रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
आत्महत्या कर ले। सीता चिता जलाकर जलने को तैयार हुई तब त्रिजटा ने विभीषण से राम का कुशल वृत्तान्त
जानकर सीता को आश्वस्त किया। तात्पर्य प्रायः सबका एक ही है, अवान्तर कथाओं में कुछ भेद संभव है, फिर भी
इतिहास की दृष्टि से वाल्मीकिरामायण-कथा ही ठीक है।
५८४ अनु०, वाल्मीकिरामायण के केवल दाक्षिणात्य पाठ में अङ्गद के दौत्य कार्य से पहले ही सुग्रीव और
रावण का द्वन्द्वयुद्ध वर्णित है। सुग्रीव सहसा पर्वत से लङ्का के गोपुर पर कूद कर रावण के पास पहुँचता है और
द्वन्द्वयुद्ध करता है। सुग्रीव रावण को द्वन्द्वयुद्ध में परास्त करता है (अ० रा० ६।५।४१-४५)। सुवेल से ही राम ने
रावण को उसके मन्त्रियों सहित देखा और एक ही बाण से उसके हजारों श्वेत छत्र काट डाले। रावण लज्जित होकर
अपने भवन के अन्दर चला गया।
रामकियेन (अध्याय २६) के अनुसार ब्रह्मा ने रावण को एक चमत्कारी छत्र दिया था। जब रावण
उसे खोल देता था तब लङ्का के चारों ओर गहन अन्धकार छा जाता था। जिससे कोई योद्धा लङ्का को देख नहीं
सकता था। सुग्रीव ने कूदकर उस छत्र को छिन्न-भिन्न कर दिया। लङ्का का गहन अन्धकार दूर हो गया।
कृत्तिवासरामायण के अनुसार अन्तरिक्ष में स्थित देवता युद्ध की प्रतीक्षा कर रहे थे। पार्वती ने शिव से
अनुरोध किया कि वह अपने भक्त रावण की रक्षा करें। शिवजी ने कहा, रावण को अमरत्व का वर नहीं प्राप्त है।
विष्णु अवतार लेकर उसका वध करने आये हैं। अब उसका बचना संभव नहीं है। बालरामायण (८।२) के
अनुसार रावण ने शुक और सारण को भेजने के बाद शिव की पूजा की, किन्तु स्त्री समझकर उमा को प्रणाम नहीं
किया। उन्होंने क्रुद्ध होकर शिव के वरदायक हाथ को खींच लिया था। उक्त कथाएँ वाल्मीकिरामायण के अविरुद्ध
होने से असंभव नहीं हैं।
५८५ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि "वाल्मीकिरामायण के अनुसार लङ्कावरोध के पहले विभीषण के
परामर्शानुसार अङ्गद द्वारा यह संदेश भेजा गया था कि यदि रावण सीता को लौटा दे तो मैं राक्षसों का विनाश
नहीं करूँगा।" सन्देश से क्रुद्ध होकर रावण ने अङ्गद के वध का आदेश दिया। चार राक्षसों ने अङ्गद को पकड़ना
चाहा। अङ्गद बाहुसम्बद्ध चारों के साथ ही वेग से एक भवन पर कूदा। चारों निस्सहाय भूमि पर गिरे ऊपर से
भवन को ढहाकर अङ्गद राम के पास चला गया। रामचरितमानस आदि में अङ्गद और रावण का संवाद विस्तार
से वर्णित है। उस परम्परा के अनुसार वह ठीक ही है। आनन्दरामायण तथा भावार्थरामायण के अनुसार अङ्गद
अपनी पूंछ का कुण्डल बनाकर सिंहासन की भाँति उसपर बैठा था।
बुल्के कहते हैं कि "अङ्गद द्वारा बलप्रदर्शन तथा राक्षसों की पराजय के विषय में अनेक नयो घटनाओं
की कल्पना कर ली गयी है।"
बुल्के यह नहीं जानते कि भारतीय विद्वान् या तुलसीदास जैसे सन्त अप्रामाणिक कल्पना को पाप
समझते हैं। झूठे इतिहास के निर्माण की परम्परा पाश्चात्यों में ही प्रसिद्ध है। अतएव रामचरितमानस के अनुसार
अङ्गद का प्रण कर पैर रोपना और उसे उठाने में कोटि कोटि सुभटों का असमर्थ होना कल्पना नहीं है, किन्तु वह
सत्य घटना थी।
तुलसीदास ने जिस परम्परा की चर्चा की है वह ऐतिहासिक तथ्य है। शतकोटि-प्रविस्तर रामायण में उक्त
कथानक विद्यमान ही है। रामचरितमानस के अनुसार अङ्गद के बलप्रदर्शन पर पृथिवी हिलने लगी, रावण के मुकुट
गिर पड़े। कुछ तो रावण ने उठाकर अपने सिर पर रख लिये और कुछ अङ्गद ने राम के पास प्रेषित कर दिये।
अङ्गद प्रेषित मुकुटों को आते देख वानरों ने उन्हें उल्कापात समझा था या रावण प्रेषित वज्र समझा था। राम ने
बतलाया कि ये अङ्गद-प्रेषित दशमुख के किरीट हैं। हनुमत् ने उनको पकड़कर राम के पास रखा । सूर्य के समान
प्रकाशवाले उन मुकुटों को कौतुक से वानर देख रहे थे—
ये किरीट दशकन्धर केरे । आवत वालिनयके प्रेरे ॥” ( रा० मा० ६।३१।५ )
आश्चर्य है, बुल्के तुलसीदास में श्रद्धा प्रकट करते हैं, परन्तु उन्हें मिथ्याकल्पनाकार भी लिखते हैं । गुणभद्र
आदि के अनुसार हनुमान् को ही दौत्य के लिए भेजा गया है । सेरीराम के अनुसार कुम्भकर्ण-वध के बाद राम
हनुमान् के द्वारा पत्र भेजते हैं जिसमें सीता को लौटाने का प्रस्ताव था । शूर्पणखा को विरूपित करनेवाले लक्ष्मण को
बाँधकर लङ्का भेज दिया जाय तो रावण इस प्रस्ताव को स्वीकार करने को तैयार था। रामचन्द्रिका ( १६।३२ )
के अनुसार रावण निम्नोक्त शर्तों के साथ सीता को लौटाने को तैयार था । सुग्रीव को मारकर अङ्गद को राज्य दिया
जाय, विभीषण को बाँधकर लङ्का भेजा जाय, सेतु नष्ट कर दिया जाय, हनुमान् की पूँछ जला दी जाय तथा राम रुद्र
की पूजा करें ।
वस्तुतः रावण सीता को लौटाना नहीं चाहता था । तदनुसार कवियों ने असंभावित शर्तों की भी कल्पना
की है । वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, महाभारत, विभिन्न पुराणों तथा रामचरितमानस की
परम्पराप्राप्त कथाओं में ही कल्पभेद से समन्वय होता है। अन्य कथाओं को उनके अनुसार ही लगाना चाहिये ।
सर्वथा विपरीत जैनबौद्ध कथाएँ त्याज्य ही हैं ।
नागपाश
५८६ वें अनु० में लङ्कावरोध के अनन्तर रावण युद्ध का आदेश देता है । इसमें अनेक द्वन्द्वयुद्धों का वर्णन
है । अङ्गद द्वारा इन्द्रजित् की पराजय तथा इन्द्रजित् के द्वारा राम और लक्ष्मण का नागपाश में बाँधा जाना सबसे
महत्त्वपूर्ण घटना है । ब्रह्मा के वरदान से अदृश्य होकर इन्द्रजित् नागमय शरों से राम और लक्ष्मण को आहत करता
है। दोनों निश्चेष्ट होकर रणभूमि में शयन करते हैं । इन्द्रजित् दोनों को मृत समझकर रावण को सूचना देता है—
( वा० रा० ६। सर्ग ४३–४६ ) ।
रावण ने सीता तथा त्रिजटा को पुष्पक विमान द्वारा मूच्छित राम और लक्ष्मण को दिखलाया । सीता
विलाप करने लगी तब त्रिजटा ने कहा कि राम जीवित हैं । यदि राम जीवित न होते तो तुम पुष्पक में बैठ ही
नहीं सकती, क्योंकि पुष्पक विधवा का वहन नहीं करता है तथा राम और लक्ष्मण के मुख पर मृत्यु का विकार लक्षित
नहीं होता ( वा० रा० ६। सर्ग ४७, ४८ ) ।
बाद में राम चेतना प्राप्त कर लक्ष्मण के लिए विलाप करते हैं । सुषेण औषध लेने हनुमान् को भेजने का
प्रस्ताव करते हैं । इतने में गरुड़ के आगमन से नाग भाग जाते हैं । उनके स्पर्श से दोनों स्वस्थ हो जाते हैं ( वा०
रा० ६। सर्ग ५० ) ।
बुल्के गरुड़ागमन को प्रक्षिप्त मानते हैं । पर उनके श्रद्धेय तुलसीदास के रामचरित का मुख्य आधार ही
गरुड़-भुशुण्डिसंवाद है । गरुड़ को नागपाशबद्ध राम के दर्शन से ही मोह होता है ।
महाभारत के रामोपाख्यान में विभीषण स्वयं ही प्रज्ञास्त्र से राम और लक्ष्मण को शरपाश से मुक्त
करते हैं ।
गोविन्दरामायण के अनुसार सीता नागमन्त्र पढ़कर नागपाश काट देती हैं । वस्तुतः विभीषण का प्रज्ञास्त्र
सही समझना चाहिये । उन्होंने जान लिया कि नाग ही बाण बनकर बन्धन बने हैं । अतः गरुड़ से ही उनका
निवारण होगा । इसी तरह सीता के मन्त्र का प्रभाव भी गरुड़ के आगमन में हेतु कहा जा सकता है । इसी दृष्टि से
अध्याय युद्धकाण्ड ५७३
कथाओं का परस्पर समन्वय किया जा सकता है। अन्यथा यह कहना होगा कि सभी कथाएँ परस्पर असंबद्ध ही हैं।
किन्तु प्रामाणिक कथाओं के सम्बन्ध में ऐसा कहना उचित नहीं।
चतुर्लक्षणी ब्रह्मसूत्र और द्वादशलक्षणी पूर्वमीमांसा तथा तदनुसारी धर्मशास्त्रों के निबन्धग्रन्थ सभी
निरर्थक सिद्ध होंगे। यदि उनके अनुसार परस्परविरुद्ध वाक्यों का समन्वय न किया जायगा तो सम्पूर्ण वेद,
उपनिषद्, धर्मशास्त्र, तन्त्र, आगम सभी असम्बद्ध एवं अप्रामाणिक ही समझे जायेंगे। अतः जैसे पूर्वोत्तरमीमांसाओं
के अनुसार मन्त्र-ब्राह्मणरूप वेदों का समन्वय किया जाता है उसी तरह रामायण और पुराणों का समन्वय करना
उचित है। तिलक आदि टीकाकारों ने उसी सरणि का अवलम्बन किया है। उनकी दृष्टि से विचार करने पर असंगति
तथा असम्भव का प्रश्न ही नहीं उठता है।
सेरीराम के अनुसार इन्द्रजित् की एक विशाल सेना को आकाशमार्ग से आती देखकर हनुमान् ने राम को
परामर्श दिया कि वानर-सेना की रक्षा के लिए गरुड़ महावीर को बुलाया जाय। राम ने गरुड़ को बुलाया। इन्द्रजित्
पत्थर बरसाने लगा। गरुड़ ने राम के आदेशानुसार समस्त वानर-सेना पर अपने पङ्ख फैला दिये। बाद में गरुड़ ने
पत्थरों की मार से व्यग्र होकर राम से सहायता माँगी। राम ने गरुड़ को ऊपर उठाकर उनका शरीर हिलाकर
पत्थर भार से मुक्त किया। ४० दिन तक वैसी ही पत्थर वर्षा होती रही।
कृत्तिवास के अनुसार गरुड़ ने नागपाशमुक्ति के पश्चात् कृष्ण-रूप देखने की इच्छा प्रकट की। राम ने
कहा मुझे न देखकर वानर-सेना किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जायगी। तब गरुड़ ने पङ्ख फैलाकर राम को छिपा लिया और
राम ने उन्हें कृष्ण-रूप दिखाया। हनुमान् ने योगबल से सब वृत्तान्त जान लिया। उन्होंने कृष्णावतार के समय बदला
लेने का निश्चय किया। किसी पौराणिक कथा के अनुसार श्रीकृष्ण ने हनुमान् को बुलाने के लिए गरुड़ को भेजा।
गरुड़ ने आकर हनुमान् से कहा कि आपको श्रीकृष्ण ने बुलाया है। मैं आपको ले चलूँगा। हनुमान् ने कहा आप
चलो, मैं आ जाऊँगा। गरुड़ को अभिमान हो गया कि ये मुझसे पहले कैसे पहुँचेंगे ? वे बड़े वेग से चले तो मनोजव
हनुमान् उनके पहले ही भगवान् के पास पहुँच गये। बीच में किसी उद्यान से पुष्प लेने भी गये। वहाँ सुदर्शन
चक्र का पहरा था, उन्होंने भी बाधा डाली। हनुमान् ने उन्हें मुद्रिका बनाकर अपनी अँगुली में पहन लिया।
ऐसी अनेक कथाएँ पुराणों में मिलती हैं। वस्तुतः हनुमान् के माहात्म्य के वर्णन में ही उक्त आख्यायिकाओं का
तात्पर्य है।
"नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते किन्तु विधेयं स्तोतुम् ।"
इस मीमांसा-सिद्धान्त के अनुसार निन्दा का तात्पर्य गरुड़ या चक्र आदि का अपकर्ष वर्णन करने में न
होकर विधित्सित हनुमान् की उपासना—स्तुति में ही है।
बुल्के कहते हैं कि वाल्मीकिरामायण में तारा के पिता वानर-सेनापति सुषेण को वैद्य भी माना गया है।
वह लक्ष्मण एवं योद्धाओं की चिकित्सा करता है (सर्ग ९१)। हनुमान् द्वारा लायी गयी औषधियों से वह रावण
की शक्ति से आहत लक्ष्मण को स्वस्थ करता है (सर्ग १०१)।
महानाटक, रामचरितमानस आदि में वह राक्षस-वैद्य माना जाता है, जिसे हनुमान् लङ्का से ले आते हैं।
इस विरोध का समाधान भी कल्पभेद ही है।
हनुमान् की हिमालय-यात्रा
५८७ वें अनु० में बुल्के हनुमान् की हिमालय-यात्राविषयक सामग्री को प्रक्षिप्त मानते हैं। उनके तद्विषयक
तर्क का खण्डन पीछे किया जा चुका है।
५७४ रामायणमीमांसा अष्टादश
कुम्भकर्ण-वध के पश्चात् इन्द्रजित् युद्ध में अदृश्य होकर ब्रह्मास्त्र से लक्ष्मण को आहत करता है और
बहुत से योद्धाओं का वध करता है। जाम्बवान् के आदेशानुसार हनुमान् रात को हिमालय जाते हैं। वहाँ औषधियों
को न देखकर औषधपर्वत को ही उठा लाते हैं। उसकी सुगन्ध से सब योद्धा स्वस्थ हो जाते हैं। वे पुनः पर्वत को
वहीं पहुँचा देते हैं। बुल्के यह भी मानते हैं कि कालनेमि तथा मकरी (ग्राही) का वृत्तान्त और हिमालय के गन्धर्वों
की चुनौती तथा उनका हनुमान् द्वारा वध, औषधपर्वत ले जाते समय राक्षसों का आक्रमण और पराजय भी उदीच्य
पाठ में हैं।
गौड़ीय पाठ में भरत और हनुमान् का विवाद भी वर्णित है। हमने पहले लिखा है कि सभी पाठ
प्रामाणिक हैं। अतः उक्त कथाएँ बाद में विकसित हुई हैं, बुल्के की यह कल्पना निराधार ही है। अतएव तुलसीदास-
जी ने अपने रामचरितमानस में कालनेमि आदि का वृत्तान्त दिया है। रावण की प्रेरणा से रामकाज में विघ्न डालने
के लिए कालनेमि तपस्वी बनकर मायामय आश्रम में हनुमान् से भूत-भविष्य की बातें करता है। हनुमान्जी उससे
दीक्षा लेने के लिए सरोवर में स्नान करने जाते हैं। वहाँ मकरी उनको निगलना चाहती है। पर वह हनुमान् के
द्वारा मारी जाकर दिव्यरूप धारण करती है एवं कालनेमि का रहस्य बतलाती है। पश्चात् हनुमान् कामनेमि का भी
वध करते हैं। गौड़ीय पाठ तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ के अनुसार सूर्योदय के पहले ही हनुमान् को लौटने के
लिए कहा गया था। कृत्तिवास के अनुसार मध्यरात्रि में रावण की आज्ञा के अनुसार सूर्योदय हुआ था,
किन्तु हनुमान् ने सूर्य को अपनी काँख में दबा लिया था। भावार्थरामायण के अनुसार राम के डर से,
हनुमान् के लङ्का पहुँचने के पहले, सूर्यदेव उदित होने का साहस नहीं करते। उक्त कथाओं का तात्पर्य रावण का
प्रभाव तथा उससे भी अधिक हनुमान् और राम का महत्त्ववर्णन करने में ही है। फिर भी सूर्य के उदय में विलम्ब
होना अत्यन्त असंभव नहीं। अतएव शाण्डिली ब्राह्मणी अपने पातिव्रत्य के बल से सूर्योदय रोक सकी थी।
गौड़ीय पाठ (६।८२।९०-१२८) के अनुसार हिमालय की ओर जाते हुए हनुमान् को देखकर भरत को
कौतूहल हुआ। उन्होंने बाण मारकर हनुमान् को गिराना चाहा, पर हनुमान् अपना परिचय देकर अपनी यात्रा का
उद्देश्य बताते हैं। सब कथा सुनाकर विजयी राम के शीघ्र प्रत्यावर्तन का आश्वासन देकर हनुमान् हिमालय की
ओर प्रस्थान करते हैं। अन्यत्र प्रस्तुत प्रसङ्ग में स्वप्न का भी उल्लेख मिलता है। सुमित्रा ने देखा कि एक साँप
उनकी बाईं भुजा खा रहा है। अपशकुन को शान्ति के लिए तुरन्त देवार्चन का आयोजन हुआ। शान्ति-मण्डप से ही
भरत ने आकाश में जाते हुए हनुमान् को गिरा दिया। राम-लक्ष्मण का नाम स्मरण करते हुए हनुमान् मूच्छित
हो गये। तब वसिष्ठ ने पर्वत की ओषधियों द्वारा उन्हें स्वस्थ किया। भरत की परीक्षा लेने की दृष्टि से हनुमान् ने
कहा कि श्रान्त होने के कारण मेरा सूर्योदय के पहले पहुँचना कठिन है। यह सुनकर भरत ने पर्वत सहित हनुमान्
को बाण पर चढ़ाकर धनुष से प्रेषित करने का उपक्रम किया। भरत का पराक्रम देखकर हनुमान् को सन्तोष हुआ।
बाण से उतरकर उन्होंने भरत के बाहुबल की प्रशंसा की। पश्चात् रुद्रावतार हनुमान् पर्वत उठाकर लङ्का पहुँच गये।
रङ्गनाथरामायण के अनुसार भरत ने ही अशुभ स्वप्न देखा था। उन्होंने ब्राह्मणों को बुलाकर हवन
आदि शान्तिक कर्म कराया।
हनुमान् ने आकाश से भरत को देखा तो उन्हें भ्रम हुआ कि राम सीता और लक्ष्मण के बिना यहाँ कैसे
आये ? भरत ने हनुमान् को देखकर गिराने का निश्चय किया तो आकाशवाणी ने उन्हें रोका।
आनन्दरामायण के अनुसार भरत ने बाण मारकर उनके हाथों से पर्वत गिरा दिया। हनुमान् ने भरत को
देखकर उन्हें राम ही समझा। जब भरत पुनः बाण मारने को तैयार हुए तो उनका भ्रम दूर हुआ और उन्होंने भरत
को अपना परिचय दिया। अन्त में भरत ने पर्वत लौटा दिया हनुमान् उसे लङ्का ले गये।
अध्याय युद्धकाण्ड ५७५
सूरसागर, रामचरितमानस आदि के अनुसार भरत ने बाण मारकर हनुमान् को नीचे गिराया था।
भावार्थरामायण के अनुसार भरत ने हनुमान् को इन्द्र समझकर रामनामाङ्कित बाण चलाया था। वह हनुमान् के
पैरों को पकड़कर उन्हें नीचे की ओर खींचने लगा। हनुमान् ने रामनामाङ्कित बाण देखकर समझा कि राम अयोध्या
चले आये और भरत से कहा कि आप अपने मित्रों को छोड़कर यहाँ कैसे आ गये। रामचरितमानस के अनुसार
भरत बाण पर बैठाकर पर्वत सहित हनुमान् को लङ्का भेजने का प्रस्ताव करते हैं, पर हनुमान् नम्रता से अस्वीकार
कर शीघ्र ही पहुँच जाने का आश्वासन देते हैं। उक्त कथाओं का तात्पर्य हनुमान् और भरत दोनों की लोकोत्तर
महिमा का वर्णन करने में ही है। अतः वाच्यार्थ में कुछ विरोधाभास होने पर भी तात्पर्यतः अविरोध ही है।
कुम्भकर्ण वध
५८९वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि “कुम्भकर्ण (वा० रा० ६।१२ में) सीता को लौटाने के लिए रावण
से अनुरोध करता है। महाभारत में इसका उल्लेख नहीं है, इसलिए वे इसे प्रक्षिप्त कहते हैं, क्योंकि रावण के
आदेशानुसार जगाये जाने पर कुम्भकर्ण सीता-हरण, लङ्कावरोध आदि घटनाओं से अनभिज्ञ प्रतीत होता है
(सर्ग ५१)।” बुल्के का उक्त कथन असङ्गत है। वस्तुतः ५१ वें सर्ग में नहीं दाक्षिणात्य पाठ ६० वें सर्ग में
कुम्भकर्ण को जगाया गया था। अस्वाभाविक जागरण के कारण ही कुम्भकर्ण को पिछली बातों का स्मरण नहीं
रहा। आज भी घोर निद्रा से जगाये जाने पर प्राणी को यह भी समझ में नहीं आता है कि मैं कौन हूँ और कहाँ
हूँ? अस्वाभाविक प्रबोधन के कारण ही कुम्भकर्ण ने अकाल-बोधन से विस्मित होकर कहा कि आप लोगों ने मुझे
क्यों जगाया ?
“बोधनाद्विस्मितश्चापि राक्षसानिदमब्रवीत् ।
किमर्थमहमाहृत्य भवद्भिः प्रतिबोधितः ॥
नह्यल्पकारणे सुप्तं बोधयिष्यति मादृशम् ॥” (वा० रा० ६।६०।६६-७०)
तिलककार ने लिखा है—
“स्वभावतो निद्रापगमाभावेनाकालबोधनादिति भावः”
अर्थात् स्वभावतः निद्रा नहीं गयी, क्योंकि अकाल में जगाया था। अतएव जब वह नेत्र-मुखप्रक्षालन कर
स्नान, पान, भोजन आदि करके रावण के पास पहुँचा और रावण का परिदेवन सुना तो उसने ६३ वें सर्ग में कहा
है—मन्त्रकाल में हम लोगों ने जो सर्वनाशरूप दोष देखा था वही आज उपस्थित है—
“दृष्टो दोषो हि योऽस्माभिः पुरा मन्त्रविनिर्णये ।
हितेष्वनभियुक्तेन सोऽयमासादितस्त्वया ॥” (वा० रा० ६।६३।२)
मन्दोदरी ने और विभीषण ने हित की बात कही थी, पर आपने किसी की नहीं सुनी—
“यदुक्तमिह ते पूर्वं प्रियया मेऽनुजेन च।
तदेव नो हितं वाक्यं यथेच्छसि तथा कुरु ॥” (वा० रा० ६।६३।२१)
इन पूर्वापर प्रसङ्गों से स्पष्ट है कि केवल ६०वें सर्ग में निद्राक्रान्ति की दशा में सीता-हरण तथा लङ्का-
वरोध की चर्चा न करने के कारण यह नहीं कहा जा सकता कि १२ वाँ सर्ग ही प्रक्षिप्त है। ६३ वें सर्ग में १२ वें
सर्ग के मन्त्र की चर्चा करने से उसको प्रक्षेप कहनेवाले का मुखबन्द हो जाता है।
बुल्के कहते हैं कि वाल्मीकिरामायण दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार कुम्भकर्ण के जगाने में विभिन्न प्रयत्नों
का अतिरञ्जित वर्णन है। अन्त में सहस्र हाथियों से उसके शरीर को कुचलवा कर वह जगाया गया था। वा० रा०
५७६ रामायणमीमांसा अष्टादश
उदीच्यपाठ के अनुसार यक्ष, राक्षस तथा गन्धर्वों को कन्याओं के आभूषणों की झनकार, सङ्गीत तथा स्पर्श से
उसका जागरण हुआ । वा० रा० गौड़ीय पाठ, भावार्थरामायण आदि के अनुसार घृताची, रम्भा, मेनका, उर्वशी
आदि अप्सराओं द्वारा उसे जगाया गया था । सेरीराम के अनुसार चार दासियाँ कुम्भकर्ण की नाक में प्रवेश कर
बाल उखाड़ती हैं । वे कुम्भकर्ण की छींक से बाहर फेंकी जाती हैं । अन्त में पैर के बाल उखाड़े जाने पर वह जागता
है । वाल्मीकिरामायण के विभिन्न पाठों का समन्वय होने में कोई बाधा नहीं है । अन्य कथाओं का तात्पर्य उसकी
निद्रा की भीषणता के प्रतिपादन में ही है ।
रामायण के सभी पाठों के अनुसार राम ने कुम्भकर्ण का वध किया है । उदीच्य पाठ के अनुसार कुम्भ-
कर्ण ने रावण से कहा था कि नारद ने विष्णु के अवतार राम का रहस्य मुझसे प्रकट किया था । रावण ने उत्तर
में कहा था कि मैं विष्णु के हाथ मरकर परम गति प्राप्त करना चाहता हूँ—
“निहतो गन्तुमिच्छामि तद्विष्णोः परमं पदम् ।”
दाक्षिणात्य पाठ में यह प्रसङ्ग नहीं मिलता, किन्तु अध्यात्मरामायण ( ६।७ ), आनन्दरामायण
( १।११।१४ ), रङ्गनाथरामायण ( ६।७० ), भावार्थरामायण ( ६।२२ ) तथा रामचरितमानस ( ६।६३ )
आदि में पाया जाता है । वा० रा० पश्चिमोत्तरीय पाठ ( ४६।८२-९१ ) के अनुसार रणभूमि में विभीषण से
मिलकर रामशरण लेने के कारण उसकी प्रशंसा कुम्भकर्ण ने की थी । वाल्मीकिरामायण के अन्य पाठों में इसका
उल्लेख नहीं है, किन्तु यह प्रसङ्ग अध्यात्मरामायण ( ६।८ ), आनन्दरामायण ( १।११।१२५ ), रामचरितमानस
( ६।१४ ) तथा भावार्थरामायण ( ६।२५ ) में वर्णित है । अन्य पाठों में वैसा उल्लेख न होने पर भी पश्चिमोत्तरीय
पाठ तथा अन्य ग्रन्थों से सम्मत होने के कारण उक्त वृत्तान्त को प्रामाणिक ही समझना चाहिये ।
रङ्गनाथरामायण के अनुसार कुम्भकर्ण का सिर लङ्का की ऊँची अट्टालिकाओं को चूर्ण करता हुआ एवं
समुद्र के विविध प्राणियों को नष्ट करता हुआ समुद्र में डूब गया । भावार्थरामायण के अनुसार कुम्भकर्ण का सिर कट
जाने के पश्चात् कबन्ध राक्षसों पर गिरा एवं उसने बहुतों को नष्ट कर दिया । सेरीराम के अनुसार राम ने कुम्भकर्ण
का सिर रावण के शिविर में फेंक कर बहुत से राक्षसों का वध किया था ।
महाभारत के रामोपाख्यान ( अध्याय २७१ ), स्कन्दपुराण ( सेतुमाहात्म्य अध्याय ४४ ) आदि में
लक्ष्मण के द्वारा कुम्भकर्ण का वध वर्णित है । परन्तु भावदीपकार नीलकण्ठ ने कहा है कि रामचरित में वाल्मीकि-
रामायण ही मुख्य प्रमाण है, अतः अन्य ग्रन्थों को तदनुसार लगाना ही उचित है । अतः लक्ष्मण के द्वारा कुम्भकर्ण
मृतप्राय हो गया था । यही लक्ष्मण द्वारा उसके वध का अभिप्राय है । परन्तु उसकी मृत्यु राम के ही बाण से स्वीकार
करना उचित है, क्योंकि जय-विजयरूप रावण और कुम्भकर्ण दोनों का वध विष्णु के द्वारा ही प्रमाणसिद्ध है ।
५९० अनु० में बुल्के कहते हैं कि “इन्द्रजित् के द्वितीय युद्ध में प्रथम युद्ध के नागपाश-वृत्तान्त का
अनुकरणमात्र प्रतीत होता है,” परन्तु यह सङ्गत नहीं हैं; क्योंकि उन्होंने आगे स्वयं उसकी विशेषताएँ स्वीकार की
हैं कि द्वितीय युद्ध के पूर्व इन्द्रजित् पावक को होम देकर ब्रह्मास्त्र प्राप्त करता है और अदृश्य होकर वानर-सेनापतियों
तथा राम और लक्ष्मण को घायल करता है, फिर विजयी के रूप में लङ्का लौटता है । युद्ध में किसी अंश में तो तुल्यता
होती ही है । इतनेमात्र से वह अनुकरण नहीं कहा जा सकता है । वस्तुतः इस युद्ध में इन्द्रशत्रु ने इन्द्र, वैवस्वत,
विष्णु एवं रुद्र, साध्य, वैश्वानर, चन्द्र और सूर्य को अपना अप्रमेय पराक्रम दिखाया था । वह तान्त्रिक आभिचारिक
विधानों का अनुकरण कर अपने प्रयोग को सिद्ध कर विजयसूचक चिह्नों से प्रेरित होकर अपने रथ, धनुष तथा
ब्रह्मास्त्र को अभिमन्त्रित कर सम्पूर्ण सेनानियों तथा वानरसेना को शरजाल से व्याकुल कर देता है । राम और लक्ष्मण
अध्याय युद्धकाण्ड ५७७
पर भी मन्त्रयुक्त तीव्र बाणों का प्रयोग करता है। स्वयम्भू के अचिन्त्य अस्त्र के प्रभाव को देखकर राम लक्ष्मण से
अव्यग्रता से उसके बाण-वृष्टिकाल को सहने के लिए कहते हैं—
“बाणावपातं त्वमिहाद्य धीमन् मया सहाव्यग्रमनाः सहस्व ।’’ ( वा० रा० ६।७३।६६ )
राम यह भी कहते हैं कि हम दोनों को रणभूमि में शयान देखकर ही यह लौटेगा और अस्त्रजालों से
मेघनाद ने दोनों को पीड़ित तथा मूच्छित कर दिया। दूसरी विशेषता यह है कि पूर्व युद्ध में नाग ही बाणरूप में छोड़े
गये थे। अतएव उनकी निवृत्ति के लिए गरुड़ की ही आवश्यकता थी। पर ७३वें सर्ग के युद्ध में वह बात नहीं थी ।
७४वें सर्ग में तो ब्रह्मास्त्र को सम्भावित करके मारुति हनुमान् उठ खड़े हुए । विभीषण और हनुमान् रात्रि में उल्का
( मशाल ) हाथ में लेकर जीवित वीरों को आश्वस्त करने में लग गये । सागरौघतुल्य बाणों से अदित भीमबल में
विभीषण सहित हनुमान् वृद्ध जाम्बवान् को ढूंढते हैं। जाम्बवान् प्रजापति के पुत्र थे। अवस्था से वृद्ध तथा सैकड़ों
बाणों से आहत होने के कारण पावक के समान प्रशान्त हो रहे थे। विभीषण ने उनके मिलने पर कहा—आर्य !
तीक्ष्ण बाणों से आपके प्राण तो ध्वस्त नहीं हुए। विभीषण की बात को सुनकर बड़ी कठिनाई से बोलते हुए उन्होंने
कहा राक्षसेन्द्र ! मैं तुम्हें स्वर से पहचान रहा हूँ। तीक्ष्ण बाणों से अतिविद्ध होने के कारण मैं चक्षु से तुम्हें देख नहीं
पा रहा हूँ। जिसके द्वारा अञ्जना और मरुत् दोनों ही सुपुत्र हुए हैं वह वानरश्रेष्ठ हनुमान् क्या जीवित है ? जाम्बवान्
की बात सुनकर साश्चर्य विभीषण ने कहा—क्या कारण है कि आपने आर्यपुत्र राम, लक्ष्मण तथा सुग्रीव एवं अङ्गद
के सम्बन्ध में वैसा स्नेह नहीं प्रदर्शित किया। जाम्बवान् ने कहा नैर्ऋतशार्दूल, सुनो वह कारण, जिससे मैं हनुमान्
को पूछ रहा हूँ। हनुमान् के जीवित रहने पर सब सेना नष्ट होने पर भी अनष्ट ही समझिये और उसके मृत हो जाने
पर हम सब जीवित रहते हुए भी मृत होंगे। यदि मारुततुल्य तथा वैश्वानरोपम हनुमान् जीवित हैं तो हम सबको
जीवन की आशा बनी रहेगी।
हनुमान् ने बड़ी नम्रता से वृद्ध जाम्बवान् के पास जाकर पादग्रहण कर अभिवादन किया । जाम्बवान् ने
प्रसन्न होकर अपना पुनर्जन्म समझा और कहा, हरिशार्दूल ! यह तुम्हारे पराक्रम का काल है। आकाश-मार्ग से
नगश्रेष्ठ हिमवान् में जाकर अत्युग्र काञ्चन पर्वत ऋषभ और कैलास के मध्य में स्थित ओषधि-पर्वत है। वहाँ स्थित
मृतसञ्जीवनी, विशल्यकारिणी, सुवर्णकरणी तथा सन्धानी इन चारो औषधों को लाओ ।
हनुमान् भीषण नाद कर लङ्कास्थ राक्षसों की भयभीत एवं स्तब्धकर वेग से आकाश-मण्डल में धावन
करते हुए शैलों, शिलाओं तथा सामान्य वानरों को आकृष्ट करते हुए हिमालय की ओर गये और ओषधि पर्वत ही उठा
लाये । समस्त वानर-सेना और राम-लक्ष्मण स्वस्थ हो गये । ऐसे महत्त्वपूर्ण वर्णन को बुल्के इसी लिए प्रक्षेप कहने का
साहस करते हैं, क्योंकि वे हिमालय-यात्रा को ही प्रक्षेप कह चुके हैं। ऐसे ही उसके तीसरे युद्ध की भी अपनी
विशेषताएँ हैं ही।-
उत्तरकाण्ड के अनुसार इन्द्रजित् ने अग्निष्टोम, राजसूय, अश्वमेध आदि यज्ञों का अनुष्ठान किया था ।
माहेश्वर यज्ञों से सन्तुष्ट पशुपति से कामग रथ, अक्षय तूणीर तथा अदृश्य रहने की शक्ति प्राप्त की थी।
मेघनाद ने इन्द्र को भी जीतकर लङ्का के कारावास में रख दिया था । ब्रह्मादि देवताओं ने 'इन्द्रजित्' उपाधि
प्रदान कर उसके अतिरिक्त भी एक वर प्रदान किया था। जिससे उसने यह माँगा कि विधिवत् होम करने पर अग्नि
से एक अश्वयुक्त रथ उत्पन्न हो जब तक मैं उसपर रहूँ अमर बना रहूँ (सर्ग ३०)।
अन्त में उसने यह भी कहा कि जप, होम आदि की समाप्ति के पहले यदि मैं संग्राम करूँ तभी मेरा
विनाश हो । इस तरह बिना तपस्या के उसने अमरत्व प्राप्त किया था ।
७३
५७८ रामायणमीमांसा अशक्य
५९१ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि "मायामय सीता के वध का वृत्तान्त आदिरामायण में नहीं पाया
जाता था, क्योंकि महाभारत के रामोपाख्यान में इसका अभाव है।" परन्तु उनका यह कहना भी असङ्गत है, क्योंकि
रामोपाख्यान में संक्षेप के कारण ही कई सामग्रियों का छूट जाना स्वाभाविक ही है। शाखाभूत किसी ग्रन्थ में किसी
चरित्र के न मिलने पर भी मूल ग्रन्थों में जो चरित्र विद्यमान है उसको शाखा ग्रन्थ में न होने से प्रक्षिप्त कहना अजीब
बात है। रामायण, महाभारत, पुराण और धर्मशास्त्र सभी ग्रन्थ वेदमूलक ही हैं। फिर वेद की अनेक बातें उनमें
अविद्यमान हो सकती हैं और हैं भी तथापि मूल वैदिक वस्तुओं को प्रक्षेप नहीं कहा जा सकता।
वाल्मीकिरामायण (सर्ग ८१ और ८२) के अनुसार इन्द्रजित् हनुमान् तथा अन्य वानरों के सामने अपने
रथ पर मायासीता का सिर काटता है। हनुमान् से समाचार जानकर राम व्याकुल होते हैं, किन्तु विभीषण आश्वा-
सन देते हुए कहते हैं कि यह तो राक्षसी माया है, क्योंकि दुरात्मा रावण का सीता में प्रेम है, वह सीता का वध
कभी न होने देगा।
“मायामयीं महाबाहो तां विद्धि जनकात्मजाम् ।” (वा० रा० ६।८४।१३)
विभीषण सच्चाई जानने के लिए मधुमक्खी का रूप या अन्य सूक्ष्म रूप धारण कर के जाता है। रामकियेन
आदि में सीता-वध का कुछ विलक्षण वृत्तान्त है। वाल्मीकिरामायण के अनुसार विभीषण ने राम को सावधान किया
कि इन्द्रजित् निकुम्भिला में अपना यज्ञ करने के पश्चात् अजेय बन जायगा, अतः यज्ञ का विध्वंस करना अत्यावश्यक
है। अतएव विभीषण तथा अङ्गद, हनुमान् आदि वानरों को साथ लेकर लक्ष्मण ने इन्द्रजित् की रक्षा करनेवाली
सेना पर आक्रमण कर दिया। युद्ध का कोलाहल सुनकर इन्द्रजित् अपूर्ण यज्ञ छोड़कर युद्ध करने के लिए उठ
खड़ा हुआ। विभीषण को देखकर इन्द्रजित् ने उनकी निन्दा की। अनन्तर लक्ष्मण इन्द्रजित् का घोर संग्राम हुआ।
लक्ष्मण ने उनके सारथि को मार डाला। इन्द्रजित् पैदल लङ्का लौट गया। पुनः वह नये रथपर चढ़कर आया। पुनः
लक्ष्मण ने उसके सारथि एवं घोड़ों को मार डाला। अन्त में लक्ष्मण ने ऐन्द्र अस्त्र से इन्द्रजित् का वध किया। बाद
में सुषेण ने लक्ष्मण, विभीषण आदि की चिकित्सा की। इन्द्रजित् की मृत्यु का समाचार सुनकर रावण ने सीता का
वध करना चाहा, पर सुपाश्र्वं ने रोक दिया।
महानाटक के अनुसार इन्द्रजित् का कटा सिर रावण के हाथों में फेंका गया था। कम्बरामायण के
अनुसार इन्द्रजित् ने युद्ध करते हुए यह जान लिया था कि लक्ष्मण विष्णु के अवतार हैं। अतः उसने रावण से अनु-
रोध किया कि सीता राम को दे दी जाय। रावण ने नहीं माना, तब रणभूमि में लौटकर उसने पुनः युद्ध किया।
लक्ष्मण ने उसका बायां हाथ काटा और सिर काटकर राम के चरणों में धर दिया।
आनन्दरामायण के अनुसार हनुमान् ने उसका सिर उठाकर राम को दिखलाया। बहुत सी कथाओं में
कहा गया गया है कि बारह वर्ष नींद, नारी तथा भोजन त्याग के प्रभाव से लक्ष्मण ने मेघनाद को मारा था।
सेरीराम के अनुसार उसका वध राम के द्वारा होता है। समाचार सुनकर रावण रणभूमि में आकर
उसके कबन्ध को लेकर ऐसा विलाप करता है कि सभी वानर और राम भी रो पड़ते हैं। पर कुछ वानर उसको दसों
मुखों से रोते देखकर हँसी नहीं रोक पाते। अन्त में वह उसके देह को लङ्का ले जाता है। जहाँ उसकी पत्नी चिता
पर बैठकर सती होती है। द्विपदरामायण (६।१११-११३), भावार्थरामायण तथा आनन्दरामायण में उल्लेख है कि
सुलोचना कटी हुई पति की भुजा देखकर विलाप करने लगती है। भुजा ने बाण द्वारा अपने रक्त से लिखा कि मैंने
शेष के हाथ से मरकर मुक्ति पायी है। रामचरितमानस के क्षेपकों के अनुसार वह कहती है कि जो बारह वर्ष नींद,
नारी और भोजन त्याग सकता हैं उससे मेरे पति का मरण हो सकता है। इस भुजा ने लिखा—
अध्याय युद्धकाण्ड ५७९
"नींद नारि भोजन शत कोटी ।
तजब तासु महिमा अति छोटी ॥" (रा० मा० परिशिष्ट ७।३।२)
अर्थात् बारह वर्ष ही नहीं शतकोटि वर्ष भी नींद, नारी तथा भोजन का त्याग करना लक्ष्मण के लिए
कोई बड़ी बात नहीं है। सुलोचना रावण से पति के सिर की प्राप्ति के लिए कहती है । रावण कहता है—धैर्य रखो,
मैं राम और लक्ष्मण के सिर के साथ ही इन्द्रजित् का सिर ला दूँगा । परन्तु मन्दोदरी उसे परामर्श देती है कि वह
स्वयं राम के दरबार में जाकर सिर प्राप्त करे । उसने कहा वहाँ विभीषण तुम्हारे ससुर हैं। लक्ष्मण की महिमा
भुजा ने ही लिखी है। अङ्गद मेरा पुत्र है । हनुमान् रुद्रावतार हैं। राम सदा नीतिनिष्ठ हैं फिर वहाँ जाने में
क्या संकोच ?
"सदा नीतिरत राम नरेशा ।
तहाँ जात कहु कोन कलेशा ॥" (रा० मा० परिशिष्ट ६।१२।५)
सुलोचना जाती है। त्रिलोकसुन्दरी नागकन्या सुलोचना को देखकर भी अनुशासननिष्ठ वानर-सेना
प्रशान्त थी। सुलोचना ने इन्द्रजित् की भुजा द्वारा लिखित लक्ष्मण की महिमा का उल्लेख करके सहगमन के
लिए सिर मांगा। किन्हीं लोगों ने कहा कि मृत भुजा द्वारा उल्लेख का विश्वास तभी किया जा सकता है। जब यह
सिर हँसे । इसपर सुलोचना ने सिर को अपनी गोद में लेकर बहुत सी बातें कहीं और यह भी कहा कि यदि
मुझे यह मालूम होता तो मैं अपने पिता शेष को तुम्हारी सहायता के लिए बुलाती । इसपर वह सिर बहुत जोर से
हँसा, जिसका आशय यह था कि शेष द्वारा हीं मेरा वध हुआ है।
वाल्मीकिरामायण से अनुक्त होने पर भी आनन्दरामायण आदि की उक्तियाँ तथा अप्रतिषिद्ध अन्य
उक्तियाँ भी अनुमत ही हैं ।
रावण-वध
५९५ अनु०, खोतानी रामायण के अनुसार राम द्वारा आहत होकर दशग्रीव राजकर देने की प्रतिज्ञा
करता है। युद्ध स्थगित हो जाता है। जैन राम-कथाओं, उन्मत्तराघव तथा बिहौरराम-कथा के अनुसार लक्ष्मण
द्वारा रावण का वध होता है। परन्तु इसे भी वाल्मीकिरामायण के अनुसार ही लगाना उचित है। वाल्मीकिरामायण
के अनुसार महोदर, महापार्श्व तथा विरूपाक्ष के वध के बाद रावण रणभूमि में स्वयं प्रवेश करता है। वह लक्ष्मण
को अपनी शक्ति से आहत करता है, किन्तु राम द्वारा पराजित होकर लङ्का भाग जाता है। बाद में वह महान् रथ-
पर चढ़कर युद्ध-भूमि में आता है । इन्द्र अपने रथ सहित मातलि सारथि को भेज देते हैं । द्वन्द्वयुद्ध हुआ । स्वामी को
मूच्छित देखकर रावण-सारथि रथ को रणभूमि से दूर ले जाता है। चेतना प्राप्त कर रावण ने फिर युद्ध-भूमि में
रथ ले जाने का अंदिश दिया । अन्तिम युद्ध में रामने रावण के पुनः पुनः सिर काटे और वे पुनः पुनः उत्पन्न होते
गये । इस तरह सैकड़ों बार उसके सिर कटे और उत्पन्न हुए ।
मातलि के परामर्श से राम ने अगस्त्य द्वारा प्रदत्त ब्रह्मास्त्र से रावण के हृदय को विदीर्ण कर दिया।
महाभारत में न मिलने के कारण बुल्के रावण की शक्ति द्वारा लक्ष्मण के आहत होने को प्रक्षिप्त या परिवर्धन मानते
हैं, परन्तु यह असङ्गत है, क्योंकि वाल्मीकिरामायण की परम्परा तथा टीकाकारों की संमति से वह प्रक्षिप्त नहीं है ।
वाल्मीकिरामायण के अनुसार विभीषण ने रावण के रथ के घोड़ों का वध किया था, फलस्वरूप रावण ने विभीषण
की ओर शक्ति का प्रहार किया। लक्ष्मण ने उसे बीच में ही छिन्न-भिन्न कर दिया। रावण ने पुनः अन्य शक्ति
विभीषण पर चलायी । लक्ष्मण ने उससे भी विभीषण को बचा लिया । अन्त में रावण ने मय द्वारा निर्मित अमोघ
५८० रामायणमीमांसा अष्टादश
शक्ति से लक्ष्मण को मारा। राम ने लक्ष्मण की छाती से शक्ति को निकाल कर तोड़ दिया। लक्ष्मण को हनुमान् आदि
वानरों की रक्षा में छोड़कर राम ने पुनः रावण को रणभूमि छोड़कर भागने को बाध्य कर दिया। हनुमान् ने
हिमालय से औषध लाकर लक्ष्मण को जिलाया।
महानाटक के अनुसार रावण की शक्ति को हनुमान् रोक लेते हैं। कहा जाता है कि रावण के अनुरोध
से नारद हरिकीर्तन द्वारा हनुमान् को प्रेमविभोर कर के रण से असावधान करते हैं। तब रावण लक्ष्मण को आहत
करने में समर्थ होता है।
पउमचरियं के अनुसार विशल्या द्रोणमेघ की कन्या थी, ओषधि नहीं। इसके स्नान जल से लक्ष्मण की
चिकित्सा हुई थी। अन्त में हनुमान् ने उससे विवाह किया था।
बुल्के ने मातलि-रथ के प्रसङ्ग को भी प्रक्षिप्त कहा है, क्योंकि रावण की पत्नियों ने रावण-वध के बाद
विलाप करते हुए कहा था कि जिसे देवता भी नहीं मार सके, वह एक पदाति मनुष्य द्वारा मारा गया—
“अवध्यो देवतानां यस्तथा दानवरक्षसाम् ।
हतः सोऽयं रणे शेते मानुषेण पादतिना ॥” (वा० रा० ११०।१५)
पर बुल्के यह नहीं समझते हैं कि—'बाहुल्येन व्यपदेशा भवन्ति ।'
बहुलता के अनुसार व्यवहार होता है। राम ने अधिकांश युद्ध पदाति ही किया था और अब भी राम की
सेना में कोई रथ नहीं था। राम पदाति ही थे। बीच में इन्द्रप्रेषित रथ और मातलि आया भी तो उन स्त्रियों को
ज्ञात न होगा। अतः आकुल-व्याकुल विलाप-प्रलाप और परिदेवन करती हुई नारियों के केवल 'पदातिना' एक संदि-
ग्धार्थ पद के आधार पर मातलिसम्बन्धी अनेकों असंदिग्ध सर्गों को प्रक्षेप कहना केवल दुराग्रह ही है। ठीक इससे
उल्टा यही कहा जा सकता है कि अनेक सर्गों और श्लोकों से विरुद्ध होने के कारण उस एक ही श्लोक को प्रक्षिप्त
मानना युक्त है। वस्तुतः तो पूर्वोक्त प्रकार से कोई भी प्रक्षिप्त नहीं, दोनों की सङ्गति ही है। १०२ वें सर्ग तक
मातलिरथ की चर्चा है। एक श्लोक के आधार पर महत्त्वपूर्ण इन सर्गों को प्रक्षेप कहना अत्यन्त असङ्गत है।
इस तरह बुल्के युद्ध के समय अगस्त्य द्वारा राम को उपदिष्ट आदित्यहृदय को भी प्रक्षिप्त ही कहते हैं।
यह भी प्रमाद ही है, कारण वह परम्पराप्राप्त एवं टीकाकारसम्मत है। आज तक लाखों पुरुषों के द्वारा अनुष्ठान रूप
में प्रतिदिन उसका पाठ किया जाता है।
सेरीराम के अनुसार रावण के रथ में १०० सिंह और १०० अश्व जुते हुए थे। लक्ष्मणचिकित्सा
सम्बन्धी अनेकविध कथाएँ सेरीराम, रामकियेन आदि में विस्तार से वर्णित है।
रावण के होम का आयोजन जानकर विभीषण राम को सावधान करता है कि इस यज्ञ के विध्वंस करने
की आवश्यकता है, नही तो रावण शिव के प्रसाद से अजेय हो जायगा।
वानर-भट हनुमान् के नेतृत्व में यज्ञस्थल पर पहुँच कर विघ्न करते हैं। परन्तु उसका ध्यान-भङ्ग करने में
असमर्थ होते हैं। तब अङ्गद हनुमान् की आज्ञा से मन्दोदरी के केशों को खींचकर उसे रावण के पास ले आता है।
तब रावण उत्तेजित होकर यज्ञ को अपूर्ण छोड़कर अङ्गद पर आक्रमण करता है।
पउमचरियं के अनुसार रावण बहुरूपिणी सिद्धि के लिए शान्तिनाथ के मन्दिर में आराधना करता है।
मन्दोदरी लङ्का के सभी नागरिकों से अहिंसा-पालन के लिए निवेदन करती है। विभीषण सुझाव देता है कि राम
जाकर रावण को मन्दिर से निकाल कर कैदी बना लें। किन्तु राम यह प्रस्ताव अस्वीकार करते हैं। वानरों का
एक दल ध्यानस्थ रावण को क्षुब्ध करने के उद्देश्य से लङ्का में प्रवेश करता है। अन्तःपुर की स्त्रियों का अपमान
करता है। फिर भी रावण विचलित नहीं हुआ और उसने बहुरूपिणी विद्यासिद्धि प्राप्त कर ली। गुणभद्र के अनुसार
रावण विद्याएँ सिद्ध करने के लिए आदित्यपाद पर्वत पर तप करता है। राम एक विशाल सेना के साथ आक्रमण
करते हैं। परिणामतः रावण साधना छोड़कर लङ्का चला जाता है।
अनेक रामकथाओं में यह उल्लेख है कि रावण ने दैत्य-गुरु शुक्राचार्य के परामर्श से यज्ञ आरम्भ
किया था।
कृत्तिवास के अनुसार रावण ने शान्तिकर्म का आयोजन किया। चण्डीपाठ के लिए बृहस्पति को
बुलाया। देवताओं ने पवन के द्वारा राम को चण्डीपाठ अशुद्ध कराने का परामर्श दिया। हनुमान् मक्खीरूप धारण
कर जाकर चण्डीपाठ के दो अक्षर चाट आये। परन्तु बृहस्पति ने अभ्यास वश शुद्ध ही पाठ किया। हनुमान् ने
विक्रमरूप दिखाया, वृहस्पति डर गये। हनुमान् ने ग्रन्थ छीनकर प्रथम अध्याय के तीन श्लोक मिटा दिये। अशुद्ध पाठ
देखकर माहेश्वरी कैलास चली गयीं।
सेरीराम के अनुसार रावण अपने यज्ञ के धूम से राम की साँस रोकना चाहता था। रामकेर्ति (सर्ग
१०) के अनुसार रावण के पास विष था वह रावण की प्रार्थना पूर्ण होते ही अजेय हो जाता इत्यादि। यद्यपि यज्ञों
में विघ्न करना अनुचित कार्य माना जाता है तथापि दुष्ट भावना होने से यज्ञ, तप, दान आदि सभी कर्म अधर्म हो
जाते हैं।
“तपो न कल्कोऽध्ययनं न कल्कः स्वभाविको वेदविधिर्न कल्कः ।
प्रसह्य वित्ताहरणं न कल्कः तान्येव भावोपहतानि कल्कः ॥” (म० भा० १।१।२७५)
तप, अध्ययन, स्वाभाविक दारपरिग्रह, अग्निहोत्र आदि कर्म, उञ्छवृत्ति, शिलवृत्ति आदि पाप नहीं हैं
परन्तु भावदोष से उक्त सभी कर्म पाप बन जाते हैं। रावण और इन्द्रजित् दूसरों की पत्नी, बहू-बेटियों का हरण एवं
हजम करने की शक्ति प्राप्त करने के लिए ही यज्ञादि कर्म करते थे, अतः वह पाप ही था। “चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः”
(जै० सू० १।१।२) सूत्र में अर्थ शब्द का ग्रहण इसी लिए हैं कि अनर्थ श्येनयाग आदि धर्मकोटि में न गृहीत हों।
‘पशुना यजेत’ आदि वेद-वचनों में यज्ञ के उद्देश्य से पशु का आलम्भन विहित होने से पाप नहीं है। किन्तु
‘शत्रुमारणकामः श्येनेनाभिचरन् यजेत्’ इस आभिचारिक श्येनयाग में शत्रुमारणरूप हिंसा उद्देश्य है विधेय नहीं है।
क्योंकि वह रागप्राप्त हिंसा ‘न हिंस्यात् सर्वाभूतानि’ निषिद्ध ही है। किन्तु ‘पशुना यजेत’ में हिंसा उद्देश्य एवं राग-
प्राप्त नहीं है, विहित है, अतः वह धर्म ही है। सर्वथापि आभिचारिक कर्म पाप ही है। अतः उसका विध्वंस करना
धर्म ही है। परन्तु हनुमान् द्वारा जो मन्दोदरी का सतीत्वभङ्ग आदि का वर्णन है तथा हनुमान् का यत्र तत्र स्त्रियों
से विवाह या भोग आदि का वर्णन है वह सब विकृति ही है।
काश्मीरीरामायण के अनुसार रावण ने कैलास जाकर शिव की सहायता माँगी थी। शिव ने उसे मकेश्वर
लिङ्ग देकर आश्वासन दिया कि इस लिङ्ग के लङ्का में स्थापित हो जाने पर राम की विजय नहीं होगी। पर इस
लिङ्ग को कहीं पृथिवी पर नहीं धरना चाहिये। मार्ग में रावण को लघुशङ्का लगी। उस मकेश्वर लिङ्ग को उसने
नारद के हाथ में थमा दिया जो कि वृद्ध ब्राह्मण के रूप में आ पहुँचे थे। नारद भूमि पर लिङ्ग रखकर चले गये।
रावण पुनः उस लिङ्ग को उठाने में सफल नहीं हुआ। रावण के अन्य भी कई प्रयत्न रामकियेन में वर्णित हैं। उन्हें
पिछले प्रसङ्ग में देखना चाहिये।
पउमचरियं के अनुसार बहुरूपा विद्या सिद्ध करने के पश्चात् रावण सीता से मिलने गया। सीता ने
उसके प्रस्ताव को ठुकरा दिया और सीता यह कहकर मूच्छित हो गयीं कि मैं तभी तक जीवित रहूँगी जब तक राम,
लक्ष्मण तथा भामण्डल की मृत्यु का समाचार नहीं पाती।
५८२ रामायणमीमांसा अष्टादश
रावण सीता का पातिव्रत्य देखकर दयार्द्र हो गया और सोचने लगा कि मैंने सीता का हरण कर पाप
किया । परन्तु बिना युद्ध के लौटाने से अपयश होगा । अतः वह युद्ध में राम और लक्ष्मण को हराकर सीता को लौटा
देने का संकल्प करता है ।
तोरवेरामायण के अनुसार युद्ध के लिए प्रस्थान करने से पहले वह अपनी सारी सम्पत्ति दरिद्रों में बाँट
देता है, जेल के बन्दियों को रिहा कर देता है और आदेश निकालता है कि यदि मैं युद्ध में मारा गया तो विश्वासपात्र
विभीषण को गद्दी पर बैठाया जाय, अनेक परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न भावनाएँ प्राणियों के हृदय में उठती ही
हैं । उक्त कथा में उन्हीं का उल्लेख हुआ है ।
मर्मस्थान
अध्यात्मरामायण ( ६।११।५३ ) के अनुसार रावण की नाभि में अमृतकुण्ड था । विभीषण से यह
रहस्य जानकर राम ने आग्नेय बाण से उसे सुखाया था । आनन्दरामायण, रङ्गनाथरामायण आदि में भी इसका
उल्लेख है ।
कृत्तिवास के अनुसार तपस्या के पश्चात् ब्रह्मा ने कहा था कि तुम्हारे सिर एवं भुजाएँ कटने पर फिर
उत्पन्न हो जायेंगी और रावण को ब्रह्मास्त्र देकर कहा इसी ब्रह्मास्त्र से तुम्हारा मर्मस्थान भेदित होने पर ही मृत्यु
होगी । रावण ने उसे मन्दोदरी के रक्षण में दे रखा था । विभीषण ने यह रहस्य राम को बताया । हनुमान् ने
मन्दोदरी के पास ब्राह्मण वेष में जाकर कहा, जब तक ब्रह्मास्त्र तुम्हारे पास है रावण नहीं मर सकता है, किन्तु मुझे
शङ्का है कि विभीषण कहीं यह जान न ले । तुमने उसे कहाँ छिपा रखा है । मन्दोदरी ने कहा मैं सावधान
हूँ। मैंने उसे स्फटिक के खंभे में छिपा रखा है। हनुमान् ने लाठी से खंभा तोड़ दिया तथा ब्रह्मास्त्र राम के पास
ले गये ।
सेरीराम के अनुसार सीता ने हनुमान् से कहा था कि इसके पास एक मायावी खड्ग है। मन्दोदरी उसकी
पूजा करती है । हनुमान् ने जाकर मन्दोदरी से रावण की मृत्यु का समाचार सुनाया । वह शोकसन्तप्त हुई । हनुमान्
ने उससे लाभ उठाया और खड्ग लेकर राम को दे दिया ।
विहोरराम-कथा के अनुसार रावण का जीव मञ्जूषा में बन्द था । हनुमान् और लक्ष्मण ने मञ्जूषा
लेकर उसे मुक्त किया । रामकियेन के अनुसार रावण का जीव उसके गुरु के पास था। हनुमान् और अङ्गद उसे छल
से प्राप्त करते हैं ।
ब्रह्मचक्र के अनुसार लङ्का-दहन के पश्चात् रावण ने अपना हृदय किसी ऋषि के यहाँ सुरक्षित रखा
था । हनुमान् ने रावण का रूप धरकर उसे प्राप्त कर लिया ।
पद्मपुराण ( पातालखण्ड ११२ अध्याय ) के अनुसार अतिकाय और महाकाय गुप्तचर राम की सेना में
पकड़े गये । महानाटक तथा रामचरितमानस के अनुसार रावण के हृदय में सीता और सीता के हृदय में राम और
राम के हृदय में विश्व था । अतः रावण जब सिर कटते-कटते व्याकुल हो सीता को भूलता है, तब हृदय में बाण
मारकर राम रावण को मारते हैं ।
महाभारत ( ३।२७४ ) के अनुसार रावण ने राम और लक्ष्मण का रूप धारण करनेवाले बहुत से
मायामय योद्धाओं को उत्पन्न किया था । महाभारत ( ३।२७४।३१ ) के अनुसार ब्रह्मास्त्र से राम ने रावण को इस
प्रकार जलाया था कि उसका भस्म भी शेष नहीं रहा। किसी कथा के अनुसार मन्दोदरी रावण की चिता पर सती
हो गयी थी ।
अध्याय युद्धकाण्ड ५८३
आनन्दरामायण ( राज्यकाण्ड सर्ग २० ) के अनुसार रावण-वध के बहुत काल बाद तक अयोध्या में एक
आवाज सुनायी देती थी । उसका रहस्य वसिष्ठ ने बतलाया था । रावण ने जिस शरीर से बार-बार ब्रह्म-हत्या की
थी, वह शरीर आज भी जल रहा है । हनुमान् उसमें सौ भार काष्ठ रोज डालते हैं । रावण ने राम से एक वर माँगा
था । जिससे लोग उसे सदा स्मरण करते रहें । राम ने कहा तुम्हारे शरीर को जलानेवाली अग्नि की आवाज सप्त
द्वीपों के लोगों को सुनायी पड़ेगी ।
सेरीराम के अनुसार राम द्वारा पराजित तथा आहत रावण रण-भूमि में जीवित ही पड़ा था । अग्नि-
परीक्षा के बाद राम अपने भाइयों के साथ मिलने जाते हैं और बात चीत भी करते हैं ।
यह भी प्रसिद्ध कथा है कि राम ने लक्ष्मण को नीति सीखने के लिए रावण के पास भेजा था । पहले
रावण बोला ही नहीं, लक्ष्मण लौट आये । राम ने लक्ष्मण से नम्रता से पूछने के लिए कहा । जब लक्ष्मण ने नम्रता से
पूछा तब उसने कहा कि मनुष्य को चाहिये कि वह जो करना चाहता है कर ले, समय न टाले । मैंने सोचा था मृत्यु
को नष्ट कर दूँ पर आज-कल करता रह गया । आज मैं मृत्यु का शिकार हो रहा हूँ । मैंने सोचा था स्वर्गधाम के लिए
सीढ़ी बना दूँगा जिससे लोग बिना श्रम वहाँ पहुँच जायें पर वह भी संकल्प टलता ही गया, पूरा न हो सका ।
कहा जाता है कि रामेश्वरलिङ्ग-स्थापना के लिए सीता की अपेक्षा थी । सीता लङ्का में थी । ऋषियों
की सम्मति से राम ने रावण को रामेश्वरलिङ्ग-प्रतिष्ठा कराने को बुलाया था । रावण ने सोचा बिना सीता के अकेले
राम कैसे प्रतिष्ठा कार्य सम्पन्न करेंगे ? तदर्थ वह त्रिजटा के साथ पुष्पक यान पर सीता को ले गया और राम के
दक्षिणाङ्क में बैठा कर प्रतिष्ठा करायी फिर सीता को पुष्पक में बैठाया । राम ने दक्षिणा के लिए प्रार्थना की तो
उसने कहा कि आप क्या दे सकते हैं । तुम्हारी अयोध्या मिट्टी की है और मेरी लङ्का सोने की है, तुम्हारे नगर में
सरयू नदी है, हमारे यहाँ समुद्र है । तुम्हारे पुत्र पिता दोनों नहीं हैं; मेरे आगे पीछे अनेक पीढ़ियाँ हैं । अतः यही
दक्षिणा दो कि मेरा तुम से वैर बढ़ता ही जाय । तुम्हारे स्वरूप, ऐश्वर्य तथा माधुर्य के प्रभाव से घटे नहीं ।
मुक्ति
अध्यात्मरामायण ( ६।११।७८ ) के अनुसार रावण की ज्योति राम के रूप में मिल गयी थी ।
विष्णुपुराण के अनुसार सनकादि के शाप से जय और विजय को तीन जन्म तक असुर योनि में जन्म लेना पड़ता
है । हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु, रावण और कुम्भकर्ण के रूप से मुक्त न होकर वे शिशुपाल और दन्तवक्त्र के रूप
में कृष्ण के हाथ मरकर मुक्ति पाते हैं ।
अग्नि-परीक्षा का विवेचन पीछे हो चुका है। पउमचरियं के अनुसार अग्नि-परीक्षा के लिए तीन सौ हाथ
गहरा अग्निकुण्ड बनाकर उसमें अग्नि प्रज्वलित की गयी । सीता ने सतीत्व की शपथ लेकर उसमें प्रवेश किया । सीता
के प्रवेश करते ही अग्निकुण्ड अपने आप स्वच्छ जल से भर गया । धीरे-धीरे उमड़ कर वह सर्वत्र फैलने लगा । जनता
की प्रार्थना पर सीता उसे सीमित कर देती है । सबने देखा कि बावड़ी के मध्य सहस्रदल कमल पर सीता विराज-
मान हैं । राम ने सीता से क्षमा याचना कर अयोध्या चलने को कहा पर सीता सब छोड़ कर विरक्त हो गयीं । यहाँ
जैनों की साम्प्रदायिकता की दृष्टि से सीता ने जैन दीक्षा ले ली । जो सर्वथा मिथ्या है ।
कथासरित्सागर के अनुसार सीता टिट्टिभ सरोवर के तट पर जाकर सतीत्व की शपथ लेकर जल में प्रवेश
करती है । पृथ्वी देवी प्रकट होकर उसे गोद में लेकर सरोवर के उस पार पहुँचा देती हैं । कही केवल मायासीता का
ही अग्नि में प्रवेश माना गया है ।
बुल्के इन सब कथाओं को विकास, कल्पना या परिवर्धन नाम देकर अवास्तविक कहते हैं । परन्तु यह भूल
है कारण वाल्मीकिरामायण के समान ही पुराणों की परम्पराओं का भी प्रामाण्य मान्य है । अतः वाल्मीकिरामायण
५८४ रामायणमीमांसा अष्टादश
में अनुक्त अविरुद्ध अंश का समन्वय और विरुद्ध अंश का कल्पभेद से समाधान करना उचित है। तुलसीदास का भी
यही विचार है । अवश्य कई कथाओं में सीता का महत्त्व वर्णन की दृष्टि से विविध परीक्षाएँ वर्णित हैं ।
भोजपुरी ग्रामगीत के अनुसार सीता ने अग्नि को हाथ में लिया वह ठंडी हो गयी । सूर्य को हाथ में लिया
वह भी लुस हो गया । सर्प को हाथ में लिया वह फन फैलाकर बैठ गया । गङ्गा को हाथ में लिया वह सूख गयी ।
सब का तात्पर्य सीता की परम पवित्रता के प्रतिपादन में ही है ।
अयोध्या-प्रत्यावर्त्तन
वाल्मीकिरामायण में अयोध्या-प्रत्यावर्तन के पहले ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओं के द्वारा राम की स्तुति,
इन्द्र का वरदान, दशरथ का आगमन, शिवजी द्वारा स्तुति आदि वर्णित है । परन्तु बुल्के उन सब को प्रक्षिप्त मानते हैं,
क्योंकि उन सर्गों में राम को परब्रह्म परविष्णु रूप कहा गया है । सीता को भी साक्षात् लक्ष्मी कहा गया है ।
६०४ अनु०, वाल्मीकिरामायण के अनुसार विभीषण आतिथ्य ग्रहण की प्रार्थना करते हैं पर राम उनका
संमान करते हुए भरत का चिन्तन कर के अयोध्या-यात्रा की अनुमति माँगते हैं। विभीषण द्वारा उपस्थित पुष्पक द्वारा
चलते हुए सीता को संबोधित करके तत्तत् स्थानों में घटित वृत्तान्तों का वर्णन करते हैं । भरद्वाज आश्रम पहुँचकर
अयोध्या का वृत्तान्त जानकर हनुमान् को गुह एवं भरत के पास भेज देते हैं । जनता भरत के साथ नन्दिग्राम में
सबका स्वागत करती है। किन्तु पउमचरियं आदि जैन कथाओं के अनुसार राम और लक्ष्मण लङ्का के राजमहल में
६ वर्ष बिताते हैं । वहाँ राम और लक्ष्मण की बहुत पत्नियां भी होती हैं । नारद के द्वारा वर्णित अपराजिता
( कौशल्या ) की दीन दशा सुनकर राम साकेत की यात्रा करते हैं । किन्तु यह सब वाल्मीकिरामायण का ही विकृत
रूप है । रामकियेन की युद्धसम्बन्धी अन्य कथाएँ पूर्व में ही दी गयी हैं ।
वाल्मीकिरामायण (६।१२३।२३-३८) में सीता के अनुरोध से तारा आदि वानरियां भी पुष्पक पर बैठ-
कर अयोध्या जाती हैं। अध्यात्मरामायण (६।१४।८) तथा आनन्दरामायण (१।१२।५६) में भी उक्त वृत्तान्त
उल्लिखित है । वाल्मीकिरामायण तथा आनन्दरामायण (१।१२।४४) में कृतज्ञ सीता त्रिजटा और सरमा दोनों को
अपने साथ अयोध्या ले जाती हैं । परन्तु बुल्के का यह कहना कि आदिरामायण पुष्पक के सम्बन्ध में मौन है । पूर्व
में खण्डित कर दिया गया है । जैसे वानरों को किसी फोड़े की चिकित्सा की छूट देने से घाव भरने की अपेक्षा बढ़ेगा
ही उसी तरह दुरभिसन्धिपूर्वक शुष्क निःसार तर्कों के आधार पर पाश्चात्यों को भारतीय ग्रन्थों की छानबीन करने
की छूट देने पर कोई भी ग्रन्थ सुरक्षित नहीं रह सकता । वाल्मीकिरामायण के अनेकों सर्गों में पुष्पक की चर्चा होने
पर भी वे आसानी से उसे अपनी धारणामात्र के आधार पर प्रक्षेप कह देते हैं ।
खोतानीरामायण के अनुसार समुद्र पार करते ही सेतु को नष्ट कर दिया गया था, जिससे रामसेना का
कोई भी योद्धा युद्ध छोड़कर भाग न जाय । यह वाल्मीकिरामायण आदि के विरुद्ध होने से अग्राह्य ही है। रावण-
वध के बाद सेतुभङ्ग की वात अनेक रामायणों से सङ्गत है । स्कन्दपुराण (सेतुमाहात्म्य अ० ३०), आनन्दरामायण
(१।१२।४८), पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड ३५।१३५) आदि में रावणवध के बहुत काल बाद राम की लङ्का यात्रा के समय
सेतुभङ्ग का वर्णन है ।
लङ्का की सुरक्षा की दृष्टि
जिज्ञासादृष्टि से बहुत से लोग लङ्का-यात्रा कर सकते थे और राक्षस उन्हें प्रतिबन्ध होने पर भी खा सकते
थे, अतः विभीषण की प्रार्थना से तथा कृत्तिवास के अनुसार समुद्र की प्रार्थना से सेतुभङ्ग किया गया था ।
अध्याय युद्धकाण्ड ५८५
बुल्के कहते हैं कि यथार्थवादी वाल्मीकि के अनुसार भरद्वाज आश्रम में पहुँचकर हनुमान् को इसलिए भरत
के पास भेज दिया था कि वह राम के प्रति भरत की परीक्षा ले लें, क्योंकि यह सर्वथा सम्भव था कि राज्य करते
करते भरत का मन बदल गया हो—
“कस्य नावत्तंयेन्मनः” (वा० रा० ६।१२५।१६), यदि वास्तव में भरत राज्य चाहते हैं तो राम उनका
विरोध नहीं करना चाहेंगे। “प्रशास्तु वसुधां सर्वाम्” (वा० रा० ६।१२५।१७) पर राम की आशङ्का निर्मूल सिद्ध
हुई। राम का आगमन सुनकर भरत आनन्दित हो उठे।
मैंने पहले ही लिखा है कि सम्पूर्ण ही वाल्मीकिरामायण का यथार्थवादी दृष्टिकोण है। कौशल्या, दशरथ,
सीता, राम, लक्ष्मण आदि सभी के जिस समय अनुकूल या प्रतिकूल जैसे भी भाव उद्भूत हुए हैं, महर्षि वाल्मीकि ने
उनका वैसा ही वर्णन किया है। इसी लिए यह आदिकाव्य होता हुआ आर्ष इतिहास भी है। सीताचरित्र की शुद्धि
के सम्पादन में यथार्थवादी दृष्टिकोण का अत्यन्त महत्त्व था। अवधवासियों को इस यथार्थवाद से स्थालीपुलाकन्याय
से सीताचरित्र की शुद्धि पर उसी दृष्टि से विश्वास करना स्वाभाविक हो गया था। दशरथ द्वारा राज्याभिषेक के पूर्व
राम को शिक्षा देते समय भरत के चित्त के सम्बन्ध में शङ्का प्रकट करना तथा ननिहाल से लौटे हुए भरत से
कौशल्या का प्रथम कुछ रोषपूर्ण व्यवहार तथा अरण्य में लक्ष्मण के प्रति सीता की कटूक्तियाँ भावुकों के हृदयों को
प्रतिकूल लगती हैं। परन्तु सत्य घटना होने के कारण महर्षि वाल्मीकि ने उनका स्पष्ट वर्णन कर दिया। ऐसे ही
यदि रावण के प्रति सीता के मन में भी कोई आकर्षण होता या किसी प्रकार की चारित्रिक त्रुटि होती तो महर्षि ने
अवश्य ही उसका निःसंकोच वर्णन किया होता। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि राम को भरत की भक्ति एवं
सद्भावना में विश्वास नहीं था। अवश्य ही भरत की भक्ति में पूर्ण विश्वास रखते हुए भी राज्य एवं राजनीति की
दृष्टि से वैसा व्यवहार अत्यन्त सङ्गत है। “विश्वस्ते नातिविश्वसेत्” के अनुसार विश्वस्त के प्रति देश, काल और
परिस्थिति वश भावजिज्ञासा उचित ही है। किन्तु बुल्के तो यथार्थवादी दृष्टिकोण का दुरुपयोग करके रामायण में
तात्पर्यविधया वर्णित राम की ब्रह्मरूपता को ही यथार्थ न मानकर काल्पनिक मानने लगते हैं। पर क्या इस यथार्थ-
वादी दृष्टि से बाइबिल की चमत्कार की अनेक घटनाएँ अप्रामाणिक नहीं सिद्ध होंगी ?
उदात्तराघव आदि अनेक नाटकों में राक्षसों के अनेक छलों का वर्णन है। एक राक्षस वसिष्ठ-शिष्य का
रूप धारण कर भरत के पास आकर कहता है कि मैंने सुना है कि लक्ष्मण युद्ध में मारे गये हैं। दूसरा राक्षस नारद
के रूप में आकर कहता है कि राम का देहान्त हो गया है। सीता अकेले ही अयोध्या आ गयी। एक राक्षसी सीता
का रूप धारण करके पति एवं देवर की मृत्यु का समाचार सुनाती है। यह सुनकर भरत सरयू में शरीर त्यागने को
प्रस्तुत होते हैं। किन्तु हनुमान् समय से पहुँचकर भरत को सही समाचार देकर वैसा करने से रोक देते हैं। एक
राक्षस सुमन्त्र के रूप में राम को समाचार देता है कि भरत मरणासन्न हैं। जानकीपरिणय में छद्मवेशी शूर्पणखा
अयोध्या में राम के देहान्त का मिथ्या समाचार फैलाती है।
बुल्के कहते हैं—युद्धकाण्ड के अन्तिम सर्ग में वाल्मीकि ने अपने काव्य का निर्वहण किया।
भरत ने राज्य लौटाते हुए कहा कि मैं चोरों आदि के कारण दुःसह राज्यभार सँभालने में
असमर्थ हूँ—
“किशोरवद् गुरुं भारं न वोढुमहमुत्सहे।
वारिवेगेन महता भिन्नः सेतुरिव क्षरन्॥
दुर्बन्धनमिदं मन्ये राज्यच्छिद्रमसंवृतम् ।” (वा० रा० ६।१२८।३,४)
७४
५८६ रामायणमीमांसा अष्टादश
जैसे बलवान् एकाकी वृषभ द्वारा न्यस्त गुरु भार को किशोर नहीं वहन कर सकता, जैसे महान् वारिवेग
से दरार पड़ने के कारण क्षरण करता हुआ भिन्न सेतु (टूटा बाँध) दुर्बन्धन होता है (कठिनाई से बाँधा जाता है)
उसी प्रकार चोर आदि के कारण असंवृत राज्यच्छिद्र का संवरण करना कठिन है। परन्तु यह भरत का अनौद्धत्यमात्र
है, जो बुल्के की समझ के बाहर है।
अनन्तर राम पहले ब्राह्मणों को तथा बाद में विभीषण, सुग्रीवादि वानरों को विविध सम्मान देकर
निष्कण्टक राज्य करने लगे। राम ने लक्ष्मण को युवराज बनाना चाहा, किन्तु लक्ष्मण ने अस्वीकार किया, जिससे
भरत युवराज बनाये गये। राम १०००० वर्ष तक राज्य करते रहे। उन्होंने अन्यान्य यज्ञों के अतिरिक्त अपने पुत्रों के
साथ दस बार अश्वमेधयज्ञ सम्पन्न किया था। रामराज्य के गुणगान तथा रामायण की फलश्रुति पर वाल्मीकिकृत
आदिकाव्य समाप्त हो जाता है। परन्तु इस प्रसङ्ग में भी समझ लेना चाहिये कि बालकाण्ड में तथा उत्तरकाण्ड में
सोत्तर आदिकाव्य का वर्णन है। अतः आदिकाव्य की पूर्ण समाप्ति उत्तरकाण्ड की समाप्ति पर ही है।
बुल्के कहते हैं कि "उत्तरकाण्ड (सर्ग ३७-४०) में रामाभिषेक के लिए आमन्त्रित राजाओं तथा
सुग्रीव, विभीषण, हनुमान् आदि की बिदाई का पुनः वर्णन है।" परन्तु उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
वाल्मीकिरामायण ही नहीं किन्तु गीतादि ग्रन्थों में भी अध्याय के अन्त में भावी अध्याय का सूत्ररूप में वर्णन
किया जाता है। अगले अध्याय में उसकी विस्तृत व्याख्या की जाती है। अन्य काव्यों में भी यह पद्धति अपनायी
गयी है।
गीता के ११ वें अध्याय के अन्त में "मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः" की व्याख्या १२ वें
अध्याय में है।
आनन्दरामायण (१।१२।८४) के अनुसार राम भरत का आलिङ्गन करने के पश्चात् बहुत से रूप धारण
कर एक ही समय सबों से मिले थे। तुलसीदासजी ने भी कहा है—
"छन महँ मिले सबन्हि भगवाना। उमा मरम यह काहु न जाना।।" (रा० मा० ७।५।४)
रामकियेन (अध्याय २६) के अनुसार समुद्र पार करने के पश्चात् राम-सेना ने लङ्का के निकट पहुँचकर
मायावन देखा था। राम-सेना को आकर्षित करने तथा भूमि को नीचे खींच लेने के उद्देश्य से भानुराज ने
मायावन अपने सिर पर धारण किया था। हनुमान् ने उसकी माया जानकर भूमि में प्रवेश किया तथा उसे
मार डाला।
हरिवंश (२।५७), विष्णुपुराण (५।३३) तथा कृत्तिवासरामायण (५।४७) के अनुसार भस्मलोचन
नामक राक्षस की दृष्टि जिसपर पड़ती थी वह उसी क्षण भस्मीभूत हो जाता था। इस कारण भस्मलोचन प्रायः अपनी
आँखों को चमड़े के परदे से ढके रखता था। जब रामसेना समुद्र पारकर लङ्का की ओर बढ़ रही थी तब रावण ने
उसके विरुद्ध भस्मलोचन को भेज दिया। विभीषण के परामर्श से राम ने ब्रह्मास्त्र छोड़कर उसके सामने असंख्य दर्पण
रख दिये जिनपर दृष्टि डालकर उसने स्वयं को देखकर अपने आपको ही जला लिया।
सेरीराम के अनुसार वीलावीस, जो रावण-पुत्र था, से राम की सेना को नष्ट करने के लिए कहा गया।
वह दृष्टि से विनाश कर देता था। विभीषण के परामर्श से एक विस्तृत दर्पण पूँछ में बाँधकर हनुमान् ने उसके सामने
रखा, जिसमें वह अपना प्रतिबिम्ब निहार कर मर गया।
रामकियेन (अध्याय ३१) के अनुसार सहस्रतेज नाम का राक्षस अपनी गदा के अग्रभाग से जिसकी
ओर इशारा करता था वह नष्ट हो जाता था। हनुमान् अपने को वाली का दास कहकर उसके विश्वासपात्र बनकर
उसकी गदा प्राप्त कर लेते हैं और उसी से सहस्रतेज के सहस्र सिरों को काटकर राम के पास आ जाते हैं। सांग
अध्याय युद्धकाण्ड ५८७
आदित्य के पास मायावी दर्पण था, जिसपर उस दर्पण का प्रतिबिम्बित प्रकाश पड़ता था वह तुरन्त मर जाता था ।
वह दर्पण ब्रह्मा के संरक्षण में था। रावण ने सांग आदित्य को राम की सेना का संहार करने के लिए नियुक्त किया ।
अङ्गद सांग आदित्य के राज्यपाल का रूप धारणकर ब्रह्मा से वह दर्पण प्राप्त कर लेते हैं। इस तरह वह दर्पण से
वंचित होकर राम के द्वारा मारा जाता है। सद्धासुर युद्ध करते समय देवताओं के आयुध अपने पास बुला सकता था ।
हनुमान् ने वानरों को यह आदेश दिया कि वे बादलों में छिपकर देवताओं द्वारा भेजे गये आयुधों को बीच में ही छीन
लें। तब हनुमान् ने युद्ध के लिए सद्धासुर को ललकारा। सद्धासुर ने देवताओं से आयुध मँगाये। वानरों ने बीच में
ही छीन लिये, जिससे हनुमान् ने उसे मार डाला ।
एक अदृश्य घोड़े पर चढ़कर अदृश्य होकर विरु'चंबंग युद्ध करता था। राम ने उसके अदृश्य घोड़े को
मार दिया, किन्तु वह राक्षस माया करके भाग गया। वहाँ उसकी एक वानरी से भेंट हुई, उसने उसे समुद्रफेन
में छिपने का परामर्श दिया। वह वानरी एक शापित अप्सरा थी जो विरु'चंबंग की खोज में हनुमान् की सहायता
करने के पश्चात् शाप से मुक्ति पानेवाली थी। उस अप्सरा की सहायता से हनुमान् ने उसका वध किया ।
रावणचरित के अनुसार मैरावण ने रावण से कहा- मैं राम और लक्ष्मण को पाताल-लङ्का ले जाकर दुर्गा
को बलि चढ़ाऊँगा। विभीषण ने वानरों को सावधान कर दिया। हनुमान् अपने विशाल रूप से सेना की रक्षा करने
लगे, पर मैरावण पहले दो गुप्तचरों को भेज कर मायाविभीषण के रूप में सेना में जाकर मायाचूर्ण के प्रभाव से वानरों
को सुला देता है एवं राम और लक्ष्मण को पेटिका में बन्द कर पाताल चला जाता है। हनुमान् सूक्ष्मरूप से पद्मनाल
द्वारा जाकर द्वन्द्वयुद्ध में उसे मारकर राम और लक्ष्मण को ले आते हैं। मैरावण के प्राण राजधानी से दूर सात भृङ्गों
में निवास करते थे। दुर्बण्डी नाम की राक्षसी के संकेत से हनुमान् पहले उन्हें मारते हैं। बाद में मैरावण को मारकर
दुर्बण्डी के पुत्र नीलमेघ को मुक्त करते हैं। आनन्दरामायण (७।१४) के अनुसार शापवश अश्वनीकुमार मैरावण
और ऐरावण बने हुए थे। दोनों आकाश-मार्ग से हनुमान् की बढ़ायी हुई पूँछ की परिध को पारकर निद्रामग्न राम
और लक्ष्मण को ले जाते हैं। हनुमान् अपने पुत्र मकरध्वज से रहस्य जानकर कामाक्षा देवी के मन्दिर में सूक्ष्मरूप से
प्रवेश करते हैं। वह देवी की वाणी में आदेश देते हैं कि जीवित ही राम और लक्ष्मण देवी के सामने लाये जायें।
इस प्रकार राम और लक्ष्मण बन्धनमुक्त होकर १०० वार दोनों को मार डालते हैं पर वे दोनों पुनः पुनः जीवित हो
जाते हैं। अन्त में ऐरावण की भोगपत्नी राम उसे पत्नीरूप में स्वीकार करें इस शर्त पर बतलाती है कि मैरावण
और ऐरावण के शयनागार में जो भ्रमर रहते हैं वे ही अमृत लाकर दोनों को जिला देते हैं।
हनुमान् ने उसका प्रस्ताव इस शर्त पर स्वीकार किया कि यदि उसकी पलँग राम के भार से न टूट
जाय तो उसे पत्नीरूप में स्वीकार करेंगे। हनुमान् एक भ्रमर को छोड़कर सब को मार डालते हैं।
उस भ्रमर को आदेश देते हैं कि वह उसकी पलँग की लकड़ी को खोखला कर दे। अन्त में राम दोनों राक्षसों को
मार देते हैं तथा ऐरावण की भोगपत्नी को आश्वासन देते हैं कि वह तीसरे जन्म में कन्या कुमारी बनकर उनकी पत्नी
बनेगी। हनुमान् राम को तथा मकरध्वज लक्ष्मण को लङ्का पहुँचा देते हैं।
कृत्तिवास (६।७९-८७) के अनुसार महीरावण अष्टावक्र द्वारा शापित शक्रधनु गन्धर्व था। निकषा
के परामर्श से रावण ने उसे बुलाया था, किन्तु विभीषण ने पक्षी के रूप में दोनों की मन्त्रणा सुन ली और राम को
सावधान कर दिया। हनुमान् अपनी पूँछ बढ़ाकर चारों ओर से सेना की रक्षा करते हैं। राम ने आकाश में विष्णु-चक्र
रख दिया था। नल ने पाताल में माया का विस्तार किया। महीरावण ने क्रमशः दशरथ, कौशल्या और जनक के
रूप में आकर हनुमान् को धोखा देने का असफल प्रयास किया। अन्त में वह विभीषण के रूप में प्रवेश पाकर माया-
चूर्ण से राम और लक्ष्मण को निद्रामग्न करके दोनों को अपने भवन में ले गया।
१८८ रामायणमीमांसा अष्टादश
हनुमान् पाताल पहुँच कर किसी वृद्धा से राम और लक्ष्मण का वृत्तान्त जानकर मक्षिका-रूप धारण कर महल
में जाकर राम और लक्ष्मण को प्रणाम करते हैं। बाद में हनुमान् महामाया-मन्दिर में देवी को राम का समाचार
सुनाते हैं। देवी राम और शिव की अभिन्नता का उल्लेख करती हुई महीरावण के वध का उपाय बताती है कि जब
राम और लक्ष्मण देवी के सामने उपस्थित किये जायें तो उनको महीरावण से कहना चाहिए कि हम साष्टाङ्ग प्रणाम
करना नहीं जानते, हमें करके बतलाइये । जब वह साष्टाङ्ग प्रणाम करे तब उसी समय उसे मार डालना चाहिये ।
देवी के इस निर्देश के अनुसार ही हनुमान् ने महीरावण का वध कर दिया । बाद में महीरावण की पत्नी भी युद्ध
में आती है। हनुमान् के पादप्रहार से उसके गर्भ से चार सिरवाले अहिरावण का जन्म हुआ । उसने तुरन्त हनुमान् का
मुकाबला किया तथा हनुमान् के हाथ मारा गया ।
सेरीराम के अनुसार रावण का पुत्र पातालमहरायन हनुमान् का रूप धारण कर वानर-सेना में प्रवेश
कर जाता है और राम को मायालेप से निद्रामग्न कर अपने घर ले जाता है। हनुमान् राम की खोज में पाताल
जाकर एक राजकुमारी से भेंट करते हैं। जो अपने पुत्र के स्नान के लिए जल ले जानेवाली थी । ज्योतिषियों ने कहा
था कि उसका पुत्र पाताल महरायन का उत्तराधिकारी होगा, अतः महरायन ने उसे राम के साथ ही मारने का
निश्चय कर दिया था । हनुमान् उसे राजा बनाने की प्रतिज्ञा करते हैं । वह हनुमान् को छिपकली के रूप में अपने
जलपात्र में छिपाकर किले के भीतर ले जाती है। फाटक पर हनुमान् अपने पुत्र तूगंग से द्वन्द्वयुद्ध कर उसकी सहायता
अस्वीकार करते हैं। पाताल महरायन को हराकर सोये हुए राम को लड़का ले जाते हैं। राम तभी जागते हैं जब
विभीषण उनके चेहरे पर के मायालेप को धो डालते हैं । अगले दिन राम रणभूमि में ही पातालमहरायन का
वध करते हैं ।
सेरीराम के शेलावेर पाठ के अनुसार पाताल महरायन पहले दो सेनापतियों को भेजता है । बाद में वह
कीट का रूप धारण कर हनुमान् का शरीर पार कर जाता है तथा क्रमशः सुग्रीव, जाम्बवान् और विभीषण के वेश
में वह सेना में घुसने का असफल प्रयास करता है। रात के पिछले पहर में वह राम को पद्मनाल के मार्ग से ले जाता
है । हनुमान् की जिससे भेंट होती है वह राजकुमारी अमीर अरब ( महरायन ) की बहन है । वह रावण का मामा
था जिसने भानजे को कैद कर रखा था ।
हनुमान् पक्षी का रूप धारण कर जलपात्र में छिप जाते हैं । अमीर अरब को मार कर भानजे को राजा
बनाते हैं ।
रामकियेन के अनुसार मैयरब को सहमालिबन का पोता माना गया है । उसके गुरू सुमेध ने उसका जीव
मक्खी के रूप में त्रिकूट पर्वत पर छिपाया था । वह मायाचूर्ण से वानरों को सुला देता है । राम को हनुमान् के मुख से
निकालकर पाताल ले जाता है। हनुमान् वहाँ जाकर अपने पुत्र मच्छानु तथा बाद में बिरक्वन नामक मैयरब की
बहन से भेंट करते हैं । बिरक्वन को आदेश मिला कि वह एक हण्डा जल से भर दे; उसमें उसका पुत्र उबाला
जायगा । बिरक्वन हनुमान् को पद्मतन्तु के रूप में अपने दुपट्टे में छिपाकर ले जाती है । तथा मैयरब के वध की
युक्ति बताती है । हनुमान् राम के साथ लौटने के पहले बिरक्वन के पुत्र वैयविक को राजा तथा मच्छानु को युवराज
नियुक्त करते हैं ।
बुल्के इसी तरह की अनेक कथाओं का संकलन कर राम-कथा का परिवर्तन, परिवर्धन, विकास या
कल्पना सिद्ध करना चाहते हैं। उनकी दृष्टि में प्रचलित वाल्मीकिरामायण भी परिवर्धित, विकसित तथा कल्पित
कथाओं से पूर्ण है । उनकी तथाकथित आदिरामायण का कोई व्यावहारिक रूप उपलब्ध नहीं है । उनकी कल्पना ही
उसका आधार है। इसी तरह कुछ लोगों की दृष्टि में उनकी आदिरामायण में भी बहुत अंश कल्पित कहे जा सकेंगे ।
अध्याय युद्धकाण्ड ५८९
परिणामस्वरूप सम्पूर्ण रामायण के प्रति अनास्था और अविश्वास ही उत्पन्न होगा। यह सब ईसाइयत के प्रचार की
भूमिका है। यही बुल्के का उद्देश्य है। वस्तुतः अनादि अपौरुषेय मन्त्र, ब्राह्मण और उपनिषद् रूप वेद परम प्रमाण
हैं। वही रामकथा का मूल है। वाल्मीकिरामायण द्वारा उसी का उपबृंहण होता है। शतकोटिप्रविस्तर रामायण,
पुराण आदि राम-कथा के भिन्न-भिन्न प्रस्थान हैं। कल्पभेद से उनमें कुछ विलक्षणताएँ भी होती हैं। अन्य अर्वाचीन
भारतीय एवं अभारतीय रामायणों के वही स्रोत हैं। देश और काल के व्यवधान से उनमें वाल्मीकिरामायण
के विरुद्ध विकृतियाँ भी आ गयी हैं। रामकियेन आदि का तो अधिकांश भाग वाल्मीकिरामायण पर ही निर्भर है।
कुछ अंशों में विकृतियाँ भी हैं। राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान् आदि का आदर्श वैदिक धर्म की मर्यादाओं के अनुरूप
ही है।
एकोनविंश अध्याय
उत्तरकाण्ड
बुल्के उत्तरकाण्ड, जो उनकी दृष्टि में प्रक्षेप है, में रावणचरित को प्रक्षेप मानते हैं । रामचरित से अलग
रावण के विषय में स्वतन्त्र काव्य का कहीं निर्देश नहीं है । वैदिक साहित्य में रावण, कुबेर, विश्रवा, वैश्रवण आदि का
संकेत नहीं किया गया है ।
पाली जातकट्ठवण्णना में बेस्सवण ( यक्षों के राजा ) का बहुत स्थलों पर उल्लेख है; रावण का कहीं भी
उल्लेख नहीं है, किन्तु धनेश, कुबेर, वैश्रवण आदि का उल्लेख स्वतन्त्ररूप से बहुत स्थलों पर किया गया है ।
इससे यह अनुमान दृढ़ हो जाता है कि वैश्रवण अथवा कुबेर रावण-कथा से पूर्व ही प्रसिद्ध हो चुके थे ।
बाद में ही रावण के साथ उनका सम्बन्ध स्थापित किया गया है । पर बुल्के का उक्त कथन निस्सार एवं
निराधार ही है । वैदिक साहित्य में कुबेर, वैश्रवण नाम हैं तो वैदिक साहित्य में राम, दशरथ, जनक आदि के नाम
भी हैं ही । रावण का नाम भी रामतापनीय आदि उपनिषदों में है ही । अथर्ववेद में दशशीर्ष ब्राह्मण का भी स्पष्ट
उल्लेख है । उपनिषद् भी वैदिक साहित्य ही हैं । रावण भी विश्रवा का पुत्र है, यह रामायण से सिद्ध ही है । रामायण
वेद का ही उपबृंहण है । वेद का विवरण धर्मशास्त्र, पुराण, रामायण आदि द्वारा ही होता है । शिखा और यज्ञोपवीत
का नाममात्र वेदमन्त्रों में है । परन्तु शिखा कहाँ हो, यज्ञोपवीत कैसे बने और कहाँ पहना जाय, इसका स्पष्ट
निरूपण धर्मशास्त्रों से ही होता है । इसी तरह वैश्रवण, कुबेर कौन हैं ? विश्रवा कौन हैं ? उनके पिता कौन हैं ? पत्नी
कौन है ? वैश्रवण के कितने भाई थे ? इन सब बातों का परिज्ञान इतिहास-पुराणों से ही होता है । तत्तद्वैदिक
शाखाओं में प्रवक्ता कौन हैं ? गोत्र क्या है ? वेदाधिकारी कौन होते हैं ? इत्यादि सब बातों का पूरा परिज्ञान इतिहास-
पुराण से ही संभव है । अन्यथा मिथ्या सम्बन्ध कल्पना किसने की ? किसने देखा ? इत्यादि बातों का उत्तर देना
बुल्के के लिए मुश्किल हो जायगा ।
बुल्के यह भी कहते हैं कि रावण के नाम से बहुत सी अर्वाचीन रचनाओं का उल्लेख मिलता है—
अर्कप्रकाश ( वैद्यक ), कुमारतन्त्र, इन्द्रजाल ( उड्डीश ), प्राकृतकामधेनु, प्राकृतलङ्केश्वर, ऋग्वेदभाष्य, रावणभेट
आदि । बलरामदास के रामायण में माना गया है कि रावण ने वैदिक मन्त्रों का सम्पादन कर वेदों की एक नयी
शाखा चलायी थी । बुल्के का यह भी कथन निस्सार है कि वे अपने मतानुसार ही इन ग्रन्थों को अर्वाचीन
कहते हैं । उनके अनुसार तो वेद भी, जो लाखों वर्ष पुराने ही नहीं, किन्तु अनादि हैं, रावण की अपेक्षा अर्वाचीन ही
ठहरेंगे, क्योंकि पाश्चात्य ई० पू० दो या तीन हजार वर्ष की ही वेदरचना मानते हैं । परन्तु यह मत असङ्गत है,
क्योंकि वेद नित्य, अनादि और अपौरुषेय हैं । ( देखिये वेद की अपौरुषेयता ) । वेद के साथ ही वेदाङ्ग भी होते हैं ।
किसी को क्या आवश्यकता पड़ी है कि जो स्वयं ऋग्भाष्य लिखकर उसे रावण के नाम से प्रसिद्ध करे । वेदों की कोई
नई शाखा मान्य नहीं होती है, अतः रावणनिर्मित वेदशाखा सर्वथा अप्रामाणिक है ।
वाल्मीकिरामायण के अनुसार रामाभिषेक के बाद तपस्वी लोग राम का अभिनन्दन करने आये थे ।
इसी अवसर पर अगस्त्य ने राक्षसवंश का इतिहास सुनाया था । महाभारत में रावणचरितवर्णन रामोपाख्यान के
प्रारम्भ में है । पउमचरियं राक्षस तथा वानरों के वंश के इतिहास से प्रारम्भ होता है ।