रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८० रामायणमीमांसा अष्टादश
शक्ति से लक्ष्मण को मारा। राम ने लक्ष्मण की छाती से शक्ति को निकाल कर तोड़ दिया। लक्ष्मण को हनुमान् आदि
वानरों की रक्षा में छोड़कर राम ने पुनः रावण को रणभूमि छोड़कर भागने को बाध्य कर दिया। हनुमान् ने
हिमालय से औषध लाकर लक्ष्मण को जिलाया।
महानाटक के अनुसार रावण की शक्ति को हनुमान् रोक लेते हैं। कहा जाता है कि रावण के अनुरोध
से नारद हरिकीर्तन द्वारा हनुमान् को प्रेमविभोर कर के रण से असावधान करते हैं। तब रावण लक्ष्मण को आहत
करने में समर्थ होता है।
पउमचरियं के अनुसार विशल्या द्रोणमेघ की कन्या थी, ओषधि नहीं। इसके स्नान जल से लक्ष्मण की
चिकित्सा हुई थी। अन्त में हनुमान् ने उससे विवाह किया था।
बुल्के ने मातलि-रथ के प्रसङ्ग को भी प्रक्षिप्त कहा है, क्योंकि रावण की पत्नियों ने रावण-वध के बाद
विलाप करते हुए कहा था कि जिसे देवता भी नहीं मार सके, वह एक पदाति मनुष्य द्वारा मारा गया—
“अवध्यो देवतानां यस्तथा दानवरक्षसाम् ।
हतः सोऽयं रणे शेते मानुषेण पादतिना ॥” (वा० रा० ११०।१५)
पर बुल्के यह नहीं समझते हैं कि—'बाहुल्येन व्यपदेशा भवन्ति ।'
बहुलता के अनुसार व्यवहार होता है। राम ने अधिकांश युद्ध पदाति ही किया था और अब भी राम की
सेना में कोई रथ नहीं था। राम पदाति ही थे। बीच में इन्द्रप्रेषित रथ और मातलि आया भी तो उन स्त्रियों को
ज्ञात न होगा। अतः आकुल-व्याकुल विलाप-प्रलाप और परिदेवन करती हुई नारियों के केवल 'पदातिना' एक संदि-
ग्धार्थ पद के आधार पर मातलिसम्बन्धी अनेकों असंदिग्ध सर्गों को प्रक्षेप कहना केवल दुराग्रह ही है। ठीक इससे
उल्टा यही कहा जा सकता है कि अनेक सर्गों और श्लोकों से विरुद्ध होने के कारण उस एक ही श्लोक को प्रक्षिप्त
मानना युक्त है। वस्तुतः तो पूर्वोक्त प्रकार से कोई भी प्रक्षिप्त नहीं, दोनों की सङ्गति ही है। १०२ वें सर्ग तक
मातलिरथ की चर्चा है। एक श्लोक के आधार पर महत्त्वपूर्ण इन सर्गों को प्रक्षेप कहना अत्यन्त असङ्गत है।
इस तरह बुल्के युद्ध के समय अगस्त्य द्वारा राम को उपदिष्ट आदित्यहृदय को भी प्रक्षिप्त ही कहते हैं।
यह भी प्रमाद ही है, कारण वह परम्पराप्राप्त एवं टीकाकारसम्मत है। आज तक लाखों पुरुषों के द्वारा अनुष्ठान रूप
में प्रतिदिन उसका पाठ किया जाता है।
सेरीराम के अनुसार रावण के रथ में १०० सिंह और १०० अश्व जुते हुए थे। लक्ष्मणचिकित्सा
सम्बन्धी अनेकविध कथाएँ सेरीराम, रामकियेन आदि में विस्तार से वर्णित है।
रावण के होम का आयोजन जानकर विभीषण राम को सावधान करता है कि इस यज्ञ के विध्वंस करने
की आवश्यकता है, नही तो रावण शिव के प्रसाद से अजेय हो जायगा।
वानर-भट हनुमान् के नेतृत्व में यज्ञस्थल पर पहुँच कर विघ्न करते हैं। परन्तु उसका ध्यान-भङ्ग करने में
असमर्थ होते हैं। तब अङ्गद हनुमान् की आज्ञा से मन्दोदरी के केशों को खींचकर उसे रावण के पास ले आता है।
तब रावण उत्तेजित होकर यज्ञ को अपूर्ण छोड़कर अङ्गद पर आक्रमण करता है।
पउमचरियं के अनुसार रावण बहुरूपिणी सिद्धि के लिए शान्तिनाथ के मन्दिर में आराधना करता है।
मन्दोदरी लङ्का के सभी नागरिकों से अहिंसा-पालन के लिए निवेदन करती है। विभीषण सुझाव देता है कि राम
जाकर रावण को मन्दिर से निकाल कर कैदी बना लें। किन्तु राम यह प्रस्ताव अस्वीकार करते हैं। वानरों का
एक दल ध्यानस्थ रावण को क्षुब्ध करने के उद्देश्य से लङ्का में प्रवेश करता है। अन्तःपुर की स्त्रियों का अपमान