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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 664

अध्याय युद्धकाण्ड ५८७
आदित्य के पास मायावी दर्पण था, जिसपर उस दर्पण का प्रतिबिम्बित प्रकाश पड़ता था वह तुरन्त मर जाता था ।
वह दर्पण ब्रह्मा के संरक्षण में था। रावण ने सांग आदित्य को राम की सेना का संहार करने के लिए नियुक्त किया ।
अङ्गद सांग आदित्य के राज्यपाल का रूप धारणकर ब्रह्मा से वह दर्पण प्राप्त कर लेते हैं। इस तरह वह दर्पण से
वंचित होकर राम के द्वारा मारा जाता है। सद्धासुर युद्ध करते समय देवताओं के आयुध अपने पास बुला सकता था ।
हनुमान् ने वानरों को यह आदेश दिया कि वे बादलों में छिपकर देवताओं द्वारा भेजे गये आयुधों को बीच में ही छीन
लें। तब हनुमान् ने युद्ध के लिए सद्धासुर को ललकारा। सद्धासुर ने देवताओं से आयुध मँगाये। वानरों ने बीच में
ही छीन लिये, जिससे हनुमान् ने उसे मार डाला ।
एक अदृश्य घोड़े पर चढ़कर अदृश्य होकर विरु'चंबंग युद्ध करता था। राम ने उसके अदृश्य घोड़े को
मार दिया, किन्तु वह राक्षस माया करके भाग गया। वहाँ उसकी एक वानरी से भेंट हुई, उसने उसे समुद्रफेन
में छिपने का परामर्श दिया। वह वानरी एक शापित अप्सरा थी जो विरु'चंबंग की खोज में हनुमान् की सहायता
करने के पश्चात् शाप से मुक्ति पानेवाली थी। उस अप्सरा की सहायता से हनुमान् ने उसका वध किया ।
रावणचरित के अनुसार मैरावण ने रावण से कहा- मैं राम और लक्ष्मण को पाताल-लङ्का ले जाकर दुर्गा
को बलि चढ़ाऊँगा। विभीषण ने वानरों को सावधान कर दिया। हनुमान् अपने विशाल रूप से सेना की रक्षा करने
लगे, पर मैरावण पहले दो गुप्तचरों को भेज कर मायाविभीषण के रूप में सेना में जाकर मायाचूर्ण के प्रभाव से वानरों
को सुला देता है एवं राम और लक्ष्मण को पेटिका में बन्द कर पाताल चला जाता है। हनुमान् सूक्ष्मरूप से पद्मनाल
द्वारा जाकर द्वन्द्वयुद्ध में उसे मारकर राम और लक्ष्मण को ले आते हैं। मैरावण के प्राण राजधानी से दूर सात भृङ्गों
में निवास करते थे। दुर्बण्डी नाम की राक्षसी के संकेत से हनुमान् पहले उन्हें मारते हैं। बाद में मैरावण को मारकर
दुर्बण्डी के पुत्र नीलमेघ को मुक्त करते हैं। आनन्दरामायण (७।१४) के अनुसार शापवश अश्वनीकुमार मैरावण
और ऐरावण बने हुए थे। दोनों आकाश-मार्ग से हनुमान् की बढ़ायी हुई पूँछ की परिध को पारकर निद्रामग्न राम
और लक्ष्मण को ले जाते हैं। हनुमान् अपने पुत्र मकरध्वज से रहस्य जानकर कामाक्षा देवी के मन्दिर में सूक्ष्मरूप से
प्रवेश करते हैं। वह देवी की वाणी में आदेश देते हैं कि जीवित ही राम और लक्ष्मण देवी के सामने लाये जायें।
इस प्रकार राम और लक्ष्मण बन्धनमुक्त होकर १०० वार दोनों को मार डालते हैं पर वे दोनों पुनः पुनः जीवित हो
जाते हैं। अन्त में ऐरावण की भोगपत्नी राम उसे पत्नीरूप में स्वीकार करें इस शर्त पर बतलाती है कि मैरावण
और ऐरावण के शयनागार में जो भ्रमर रहते हैं वे ही अमृत लाकर दोनों को जिला देते हैं।
हनुमान् ने उसका प्रस्ताव इस शर्त पर स्वीकार किया कि यदि उसकी पलँग राम के भार से न टूट
जाय तो उसे पत्नीरूप में स्वीकार करेंगे। हनुमान् एक भ्रमर को छोड़कर सब को मार डालते हैं।
उस भ्रमर को आदेश देते हैं कि वह उसकी पलँग की लकड़ी को खोखला कर दे। अन्त में राम दोनों राक्षसों को
मार देते हैं तथा ऐरावण की भोगपत्नी को आश्वासन देते हैं कि वह तीसरे जन्म में कन्या कुमारी बनकर उनकी पत्नी
बनेगी। हनुमान् राम को तथा मकरध्वज लक्ष्मण को लङ्का पहुँचा देते हैं।
कृत्तिवास (६।७९-८७) के अनुसार महीरावण अष्टावक्र द्वारा शापित शक्रधनु गन्धर्व था। निकषा
के परामर्श से रावण ने उसे बुलाया था, किन्तु विभीषण ने पक्षी के रूप में दोनों की मन्त्रणा सुन ली और राम को
सावधान कर दिया। हनुमान् अपनी पूँछ बढ़ाकर चारों ओर से सेना की रक्षा करते हैं। राम ने आकाश में विष्णु-चक्र
रख दिया था। नल ने पाताल में माया का विस्तार किया। महीरावण ने क्रमशः दशरथ, कौशल्या और जनक के
रूप में आकर हनुमान् को धोखा देने का असफल प्रयास किया। अन्त में वह विभीषण के रूप में प्रवेश पाकर माया-
चूर्ण से राम और लक्ष्मण को निद्रामग्न करके दोनों को अपने भवन में ले गया।