ड सर्ग ६ ) के अनुसार राम स्वयं पृथ्वी के समस्त राजाओं पर विजय प्राप्त
करते हैं । जम्बूद्वीप, प्लक्षद्वीप आदि सप्त द्वीपों की यात्रा करते हैं ( आ० रा० राज्यका० सर्ग ७-९ ) । आनन्द-
रामायण ( राज्यका० सर्ग २१ ) के अनुसार एक बार राम को वाल्मीकि और विश्वामित्र दोनों ने एक ही समय दूत
भेजकर यज्ञ के लिए निमन्त्रण दिया । राम ने दोनों का निमन्त्रण स्वीकार किया । वहाँ अपने अन्य साथियों के दो-
दो देह बना लिये और एक ही समय दोनों मुनियों के यहाँ पहुँच गये । सर्ग २४ में राम की यमपुर-यात्रा वर्णित है ।
सुमन्त्र की आयु ९ दिन शेष रहते हुए वह मर गया । राम ने यमपुर प्रस्थान किया। मार्ग में ही यमदूतों से भेंट
हुई । राम ने उनको परास्त कर सुमन्त्र को लौटा लिया ।
आनन्दरामायण के पूर्णकाण्ड ( सर्ग १-४ ) में सोमवंशी राजाओं के आक्रमण का वर्णन है। राम अपनी
सेना के साथ उनका सामना करने गये । हस्तिनापुर में ६ महीने तक भीषण युद्ध हुआ । अन्त में सीता के अनुरोध
पर सन्धि हुई । बालकाण्ड तथा अयोध्याकाण्ड के कथानकों के अन्तर्गत भी राम की तीर्थयात्राएँ वर्णित हैं । स्कन्द-
पुराण ( ब्राह्मख० धर्मारण्यमा० अध्याय ३३ ) में राम की धर्मारण्य की तीर्थयात्रा वर्णित है ।
६३८ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “वाल्मीकिरामायण ( ७।४२ ) में रामाभिषेक के बाद तथा सीता-
त्याग के पूर्व राम और सीता के विहार में अप्सराओं के नृत्य और मदिरा तथा मांस के सेवन का उल्लेख है।” परन्तु
बुल्के को जानना चाहिये कि यज्ञ, यागादि में अनिषिद्ध तथा विहित मांस तथा दिव्य मधु निषिद्ध नहीं है ।
अध्याय उत्तरकाण्ड ६१३
राम ईश्वर थे । उनके वरदान से ही बहुत से ऋषि, मुनि तथा स्त्रियाँ व्रज की गोपाङ्गनाएँ हुई थीं ।
हिंडोल, होलिकोत्सव आदि तो अनादि काल से सनातन धर्म के महोत्सव अवतारों द्वारा आदृत होते ही रहे हैं । इसमें
कृष्ण-लीला का प्रभाव देखना अनभिज्ञता ही है ।
अद्भुतरामायण भी शतकोटिप्रविस्तर रामायण के अन्तर्गत हो है । उसमें सर्ग १७-२७ के अनुसार
एक बार विश्वामित्र आदि मुनियों ने आकर रावणवध के कारण राम की प्रशंसा की । इसपर सीता ने मुस्कुरा
कर विश्रवा और कैकसी के पुत्र सहस्रस्कन्ध रावण की कथा सुनायी, जिसने इन्द्र आदि देवताओं को पुष्कर में
कारागार में कैद किया था । कथा सुनकर राम सेना सहित पुष्कर जाते हैं । रावण वायव्य शर से समस्त सेना
को अयोध्या तक उड़ा देता है तथा द्वन्द्वयुद्ध में राम मृतप्राय हो जाते हैं । तब सीता देवी महाविकट रूप धारण
कर सहस्रस्कन्ध रावण तथा उसके योद्धाओं का सिर काटकर नाचने लगती हैं, जिससे सारी सृष्टि संकट में पड़
जाती है—
“ननर्त जानकी देवी घोरकाली महाबला ।” २३-६३
ब्रह्मा आदि देवता सीता से नृत्य समाप्त करने का अनुरोध करते हैं। ब्रह्मा राम को पुन: जीवित करते
हैं । राम परमशक्ति के रूप सीता की स्तुति करके उनसे अनुरोध करते हैं कि वह अपना विकट रूप त्याग दें तब
सीता विकटरूप त्यागकर सौम्य रूप धारण करती हैं और राम के साथ पुष्पक पर चढ़कर अयोध्या जाती हैं । उक्त
प्रसङ्ग सीतामाहात्म्य-वर्णन का अर्थवाद है । युद्ध-शोभार्थ जैसे राम इन्द्रजित् के ब्रह्मास्त्र से मूर्च्छित हुए थे । वैसे ही
प्रकृत प्रसङ्ग में भी समझना चाहिये ।
उड़िया राम-साहित्य में प्रस्तुत प्रसङ्ग के दो अन्य रूप मिलते हैं । विलङ्कारामायण के पूर्वखण्ड के अनुसार
सहस्रस्कन्ध रावण ने राम, लक्ष्मण तथा हनुमान् को परास्त किया था । तब सीता ने मङ्गलादेवी से पुष्पधनुष तथा
पाँच शर प्राप्त कर रावण पर चलाये और राम ने कामातुर रावण के समस्त सिर काट दिये । विलङ्काखण्ड के
अनुसार दशशिर रावण के वध के अनन्तर सहस्रस्कन्ध रावण सन्धि प्रस्ताव ठुकरा कर युद्ध करने आया । शक्ति के
प्रहार से उसने राम और लक्ष्मण को मूर्च्छित कर सीता का हरण करना चाहा, किन्तु सीता के शरीर से एक गन्धर्व-
सेना निकली जिसने सहस्रस्कन्ध रावण का वध किया ।
आगारिया आदिवासियों में प्रचलित कथा के अनुसार सीता ने पातालवासी सहस्रस्कन्ध रावण की चर्चा
की । राम ने एक बाण से उसे आहत कर दिया । पर उसने अपने पैर से बाण निकालकर राम को मारने के लिए
उसी बाण को भेज दिया । राम मूर्च्छित हो गये । तब सीता ने लोगुन्दी के पास जाकर उससे कोयले का एक पात्र
माँग लिया और यह निवेदन किया कि आज्ञासुर और लोहासुर को मेरे साथ भेज दीजिये । राजा की स्वीकृति हो
गयी । कोयले का पात्र तथा तलवार लेकर सीता दोनों को साथ लेकर चल पड़ी । कोयले के धुएँ से सीता का रङ्ग
काला पड़ गया । उन्होंने रावण के सिर काट डाले । आज्ञासुर तथा लोहासुर दोनों ने रावण का रक्त पी लिया ।
आनन्दरामायण ( राज्यका० सर्ग ४।८०-८५ ) के अनुसार शतशीर्ष रावण शोण नदी के तटपर माया-
पुरी में रहता था । कुम्भकर्ण का पौत्र पौण्ड्रक उससे सहायता माँगने गया था । दोनों ने मिलकर विभीषण को
पराजित कर दिया । विभीषण राम के पास सहायता के लिए आये । राम और सीता दोनों गये । युद्ध में राम
परास्त हुए, किन्तु सीता ने दोनों का वध किया ।
तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार सीता ने अष्टादशभुजावाला विकट रूप धारण कर शतानन रावण का वध
किया था । विलङ्कारामायण उत्तरखण्ड के अनुसार काली का रूप धारणकर सीता ने लक्षशीर्ष रावण का वध
किया था ।
६१४ रामायणमीमांसा एकोनविंश
आनन्दरामायण (सर्ग ४-६) के अनुसार पातालवासी रावणपुत्र मूलकासुर से पराजित होकर विभीषण
पुनः राम के पास गये । राम सहायतार्थ गये । सात दिनों तक मूलकासुर के साथ युद्ध हुआ । हनुमान् ने पहले की
भाँति द्रोणाचल लाकर मृत वानरों को जिलाया । ब्रह्मा ने आकर कहा कि मेरे वरदान के अनुसार यह किसी वीर के
हाथ न मरेगा । किसी ऋषि ने इसे सीता के हाथ मरने का शाप दिया है । राम ने गरुड़ को सीता लाने भेजा ।
सीता ने लङ्का पहुँचकर तामसी छाया को युद्ध के लिए प्रेरित किया । इतने में वानर मूलकासुर का यज्ञ विध्वंस कर
लौटे । सीता की तामसी छाया ने चण्डी का रूप धारणकर मूलकासुर का वध किया ।
हनुमच्चरित
वाल्मीकिरामायण के अनुसार हनुमान् का चरित्र महत्त्वपूर्ण है । हनुमान् ही राम और लक्ष्मण को सुग्रीव
के पास ले जाकर मैत्री कराते हैं । वर्षा ऋतु के पश्चात् सुग्रीव को राम के प्रति कर्त्तव्यपालन का स्मरण दिलाते हैं ।
राम की मुद्रिका लेकर सीता की खोज में वानरों के साथ दक्षिण की ओर प्रस्थान करते हैं और समुद्रलङ्घन कर
सीता का पता लगाते हैं । उनका सन्देश लेकर राम के पास लौटते हैं । लङ्का-दहन वृत्तान्त को बुल्के प्रक्षिप्त कहते
हैं, परन्तु वह उनकी भूल है । हनुमान् द्वारा लङ्का-दाह वाल्मीकिरामायण से सिद्ध है । अक्षयकुमार का वध भी
लङ्का-दाह के प्रसङ्ग में वर्णित है । युद्ध में भी हनुमान् का प्रमुख भाग रहा है और अनेक बार औषध-पर्वत लाकर
उन्होंने लक्ष्मण एवं अन्य वानरवीरों के प्राण बचाये हैं । इन अंशों को बुल्के प्रक्षिप्त कहते हैं ।
बुल्के यह भी कहते हैं कि प्राचीन रामायण में हनुमान् की जन्म-कथा का अभाव रहा होगा । परन्तु यह
सब भी उनके निःसार अनुमान हैं । रामायण राम-पुत्र कुश और लव द्वारा गाया गया है, बुल्के के तथाकथित
कुशीलवों द्वारा नहीं । अतएव उनके (कुशीलवों के) द्वारा रामायण की पूर्ति की गयी है, यह उनकी कल्पना निःसार
है । प्रचलित वाल्मीकिरामायण ही प्रामाणिक रामायण है ।
हनुमान् की कथा
पराक्रम, बुद्धिमत्ता, चिरजीवित्व, ब्रह्मचर्य, रामभक्ति, देवत्व ये हनुमान् के विशिष्ट गुण हैं ।
पउमचरियं के अनुसार हनुमान् रावण तथा सुग्रीव दोनों के रिश्तेदार माने गये हैं । रावण ने अपनी
बहन चन्द्रनखा की पुत्री अनङ्गकुसुमा का तथा सुग्रीव ने अपनी पुत्री पद्मरागा का हनुमान् से विवाह किया था । युद्ध
के बाद राम ने हनुमान् को राजा बनाकर उन्हें श्रीपर्वत के शिखर पर स्थित श्रीपुर प्रदान किया था । अन्त में दीक्षा
लेकर हनुमान् निर्वाण प्राप्त करते हैं । जैनों की दीक्षा का मिथ्या प्रचार प्रसिद्ध ही है ।
वाल्मीकिरामायण के अनुसार तो हनुमान् सूर्यनारायण से सम्पूर्ण वेद-वेदाङ्गों का अध्ययन करते हैं और
ब्रह्मविद्या में वे प्रधानतया निष्णात हैं । रामायण के अनुसार वे अञ्जनापुत्र हैं, यह निर्विवाद है । बुल्के कहते हैं कि
इसकी प्रामाणिकता सन्दिग्ध है । परन्तु बुल्के का पक्ष ही प्रमाणशून्य है । हनुमान् का अञ्जना-पुत्रत्व तो वाल्मीकि-
रामायण से सिद्ध ही है ।
अध्यात्मरामायण (४।७।१९,२०) के अनुसार हनुमान् और अङ्गद नारायण की आराधना कर उनके
पार्षद बने थे और मायाशक्ति के प्रभाव से वानररूप में उत्पन्न हुए थे । बुल्के प्रचलितरामायण की हनुमज्जन्म-कथा
के विरुद्ध दो तर्क देते हैं—एक तो वाल्मीकिरामायण में केसरी एवं अञ्जना के उल्लेखों की कमी है । दूसरे हनुमान्
की उपाधि वायु-पुत्र का निरन्तर उल्लेख मिलता है । परन्तु यह तर्क भी तर्काभास ही है, क्योंकि प्रामाणिक एक स्थल
के वचन पर्याप्त होते हैं । प्रमाणाभास सैकड़ों वचन भी अकिञ्चित्कर होते हैं । फिर स्वयं बुल्के भी यह मानते हैं कि
एक स्थल में तीनों पाठों के अनुसार हनुमान् के पिता के रूप में केसरी का उल्लेख हुआ है । फिर कई बार केसरी
अध्याय उत्तरकाण्ड ६१५
का उल्लेख होने पर भी कमी बतलाना सरासर झूठ है। देखो—सीता-हनुमान्-संवाद में वे सीता से कहते हैं—
"अहं सुग्रीवसचिवो हनुमान् नाम वानरः ।” (वा० रा० ५।३४।३८)
अगले सर्ग में वे पुनः अपना परिचय देते हैं—मैं केसरी की पत्नी से उत्पन्न हनुमान् हूँ—
"माल्यवान् नाम वैदेहि गिरीणामुत्तमो गिरिः।
ततो गच्छति गोकर्णं पर्वतं केसरी हरिः॥
यस्याहं हरिणः क्षेत्रे जातो वातेन मैथिलि ।
हनुमानिति विख्यातो लोके स्वेनैव कर्मणा।।" (वा० रा० ५।३५।७९-८१)
वस्तुतः वानररूप में हनुमान् को देखकर सीता को यह शङ्का उत्पन्न हो गयी कि कहीं यह रावण ही
तो नहीं है ?
"स्वं परित्यज्य रूप यः परिव्राजकरूपवान् ।
जनस्थाने मया दृष्टस्त्वं स एव हि रावणः ।।" ( वा० रा० ५।३५।१५ )
सीता शङ्का मिटाने के लिए उन्हें राम के गुण कहने को प्रेरित करती हैं, क्योंकि रावण राम का द्वेषी
है। यदि यह रावण होगा तो राम का गुण-वर्णन नहीं करेगा। यदि कृत्रिम भावना से वर्णन करेगा तो कृत्रिमता व्यक्त
हो ही जायेगी।
हनुमान् राम का गुण-वर्णन करते हैं और अपना परिचय देते हुए कहते हैं—मैं हनुमान् नामक वानर
सुग्रीव का सचिव हूँ, मैं मायावी राक्षस नहीं हूँ---
"अहं सुग्रीवसचिवो हनुमन्नाम वानरः ।
नाहमस्मि तथा देवि यथा मामवगच्छसि ।।" ( वा० रा० ५।३४।३८ )
सीता पुनः राम और सुग्रीव के समागम के सम्बन्ध में एवं राम तथा लक्ष्मण के चिह्नों को पूछती है।
हनुमान् गुणों तथा लक्षणों सहित राम का वर्णन तथा वानरों के साथ समागम आदि की कथा का वर्णन कर के शङ्का
मिटाने के लिए पुनः कहते हैं—देवि ! मुझपर विश्वास कर मुझसे बोलो। मैं राम का दूत हूँ। तुम्हारे लिए जो राम
का उद्योग है, तदर्थ ही आया हूँ—
"अभिभाषस्व मां देवि ! दूतो दाशरथेरहम् ।”
मुझे सुग्रीव-सचिव एवं पवनपुत्र हनुमान् ही समझो—
"सुग्रीवसचिवं देवि ! बुद्धयस्व पवनात्मजम् ।”
पवन-पुत्र होने से ही मैं समुद्र-लङ्घन कर सकने में समर्थ हुआ हूँ।
शङ्का हो सकती थी कि तुम्हारा तिर्यग्देह है। तुम पवन-पुत्र कैसे हो ? इस बात का समाधान करते हुए
हनुमान् ने अपने जन्म की बात कही। देवर्षियों से आदिष्ट होकर मेरे पिता केसरी ने शम्बसादन असुर का वध किया
था। उन केसरी के क्षेत्र अञ्जना में वायु के द्वारा मेरा जन्म हुआ है।
"यस्याहं हरिणः क्षेत्रे जातो वातेन मैथिलि ।”
इससे दोनों बातों का स्पष्ट समाधान हो जाता है। केसरी के पुत्र हैं एवं वायु के तेज से जन्म होने के
कारण वायु-पुत्र भी हैं। इस तरह केसरी-पुत्र तथा वायु-पुत्र दोनों का समन्वय हो जाता है। अञ्जनापुत्र होने में तो
विवाद का प्रश्न ही नहीं है। अतएव इन श्लोकों को प्रक्षिप्त कहना भी निर्मूल है।