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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 677

इस प्रकार बुल्के के माने हुए युद्धकाण्ड में भी शाप का उल्लेख होने पर भी बुल्के झूठ बोलने में कितने
निपुण हैं, यह पाठक विचार करें ।
पउमचरियं के अनुसार रावण ही उपरम्भा का प्रेम-प्रस्ताव अस्वीकार करता है, क्योंकि अनन्तवीर्य का
उपदेश सुनकर विरक्त हुए उसने परनारी के साथ रमण न करने का व्रत लिया था । जैनों और बौद्धों के अनुसार
रावण पक्का धर्मभीरु जैनी या बोधिसत्त्व है । परन्तु यह सब उनके वैदिकधर्मविरोधी होने का ही दुष्परिणाम है ।
वाल्मीकिरामायण उत्तरकाण्ड ( सर्ग १६ ) के अनुसार रावण ने नन्दी को वानरमुख देखकर उसका
उपहास किया था । नन्दी ने यह शाप दिया था कि तुम्हारे कुल के नाश के लिए मेरे समान रूप और बल से
सम्पन्न वानर होंगे ( वा० रा० ७ । सर्ग १६, १७ )। वेदवती का शाप भी उत्तरकाण्ड में उल्लिखित है।
उत्तरकाण्ड ( सर्ग १९ ) के अनुसार अयोध्या के राजा अनरण्य द्वन्द्वयुद्ध में रावण द्वारा मारे गये थे ।
उन्होंने शाप दिया था कि इक्ष्वाकु-कुल में उत्पन्न राम तुम्हारा वध करेंगे । पुञ्जिकस्थला अप्सरा से उसकी इच्छा
के विरुद्ध रावण ने रमण किया था । ब्रह्मा ने सारा हाल जानकर शाप दिया था कि आज से यदि बलात् किसी नारी
का गमन करोगे तो तुम्हारा सिर शतधा फट जायगा ( वा० रा० ६।१३।१४ ) । यह शाप भी बुल्के के मान्य काण्ड
का है । फिर बुल्के किस मुँह से कहते हैं कि वाल्मीकिरामायण में शाप नहीं है । कैलास-शिखरचालन के समय उमा
ने भी कहा कि स्त्रीनिमित्त से ही रावण का मरण होगा ( वा० रा० ७।१६।२६ ) ।
रावण-पराजय
महाभारत में परशुराम द्वारा कार्तवीर्य के वध का उल्लेख है ( अध्याय १३३ ) । हरिवंश के अनुसार
कार्तवीर्य ने उग्र तप द्वारा सहस्र भुजाएँ प्राप्त कीं और सबको जीत लिया । कीर्तवीर्य ने सेना सहित रावण को परास्त
किया था और उसे बन्दी बना लिया था । पुलस्त्य ने जाकर उसे छुड़ाया । उत्तरकाण्ड ( सर्ग ३४ ) कार्तवीर्य के
कारावास से मुक्त होकर योग्य प्रतिद्वन्द्वियों की खोज में रावण पृथ्वी पर भ्रमण कर रहा था । किष्किन्धा पहुँचकर
उसने सुना वाली दक्षिणी समुद्र पर सन्ध्या कर रहा है। रावण पुष्पक द्वारा वाली के पास गया । वाली रावण
को अपनी काँख में दबाकर आकाश-मार्ग से पश्चिम सागर और उत्तर सागर पर गया, सन्ध्या समाप्त कर
किष्किन्धा लौटा तभी उसने रावण को मुक्त किया। रावण ने वाली के पराक्रम की प्रशंसा की और उससे सख्य
करने की प्रतिज्ञा की ।
आनन्दरामायण ( सर्ग १।१३।१०० ) में अङ्गद के पालने के नीचे बद्ध रावण—‘‘अङ्गदस्य मूत्रधारा-
धोताननः'' होता है। सेरीराम के अनुसार वाली अपने राज्य पर पुष्पक को उड़ते देख रावण पर आक्रमण करता
है तथा मन्दूदा ( मन्दोदरी ) को छीनकर पुष्पक सहित रावण को समुद्र में फेंक देता है। मन्दूदा से विवाह कर लेता
है । कुछ दिनों बाद उसने हनुमान् को आदेश दिया कि गर्भवती मन्दूदा की सेवा के लिए २४ राजकुमारियों को
लायें । रावण ने वाली के गुरु के पास जाकर मन्दूदारी के हरण का समाचार बताया । गुरु ने आश्वासन दिया
कि वह तुमको वापस मिल जायगी, पर तुम तपस्वियों के आश्रमों को नष्ट न करो । गुरु के अनुरोध से वाली
ने कहा—वह गर्भवती है। गुरु ने गर्भ निकाल कर बकरी के शरीर में रख दिया। रावण मन्दूदा को पाकर घर
चला गया ।
गुरु ने हनुमान् से इन्द्रपवानम पर्वत से फूल लाने को कहा—वे समस्त पर्वत उठा लाये । गुरु ने मन्त्रों
की सहायता से उन फूलों से एक मण्डूक की सृष्टि की और मण्डूक से सुन्दर स्त्री की सृष्टि की। गुरु ने उसका नाम
देवीवरमाकोमाल रखा। उसे वाली को पत्नी के रूप में प्रदान किया। बकरी से उत्पन्न पुत्र का नाम अंग्गाद रखा
गया। वरमाकोमाल ने अनूल नामक पुत्र उत्पन्न किया । अन्त में हनुमान् और वाली दोनों तप के लिए चले गये ।