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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 680

अध्याय उत्तरकाण्ड ६०३
बिल्कुल अशुद्धियाँ न होने से उन्हें वेदों से भी प्राचीन मानना पड़ेगा और वेदों में वैसी अशुद्धियाँ होने से उन्हें
अत्यन्त अर्वाचीन कहना होगा, परन्तु यह सब वस्तुस्थिति के बिलकुल विरुद्ध है ।
'वधंसे' के स्थान में 'वधंसि' प्रयोग कर ( १।२८ इत्यादि स्थानों में ) टीकाकारों ने समाधान भी किया
है । विशेषकर 'तिलक' व्याख्याकार तो महावैयाकरण नागेश भट्ट हैं । अतिथियों की पुनः विदाई का वैसा ही
समाधान है जैसा कि पहले संक्षेप में वर्णनीय विषय का वर्णन कर उसका विस्तृत रूप में पुनः वर्णन किया जाता है ।
इतना ही नहीं सम्पूर्ण उत्तरकाण्ड को प्रक्षेप मानकर भी उस प्रक्षेप में भी प्रक्षेप की वे कल्पना करते हैं ।
अतएव रावणचरित आदि को वे प्रक्षेप में प्रक्षेप मानते हैं । उनकी दृष्टि में "उत्तरकाण्ड का मूल रूप सीता-त्याग के वर्णन
से प्रारम्भ हुआ होगा ( सर्ग ४२-५२ ) । शेष सामग्री से पौराणिक कथाओं को तथा शम्बूकवध की कथा को हटाने
पर जो वृत्तान्त रह जाता है वही प्रारम्भिक उत्तरकाण्ड रहा होगा । अर्थात् शत्रुघ्नचरित, कुश और लव का जन्म,
राम का अश्वमेध, कुश तथा लव द्वारा रामायणगान, सीता का भूमि-प्रवेश, रामादि के पुत्रों की राज्य-स्थापना,
लक्ष्मण का देहान्त, राम का स्वर्गारोहण ।” परन्तु यह सब बुल्के की अटकलमात्र है । कोई ठोस आधार और प्रमाण
उनकी इस कल्पना में नहीं है । परम्परा एवं टीकाएँ तो प्रचलित सम्पूर्ण उत्तरकाण्ड की प्रामाणिकता ही सिद्ध करती
हैं । उत्तरकाण्ड का अर्थ ही यह है कि जो वस्तु छः काण्डों में अपेक्षित थी, उसका वर्णन किया जाय । रावण,
मेघनाद आदि का जन्म, कार्य तथा हनुमान् आदि का भी जन्म तथा चरित आदि का वर्णन प्रासङ्गिक ही है ।
परस्पर विचारविनियम के प्रसङ्ग में निमि, नृग, ययाति आदि का वर्णन भी अत्यन्त प्रासङ्गिक है, अतः इतने बड़े
अंशों को प्रक्षेप कहना अवश्य ही साहस है । शत्रुघ्न-चरित प्रचलित रामायण में वर्णित ज्यों का त्यों प्रामाणिक ही है।
सौदास की कथा
वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड ( सर्ग ६५ ) में वाल्मीकि ने शत्रुघ्न को सौदास की कथा सुनायी थी ।
सौदास ने मृगया के समय व्याघ्ररूपधारी दो राक्षसों को देखकर एक को मार डाला । प्रतीकार करने का संकल्प
लेकर दूसरा राक्षस अन्तर्हित हो गया । कालान्तर में सौदास वसिष्ठ के नेतृत्व में अश्वमेध यज्ञ करते हैं । यज्ञान्त में राक्षस
ने वसिष्ठरूप धारण कर सामिष भोजन माँगा । राजा ने तैयार करने का आदेश दिया । राक्षस नरमांस का भोजन
हाथ में लेकर रसोइये के रूप में राजा के सामने उपस्थित हुआ । राजा ने अपनी पत्नी मदयन्ती के साथ यह भोजन
परोस दिया । मानुष्यामिष भोजन समझ कर वसिष्ठ ने राजा को यह शाप दे दिया कि यही तुम्हारा भोजन होगा ।
शाप सुनकर क्रोधवश सौदास भी प्रतिशाप देने के लिए प्रस्तुत हुए, किन्तु मदयन्ती के रोकने से सौदास ने क्रोधमय
शाप-जल को अपने पैर पर ही डाल दिया जिससे उसके पैर पर काले धब्बे पड़ गये । इसी लिए कल्माषपाद नाम से
उसकी प्रसिद्धि हुई । अन्त में राक्षस का कपट जानकर वसिष्ठ ने शाप १२ वर्ष के लिए सीमित कर दिया । फलतः
१२ वर्ष के बाद कल्माषपाद शापमुक्त होकर पुनः राज्याधिकारी होकर प्रजापालन करने लगे ।
विष्णुपुराण ( ४।४।३८-५८ ); भागवत ( ९।९।२०-२५ ) तथा स्कन्दपुराण ( ३।३।२ ) में भी यह
कथा है । स्कन्दपुराण के अनुसार वसिष्ठ द्वारा सन्तति प्राप्त कर वह तपस्या के लिए बन जाता है । वहाँ ब्रह्महत्या
सामने आती है । उससे मुक्ति के लिए वह तीर्थों में भ्रमण करता है । अन्त में वह गौतम के आदेशानुसार गोकर्ण में
शिवलिङ्ग के दर्शन कर मुक्त होता है । कृत्तिवासरामायण के अनुसार वह गङ्गाजल से मुक्त होता है ।
बुल्के के अनुसार “रामकथासाहित्य में इस कथा के तीन रूप मिलते हैं । कोई व्यक्ति अनजान में मांसाहार
परोसने के कारण ब्राह्मण-शाप का भाजन बनता है और वह राम द्वारा मुक्त होता है । अन्तिम दो कथाओं में किसी
शत्रु के षड्यन्त्र के कारण नरमांस परोसा गया था तथा तीसरी कथा के अनुसार राजा प्रतापभानु ब्राह्मणों का