सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

क्रमशः सीता और दशमुख बनते हैं । वाल्मीकिरामायण के आदर्श में और उक्त कथा में महान् अन्तर है । वाल्मीकि-
रामायण की वेदवती का रावण स्पर्श तक नहीं कर पाता, केशस्पर्श होने से भी वेदवती अपने हाथ को ही तलवार
बनाकर केशों को छिन्नकर देती है, किन्तु पउमचरियं के अनुसार रावण उससे बलात्कार करता है । इसमें रावण
और लक्ष्मण का पहले भी कई बार युद्ध होता है । इसमें जैसे मादा पशु के लिए दो पशु लड़ते हैं वैसे ही लक्ष्मण
और रावण लड़ते हैं । इसपर भी दोनों ही ग्रन्थ समानरूप में रखे जाते हैं, यह भी कम आश्चर्य नहीं है । जैनों के
अनुसार रावण एक धर्मभीरु जैनी ही है ।
असमिया बालकाण्ड के अनुसार भगवान् ने राम के रूप में अवतार लेने की प्रतिज्ञा की तो लक्ष्मी ने
पूछा मैं क्या करूँ ? उन्होंने कहा तुम जनक के यहाँ जन्म लो । लक्ष्मी पृथ्वी पर उतर कर एक पर्वत के शिखर पर
बैठ गयीं । रावण उन्हें देखकर मोहित हुआ । लक्ष्मी ने उसे डाँटा कि तुमको मारनेवाला जन्म ले चुका है । यह
कहकर वह सागर में कूदकर अन्तर्धान हो जाती है । तब सागर में एक सौ योजन का द्वीप ऊपर आया और लक्ष्मी
उसपर विराजमान रही । वसुमती ने आकर लक्ष्मी को आदरपूर्वक अपने गर्भ में धारण कर लिया । बाद में यज्ञ के
लिए लोगों ने हल जोतते समय पृथ्वी में एक डिम्ब पाया तथा उसे मिथिलानगर में ले गये । राजा जनक ने डिम्ब
को तोड़कर उसमें से एक कन्या निकाली ( अध्याय २३ ) ।
बुल्के कहते हैं, "रामायण की अलौकिक सीता-जन्मकथा का परिवर्धन किया जाना अत्यन्त स्वाभाविक
था । भूमि में पड़ी हुई कन्या आयी कहाँ से ? और वह रावण-नाश का कारण क्यों सिद्ध हुई । वेदवती की कथा में
इन प्रश्नों का उत्तर मिलता है । सीता-हरण के पूर्व ही सीता-रावण-सम्बन्ध का इस कथा में प्राचीनतम उल्लेख
मिलता है । बाद की कथाओं में यह सम्बन्ध अधिक निकट का हो जाता है । जनक द्वारा प्राप्त होने के पूर्व सीता का
किसी न किसी तरह लङ्का से सम्बन्ध स्थापित किया गया है", पर यह ठीक नहीं है, क्योंकि रामायण की सीता
की अलौकिक जन्मकथा निरपेक्ष ही है । भारतीय शास्त्रों की पद्धति से परिचित लोगों के लिए ईश्वर एवं उसकी
शक्तियाँ प्रयोजन के अनुसार कहीं भी प्रकट हो सकती हैं—
"हरि व्यापक सर्वत्र समाना । प्रेम तें प्रकट होहिं मैं जाना ॥" ( रा० मा० १।१८४।३ )
पाषाणस्तम्भ से नृसिंह का प्राकट्य होता है । मत्स्य, कूर्म, वराह रूपधारी भगवान् के प्राकट्य भी कुछ
ऐसे ही हैं । फिर भी कृषि की अधिष्ठात्री शक्तिविशिष्ट महालक्ष्मी का तो भूमि से प्रादुर्भूत होना अत्यन्त स्वाभाविक
ही था । एक ब्रह्मज्योति ही सीता-राम, राधा-कृष्ण, लक्ष्मी-नारायण, कामेश्वरी-कामेश्वर आदि दो रूपों में प्रकट
होती है । विष्णु और लक्ष्मी के समान ही राम और सीता का प्रादुर्भाव होना अनिवार्य है । राम के आविर्भाव का
हेतु बालकाण्ड में निर्दिष्ट रावण-वधादि ही है । वेदवती की कथा को भी नवीन बतलाना उसे प्रक्षेप कहने का ही
उपक्रम है । वाल्मीकिरामायण की दृष्टि से वह प्राचीन है । प्रसङ्गानुरूप ऋषियों ने उसे उत्तरकाण्ड में राम को
सुनाया था । सीता तथा लङ्का के सम्बन्ध का पुराणों में भी अनेक शापों के रूप में वर्णन है ।
बुल्के कहते हैं—"अनेक ग्रन्थों में सीता को रावणात्मजा कहा गया है । भारत, तिब्बत, खोतान,
हिन्दोनेशिया, श्याम और वसुदेवहिण्डि में यह कथा मिलती है । उसके अनुसार विद्याधर मय ने रावण के पास अपनी
पुत्री मन्दोदरी के विवाह का प्रस्ताव रखा था, लक्षणज्ञों ने कहा कि इसकी प्रथम सन्तान अपने कुलनाश का हेतु
बनेगी । पर रावण उसपर मोहित हो गया था, अतः प्रथम सन्तान के त्याग का निर्णय कर उसने उससे विवाह कर
लिया । मन्दोदरी को जब प्रथम पुत्री उत्पन्न हुई तो नाना रत्नों के साथ एक मञ्जूषा में रखकर उसे कहीं छोड़ देने
को कहा गया । मन्त्री ने उसे मिथिला में जनक के खेत में रख दिया । बाद में जनक से कहा गया कि यह बालिका
हल की रेखा से उत्पन्न हुई है । जनक ने उसे ग्रहण कर अपनी रानी को सौंप दिया । गुणभद्र के उत्तरपुराण की

निम्न कथा में इसका और वेदवतीकथा का समन्वय किया गया है । अलकापुरी के राजा अमितवेग की पुत्री राजकुमारी
मणिमती विन्ध्यगिरि पर विजयार्थ तप कर रही थी । रावण ने उसे प्राप्त करने का प्रयास किया । सिद्धि में विघ्न
उत्पन्न होने के कारण मणिमती ने क्रुद्ध होकर संकल्प किया कि मैं रावण की पुत्री बन कर उसके नाश का कारण
बनूँगी । फलस्वरूप वह मन्दोदरी के गर्भ से उत्पन्न हुई । उसका जन्म होते ही लङ्का में भूकम्प आदि अपशकुन हुए ।
यह देख ज्योतिषियों ने कहा यह कन्या रावण के नाश का कारण होगी । इसपर रावण ने मारीच को आदेश दिया
कि वह उसे किसी दूर देश में छोड़ दे । मन्दोदरी ने कन्या को द्रव्य तथा परिचयात्मक पत्र के साथ एक मञ्जूषा
में रख दिया, मारीच ने उसे मिथिला-भूमि में गाड़ दिया, जहाँ उसी दिन वह कृषकों द्वारा पायी गयी । वे उसे जनक
के पास ले गये । जनक ने मञ्जूषा खोलकर उससे कन्या को निकाल कर उसे अपनी पत्नी वसुधा को सौंप दिया ।
यह वृत्तान्त वेदवती की कथा पर ही आधारित है । सीता की धर्ममाता वसुधा होना भी यह सूचित करता है कि
रचयिता वाल्मीकि भी उस कथा से परिचित था जिसमें सीता को पृथ्वी की पुत्री कहा गया है । महाभागवत
देवीपुराण के अनुसार भी सीता मन्दोदरी से उत्पन्न हुई थी । बाद में वह पृथ्वी से आविर्भूत हुई है ।'' वस्तुतः
वसुदेवहिण्डि और उत्तरपुराण कोई आर्ष ग्रन्थ नहीं हैं । सीता और राम के सम्बन्ध में वाल्मीकिरामायण तथा अन्य
आर्ष पुराण ही प्रमाण हैं । महाभागवत, देवीपुराण अवश्य आर्ष ग्रन्थ हैं, परन्तु उनका वाल्मीकिरामायण से समन्वय
करके यही अर्थ समझना चाहिये कि तयोक्त मन्दोदरी-कन्या भी महालक्ष्मी के साथ सायुज्य को प्राप्त हो गयी । अत-
एव महालक्ष्मी की अवतारभूत सीता में उसका भी संनिवेश था ।
“सीता मन्दोदरीगर्भे संभूता चारुरूपिणी ।
क्षेत्रजा तनयाप्यस्य रावणस्य रघूत्तम ॥” ( महाभा० ४२।६२ )
मन्दोदरी के गर्भ से चारुरूपिणी कन्या आविर्भूत हुई । रावण की तो वह क्षेत्रजा ही कन्या थी, औरसी
नहीं । इस दृष्टि से श्रीदशरथ के यज्ञलब्धचरु के अंश से सीता के जन्म की बात भी संगत होती है । अन्यथा यदि सीता
मन्दोदरी की प्रथम सन्तान होती तो यह भी कहना होगा कि मेघनाद आदि सब उससे छोटे होंगे फिर इतनी कम
उम्र में उनकी विशिष्ट तपस्या तथा इन्द्रादि पर विजय कैसे संभव होती है ?
काश्मीरीरामायण की यह कथा कि ‘मन्दोदरी कन्या के गले में पत्थर बाँधकर उसे समुद्र में फेंक देती
है’ तथा अन्य कथा के अनुसार रावण द्वारा कन्या को मञ्जूषा में बन्द कर समुद्र में फेंक देने की कथा में
विकृति ही है ।
यह भी कथा वैसी ही है कि एक ब्राह्मण ने किसी बालिका के सम्बन्ध में रावण से कहा कि यह तुम्हारे
निधन का कारण बनेगी । यह सुनकर रावण ने उसपर कड़ा पहरा लगा दिया । जब वह कन्या केवल छः मास की
थी ऐसी भयङ्कर वर्षा हुई कि उसके पास के सभी व्यक्ति डूबकर मर गये । वह कन्या मञ्जूषा में होने के कारण जल-
प्रवाह के द्वारा सिंहलद्वीप पहुँच गयी । इसी कन्या ने उन राम से विवाह कर लिया जिनके द्वारा रावण का
वध हुआ ।
तिब्बती तथा खोतानी रामायणों में रावण की पुत्री जन्म-कुण्डली के अशुभ ग्रहों के कारण परित्यक्त की
जाती हैं एवं उसे एक पेटिका में रखकर जल में फेंक दिया जाता है । तिब्बती रामायण के अनुसार पेटिका खोलने-
वाला जनक के स्थान पर एक कृषक है । खोतानी रामायण के अनुसार एक ऋषि उसका भरण-पोषण करते हैं ।
सेरतकाण्ड में भी रावण-महिषी एक पुत्री को जन्म देती है, जो श्री का अवतार थी, पर उसे यह मालूम था कि यदि
उसकी सन्तान पुत्री हो तो रावण को उसमें अनुरक्ति होगी । इसी लिए वह उसे पेटी में बन्द कर समुद्र में फेंकवा
देती है । बाद में मंतिलीनिवासी कल नामक ऋषि उसको पाते और पालते हैं । उसका नाम सीता रखते हैं । बुल्के

को मंतिली से मिथिला का स्मरण होता है और यह कथा भी वाल्मीकि की सीता-कथा से मिलती है । सेरीराम के
पातानी पाठ के अनुसार मन्दोदरी की उस कन्या के मुख का तालू काला था, अतः लक्षणज्ञों ने उसे अशुभ कहा ।
वह समुद्र में फेंकी गयी । उसे मकर ने डूबने से बचाया । मकर की प्रार्थना से मरुतों ने उसे एक ऋषि की वाटिका
में एक पद्म पर रख दिया । ऋषि ने उसका पुत्री की तरह पालन किया । इस कथा पर पद्मजा सीता का प्रभाव पड़ा
है । कम्बोडिया के रामकेर्ति के अनुसार जनक यमुना के तीर पर यज्ञ के लिए हल चलाते हुए सीता को एक बेड़े पर
देखते हैं। उसे जनक ने पुत्री बनाया । श्याम के रामकियेन के अनुसार दशरथ-यज्ञ के चरुसम्बन्धी अष्टमांश को
खाकर मन्दोदरी ने एक कन्या उत्पन्न की, जो वास्तव में लक्ष्मी की अवतार थी । रावण विभीषण आदि ज्योतिषियों
से उसे अपने वंश के नाश का कारण जानकर उसे विभीषण को देता है । वह उसे घड़े में रखकर नदी में डाल देता
है । नदी में एक कमल उत्पन्न होता है जो उस घड़े का आधार बन जाता है । लक्ष्मी की दिव्य शक्ति से वह घड़ा
जनक के पास पहुँचता है । जनक वन में उसी नदी पर तप कर रहे थे । वे घड़ा उठाकर वन में ले जाते हैं तथा
एक पेड़ के नीचे खोदकर प्रार्थना करते हैं : यदि यह कन्या राजा के रूप में उत्पन्न नारायणावतार
की रानी बननेवाली हो तो इस स्थान पर एक कमल उत्पन्न हो जाय, जो उस घड़े को धारण कर सके ।
उसी क्षण वहाँ कमल उत्पन्न हो जाता है । उसपर घड़ा रखकर उसे मिट्टी से ढँक कर जनक पुनः तपस्या करने
लगते हैं । तपस्या से संतोष न पाकर १६ वर्ष बाद जनक अपनी राजधानी लौटने का निश्चय करते हैं । किन्तु ढूँढने
पर भी वे उस घड़े को नहीं पाते । सेना बुलायी गयी । सैनिक भी खोज में असफल होते हैं । अन्त मे जनक हल
चलाते हैं तब वह घड़ा अपने आप हल-पद्धति से प्रकट होता है । उसमें एक अत्यन्त सुन्दर कन्या पद्म पर बैठी प्राप्त
होती है । सीता ( लाङ्गल-पद्धति ) से उत्पन्न होने के कारण उसका सीता नाम पड़ता है ( अ० रा० ) । वस्तुतः
वाल्मीकिरामायण और पुराणों की कथा ही विभिन्न देशों से होती हुई वहाँ पहुँची है, अतः अनेक प्रकार की कल्प-
नाएँ उसके साथ जुड़ गयीं । किन्तु राम विष्णु हैं, सीता लक्ष्मी हैं और जनक से सीता का पिता-पुत्री का सम्बन्ध
है । वाल्मीकिरामायण तथा पुराणों का यह अंश प्रायः सर्वत्र व्याप्त है । सीता लक्ष्मी हैं, इस दृष्टि से विविध कमलों
तथा पद्द्मों का सम्बन्ध भी उनके साथ है । रामजातक तथा पालकपालाम के अनुसार रावण ने इन्द्र का रूप धारण
कर इन्द्राणी को धोखा दिया था, अतः इन्द्राणी ही सीता बनकर रावण के नाश का हेतु बनती है। पालकपालाम के
अनुसार—रावण इन्द्र से इन्द्रजाल सीखता था । कालान्तर में इन्द्राणी सीता के रूप में प्रकट होकर अपने पिता
रावण पर छूरी का प्रहार करती है, इसपर बालिका बेड़े पर रखकर समुद्र में बहायी जाती है । किसी टापू में उसका
ऋषि ने पुत्रीवत् पालन किया है, यह सब वाल्मीकिरामायण का ही विकृत रूप हैं ।
पद्मजा सीता
क्षेमेन्द्रकृत दशावतारचरित ( १०।१०४ ) के अनुसार रावण एक विशिष्ट स्थान पर बार-बार जाता
है । वह आरम्भ में एक पर्वत देखता है, वहीं फिर नगर, फिर जङ्गल देखता हैं, पुनः वहीं विस्तृत गड्ढा और फिर
कमलयुक्त सरोवर देखता है । वहाँ एक शिवलिङ्ग स्थापित कर कमलों से शिव की पूजा करता है । पुनः वह एक
कनकपद्म पर एक दिव्य कन्या, जो लक्ष्मी है, देखता है । उसे पुत्री के रूप में ग्रहण कर लङ्का लाता है । नारद
मन्दोदरी की गोद में उसे देखकर कहते हैं । यह कन्या चपलेन्द्रिय रावण की अभिलाषा की भूमि बनेगी—
‘‘कन्या भविष्यत्यभिलाषभूमिंश्चपलेन्द्रियस्य’’
यह सुनकर मन्दोदरी उसे स्वर्णपेटिका में बन्द कर किसी दूसरे देश में गाड़ देने का आदेश देती है ।
जनक यज्ञार्थ हल चलाते हुए उसे प्राप्त करते हैं । तोरवेरामायण ( १।१६ ) के अनुसार हल जोतते समय जनक ने
पृथ्वी के नीचे एक कमलों का सरोवर पाया और वहाँ कमल पर विराजमान एक शिशु देखा । जनक अलौकिक दृश्य
से भयभीत होकर लक्ष्मी के इस स्थान को छोड़ देने की बात सोच रहे थे कि नारद आ गये और कहा कि इसका

अध्याय बालकाण्ड ४५३
नाम सीता रखो और इसका पालन करो। विष्णु भी अवतार लेनेवाले हैं। वे सीता को पत्नी के रूप में ग्रहण करेंगे।
तुम इसका स्वयंवर करना, शिव-धनुष चढ़ानेवाले को ही इसे देना।
वाल्मीकिरामायण की टीका में गोविन्दराज के अनुसार वेदवती एक पद्मपर पुनः उत्पन्न होती है। रावण
उसे लङ्का ले जाता है और लक्षणज्ञों से उसे अपनी मृत्यु का कारण जानकर उसे समुद्र में फेंक देता है। वहीं कन्या
जनक को मिलती है। वस्तुतः उक्त कथाओं का इतना ही तात्पर्य है कि सीता साक्षात् लक्ष्मी का अवतार थी।
उसके वर्णन में कवियों की कल्पनाओं में भेद है। वस्तुतत्त्व एक ही है।
रक्तजा सीता
अद्भुतरामायण (सर्ग ८) के अनुसार रावण दिग्विजय के प्रसङ्ग में ऋषियों से राजकर लेता है। द्रव्य के
अभाव में ऋषि लोग कुछ रक्त देते हैं। वह ऋषि गृत्समद के पात्र में एकत्रित किया जाता है। उस पात्र में कुश का
किञ्चित् रस था जिसमें गृत्समद के मन्त्रों के फलस्वरूप लक्ष्मी विद्यमान थी। रावण उस पात्र को लङ्का ले जाता
है। मन्दोदरी को यह कह कर देता है कि इसमें विष भरा है। कभी रावण की परस्त्री-अनुरक्ति से खिन्न मन्दोदरी
आत्महत्या के विचार से उस रक्त का पान कर लेती है, गर्भवती हो जाती है एवं वह तीर्थयात्रा के लिए निकलती
है। कुरुक्षेत्र में उस गर्भ को गाड़ देती है बाद में जनक के हल चलाने से वही कन्या भूमि से निकलती। जनक उसे
पुत्रीवत् पालते हैं। सिंहलद्वीप की रामकथा में भी उक्त कथा का निर्देश है। एक अन्य कथा के अनुसार मन्दोदरी ने
उस रक्त में से कुछ ही बूंदों का पान किया था। उसी से उससे कन्या उत्पन्न होती है। रावण-कोप की शङ्का से
उसी घट में उसे रखकर समुद्र में छोड़ देती है। वही जनक के राज्य में पहुँच कर कृषकों द्वारा जनक के पास
लायी जाती है।
एक अन्य कथा के अनुसार महादेव के धनुष के प्रताप से जनक ने रावण को कई बार पराजित किया
था। अद्भुतरामायण के अनुसार रावण राजस्व के स्थान में ऋषियों से रक्त लेता है। ऋषि यह शाप देते हैं कि इस
रक्त से तुम्हारा नाश होगा। रावण शाप की अवज्ञा कर उसे लङ्का ले जाता है। उससे वहाँ अनावृष्टि आदि अनिष्ट
घटित होते हैं। ज्योतिषियों ने कहा जब तक यह रक्त लङ्का में रहेगा विपत्तियों का अन्त नहीं होगा। यह सुनकर
रावण जनक से हुई पराजय का बदला लेने के लिए उस घड़े को मिथिला में गड़वा देता है। वहाँ भी अनावृष्टि हुई।
तब मन्त्रिगण राजा को रानी के साथ हल चलाने का परामर्श देते हैं। वैसा करने पर राजा ने उस घड़े को पाया।
उसमें ऋषिरक्त से उत्पन्न सीता दिखायी पड़ी। उसके बाद सब अनर्थ शान्त हो गये। पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १३ एवं
बिहौररामकथा में भी ऐसा ही उल्लेख है।
इन कथाओं का भी तात्पर्य यही है कि सीता मोक्षलक्ष्मी, राज्यलक्ष्मी तथा ऐश्वर्यलक्ष्मी के साथ ही ऋषियों
की तपोमयी लक्ष्मी-भी हैं।
आनन्दरामायण के अनुसार राजा पद्माक्ष कठोर तपस्या के बाद लक्ष्मी को पुत्री के रूप में प्राप्त कर
उसका पद्मा नाम रखता है। पद्मा के स्वयंवर में पद्माक्ष युद्ध के कारण मारा जाता है। यह देखकर पद्मा ने अग्नि
में प्रवेश किया। एक दिन उसके अग्निकुण्ड से निकलने पर रावण ने उसे देख लिया। इस पर वह शीघ्र ही अग्नि
में प्रविष्ट हो गयी। रावण अग्नि बुझाकर उसकी राख में पाँच दिव्य रत्न देखकर एवं उन्हें एक पेटिका में बन्द कर
लङ्का ले जाता है। लङ्का में कोई भी उस पेटिका को उठा नहीं सकता। उसे खोलने पर उसमें कन्या मिली।
मन्दोदरी के परामर्श से पेटिका मिथिला में गड़वा दी जाती है। बाद में उसे एक शूद्र पाता है, जो ब्राह्मण के लिए
खेती कर रहा था। वह ब्राह्मण पेटी जनक को प्रदान करता है। खोलकर जनक ने उसमें कन्या देखी और अपनी
पुत्री बनाया। इससे भी हिरण्मयी लक्ष्मी का हिरण्यरेता अग्नि में निवास और उसी से आविर्भाव सूचित किया गया है।

३. तृतीय काण्ड: किष्किन्धा व सुन्दरकाण्ड: बालि-वध धर्म-मीमांसा एवं हनुमान् पराक्रम

दक्षिण भारत के वृत्तान्त के अनुसार लक्ष्मी एक फल से उत्पन्न होती है। वेदमूनि नामक एक ऋषि द्वारा
उसका पोषण होता है। उसका नाम सीता था। बाद में वह समुद्र तट पर तप करने जाती है। इसके सौन्दर्य की
चर्चा सुनकर रावण उसके पास पहुँचता है, जिसपर वह अग्नि में प्रवेश करके भस्म हो जाती है। राख को वेदमूनि
एक स्वर्णयष्टि में बन्द कर देते हैं। बाद में वह यष्टि रावण के पास पहुँचती है, जिसे वह अपने कोषागार में रख देता
है। कुछ दिनों के बाद उसमें आवाज सुनायी पड़ती है। उसे खोला जाता है। उसमें कन्या के रूप में सीता दिखायी
पड़ती है। ज्योतिषी कहते हैं, इससे सिंहल का नाश होगा। रावण उसे स्वर्णमञ्जूषा में बन्द कर समुद्र में फेंक देता
है। वह मञ्जूषा लहरों द्वारा गङ्गा में प्रविष्ट होकर खेत में पहुँचती है। कृषक उसे पाकर अपने राजा को देता है।
बुल्के कहते हैं—जिस वृक्ष से सीता का जन्म हुआ वह अवश्य सीताफल ही है। वस्तुतः कृषि, पुष्प,
फल आदि सभी लक्ष्मी के ही रूपान्तर हैं। सीतोपनिषद् में भी इसका उल्लेख है। सप्तशतीरहस्य में कहा
गया है—
“पुष्पपल्लवमूलादिफलाढ्यं शाकसञ्चयम् ।
काम्यानन्तरसैर्युक्तं क्षुत्तृण्मृत्युजरापहम् ॥”
परमेश्वरी क्षुधा और तृष्णा मिटानेवाले तथा काम्य अनन्त रसों से युक्त पुष्प, पल्लव, मूल और फल से
आढ्य शाकसञ्चय को धारण करती है। विविध रत्नमयी लक्ष्मीरूप से भी सीतोपनिषद् में सीता का प्राकट्य कहा
गया है।
किसी कथा में सीता का अग्निकुण्ड से उत्पन्न होना कहा गया है। कहा जाता है कि योगी का रूप धारण
कर ईश्वर लङ्का में निवास करते थे। उसमें अनेकानेक उपद्रव उत्पन्न होने लगे। वे बाद में नगर के एक फाटक पर
रहने लगे। वहाँ उन्होंने बहुत-सी राख एकत्रित कर ली जिससे एक बहुत बड़ा वृक्ष उत्पन्न हुआ। योगी चले गये।
रावण ने वृक्ष के चार टुकड़े कर समुद्र में फेंकवा दिये। उनमें से एक टुकड़ा जनक के राज्य में पहुँच गया। वहाँ
उसका यज्ञाग्नि में उपयोग हुआ। तब उस अग्नि से एक धनुष के साथ सीता की उत्पत्ति हुई। उसमें लिखा था जो
इसे तोड़ेगा वही इस कन्या का पति होगा (पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १)।
इसी तरह रावण की वाटिका के एक वृक्ष से किसी दिन एक कन्या उत्पन्न हुई। माली उसे रावण के
पास ले जाता है। रावण को देखकर वह यक्षिणी का रूप धारण कर लेती है। रावण उसे घड़े में बन्द कर समुद्र में
बहा देता है। वह घड़ा कन्नक नामक नगर में पहुँचता है। वहाँ का राजा सन्तानहीन था। किसी ऋषि ने राजा को
घड़े का रहस्य बताया। राजा ने उसे प्राप्त किया। कन्या को अपनी कन्या बनाकर राजा ने उसका पालन किया।
यहाँ भी देश और काल के भेद से वाल्मीकिरामायण की कथा के आधार पर ही उक्त विभिन्न कल्पनाएँ समझनी
चाहिये। पर बुल्के का यह कहना ठीक नहीं है कि सीता और लक्ष्मी के अभेद की कल्पना वाल्मीकि के बहुत बाद ही
संभव हुई होगी, क्योंकि भूमिजा और वेदवती की कथा में ही पूर्वोक्त व्याख्या के अनुसार सीता तथा लक्ष्मी का अभेद
स्पष्टरूप से कह दिया गया है। युद्धकाण्ड में भी सीता को लक्ष्मी कहा ही गया है। उसे प्रक्षेप कहना तो प्रमाणों से
पिण्ड छुड़ाने का निष्फल प्रयासमात्र है—‘‘सीता लक्ष्मीर्भवान् विष्णुर्देवः कृष्णः प्रजापतिः ।’’ (वा० रा० ६।११७।
२७) टीकाकार भी कहते हैं ‘प्रसिद्धविष्णुपत्न्यभिन्नत्वात्’ (तिलक)। अतएव यह भी कहना अशुद्ध है कि सीता
के कुल परम्परा के तथ्य के अभाव की पूर्ति के उद्देश्य से भूमिजा सीता के वृत्तान्त की उत्पत्ति हुई है और वेदवती-
वृत्तान्त भूमिजा सीता की जन्मकथा की एक पूर्तिमात्र है, क्योंकि अटकलबाजी के आधार पर मनमानी कल्पना की
अपेक्षा आर्ष वाल्मीकिरामायण के आधार पर ही तत्त्वनिर्णय करना उचित है। कई लोग कहते हैं यीशू क्राइष्ट की
उत्पत्ति प्राकृत ढङ्ग से ही हुई थी, परन्तु अविवाहिता स्त्री से उत्पत्ति का कलङ्क धोने की दृष्टि से ही उसे कुमारी

अध्याय बालकाण्ड ४५५
कन्या से ईश्वर द्वारा उत्पन्न होने की कथा गढ़ी गयी है। ईसाई फ़ादर बुल्के विचार करें यदि सीता की भूमि से
उत्पत्ति असंभव है तो क्या उपर्युक्त बातें संभव हैं ?
जैसे महाभारत में अग्निकुण्ड से द्रौपदी, धृष्टद्युम्न आदि की उत्पत्ति होने पर कुल-परम्परा के तथ्यों में
कोई बाधा नहीं पड़ी। द्रुपद के आयोजित अग्निकुण्ड से आविर्भूत होने के कारण सब द्रुपद के पुत्र-पुत्री माने गये
वैसे ही जनक के यज्ञक्षेत्र में जनक की हलपद्धति से उत्पन्न होने के कारण सीता भी जनकपुत्री कहलायीं । वेदवती की
कथा भी वस्तुस्थिति से सम्बन्धित है । किसी की पूर्ति के लिए कल्पित नहीं है, क्योंकि बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड
सहित सारा वाल्मीकिरामायण प्रमाण है । सीता नाम के आधार पर भूमिजावृत्तान्त नहीं उत्पन्न हुआ, किन्तु भूमिजा-
वृत्तान्त के अनुसार सीता नाम ही हुआ । क्योंकि अर्थों के अनुसार अन्वर्थ चातुर्होत्र, इन्द्र, अग्नि आदि नामों की
पद्धति वैदिक वाङ्मय में प्रचुरमात्रा में मिलती है । राम आदि नामों की भी उत्पत्ति अर्थानुसारी ही हुई ।
दशरथजातक के अनुसार सीता दशरथ की पुत्री और राम की बहन थी, यह बौद्धों के वेदादि शास्त्रों के
विरोध का नमूना ही है, क्योंकि उनके यहां वेदादि शास्त्र मान्य न होने से भगिनी से विवाह में भी कोई बाधा नहीं
होती । बुल्के ने भी ४१९वें अनु० में इसे निर्मूल माना है। उड़ीसा में सुभद्रा वहाँ की इष्ट देवी हैं, अतः उत्कल लोग
सीता को सुभद्रा से अभिन्न ही मानते हैं ।
जावा के रामकेलिङ्ग, मलय के सेरीराम तथा हिकायत महाराज रावण के अनुसार दशरथ की पटरानी
मन्दोदरी के सौन्दर्य का वर्णन सुनकर रावण दशरथ से उसकी माँग करता है । मन्दोदरी प्रदान के लिए पति को
उद्यत देखकर जादू द्वारा एक दूसरी मन्दोदरी बना देती है जिसे रावण ले जाता है । बाद में दशरथ मन्दोदरी से
सत्य वृत्तान्त सुनकर घबड़ाते हैं कि रावण अक्षतयोनि नयी मन्दोदरी का अनुभव करके धोखा समझ जायगा । दशरथ
छिप कर लङ्का जाकर नयी मन्दोदरी से मिलते हैं । बाद में रावण मन्दोदरी का विवाह होता है और मन्दोदरी को
एक पुत्री होती है । उसकी जन्मकुण्डली से विदित होता है कि उसका पति रावणहन्ता होगा । अतः वह रावण द्वारा
पेटिका में बन्द कर समुद्र में फेंक दी जाती है । महर्षि कलि उसे पाकर पालते हैं । महर्षि कलि जावा के सेरतकाण्ड
के ऋषि कल ही प्रतीत होते हैं, जिन्हें मिथिलानिवासी ( मंतिलीनिवासी ) माना है । दशरथ की पत्नी के रूप में
मन्दोदरी का उल्लेख अन्यत्र कहीं नहीं है । बुल्के ही कहते हैं कि ऐसी कल्पना दशरथजातक के आधार पर हुई होगी ।
फिर भी रावण द्वारा पार्वती के स्थान पर मन्दोदरी को प्राप्त करने की कथा का यह विकृत रूप ही प्रतीत होता है ।
अयोध्याकाण्ड का विश्लेषण करते हुए बुल्के कहते हैं कि इस काण्ड में तीनों पाठों में अभिन्नता महत्वपूर्ण
है । दाक्षिणात्य पाठ के अनुसार कैकेयी की माता के अपने पति द्वारा त्यक्त किये जाने की कथा सर्ग ३५।४-२१ में
है । वे प्रथम सर्ग के प्रारम्भिक श्लोकों (१-३५) को, बालकाण्ड के अन्तिम श्लोकों की पुनरावृत्तिमात्र होने के कारण
प्रक्षिप्त मानते हैं । परन्तु यह सर्वथा असङ्गत है, क्योंकि पहले तो बालकाण्ड के अन्त में केवल चार पाँच श्लोक ही
राम के गुण और स्वभाव का वर्णन करनेवाले हैं, किन्तु अयोध्याकाण्ड के प्रथम सर्ग के ३५ श्लोकों में राम के गुण
और स्वभाव का वर्णन है । इसके अतिरिक्त टीकाकारों ने विस्तृत टीकाएँ भी इन श्लोकों पर लिखी हैं । यदि वे
पूर्व श्लोकों के ही आवृत्तिमात्र होते तो उनपर टीका करने की आवश्यकता क्यों होती ? अतः स्पष्ट है कि यहाँ
शब्दतः तथा अर्थतः किसी प्रकार की आवृत्ति नहीं कही जा सकती ।
बालकाण्ड के श्लोकों का सार यह है : राम और लक्ष्मण अपने देवतुल्य पिता की सदा पूजा करते थे
और पिता की आज्ञा के अनुसार सब पौर कार्य करते थे । राम सभी के प्रिय एवं हित कार्य करते थे । परम
नियन्त्रित श्रुति तथा स्मृति की मर्यादा के अनुसार माताओं के लिए मातृकार्य करते थे । यथासमय गुरुओं के सुश्रूषादि
गुरुकार्यों की भी देखभाल करते थे । इस तरह राजा दशरथ तथा ब्राह्मण, वैश्य और विषयवासी सभी नागरिक
राम के शील एवं सदाचार से प्रसन्न थे । चारों ही पुत्रों में सत्यपराक्रम राम भूतों में स्वयम्भू के समान अतियशस्वी
एवं गुणवत्तर हुए थे ।

चतुर्दश अध्याय
अयोध्याकाण्ड
अयोध्याकाण्ड में कहा गया है कि रामादि चारों भ्राता राजा दशरथ को अपने शरीर से आविर्भूत चार
भुजाओं के तुल्य प्रिय थे। उनमें भी महातेजा राम पिता के लिए अत्यन्त रतिकर थे। प्राणियों में चतुर्मुख के समान
राम उन सबमें गुणवत्तर थे, क्योंकि वे साक्षात् सनातन विष्णु थे । उदीर्ण रावण का वध चाहनेवाले देवताओं की
प्रार्थना से विष्णु ही राम के रूप में प्रकट हुए थे—
“स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः ।
अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णुः सनातनः ॥” (वा० रा० २।१।७)
उन अमिततेजा राम से कौशल्या वैसे ही शोभित हुईं जैसे वज्रपाणि इन्द्र से अदिति देवी शोभित हुई थी ।
श्रीराम दिव्य लावण्य और सौन्दर्यपूर्ण दिव्य रूप से सम्पन्न, वीर्यवान् एवं असूयारहित थे। वे गुणों में दशरथ के
तुल्य तथा भूमि भर में अनुपम पुत्र थे । वे नित्य शान्तात्मा, मृदुभाषी एवं पहले ही बोलते थे । दूसरे के परुष वचन
बोलने पर भी वे परुष उत्तर नहीं देते थे। वे किसी के द्वारा किये गये एक उपकार से ही सन्तुष्ट हो जाते थे और
आत्मवान् होने के कारण उसके सैकड़ों अपराधों का भी स्मरण नहीं करते थे—
“स च नित्यं प्रशान्तात्मा मृदु पूर्वं प्रभाषते ।
उच्यमानोऽपि परुषं नोत्तरं प्रतिपद्यते ॥
कदाचिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति ।
विस्मरत्यपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया ॥” (वा० रा० २।१।१०, ११)
वे शीलवृद्ध, ज्ञानवृद्ध एवं सज्जनों से अस्त्र-शस्त्रादि श्रम के भी मध्य में सदा ही वेद-वेदान्त-नीति
सम्बन्धी चर्चा करते रहते थे । अन्य समय में सुतरां सज्जनों से शास्त्ररहस्य की चर्चा ही करते थे । राम परम
बुद्धिमान् तथा आये हुए लोगों से पहले ही बोलते थे । शब्दतः मधुराभिभाषी एवं अर्थतः प्रियंवद थे । वीर्यवान् होने
पर भी अपने महान् वीर्य से विस्मित नहीं होते थे। अनृत कथा कभी नहीं करते थे। वे विद्वान् थे और वृद्धों के
पूजक थे । प्रजा सदा राम का अनुरञ्जन करती थी और राम सदा ही प्रजा का अनुरञ्जन करते थे । प्रजा का रञ्जन
करने से ही राजा होता है, “रञ्जनाद्राजा” इस उक्ति को वे चरितार्थ करते थे । राम सानुक्रोश अर्थात् दुखियों के
प्रति दयालु थे । जितक्रोध एवं विशेषतः ब्राह्मणों के प्रतिपूजक थे । दीनों पर अनुकम्पा करनेवाले, धर्मज्ञ एवं नित्य ही
दुष्टनिग्रह एवं इन्द्रियनिग्रह में तत्पर तथा पवित्र थे । कुलोचित बुद्धि अर्थात् अपने कुल के अनुसार दया, दाक्षिण्य,
शरणागतरक्षण आदि धर्मों में उनकी बुद्धि सदा प्रवण रहती थी, अतएव वे क्षात्र धर्म प्रजापालनादि का बहुत आदर
करते थे और उसके द्वारा महान् स्वर्ग की प्राप्ति समझते थे । श्रेय के विपरीत कर्म में उनको कभी रति नहीं होती
थी एवं उनकी धर्मविरुद्ध कथा में कभी रुचि नहीं होती थी ।
राम कभी भी अश्रेयस्कर निषिद्ध कर्म में प्रवृत्त नहीं होते थे तथा धर्मविरुद्ध कथा में रुचि नहीं रखते थे ।
वाद, जल्प आदि कथाओं में वे बृहस्पति के समान स्वसिद्धान्तनिर्वाहक युक्तियों के वक्ता थे। वे अरोग अर्थात् सत्कर्मा-
नुष्ठानसमर्थ, तरुण, विपुलांशत्व आदि उत्तम लक्षणवाले वपु से युक्त, तत्तत्कर्मयोग्य देश तथा काल के ज्ञाता थे एवं निग्रह
और अनुग्रह के लिए पुरुषों की अधर्मिष्ठता आदि जानते थे । ऐसा प्रतीत होता था कि मानों ब्रह्मा द्वारा वे संसार में

अध्याय अयोध्याकाण्ड ४५७
एकमात्र सर्वगुणयुक्त साधु पुरुष निर्मित हुए हैं। राम गुणों के कारण श्रेष्ठ गुणों से युक्त प्रजाजनों के बहिश्चर प्राणों
के तुल्य परम प्रिय थे। वे यथावत् साङ्गोपाङ्ग वेदों के ज्ञाता थे और तत्तद् विद्याओं के लिए अपेक्षित व्रतों का
अनुष्ठान कर व्रतस्नात हुए थे। मन्त्रहीन शस्त्रों एवं मन्त्रयुक्त अस्त्रों में भरताग्रज राम अपने पिता से भी श्रेष्ठ थे।
विविध कल्याणों की वे जन्मभूमि थे। वे साधु तथा क्षोभ के हेतु उपस्थित होने पर भी अक्षुब्ध अन्तःकरणवाले,
सत्यवाक् एवं धर्मार्थदर्शी वृद्ध ब्राह्मणों द्वारा शिक्षित तथा सौम्य थे। वे धर्म, अर्थ और काम के याथात्म्य को जानने-
वाले और स्मृतिमान् तथा प्रतिभासंपन्न थे। वे लौकिक कार्यों के करने में सामर्थ्यसम्पन्न तथा समयाचार धर्म में कुशल
थे। वे विनीत, गूढ़ अभिप्रायवाले तथा फल-निष्पत्ति-पर्यन्त मन्त्रणा को गुप्त रखनेवाले थे और मित्रत्वेन सब लोगों
द्वारा अज्ञात मित्रों से सुरक्षित थे एवं उन्हीं के द्वारा परराष्ट्र-भेद आदि में पूर्ण साहाय्य प्राप्त करते थे। राम के क्रोध
और हर्ष दोनों अमोघ थे जिसपर प्रसन्न होते उसे निहाल कर देते थे। सत्पात्र में वित्तदान एवं न्यायपूर्वक धनसंग्रह के
वे कालज्ञ थे। वे गुरु आदि में दृढ़ भक्तिवाले तथा स्थिरप्रज्ञ अर्थात् विस्मृतिरहित थे। वे असद्ग्राही दुर्वचन बोलने-
वाले नहीं थे, आलस्यरहित, सावधान एवं स्वदोष तथा परदोष को जाननेवाले थे। वे शास्त्रज्ञ, कृतज्ञ तथा परकृत
अल्प उपकारों को भी जानते थे और वे पुरुषों के अन्तर (तारतम्य) को जाननेवाले थे अथवा पुरुषों के अन्तर अर्थात्
अभिप्राय को जाननेवाले थे। न्याय के अनुसार प्रग्रह, निग्रह एवं अनुग्रह करने में दक्ष थे। वे सत्पुरुषों के संग्रह और
सपरिवार सत्पुरुषों के पालन तथा दुष्टों के निग्रह का देश और काल जानते थे और वे आय कर्म के उपायों को
जानते थे। जैसे मधुकर पुष्पों से रस का संग्रह करता है वैसे ही प्रजा से यथोचित धन ग्रहण करने में वे चतुर थे
एवं शास्त्रदृष्ट व्यय कर्म के भी अच्छे जानकार थे। आय के अर्धभाग, चतुर्भाग या त्रिभाग के व्यय की व्यवस्था जानते
थे। शास्त्रसमूहों तथा प्राकृतादि भाषामिश्रित नाटकादि में वे निपुण थे। निरालस्य होकर अर्थ और धर्म का संग्रह
कर अर्थ और धर्म के अविरुद्ध काम का भी आदर करते थे। क्रीड़ा प्रयोजनवाले गीत, वाद्य, चित्रकर्म आदि के विज्ञाता
थे तथा अर्थ के 'धर्माय यशसेऽर्थाय कामाय स्वजनाय च ।' पञ्चधा विभाग के ज्ञाता एवं अनुष्ठाता थे। अश्व, हस्ती
आदि के आरोहण, नियन्त्रण, गत्यादि-शिक्षण में वे सावधान थे। धनुर्वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ और अतिरथों से आदृत थे।
वे परसेना के संमुख अभियान करनेवाले एवं शत्रुओं पर प्रहार करनेवाले थे। सेनाओं के नयन तथा व्यूहनिर्माण आदि
में विशारद थे। संग्राम में क्रुद्ध हुए देवताओं तथा दानवों के द्वारा भी सर्वदा अप्रधृष्य थे। असूया, क्रोध, घमण्ड
तथा मत्सर से रहित थे। कोई प्राणी उनकी अवज्ञा नहीं कर सकता था। प्राकृत पुरुषों के समान वे कालपराधीन न
होकर स्वायत्त परिकर थे। सर्वश्रेष्ठ गुणों से युक्त राजकुमार राम प्रजाजनों के सम्मत सर्वश्रेष्ठ गुणों से युक्त हैं यह
तीन बार कहकर राम में श्रेष्ठ गुणों की दृढ़ता कही गयी। वे अपने क्षमाप्रधान गुणों के कारण वसुधा के तुल्य, बुद्धि
से बृहस्पति के तुल्य तथा वीर्य में इन्द्र के तुल्य थे। पिता को प्रसन्नता देनेवाले तथा सभी प्रजाजनों के अभीष्ट उत्तम
गुणों से राम इस प्रकार प्रदीप्त हुए जैसे अंशुजालों के द्वारा सूर्य दीप्त होता है। एवंगुणसम्पन्न तथा अप्रधृष्य पराक्रम-
वाले राम लोकनाथ विष्णु के तुल्य हैं। उन राम को मेदिनी ने अपना पति बनाना चाहा (वा० रा० २।१।३-३४)।
यह दोनों अंशों की संक्षिप्त व्याख्या है। इसमें बालकाण्ड के अंश की आवृत्तिमात्र है' यह कहना
अज्ञजनप्रतारण छोड़कर कुछ तथ्य नहीं है। वस्तुतः यह भी "वदतो व्याघातः" है जब बुल्के की दृष्टि में बालकाण्ड
तथा उत्तरकाण्ड वाल्मीकि की कृति में थे ही नहीं तब अयोध्याकाण्ड के इस अंश को पूर्व की आवृत्ति कैसे कहा जा
सकता है ? वस्तुतः यह बुल्के की भी अज्ञता का स्पष्ट नमूना है। यदि यह प्रक्षिप्त है तब राम कौन हैं, क्यों वे राजा
“अथ राज्ञो बभूवैव वृद्धस्य चिरजीविनः ।
प्रीतिरेषा कथं रामो राजा स्यान्मयि जीवति ।। ( वा० रा० २।१।३६ )
हों, क्यों राजा के मन में ऐसी प्रीति थी ? इत्यादि सब बातों का समाधान बिना उक्त श्लोकों के अधूरा ही
५८

४५८ रामायणमीमांसा चतुर्दश
रहेगा। 'अथ राजः' यहीं से रामायण का आरम्भ है, यह कहना भी असङ्गत ही है। जब किसी सामान्य लेख का
भी कोई उपोद्घात या भूमिका होती है तब बिना उपोद्घात के वाल्मीकिरामायण का आरम्भ मान लेना कैसे सङ्गत
होगा ? पूर्वोक्त पंक्तियों में न तो शब्दतः और नहीं अर्थतः पुनरुक्ति है। शुक्लयजुः के ४० वें अध्याय में "अनेजदेकं
मनसो जवीयो" (ईशा० उ० ३) "तदेजति तन्नैजति" (ईशा० उ० ५) इत्यादि समान शब्द और समान अर्थ
का आवर्तन होने पर भी किसी को प्रक्षिप्त नहीं माना जाता है। गीता में दूसरे अध्याय के स्थितप्रज्ञ-लक्षणों तथा
१२ वें अध्याय के भक्त-लक्षणों और १४ वें के गुणातीत-लक्षणों में बहुत कुछ समानता है। क्या उन्हें भी प्रक्षेप माना
जाय ? ११ वे अध्याय के अन्त में 'मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः' (गी० ११।५४) जो कुछ कहा गया है वही १२ वें
अध्याय में कहा गया है। विशेषतः भारतीय दृष्टिकोण से सिद्धों के जो स्वाभाविक लक्षण होते हैं वे ही साधकों के
लिए साधन होते हैं। 'अमानित्वम्, अदम्भित्वम्' (गी० १२।७) आदि सिद्ध ज्ञानी के स्वाभाविक गुणों का इसलिए
विस्तृत वर्णन किया जाता है कि वे सब धार्मिक तथा राजनीतिक साधकों के लिए परम अनुकरणीय एवं अनुष्ठेय हैं।
विशेषतः उत्तरमीमांसा के अनुसार ईश्वर के गुणों का वर्णन उपासनार्थ अपेक्षित होता है जैसे सर्वगन्धत्व, सर्वरसत्व,
भामनीत्व, वामनीत्व आदि गुणों से विशिष्ट परमेश्वर की उपासना करने से उपासकों को वे ही सब गुण फल के
रूप में मिलते हैं। उसी तरह उपर्युक्त गुणों से विशिष्ट राम की उपासना करने से वे सब गुण उपासकों को फलरूप
में मिलते हैं। अतः गुणों का वर्णन निरर्थक नहीं है। पर राम के द्वेषी बुल्के को रामोपासना से क्या लेना देना
है। आवृत्ति तो है ही नहीं, साथ ही प्रशंसा भी नहीं है, क्योंकि अविद्यमान गुणों का वर्णन ही प्रशंसा है। भगवान् के
तो विद्यमान गुणों का भी पूरा वर्णन सम्भव नहीं है, फिर अविद्यमान गुणों के वर्णन का तो प्रसङ्ग ही कहाँ है ?
सर्वथापि अयोध्याकाण्ड के प्रथम सर्ग को प्रक्षिप्त कहना अत्यन्त निराधार एवं दुरभिसन्धिपूर्ण है। वस्तुतः इस सर्ग को
प्रक्षिप्त कहने का बुल्के का उद्देश्य यह है कि इससे उनके अभिमत के विरुद्ध राम विष्णु के अवतार सिद्ध होते हैं। उसमें
स्पष्ट कहा गया है दृप्त रावण के वध के लिए देवताओं की प्रार्थना से विष्णु राम के रूप में अवतीर्ण हुए हैं। बुल्के
अयोध्द्यादि पाँच ही काण्डों को प्रमाण मानते हैं। उनमें भी अवतारवाद सिद्ध होने से बुल्के का पक्ष निर्बल होता है।
इसी लिए वे उसे प्रक्षिप्त कहने का वृथा साहस करते हैं। परन्तु उनके तर्क निःसार हैं। यदि उनके मन्तव्यानुसार
बालकाण्ड वाल्मीकिरामायण का है नहीं तो उसकी आवृत्ति कैसे कही जा सकती है ? डा० याकोबी का यह कथन
भी निराधार है कि आदिरामायण में राम के प्रस्थान के अनन्तर उनकी चित्रकूट तक की यात्रा का वर्णन किया
गया था, क्योंकि जिसका वनप्रस्थान से लेकर युद्धकाण्ड तक विस्तृत चरित्रवर्णन है उसके जन्म और जन्मस्थान तथा
उसके गुण और स्वभाव का वर्णन न हो तो उस ग्रन्थ की बड़ी न्यूनता ही समझी जायगी। जिस सीता के वनगमन
एवं हरण का वर्णन है, जिसके लिए समुद्र में सेतुबन्धन हुआ वह कौन थी, कहाँ की थी, उसका विवाह कब कैसे
हुआ था ? इसका वर्णन न होना भी एक चरित्रचित्रण की त्रुटि ही मानी जायेगी। सर्ग ४१-४९ को प्रक्षिप्त कहना
भी वैसा ही है। इसी तरह उनका यह कथन भी असङ्गत ही है कि प्रतीत होता है कि अन्ध मुनि के पुत्र के वध-
प्रसङ्ग रामायण के पूर्व प्रचलित थे; बहुत संभव है सर्ग ६३ और ६४ की भी अधिकांश सामग्री प्रक्षिप्त हो । सर्ग
६६-९६ में भी पुनरावृत्तियाँ पायी जाती हैं। वाल्मीकिकृत रामायण में प्रसङ्ग इतना विस्तृत नहीं था। वस्तुतः
वस्तुस्थिति अनुमान पर निर्भर नहीं होती। अनुमान लोग अपने-अपने संस्कारों के अनुसार कर लेते हैं। कई लोग
यह भी अनुमान कर सकते हैं कि बाइबिल का इतना विस्तृत रूप प्रारम्भ में नहीं रहा होगा। बहुत कुछ
विशेषतः चमत्कार की बातें मत-प्रचारक ईसाइयों ने जोड़ ली होंगी ? पुनरावृत्तियों की भ्रान्ति भी वैसे
ही है। ऋक्संहिता, अथर्वसंहिता तथा यजुःसंहिता में पुरुषसूक्त हैं। सबमें बहुत कुछ समानता ही है, फिर भी शाखा-
भेद से सभी प्रामाणिक पाठ माने जाते हैं। कभी प्रसङ्गानुसार भी वही बात दुबारा कहनी आवश्यक हो जाती है।
१०० वें सर्ग के प्रक्षिप्त होने का कारण यह कहा गया है कि उसमें राम भरत से उनके राज्य के विषय में बहुत से

अध्याय अयोध्याकाण्ड ४५९
प्रश्न पूछते हैं । मानो भरत दीर्घकाल तक शासन कर चुके हों । १०१ वें सर्ग के प्रारम्भिक श्लोक में कहा गया है
'प्रष्टुं समुपचक्रमे' । वास्तव में १०० वें सर्ग की सामग्री महाभारत के सभापर्व अध्याय ५ से उद्धृत की गयी है, पर
यह सब असङ्गत है । इन प्रश्नों के लिए यह आवश्यक नहीं है कि अधिक काल तक शासन करनेवाले से ये प्रश्न
होने चाहिए । एक उत्तमाभिजनसम्पन्न धार्मिक राज्य के शासक से आरम्भ में ही पूछना उचित है, जिससे कि वह
सावधान होकर उन नीतियों तथा आचारों को ध्यान में रखकर सदा व्यवहार करे । इसी लिए किसी भी भारतीय
विद्वान् टीकाकार ने इन श्लोकों के प्रक्षिप्त होने का सन्देह नहीं किया । दण्डवत् प्रणाम करते हुए भरत को जटिल
और चीरवसनधारी देखकर राम को ऐसा लगा जैसे दुर्दर्श भास्कर ही युगान्त में गिर पड़े हों । राम ने किसी तरह
विवर्णवदन तथा कृशगात्र भ्राता भरत को पहचान कर हाथ से उठाया और मूर्धा का आघ्राण कर आलिङ्गन किया
एवं अङ्क में बैठा कर सादर पूछा; तात, तुम्हारे पिता कहाँ हैं जो तुम वन में आये हो । उनके रहते उनकी सेवा
छोड़कर तुम्हें वन में नहीं आना चाहिये । बहुत दिनों पर दूर से आये हुए तुम्हें देख रहा हूँ । वैवर्ण्य एवं कृशता
से पहचानने में कठिनाई हो गयी है । पिताजी क्या जीवित हैं ? सौम्य, कहीं ऐसा तो नहीं कि बालक होने के कारण
तुम्हारा राज्य नष्ट हो गया हो ? सत्यसंगर, राजसूय, अश्वमेध आदि यज्ञों के अनुष्ठाता धर्मनिष्ठ राजा जीवित तो हैं ?
तात, क्या धर्मनिष्ठ महाद्युति विद्वान् ब्राह्मण इक्ष्वाकुओं के पुरोहित वसिष्ठ का तुम यथावत् पूजन करते हो ? तात, क्या
कौशल्या, सुमित्रा तथा प्रजावती सुखिनी आर्या कैकेयी देवी प्रसन्न तो है ? क्या तुमने विनयसम्पन्न, बहुश्रुत, अनिन्दक,
महाकुलप्रसूत, सकल हित के निर्वाहक पुरोहित को सत्कृत तो किया है ? क्या तुम्हारे आहवनीय आदि अग्नियों के
सम्बन्ध में सावधान मतिमान् विधिज्ञ अध्वर्युगण अवसर के अनुसार अतीत-अनागत होम के अधिकरण अग्नि का ध्यान
तो रखते हैं और तुम देवताओं, पितरों, भृत्यों, गुरुओं तथा पितृतुल्य वृद्ध वैदिक ब्राह्मणों का बहुमान तो करते हो ?
क्या अस्त्र-शस्त्रविद्यासम्पन्न, अर्थशास्त्र-निष्णात तथा धनुर्वेद के आचार्य सुधन्वा का तुम सम्मान तो करते हो ? तात,
क्या तुमने अपने समान शूर तथा श्रुतसम्पन्न, जितेन्द्रिय, कुलीन, इङ्गितज्ञ लोगों को मन्त्री बनाया है ? क्योंकि
शास्त्रकोविद श्रेष्ठ मन्त्री अमात्यों द्वारा सुसंवृत मन्त्र ही राजाओं के विजय का मूल होता हैं । तुम निद्रा के पराधीन
तो नहीं होते हो ? ठीक समय पर जाग तो जाते हो ? और अपररात्र में जाग कर अर्थ-प्राप्ति का उपाय सोचते हो ?
अकेले तो मन्त्रणा नहीं करते और बहुतों के साथ तो मन्त्रणा नहीं करते ? तुम्हारा मन्त्रित मन्त्र कहीं राष्ट्र में तो
नहीं फैल जाता ? इस तरह किसी राजा या राजपुत्र के लिए जो आवश्यक कर्तव्य हैं उन्हीं विषयों के सम्बन्ध में
राम ने भरत से प्रश्न कर उसी व्याज से उन्हें प्रासङ्गिक कर्तव्य तत्त्व का उपदेश किया हैं ।
इस प्रकार प्रश्न करने के अनन्तर भी अपने को राजा न समझ कर भरत ने जब कुछ उत्तर नहीं दिया
तब राम ने पुनः उनके आगमन का प्रयोजन पूछा । महाभारत सभापर्व अध्याय ५ के श्लोक १७ वें से ११० तक
नारद के धर्मसम्बन्धित प्रश्नव्याज से उपदेश हैं, १११ वें श्लोक से युधिष्ठिर का प्रश्न है । उसके बाद पुनः नारद के
उपदेशात्मक प्रश्न हैं । वाल्मीकिरामायण में प्रथम प्रश्न ही हैं, अन्त में कुछ प्रश्नव्याज से उपदेश भी हैं ।
प्रायः यह माना जाता है कि पूर्ववर्ती लेख अधिक सुन्दर और स्पष्ट होता है, क्योंकि वह पूर्ववर्ती की
सहायता लेकर अधिक परिष्कृत होता है । इस दृष्टि से भी वाल्मीकिरामायण का प्रश्न ही प्राचीन प्रतीत होता है ।
वाल्मीकिरामायण में ६५ श्लोक हैं, महाभारत में १२८ श्लोक हैं । महाभारत के श्लोक वाल्मीकिरामायण के
छायामात्र हैं ।
यदि १०० वें सर्ग को प्रक्षिप्त कहा जाय तो यह भी मानना पड़ेगा कि राम भरत की दशा को बिना
देखे, बिना पूछे और दशरथ का हाल बिना पूछे ही भरत से बातें करने लगे । परन्तु यह सर्वथा अस्वाभाविक ही

४६० रामायणमीमांसा चतुर्दश
है। 'प्रष्टुं समुपचक्रमे' की संगति पूर्व में बतलायी जा चुकी है। १०० वें सर्ग के बिना १०१ वाँ सर्ग सर्वथा अपूर्ण
और असङ्गत ही ठहरता है। महाभारत सभापर्व वाल्मीकिरामायण के बाद का ग्रन्थ है, अतः वाल्मीकिरामायण से
ही वहाँ कुछ श्लोकों का उद्धृत होना अधिक सङ्गत है।
इसी प्रकार कहा जाता है कि जाबालि का वृत्तान्त प्रक्षिप्त है।
राम के अयोध्या न लौटने का दृढ़ सङ्कल्प
"प्रवेक्ष्ये दण्डकारण्यमहमप्यविलम्बयन् ।
आभ्यां तु सहितो वीर वैदेह्या लक्ष्मणेन च ।।" (वा० रा० २।१०७।१६)
अर्थात् मैं शीघ्र ही सीता और लक्ष्मण के साथ दण्डकारण्य में प्रवेश करनेवाला हूँ। के पश्चात् भरत के
प्रत्युपवेशन का प्रसङ्ग आना चाहिये—
“एवमुक्तेन रामेण भरतः प्रत्यनन्तरम् ।
उवाच विपुलोरस्कः सूतं परमदुर्मनाः ॥
इह तु स्थण्डिले शीघ्रं कुशानास्तर सारथे ।
आर्यं प्रत्युपवेक्ष्यामि यावन्मे सम्प्रसीदति ।।" (वा० रा० २।१११।१२,१३)
पिता ने जो मुझे वनवास की आज्ञा दी है वह मिथ्या नहीं हो सकती, राम के ऐसा कहने पर विशाल
वक्षस्थलवाले भरत ने बहुत दुःखी होकर सूत को आज्ञा दी कि सारथे, स्थण्डिल पर कुश बिछा दो। जब तक आर्य
(राम) प्रसन्न नहीं होते तब तक मैं उनके प्रति प्रायोपवेशनव्रत करूँगा। प्रचलित पाठ के अनुसार राम के सङ्कल्प
के पश्चात् जाबालि लोकायत दर्शन का प्रतिपादन करने लगते हैं (सर्ग १०८)। राम जाबालि को उत्तर देकर अपना
संकल्प पुनः प्रकट करते हैं (सर्ग १०९।१–२९)। इसके अनन्तर राम के प्रत्युत्तर का सार उपजाति छन्दों में
दोहराया जाता है (सर्ग १०९।३०-३९)।
इस अंश में जो दाक्षिणात्य पाठ में मिलता है कि राम बुद्ध को चोर और नास्तिक कहते हैं वह सर्ग १०९
पश्चिमोत्तरीय पाठ में नहीं मिलता है। इसके अनन्तर वसिष्ठ रामवंशावली सुनाकर राज्यभार स्वीकार करने के लिए
राम से अनुरोध करते हैं (सर्ग ११०), परन्तु उपर्युक्त तर्क निःसार ही है। संसार की सभी घटनाएँ पुरुषविशेषों
के अटकलों के आधार पर नहीं घटती हैं। पुरुषों के अनुमानों के विपरीत भी घटनाएँ घटती ही हैं। चित्रकूट के
घटनास्थलपर राम और भरत केवल दो ही होते तब कदाचित् यह कहा भी जा सकता था, परन्तु जब वहाँ पर
वसिष्ठ तथा जाबालि जैसे विद्वान् भी बैठे ही थे तो वे सर्वथा मौन कैसे रहते ? राम के वनगेमन से न लौटने की बात
सुनकर भरत के कुछ कहने से पहले ही जाबालि का प्रतिज्ञा के विरुद्ध कुछ कहना असङ्गत नहीं है। सबका एक ही
उद्देश्य था कि राम को अयोध्या लौटा ले जाना, अतः जाबालि ने लोकायत तथा बौद्ध मत लेकर वेदादि शास्त्रों एवं
तदुक्त सदाचारपरम्पराओं को खण्डित कर राम को पिता की आज्ञा की परवाह न करने की सलाह देते हुए लौटने
का अनुरोध किया। वैदिक सदाचार का प्रतिपादन कर राम ने जाबालिमत के खण्डन-प्रसङ्ग में बुद्धमतानुयायियों को
नास्तिक और चोरवत् दण्डनीय कहा। वेदप्रामाण्य का अपहर्ता होने के कारण यहाँ नास्तिक को चोरवत् दण्डनीय
कहा गया। प्रजाहित के लिए जैसे चोर दण्ड्य है वैसे ही नास्तिक भी दण्ड्य है। संक्षेप में जाबालि ने कहा—राघव,
प्राकृत मनुष्यों की जैसी तुम्हारी प्राकृत बुद्धि नहीं होनी चाहिये। संसार में कौन किसका बन्धु है ? जन्तु अकेला ही
उत्पन्न होता है और अकेला ही मरता है। माता-पिता आदि बुद्धि में जो आसक्त होता है वह उन्मत्त ही है। जैसे
कोई मनुष्य एक ग्राम छोड़कर दूसरे ग्राम में जाता हुआ मार्ग में कहीं आवास करता है। दूसरे दिन आवास छोड़कर

अध्याय अयोध्याकाण्ड ४६१
अन्यत्र चला जाता है। इसी तरह मनुष्यों के पिता, माता, गृह, वन आदि हैं। कहीं भी आसक्ति उचित नहीं । अपना
राज्य छोड़कर बहुकण्टकाकीर्ण पथ में जाना उचित नहीं । अयोध्यानगरी एकवेणीधरा प्रोषितभर्तृका पत्नी के समान
तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही है । दशरथ अन्य थे, तुम अन्य हो । क्षणभङ्गवाद के अनुसार कोई स्थिर नहीं है। शोणित
और बीज ही माता-पिता हैं, माता-पिता और कोई नहीं । जहाँ जाना था राजा गये । यह सभी भूतों की गति है । निरर्थक
तुम क्यों राज्य से वञ्चित होते हो ? मैं तो धर्मपरायणों के लिए सोचता हूँ । जो इस लोक में दुःख पाकर विनाश को
प्राप्त होते हैं । पितृदैवत्य श्राद्ध आदि का प्रपञ्च केवल अन्न का उपद्रवमात्र ( अपव्यय ) है । भला जो मर गया वह
परलोक में भी क्या भोगेगा ? यदि यहाँ अन्य के भोजन से अन्य की तृप्ति होती तब तो परलोकगत पितरों का श्राद्ध
आदि मिलने की कल्पना हो भी सकती थी, और यदि ऐसा ही है तब घर में किसी को भोजन करा देने से प्रवासी
बन्धुओं को भी भोजन मिल जाना चाहिये । फिर तो किसी प्रवासी को घर से भोजनादि सामग्री ढोने का प्रयास क्यों
करना चाहिये ? दान, यज्ञ, तप आदि की महिमा का वर्णन करनेवाले ग्रन्थ स्वार्थियों ने ही गढ़ रखे हैं, अतः परोक्ष
परलोकबुद्धि का त्याग कर प्रत्यक्ष का आश्रयण करो ।
जाबालि का वचन सुनकर जाबालि द्वारा उक्त अर्थ के विपरीत प्रतिपत्तियुक्त बुद्धि एवं वेदोक्ति रूप सूक्ति
का आलम्बन कर सत्यपराक्रम राम बोले- आपने मेरे प्रिय लाभ के लिए जो कुछ कहा है वह परमार्थतः अकार्य है
जो कार्यसदृश प्रतीत होता है, वह पथ्याभास अपथ्य ही है । निर्मर्याद पापाचारसमन्वित प्राणी कहीं भी सम्मान पाने
योग्य नहीं है, क्योंकि वह साधुसम्मत चरित्र प्रतिपादक वेदादि शास्त्रों से विपरीत है, 'लोकायतादि' शास्त्रप्रसक्त है ।
वस्तुतः कुलीन अकुलीन पुरुषमानी वीर की पवित्रता या अपवित्रता का स्पष्ट प्रतिपादन वेदसम्मत आचार ही करता
है । वेदसम्मत आचारवाला ही कुलीन एवं शुचि है, तद्भिन्न अशुचि आदि ही हैं। आपके सम्मत पथ का आलम्बन
करने से सर्वथा अनर्थ ही सम्भावित है । वैसा करने पर मैं अनार्य के तुल्य आर्य, शौचहीन होकर शुचि, अलक्षण
होने पर भी लक्षणवान् तथा दुःशील होकर भी शीलवान् सा बनकर धर्मवेष से अधर्म का आचरण कर लोकसंकरकारक
मार्ग का अनुसरण कर श्रुतिविधिविवजित क्रिया का आलम्बन कर अशुभ गति को ही प्राप्त होऊँगा । उस स्थिति में
भला कौन समझदार कार्याकार्यविचक्षण पुरुष लोकदूषण और दुर्वृत्त व्यक्ति का सम्मान करेगा । यदि मैं तुम्हारे
उपदेश का आदर करूँ, सत्य परिपालनरूप पिता की आज्ञा का उल्लङ्घन करूँ तो हीनप्रतिज्ञवृत्ति से कैसे स्वर्ग पा
सकूँगा और किसके वृत्त का अनुसरण करूँगा ? शास्त्रों में तो पितादि परम्परा का अनुसरण करना कहा है—
“येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः ।
तेन यायात् .................................................. ॥” ( मनु० ४।१७८ )
जिस रास्ते से पिता, पितामह आदि चले हैं उसी रास्ते से चलना उचित है। सामान्य तथा सर्वसाधारण
लोक कामवृत्त ही होता है। जैसे आचारवाले राजा होते हैं वैसी ही प्रजा होती है। अनृशंस ( सब प्राणियों
पर दयाप्रधान ) अनादिशास्त्रसिद्ध सत्य ही सनातन राजवृत्त है । इसी लिए राज्य भी सत्यात्मक होता है। सत्य ही
में लोक प्रतिष्ठित है। ऋषियों एवं देवों ने भी सत्यलोकान्त सब लोकों की प्राप्ति का हेतु सत्य ही माना है। सत्यवादी
ही अक्षय उत्कृष्ट लोक प्राप्त करता है । सर्पवत् अनृतवादी से सभी उद्विग्न होते हैं। सत्य ही सबका मूल है, सत्य
ही ईश्वर है, धर्म भी सत्य ही में प्रतिष्ठित है । सत्य से पर कुछ भी नहीं। दत्त, इष्ट, हुत, तप तथा जगत् का
उत्पादक सर्वाधिष्ठान ब्रह्म भी अत्यन्त अबाध्यरूप सत्य ही है। एतावता चेतन से अनधिष्ठित परमाणु, प्रकृति आदि
ही जगत् के उपादान कारण हैं, यह मत खण्डित हो जाता है, क्योंकि वे परिणामी तथा मिथ्या होने से चेतन जीव
आदि के अधिष्ठान नहीं हो सकते । साथ ही व्रत, यज्ञ, दान, तप आदि धर्म का प्रतिपादन करनेवाले वेद भी सत्य
ईश्वर से श्वास-प्रश्वासवत् आविर्भूत होते हैं । अतः वक्तृगत भ्रम, प्रमाद आदि दोषों की शङ्का से रहित होने एवं

उनके द्वारा प्रतिपादित दान आदि के फल का संवाद देखने से अप्रामाण्यशङ्काशून्य होने के कारण वेद स्वतःप्रमाण हैं,
अतः सत्य ही ईश्वररूप है, इसलिए सत्यपालन में तत्पर होना ही युक्त है ।
“दत्तमिष्टं हुतं चैव तप्तानि च तपांसि च ।
वेदाः सत्यप्रतिष्ठानास्तस्मात् सत्यपरो भवेत् ॥” ( वा० रा० २।१०७।१४ )
अतः मैं पिता की आज्ञा का क्यों न पालन करूँ । पिता सत्यप्रतिज्ञ तथा समयी ( सदाचारवान् ) थे,
अतः सत्य के कारण ही उन्होंने सत्यपालन द्वारा मुझे सत्यनिष्ठ बनाया है । लोभ से या मोह से किसी तरह मैं सत्य-
सन्ध पिता के सेतु का अतिक्रमण न करूँगा । असत्यसन्ध अस्थिरचेता चपल मनुष्य के हव्य्, कव्य आदि को देवता
और पितर ग्रहण नहीं करते, यह धर्म सभी प्राणियों के हितार्थ ध्रुव है । सत्पुरुषों ने उसका आचरण और अभिनन्दन
किया है । पिता की आज्ञा का पालन आदि छोड़कर राज्य-पालन आदि धर्माभास अधर्म ही हैं। यह नृशंस एवं पाप
कर्म क्षुद्र लोगों द्वारा ही सेवित है । प्राणी मन से निश्चय कर जिह्वा से अनृत भाषण करके शरीर से पाप करता है ।
भूमि, कीर्ति, यश तथा लक्ष्मी सभी सत्यनिष्ठ पुरुष का अनुवर्तन करते हैं, अतः सत्य का आश्रयण ही ठीक है। आपने
जिन युक्त्याभासों से मुझसे राज्य करने के लिए कहा है वे अनार्य—अश्रेष्ठ ही हैं। मैंने पिता के सामने वनवास
की प्रतिज्ञा की है, कैकेयी भी उससे प्रसन्न हुई थीं, अतः उसके विपरीत भरत की बातें कैसे मैं मानूं ? पवित्रतापूर्वक
वनवास करते हुए नियत भोजन करते हुए पुण्य मूल, पुष्प और फलों से पितरों तथा देवताओं का तर्पण करते हुए
उसी से पञ्चेन्द्रियवर्ग को पुष्ट कर पितृवचन पालनरूप लोक ( यात्रा ) व्यवहार को निष्कपट तथा श्रद्धा के साथ
कार्याकार्यविचक्षण होकर चलाऊँगा । इस कर्मभूमि को प्राप्त करके जो शुभ कर्म है वही कर्तव्य है । अग्नि, वायु और
सोम सभी कर्म के ही प्रभाव से उच्च फल के भागी हुए हैं। सौ अश्वमेध करके ही शतक्रतु इन्द्र त्रिदिवाधिपति हुए
हैं। उग्र तप करके ही महर्षि लोग द्युलोकभागी हुए हैं ।
पुनश्च उग्रेतेजा राम उक्त नास्तिक्यपूर्ण 'यदि भुक्तमिहान्येन' इत्यादि शुष्क तर्क युक्त वाक्य की विगर्हणा
करते हुए बोले, सत्य एवं धर्मयुक्त पराक्रम, भूतानुकम्पा, प्रियवादिता, द्विजाति, देवता तथा अतिथि के पूजन को
सन्त लोग त्रिदिव-प्राप्ति का साधन कहते हैं । इस तरह सत्पुरुष फलवान् निश्चित कर्मों को जानकर श्रुति के
अनुकूल तर्कों से निर्णय करके सावधान होकर लोकप्राप्ति की आकाङ्क्षा करते हैं । अन्य की भुक्ति से अन्य की तृप्ति
आदि तो युक्ति और प्रमाण से हीन ही है। मैं पिता के उस कर्म की निन्दा करता हूँ जिसमें उन्होंने वेदविमुख तथा
अवैदिक दुर्मार्ग में प्रतिष्ठित बुद्धिवाले चार्वाकानुसारिणी बुद्धि से धर्मपथ से अपेत नास्तिकमत का अनुसरण करनेवाले
आपको आर्त्विज्य प्रदान किया है। जैसे चोर दण्ड्य होता है वैसे ही बुद्धादि नास्तिक मतानुसारी भी दण्ड्य हैं,
क्योंकि वह वेद-प्रामाण्य का हरण करता है । नास्तिक को चोर सदृश ही दण्ड्य समझना चाहिये, जहाँ दण्ड देना
सम्भव न हो वहाँ ब्राह्मण को नास्तिक के अभिमुख संभाषणदि नहीं करना चाहिये । वेदोक्त धर्म में शिष्टाचार
दिखलाते हुए राम फिर कहते हैं, आपसे पूर्व और पूर्वत्तर ब्राह्मणों ने बहुत से शुभ कर्म किये हैं । लोक और परलोक
की कामना छोड़कर भी कर्तव्य बुद्धि से वे कल्याणमय अहिंसा, तप, भिक्षादि कर्म करते रहे हैं । वेदप्रामाण्य से ही
तेजस्वी लोग दानगुणप्रधान, अहिंसक, वीतमल, प्रधान मुनि लोकपूज्य हुए हैं। जाबालि ने भी अन्त में कहा,
मैं नास्तिक नहीं हूँ । आर्य ! आपको अयोध्या लौटाने के लिए ही मैंने नास्तिक-वाक् का प्रयोग किया था ।
इस तरह इस संवादमयी घटना को अकस्मात् प्रक्षिप्त कहना साहसमात्र है । केवल पश्चिमोत्तर पाठ में यह
नहीं है, एतावता भी इसे प्रक्षिप्त नहीं कहा जा सकता । ऐसे कई अंश हैं जो पश्चिमोत्तरीय पाठ में होने
पर भी पाश्चात्यों को मान्य नहीं हैं जैसे अवतारवाद सभी पाठों में स्पष्टरूप से है, फिर भी बुल्के आदि उसे
नहीं मानते ।

अध्याय अयोध्याकाण्ड ४६३
कुछ लोग यह शङ्का करते हैं कि बुद्ध तो राम से अर्वाचीन थे, फिर राम बुद्ध की चर्चा कैसे कर सकते
थे ? परन्तु यह शङ्का भी निर्मूल है, क्योंकि "असद्वा इदमग्र आसीत्" ( तै० उ० २।७ ) इत्यादि श्रुतियों में ही
शून्यवाद आदि बौद्धवाद अनादिकाल से ही पूर्वपक्ष के रूप में प्रचलित है। बौद्धों के अनुसार भी लङ्कावतारसूत्र में
अमिताभ आदि अनेक नामवाले बुद्ध गौतम बुद्ध से पहले भी हो चुके हैं। लङ्कावतारसूत्र में बुद्ध को लङ्कापति रावण
का उपदेष्टा गुरु कहा गया है, अतः बुद्धमतानुयायी बुद्ध का निराकरण करना अत्यन्त सम्भव है।
इसी तरह याकोबी का राम के अत्रि के आश्रम में जाने के वृत्तान्त को ( वाल्मीकिरामायण २।११७।५
से काण्ड के अन्त तक को ) प्रक्षिप्त मानना भी निराधार है। प्रामाणिक रामायण में बालकाण्ड की घटनाओं का
निर्देश नहीं मिलता, लेकिन सीता-अनसूया-संवाद के अन्तर्गत लक्ष्मण और उर्मिला के विवाह का उल्लेख किया
गया है। अरण्यकाण्ड में लक्ष्मण को अविवाहित कहा गया है, इस अंश में अयोनि

४६४ रामायणमीमांसा चतुर्दश
आमिष न खाकर कन्द, मूल, फलों और अग्निपक्व मांस आदि से ही जीवन चलाते हुए वन में निवास करूंगा ।
"ऐणेयं मांसमाहृत्य शालां यक्ष्यामहे वयम् ।” ( वा० रा० २।५६।२२ ) के अनुसार ऐणेय मांस से ही वास्तुशान्ति
आदि कार्य भी राम ने किया था । अतएव श्राद्धादि धर्म में भी शुद्ध मांस का प्रयोग होता है ।
इस दृष्टि से “इदं मेध्यमिदं स्वादु निष्टप्तमिदमग्निना ।” ( वा० रा० २।९६।२ ) इन वचनों के साथ
समन्वय हो जाता है ( तिलक ) । २।४२।१०२ की टीका में तिलककार कहते हैं- 'मांसस्य वन्याहारान्तर्गतत्वान्न
दोषः, मृगयाधर्मकत्वाच्च न मृगहनने दोषः ।' अर्थात् शुद्ध मांस वन्य आहार के अन्तर्गत होने से शुद्ध मृगमांस खाना
दोष नहीं है । इसके अतिरिक्त मृगयाधर्म से मृग मारना भी दोष नहीं है । यदि मृगया भी अप्रामाणिक कही जाय तब
तो मारीचवध आदि सभी कथाओं को प्रक्षेप ही कहना पड़ेगा ( तिलक ) ।
बुल्के कहते हैं कि “महाभारत के रामोपाख्यान में गुह का उल्लेख नहीं है । किन्तु वाल्मीकिरामायण के
अनुसार राम चित्रकूट की यात्रा में अपने सखा गुह के यहाँ रात बिताते हैं । गुह लक्ष्मण तथा सुमन्त्र के साथ सोते
हुए राम और सीता की रक्षा करता है । अगले दिन नौका मँगाकर राम, सीता और लक्ष्मण को गङ्गा पार पहुँचाता
है ।” पर रामोपाख्यान में तो वाल्मीकिरामायण की ही संक्षिप्त कथा वर्णित है । केवट की कथा भी मूल से अविरुद्ध है,
अतः शतकोटिप्रविस्तर रामायण का ही अंश समझना चाहिये । अध्यात्मरामायण के अनुसार चित्रकूट-यात्रा प्रसङ्ग में
ही उसका वर्णन सङ्गत है । राम के चरित्र अनन्त हैं, अतः तापस-वन्दना तथा ग्राम-वधूटियों की कथा भी
प्रामाणिक है ।
अन्धमुनि-पुत्र के वध की कथा अन्य पुराणों और रामायण के अनुसार तो है ही, परन्तु वाल्मीकिरामायण
के अनुसार भी उसे विकास या प्रक्षेप कहना साहस है । तिलक आदि टीकाकारों को वह पाठ सम्मत भी है । ( वा०-
रा० २।६३।४०, ४१ ) में स्पष्ट कहा गया है कि ब्रह्महत्या का भय हृदय से निकाल दो । मैं ब्राह्मण नहीं हूँ, वैश्य से
शूद्रा में उत्पन्न हूँ-
“ब्रह्महत्याकृतं पापं हृदयादपनीयताम् ।
न द्विजातिरनं राजन् मा भूत्ते मनसो व्यथा ॥
शूद्रायामस्मि वैश्येन जातो नरवराधिप ।”
उसकी विभिन्न कथाओं का यथासम्भव समन्वय किया जा सकता है । अन्धमुनि और उसका पुत्र तपोनिष्ठ
था, इसी दृष्टि से क्वचित् उसके ब्राह्मणत्व का व्यवहार हुआ है । "ब्रह्महत्या स्पृशेन्न त्वां वैश्योऽहं तपसि स्थितः ।"
( वा० रा० २।७।२७ ) के अनुसार वह वैश्य था, अतः ब्रह्महत्या का स्पर्श नहीं हुआ । नामभेद की प्रसिद्धि देशभेद
से भिन्न भी हो सकती है ।
सेरीराम और श्याम की कथाओं का समन्वय करने से यही प्रतीत होता है कि हानिकारक हाथियों के ही
मारने का अनुरोध दशरथ से विभिन्न सूत्रों द्वारा किया गया था । उसी प्रसङ्ग में हाथी के भ्रम से दशरथ ने अन्ध-
मुनि-पुत्र को मारा था । अन्धमुनि के अन्ध होने और पुत्रदुःख-प्राप्ति के विभिन्न कारण भी हो ही सकते हैं, अतः वैसे
वर्णन भी अप्रामाणिक नहीं ।
कई कथाओं में कल्पभेद से भेद हुआ है । उसके अनुसार भी रामायणों का समन्वय संभव है । रामचरित-
मानस के अनुसार जनक के चित्रकूटगमन की कथा स्वाभाविक ही लगती है । इतनी बड़ी घटना का पता न लगना भी
संभव नहीं और पता लगने पर तटस्थ या उदासीन रहना भी सम्भव नहीं था, अतः शिव-भुशुण्डि-परम्परा में जनक
की कथा का होना स्वाभाविक है ।

अध्याय अयोध्याकाण्ड ४६५
सीताहरण का समाचार सुनकर राम और लक्ष्मण की माताओं के मर जाने की सेरीराम की बात
वाल्मीकिरामायण के विरुद्ध होने के कारण श्रद्धेय नहीं है। दशरथ के लिए राम के द्वारा इङ्गुदी की खली का
पिण्डदान-वर्णन अन्यत्र किञ्चित् भिन्न हो सकता है। ब्रह्मपुराण (अध्याय १२३) के अनुसार दशरथ अपने पुत्रों को
दर्शन देकर ब्रह्महत्या के कारण अपनी नरकयातना का वर्णन करते हैं और उनसे गौतमी-तट पर पिण्डप्रदान करने
का अनुरोध करते हैं। अनन्तर राम के पिण्डदान द्वारा दशरथ नरक से मुक्ति पाते हैं तथा स्कन्दपुराण (प्रभासक्षेत्र-
माहात्म्य अ० १११) के अनुसार दशरथ राम को स्वप्न में दिखाई देते हैं। राम ब्राह्मणों से परामर्श कर पिण्ड-
दानादि धार्मिक क्रिया करते हैं। पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड अ० २८।४८-९०) के अनुसार वनवास के समय इसी
स्वप्नदर्शनाध्याय के फलस्वरूप श्राद्ध के आयोजन का वर्णन मिलता है। गरुड़पुराण (अध्याय १४३) के
अनुसार राम अयोध्या लौटने पर पितृकर्म के लिए गयाशिर (गया) जाते हैं। प्रतिमानाटक में भी इसका
उल्लेख है। शिवपुराण (ज्ञानखण्ड अध्याय ३०) के अनुसार राम और लक्ष्मण श्राद्धसामग्री लेने गये थे आने में
विलम्ब होने पर सीता श्राद्ध-काल की किञ्चित् अवधि शेष जानकर स्वयं श्राद्ध करती है। दशरथ प्रकट होकर कहते
हैं मैं दशरथ हूँ। तुम्हारे सफल श्राद्ध से मैं तृप्त हुआ हूँ। बाद में राम के अर्पण करने पर दशरथ उनसे कहते
हैं कि पुत्र, अब क्यों प्रदान कर रहे हो, सीता के द्वारा मैं तृप्त हो गया हूँ-
“किमर्थं हूयते पुत्र त्वनया तर्पिता वयम् ।”
आनन्दरामायण में भी सीता फल्गुस्नान करने जाती हैं। माहेश्वरी-पूजा के लिए १०२ बालू के पिण्ड
तैयार करती हैं। वहाँ धरती से दशरथ का हाथ प्रकट होता है और सीता एक-एक कर १०२ पिण्ड दशरथ के
हाथ पर रख देती हैं। सीता भयभीत होकर यह वृत्तान्त छिपाकर रखती हैं। बाद में जब राम पिण्ड चढ़ाने आते
हैं तब दशरथ का हाथ नहीं प्रकट होता है, जिससे सबको आश्चर्य होता है। सीता अपना रहस्य प्रकट करती हैं कि
दशरथ मुझसे पिण्ड-ग्रहण कर चुके हैं। राम साक्षी चाहते हैं। सीता आम वृक्ष, फल्गु नदी, ब्राह्मण, बिडाल, गौ
और अश्वत्थ को साक्ष्य देने को कहती हैं। सब अस्वीकार कर सीता से शम होते हैं। अन्त में स्मरण कर सीता
का समर्थन करते हैं। दशरथ स्वयं विमान द्वारा आते हैं और कहते हैं कि राम, मैथिली के पिण्डदान से दुस्तर नरक
से मैं तर गया और मेरी पूर्ण तृप्ति हुई।
सारलादास के अनुसार वनवास के समय राम अनेक तीर्थयात्राएँ करते हैं। किसी दिन राम गया पहुँचे।
पितृ-कर्म के लिए गैंडा आवश्यक समझकर लक्ष्मण के साथ राम उसकी खोज में शिकार के लिए गये। सीता ब्रह्मा
के पुत्र फल्गु नदी के संरक्षण में रामगया में ही रह गयीं। राम को समय पर न आते देख सीता ने पूर्वजों को सात
बालू के पिण्ड समर्पित किये। दशरथ का हाथ प्रकट हुआ जिससे सीता को मालूम हुआ कि दशरथ का देहान्त हो
चुका। सीता ने फल्गु से निवेदन किया कि वह इस घटना को राम से छिपा रखे। फल्गु ने सीता से अनुचित प्रस्ताव
किया, उसके ठुकराये जाने पर ब्राह्मणों से कह दिया कि सीता ने पिण्डदान किया है। ब्राह्मण दक्षिणा के लिए
अनुरोध करने लगे तथा राम के प्रत्यागमन तक प्रतीक्षा करना उन्होंने अस्वीकार कर दिया। इसपर सीता ने अपने
कपड़े दे दिये और पद्मपत्रों से अपना अङ्ग ढक लिया। वापस आकर सब वृत्तान्त जानकर राम ने फल्गु तथा ब्राह्मणों
को शाप दिया।
कृत्तिवासरामायण के अनुसार दशरथ की मृत्यु के पश्चात् उनका श्राद्ध उचित रीति से करने के लिए
राम और लक्ष्मण अंगूठी बेचने जाते हैं। इतने में सीता फल्गु के किनारे खेलती हैं। दशरथ देखकर कहते हैं, भूख
की पीड़ा असह्य हो उठी है। रेत का पिण्ड देकर भूख शान्त कर दो। बाद में ब्राह्मण, तुलसी और फल्गु सीता के
पक्ष में साक्ष्य नहीं देते हैं। उनको सीता शाप देती हैं। वट वृक्ष सीता का समर्थन करता है तथा राम और सीता
दोनों से आशीर्वाद प्राप्त करता है।
५९

४६६ रामायणमीमांसा चतुर्दश

दुर्गावरकृत असमिया गीतिरामायण में भी इस प्रसङ्ग का वर्णन है। उसमें सीता चन्द्रमा, वायु, पृथिवी,
फल्गु तथा ब्राह्मणों को शाप देती हैं। बालरामदासरामायण के अनुसार राम स्वयं फल्गु को अन्तःसलिला बन जाने
का शाप देते हैं। प्रार्थना करने पर वर्षा ऋतु में प्रकट होने का अनुग्रह करते हैं। वस्तुतः वाल्मीकिरामायण में
वर्णित श्राद्ध का ही भिन्न-भिन्न पुराणों एवं रामायणों में पल्लवन किया गया है। दशरथजी के नरकयातना भोगने और
क्षुधातुर होने आदि का वर्णन गुणवादी अर्थवाद ही समझना चाहिए । उसका तात्पर्य गौतमी नदी पर श्राद्ध एवं
गयाश्राद्ध तथा फल्गुश्राद्ध के माहात्म्य-वर्णन में है। "नहि निन्दा निन्द्यं निन्दितुं प्रवर्तते अपितु विधेयं स्तोतुम्"
निन्दा का तात्पर्य निन्द्य की निन्दा में न होकर विधित्सित अर्थ की स्तुति में ही होता है। श्रीराम का नाम स्मरण
करने से भी प्राणियों की मुक्ति हो जाती है फिर राम के परमानुरागी दशरथ के लिए नरक-यातना की कल्पना भी
कैसे की जा सकती है। रामचरितमानस में कहा गया है—
"राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम ।
तनु परिहरि रघुबर बिरह राउ गयऊ सुरधाम ॥" ( रा० मा० २।१५५ )
"जिअन मरन फलु दशरथ पावा । अण्ड अनेक अमल जसु छावा ॥
जिअत रामविधुवदन निहारा। रामविरह करि मरन सँवारा ॥"
( रा० मा० १।१५४।१ )
ऐसे ही देवी-भागवत में परीक्षित् के अन्तरिक्ष-मरण के कारण दुर्गति का वर्णन भी निन्दार्थवाद ही है ।
प्रमाणान्तर विरुद्ध अर्थवाद का स्वार्थ ग्राह्य न होकर केवल स्तुति में ही उसका तात्पर्य होता है। उदाहरणार्थ
शुक्लयजुःसंहिता के ४० वें अध्याय में विद्या और अविद्या ( कर्म और उपासना ) दोनों की ही निन्दा की गयी है ।
"अन्धन्तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते ततो भूय इव तमो य उ विद्यायां रताः।" ( ईशा० उ० ७ ) वे
लोग अन्धन्तम में प्रवेश करते हैं जो कर्म में लगे हैं और उससे भी अधिक घोर तम में वे प्रवेश करते हैं जो कि
उपासना में लगे हैं। परन्तु ये दोनों ही बातें "कर्मणा पितृलोकः विद्यया देवलोकः ।" इन श्रुति-वचनों से विरुद्ध हैं;
क्योंकि इनमें कर्म से पितृलोक और विद्या से देवलोक की प्राप्ति कही गयी है। अतः ऊपर के वचनों का तात्पर्य विद्या
और अविद्या दोनों के समुच्चयानुष्ठान में ही है, किसी की निन्दा में नहीं। ठीक इसी तरह रामनाम का स्मरण
राम-भक्ति परम मोक्ष का कारण है, यह श्रुति, स्मृति और पुराणों से सिद्ध है। ऐसी स्थिति में परम राम-भक्त
दशरथ की नरक-प्राप्ति सर्वथा विरुद्ध ही है। अतः वैसे वचनों का तात्पर्य गौतमी तथा गया आदि क्षेत्रों एवं वहाँ के
श्राद्धादि कर्मों के माहात्म्य-वर्णन में ही है अर्थात् दशरथ जैसे परम सम्मान्य पुरुषों की सद्गति यहीं हुई थी ।
पादुकाओं का वृत्तान्त
इसे ( पादुकाओं के वृत्तान्त को ) भी बुल्के बाद में जोड़ा हुआ समझते हैं। वे कहते हैं कि "दाक्षिणात्य
पाठ ( वा० रा० १।११२।२१ ) के अनुसार भरत राम की हेमविभूषित पादुकाएँ ले जाने की प्रार्थना करते हैं—
"अधिरोहार्य पादाभ्यां पादुके हेमभूषिते ।
एते हि सर्वलोकस्य योगक्षेमं विधास्यतः ॥" ( वा० रा० २।११२।२१ )
पर गौड़ीय पाठ के अनुसार भरत के प्रस्थान के समय शरभङ्ग राम को कुशपादुकाओं का एक जोड़ा भेजते
हैं। वसिष्ठ के अनुरोध से राम उन्हें प्रदान करते हैं। माधवकन्दली और बलरामदासरामायण में भी कुशपादुकाओं
की ही चर्चा है। पश्चिमोत्तरीय पाठ में वसिष्ठ के कहने पर राम अपनी पादुकाएँ भरत को देते हैं।
दशरथजातक के अनुसार भी अमात्य लोग राम की पादुकाओं के सामने राजकार्य करते हैं। अन्याय होते
ही पादुकाएँ एक दूसरे पर आघात करती हैं एवं ठीक निर्णय होने पर शान्त हो जाती हैं।

अध्याय अयोध्याकाण्ड ४६७
पादुकाओं के स्वरूप में कुछ मतभेद होने पर भी पादुकाओं में कोई मतभेद नहीं है। अतः पादुकावृत्तान्त
को ही प्रक्षेप कहना साहसमात्र है और मतभेद से नाजायज फायदा उठाने की दुश्चेष्टामात्र है। चित्रकूटनिवास,
पर्णशाला-निर्माण आदि सभी प्रामाणिक ही हैं।
काक-वृत्तान्त
जयन्त काक का वृत्तान्त सुन्दरकाण्ड में हनुमान् के लिए अभिज्ञान के रूप में सुनाया था। राम के द्वारा
प्रयुक्त अस्त्र से वह कहीं भी त्राण न पाकर राम की शरण में आकर प्राण बचाता है। यह घटना अयोध्याकाण्ड की ही
है। अतः क्षेपक में या पुराणों में उसका वर्णन स्वाभाविक था। इसी दृष्टि से गौड़ीय पाठ ने उस सर्ग को प्रक्षिप्त नहीं
माना। नृसिंहपुराण, पद्मपुराण तथा रामचरितमानस में भी इसका वर्णन है। अध्यात्मरामायण तथा आनन्दरामायण
में भी उक्त वृत्तान्त है ही। रामकेर्ति तथा रामकियेन में काकासुर का वध वर्णित है, पर वह असुर है। अयोध्याकाण्ड
के काक-वृत्तान्त का काक तो इन्द्रपुत्र जयन्त है।
४४०वें अनु० में रसिकसम्प्रदाय की रचनाओं में रासलीला का वर्णन भावराज्य का विषय है। श्रीराम
परब्रह्म हैं। उनमें विविध भावनाओं से उपासक उनकी उपासना कर सकते हैं। वाल्मीकिरामायण में वर्णित मर्यादा-
पुरुषोत्तम की लीलाएँ प्रकट लीलाएँ हैं।
राम-वनगमन
राम-वनगमन की कथा में वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण एवं पुराणों का ही
मुख्य प्रामाण्य है।
बौद्ध और जैन कथाओं में तो उसका विकृत रूप ही है। अतएव बौद्धों के अनुसार अशोकवनिका से सीता
का हरण या रावण द्वारा अयोध्या से सीता को ले जाना या राम का हिमालय प्रदेश में वनवास करना आदि
काल्पनिक ही हैं। राम ईश्वरावतार थे, इसलिए नारद का आना और अवतार का उद्देश्य स्मरण कराना अध्यात्म-
रामायण की कथा ठीक ही है।
अनेक रामायण
वाल्मीकिरामायण के अनुसार सीता ने कहा है कि लक्षणज्ञ ब्राह्मणों ने मेरे लिए वनवास कह रखा है—
"वस्तव्यं किल मे वने" (वा० रा० २।२९।८)। वे यह भी कहती हैं कि मैंने जितने रामायण सुने हैं। उनमें
सबमें सीता राम के साथ वन जाती हैं। आनन्दरामायण के अनुसार यह भी तर्क दिया है कि स्वयंवर के समय राम
को पतिस्वरूप में प्राप्त करने के लिए १४ वर्ष वनवास का व्रत किया है। बुल्के कहते हैं, "रामवनवास के अन्य कई
कारण बताये गये हैं। दशरथ द्वारा प्राणियों का वध (वा० रा० २।३९।४), अन्धमुनि-पुत्र-वध (वा० रा०
२।६३।११) एवं पूर्वजन्म में कौशल्या द्वारा गायों के स्तनों का काटना (वा० रा० २।५३।१९)।
"मन्ये खलु मया पूर्वं विवत्सा बहवः कृताः।
प्राणिनो हिंसिता वापि तन्मामिदमुपस्थितम् ॥" (वा० रा० २।३९।४)
"निःसंशयं मया मन्ये पुरा वीर कदर्यया।
पातुकामेषु वत्सेषु मातृणां शातिताः स्तनाः ॥" (वा० रा० २।४३।१७)
"नूनं जात्यन्तरे तात स्त्रियः पुत्रैर्वियोजिताः।
जनन्या मम सौमित्रे तदद्यैतदुपस्थितम् ॥" (वा० रा० ५।५३।१९)

इन वचनों का उक्त निष्कर्ष निकालना सर्वथा अनभिज्ञता ही है। यह तो दुःखाभिभूत प्राणियों की मनो-
भावना का निदर्शन है। इसलिए ‘मन्ये’, ‘नूनम्’ आदि संभावना के सूचक शब्द हैं। कौशल्या अपना दुःख देखकर दुःख के
आधार पर कल्पना करती है, मैं समझती हूँ कि मैंने बहुत प्राणियों का वध किया होगा। उनका फल सामने उपस्थित
है। मैंने निःसंशय पयःपानार्थी बछड़ों की माताओं के (गायों के) स्तनों को काटा होगा। मैंने बहुत सी माताओं
को उनके पुत्रों से वियुक्त किया होगा। वस्तुतः बुल्के बेचारे संस्कृत ज्ञानशून्य होने के कारण ‘मन्ये’ शब्द का उत्प्रेक्षा
अर्थ मानने में समर्थ नहीं। अतः ये सब वनगमन के हेतु नहीं हैं। दुःखी हृदय की कल्पना मात्र हैं। आश्चर्य है बुल्के
को यह कैसे विश्वास हो गया कि कौशल्या या दशरथ या राम को जन्मान्तरीय हेतुओं का किस प्रकार ज्ञान हो गया।
अन्धमुनि-शाप की हेतुता कही जा सकती है और दशरथ को शाप का ज्ञान था ही। प्रत्यक्ष हेतु तो कैकेयी के लिए
वरदान हैं।

अनु० ४४४ वें में बुल्के कहते हैं कि “लक्ष्मण कैकेयी का वध करना चाहते थे। वाल्मीकिरामायण सर्ग २१
के अनुसार लक्ष्मण ने दशरथ को मार डालने का प्रस्ताव किया था एवं कौशल्या ने लक्ष्मण के उस प्रस्ताव का समर्थन
किया था। सभी रामकथाओं में राम इस परीक्षा में खरे उतर कर पिता की आज्ञा के पालन में दृढ़ रहे। परन्तु
उक्त विचार अशुद्ध हैं। वस्तुतः लक्ष्मण जैसे धर्मनिष्ठ व्यक्ति में दशरथ के वध की कल्पना नहीं की जा सकती है।
राम-प्रेमपरतन्त्र लक्ष्मण राम के विरुद्ध जो भी हो उसके प्रति अपना क्रोधमात्र व्यक्त कर रहे थे। वध शब्द का वहाँ
बन्धन भी अर्थ है। कैकेयी के भी वध की बात वहाँ नहीं है। अतएव अगले श्लोक में कहा गया है कि उत्पथ प्रतिपन्न
कार्याकार्य विवेकशून्य गुरु का भी शासन करना चाहिये। कौशल्या ने वध का समर्थन किया, यह कहना सर्वथा ही
निर्मूल है। लक्ष्मण की बात सुनकर रोती हुई शोकव्याकुल कौशल्या ने कहा पुत्र, तुमने लक्ष्मण की बात सुन ली।
अब जो उचित लगता है वह करो—‘यदत्रानन्तरं तत्त्वं कुरुष्व यदि रोचते।’ अनन्तरं युक्तं कार्यम् (तिलक)।
जो उचित है, अच्छा लगता है सो करो—‘‘अनेन कौशल्याया गूढं स्वानभिमतत्वं लक्ष्मणोक्तस्य सूचितम् ।’’
(तिलक) इससे स्पष्ट विदित होता है कि कौशल्या को लक्ष्मण की बात अभिमत नहीं है। ‘यदत्रानन्तरं तत्त्वं कुरुष्व
यदि रोचते।’ इस वाक्य में समर्थन का सूचक कोई भी शब्द नहीं है। ‘अनन्तरम्’ ‘यदि’ ‘रोचते’ तीनों बुल्के के
विरुद्ध हैं।

लक्ष्मण ने कहा—देवकल्प, ऋजु, दान्त तथा शत्रुओं पर भी अनुग्रह करनेवाले राम ऐसे पुत्र का त्याग
कौन कर सकता है। अतः पुनः बाल्यभाव को प्राप्त राजा को वनवास सम्बन्धी बात को राजवृत्त का स्मरण करने-
वाला कौन पुत्र हृदय में ला सकता है। अतः वनवास की बात प्रकट होने के पहले ही मेरे साथ आप को शीघ्र शासन
हस्तगत कर लेना चाहिए। धनुषयुक्त मेरे द्वारा सुरक्षित कृतान्त के समान आप के अभिषेक में विघ्न कौन कर
सकता है। भरत या भरतपक्षीय जो भी विपरीत होगा सबका वध कर दूँगा। यदि कैकेयी के प्रोत्साहन में पिता भी
प्रतिकूल होंगे तो उन्हें बन्धन में डाल दूँगा।

सेनासहित भरत के चित्रकूट पहुँचने पर लक्ष्मण ने जब भरत के वध करने की बात कही तब राम ने
लक्ष्मण को शान्त किया और कहा कि जब स्वयं भरत आये हैं तब धनुष की क्या आवश्यकता है ? भरत को मारकर
सापवाद राज्य से क्या लाभ ? बान्धवों और मित्रों के क्षय से जो द्रव्य मिलता है उसे विषमिश्रित भक्ष्य के समान मैं
कभी नहीं ले सकता हूँ (वा० रा० २।९८।३४)। वन में लक्ष्मण ने कैकेयी को क्रूरदर्शिनी कहा तो राम ने लक्ष्मण
से कहा कि मध्यमा माँ कैकेयी की गर्हणा नहीं करनी चाहिये—‘‘न तेऽम्बा मध्यमा तात गर्हितव्या ।’’ (वा० रा०
३।१६।३७) अतः स्पष्ट है कि प्रकृत में कैकेयी या दशरथ के मार डालने की बात यदि लक्ष्मण ने कही होती तो
राम ने अवश्य ही उसका विरोध किया होता। दशरथकथानम् के अनुसार सौतेली माँ के षड्यन्त्र के भय से

अध्याय अयोध्याकाण्ड ४६९
दशरथ राम और लक्ष्मण दोनों पुत्रों को बन में भेज देते हैं। अनामकं जातकं के अनुसार मामा के आक्रमण की
तैयारियाँ सुनकर स्वेच्छा से राम वन जाते हैं। पउमचरियं के अनुसार भी भरत को राज्य देने का समाचार सुनकर
वे स्वेच्छा से वन जाते हैं।
तिब्बती रामायण के अनुसार जब पिता 'किसको राज्य दें?' इस सम्बन्ध में किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये तब
राम आश्रम में जाकर तपस्या करने लगे। सेरीरामरामायण के अनुसार मन्थरा को पीटने के कारण राम की बदनामी
हो गयी थी। सीता-स्वयंवर के समय भरत को राज्य दिये जाने का समाचार सुनकर राम राजधानी न लौटकर
सीता एवं लक्ष्मण के साथ वन चले गये। सेरीराम के अन्य पाठ के अनुसार सीता, राम और लक्ष्मण घर लौट आते
हैं। भरत की माता भरत के लिए राज्य माँग लेती है और दशरथ के सोते समय ही राम को राज्य से वञ्चित होने
का समाचार सुनाती है। राम प्रसन्न होकर ऋषि बनने के लिए वन चले जाते हैं।
सिंहली रामकथा के अनुसार शनि की अशुभ दशा से बचने के लिए राम राजधानी छोड़कर सात वर्ष वन में
रहते हैं। पाश्चात्य वृत्तान्त नं० १ के अनुसार ताड़का-वध के प्रायश्चित्तस्वरूप राम तपस्या करने के लिए बन चले जाते
हैं। किसी अन्य वृत्तान्त के अनुसार एक ब्राह्मण के शाप से राम का ईश्वरीय ज्ञान लुप्त हो गया था। बाद में कैकेयी
की प्रार्थना से राम स्वेच्छा से ही वन में प्रवेश करते हैं। वस्तुतः मूल प्रमाण से जो लोग जितने दूर हुए हैं उन लोगों
की रामकथाओं में उतनी ही अधिक विकृतियाँ हुई हैं। भारतीय रामायणों, पुराणों, महाभारत तथा संहिताओं की
रामकथाओं तथा दूरत्व के दोषों के कारण या दुरभिसन्धि के कारण ये विकृतियाँ आ गयी हैं उनका समन्वय निरर्थक
एवं असम्भव ही हैं। यही कहा जा सकता है कि जिस किसी तरह भी राम-सम्बन्ध होना अच्छा ही है।
'भाव कुभाव अनख आलसहूँ। नाम जपत मङ्गल दिसि दसहूँ।'
(रा० मा० १।२७।१)
फिर भी रामायण तथा रामतत्त्व का याथात्म्य समझने के लिए वाल्मीकिरामायण, अध्यात्मरामायण,
आनन्दरामायण, महाभारत तथा पुराणों का ही आश्रयण अपेक्षित है। उसके बिना मूल आदर्श से वञ्चित रह जाने की
अधिक सम्भावना है।
कैकेयी को वर-प्राप्ति
४४७ वें अनु० में बुल्के कहते हैं "वाल्मीकिरामायण के अनुसार देवासुरसंग्राम में शम्बरासुर से युद्ध करते
हुए दशरथ आहत होकर कैकेयी द्वारा रणभूमि से हटाये जाते हैं। इसके लिए दशरथ उन्हें दो वर प्रदान करते हैं।
इनमें से वह एक से भरत के लिए राज्य और दूसरे से राम के लिए वनवास माँगती है-
"तत्राकरोन्महायुद्धं राजा दशरथस्तदा ।
असुरैश्च महाबाहुः शस्त्रैश्च शकलीकृतः ॥
अपवाह्य त्वया देवि संग्रामाद्भ्रष्टचेतनः ।
तत्रापि विक्षतः शस्त्रैः पतिस्ते रक्षितस्त्वया ॥
तुष्टेन तेन दत्तौ ते द्वौ वरौ शुभदर्शने ।
स त्वयोक्तः पतिर्देवि यदेच्छेयं तदा वरम् ॥
गृह्णीयाम्...............।" (वा० रा० २।९।१५-१७)
वाल्मीकिरामायण पश्चिमोत्तरीय पाठ में कहा गया है कि एक ब्राह्मण को प्रसन्न कर कैकेयी ने विद्याबल
पाया था। जिससे वह पति को बचाने में सफल हो सकी थी। शम्बर युद्ध में माया का सहारा लेता था, पर कैकेयी