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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

अध्याय कामिल बुल्के की रामकथा ४५
स्वयम्भुवा" (म० भा० १२।२३२।२५), "अत एव च नित्यत्वम्" (ब्र० सू० १।३।२९), "शब्द इति चेन्नातः
प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्" (ब्र० सू० १।३।२८) आदि से यह स्पष्ट सिद्ध होता है कि वेद-वाणी अनादि एवं
अनन्त है। उसकी उत्पत्ति और विनाश नहीं होता। हाँ, सम्प्रदाय-प्रवर्तन में उत्पत्ति और सम्प्रदाय-लोप में विनाश
का व्यवहार होता है।
वेदों में नदी, पर्वत, राजा आदि अनित्य अर्थ मानने पर अनित्य अर्थ से अनित्य शब्द का सम्बन्ध मानना
पड़ेगा। अतः शब्द और अर्थ का औत्पत्तिक स्वाभाविक नित्य सम्बन्ध मानने में विरोध होगा। इस पूर्वपक्ष का यह
समाधान किया है कि शब्द से अर्थ की सृष्टि होती है, यह बात प्रत्यक्ष अर्थात् श्रुति से और अनुमान अर्थात् स्मृति से
सिद्ध है। तथा च, नित्य शब्दों से अनित्य व्यक्तियों की उत्पत्ति मानने पर कोई विरोध नहीं होगा, क्योंकि व्यक्तियों
के अनित्य होने पर भी जाति नित्य है। अतः नित्य शब्द का और नित्य जाति का नित्य सम्बन्ध सिद्ध ही है। जैसे
न्यायाधीश आदि पदों के वाचक तथा इन्द्र आदि शब्द व्यक्ति के वाचक नहीं क्योंकि न्यायाधीश आदि पदों पर जो
भी व्यक्ति आयेंगे वहीं न्यायाधीश तथा इन्द्र आदि कहलायेंगे। अतएव वेदों की नित्यता सिद्ध है।
विष्णु-सहस्रनाम के 'रामो विरामो विरतः' में राम शब्द आता है। वाल्मीकि रामायण में भी कहा गया
है कि उदीर्ण रावण के वध की कामनावाले देवताओं की प्रार्थना से महातेजा विष्णु ही रामचन्द्र के रूप में प्रकट हुए—
“स हि देवैरुदीर्णस्य रावणस्य वधार्थिभिः ।
अर्थितो मानुषे लोके जज्ञे विष्णुः सनातनः ॥” (वा० रा० २।१।७)
इस दृष्टि से वेदों में आया हुआ विष्णु का नाम भी राम का ही नाम है। विष्णु की सब कथाएँ राम की
कथाएँ हैं, अतः वेदों में राम की विशिष्ट कथाओं का पर्याप्त वर्णन है। ऐसी स्थिति में रामकथा-सम्बन्धी सामग्री
का अभाव बताना अपनी दुरभिसन्धि एवं अनभिज्ञता का ही द्योतक है।
महाभारत प्रथम अथवा रामायण ?
दूसरे अध्याय के आरम्भ में श्रीबुल्के ने लिखा है "राम-कथासम्बन्धी आख्यान वाल्मीकिरामायण से पूर्व
भी प्रचलित थे। इसका आभास महाभारत के द्रोणपर्व तथा शान्तिपर्व के संक्षिप्त राम-चरित के निर्देशों से भी मिलता
है। ये आख्यान आजकल अप्राप्य हैं। इस प्रकार वाल्मीकिरामायण राम-कथा की प्राचीनतम विस्तृत रचना सिद्ध
होती है।"
वस्तुतः वाल्मीकिरामायण महाभारत एवं पुराणों की अपेक्षा बहुत प्राचीन रचना है। फिर महाभारत
के द्रोणपर्व या शान्तिपर्व में रामचरित का निर्देश मिलने से यह कैसे सिद्ध हो सकता है कि वाल्मीकिरामायण से भी
पूर्व राम-कथा प्रचलित थी ?
असभ्यता, एकपत्नीव्रत और विकासवाद
वास्तव में यह सब इतिहास बिगाड़नेवाले आजकल के तथाकथित ऐतिहासिकों की दुर्बुद्धि का परिणाम है
जिसके आधार पर कहा जाता है कि वाल्मीकिरामायण की अपेक्षा महाभारत प्राचीन ग्रन्थ है, क्योंकि महाभारत में
असभ्य एवं जङ्गली युग का प्राधान्येन वर्णन है। तभी उसमें कुन्ती, द्रौपदी आदि का अनेक पुरुषों से सम्बन्ध वर्णित
है। रामायण उसकी अपेक्षा अर्वाचीन है, क्योंकि उसमें एकपत्नीव्रत और पातिव्रत्य आदि का वर्णन है। परन्तु यह
सब नितान्त अशुद्ध और मनगढन्त कल्पना है, क्योंकि पुराण-आदि के रचयिता महर्षि व्यास ने वाल्मीकि और उनकी
रामायण का महत्त्व मानकर ही अपनी विशाल कृति महाभारत में रामचरित्र का वर्णन किया है, यह वाल्मीकि-
रामायण-माहात्म्य के वर्णन से भली-भाँति विदित होता है।

४६ रामायणमीमांसा द्वितीय
उत्तरकाण्ड की अर्वाचीनता
आगे चलकर श्रीबुल्के ने वाल्मीकिरामायण के पाठ-भेद की चर्चा की है। उन्होंने यह बताया है कि
“उत्तरकाण्ड की रचना बहुत बाद में हुई है, क्योंकि उसके तीनों पाठों में महत्त्वपूर्ण अन्तर नहीं है, जब कि शेष
काण्डों में स्थान स्थान पर यथेष्ट पाठ-भेद उपलब्ध हैं। दाक्षिणात्य पाठ में सीता-त्याग का कारण यह बताया गया
है कि भृगु ने अपनी पत्नी की हत्या के कारण ही विष्णु को शाप दिया था। यदि उत्तरकाण्ड प्रारम्भ से रामायण
का एक अङ्ग होता तो अन्य काण्डों की तरह इस काण्ड में भी परिवर्तन उपलब्ध होते।”
पर ये सब विचार असङ्गत ही हैं। दाक्षिणात्य पाठ, गौडीय पाठ एवं पश्चिमोत्तरीय पाठ सम्प्रदाय-भेद से
हुए हैं। काश्मीर तथा नेपाल की प्रतियों में भी पाठ-भेद पाया जाता है। बड़ौदा के शोध-संस्थान में इन प्रतियों का
उपयोग भी किया जा रहा है। प्राचीन काल में कण्ठस्थ विद्याओं का ही सर्वाधिक महत्त्व होता था। वेदों के सम्बन्ध
में आज भी वही परिपाटी प्रचलित है। दुर्गासप्तशती में भी, जिसके बहुत ही अधिक अनुष्ठान आज भी गौड़,
मैथिल एवं दाक्षिणात्यों में प्रचलित हैं, पाठ-भेद उपलब्ध हैं।
पाठ-भेद में कमी होने से उत्तरकाण्ड की अर्वाचीनता मानना निष्प्रमाण है। “सत्यारोपे निमित्तानुसरणं
न तु निमित्तमस्तीत्यारोपः” इस न्याय के अनुसार आरोप होने पर ही उसके निमित्त का अनुसरण किया जाता है,
यह नहीं कि निमित्त के आधार पर आरोप किया जाय। शुक्ति में रजत का आरोप होने पर ही सादृश्यादि निमित्तों
को आरोप का हेतु माना जाता है, यह नहीं कि शुक्ति एवं रजत का सादृश्य है, इसलिए शुक्ति में रजत का आरोप
अवश्य ही किया जाय। इस दृष्टि से, पाठ-भेद होने पर उसके निमित्त का अन्वेषण करना चाहिये न कि पाठभेद
नहीं है, इसलिए उसको वाल्मीकिकृत रामायण ही न माना जाय।
वैदिक दशरथ बनाम रामायणीय दशरथ
दशरथ के सम्बन्ध में बुल्के कहते हैं —
“चत्वारिंशद्दशरथस्य शोणाः सहस्रस्याग्रे श्रेणि नयन्ति ।” (ऋ० सं० १।१२६।४)
यानी दशरथ के भूरे रङ्ग के चालीस घोड़े एक हजार घोड़ों के दल का नेतृत्व कर रहे थे।” वस्तुतः
यह सात ऋचाओं का सूक्त है। आदि से पाँच ऋचाओं के ऋषि कक्षीवान् हैं। मन्त्रों का द्रष्टा या वक्ता ऋषि होता
है। मन्त्रों द्वारा जिसका निरूपण होता है, वह देवता होता है। “या तेनोच्यते” (अनु० २।५।१२५)।
सूक्त के भाष्यारम्भ में ही सायण ने एक प्रसिद्ध इतिहास का वर्णन किया :—
दीर्घतमा महर्षि के पुत्र कक्षीवान् ने ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करते हुए वेदाध्ययन के लिए चिरकाल तक
गुरुकुल में निवास किया तथा वेदों का भली भांति अध्ययन कर व्रतों का यथायोग्य परिपालन किया। अनन्तर गुरु की
अनुज्ञा लेकर उन्होंने अपने घर की ओर प्रस्थान किया। रात्रि को मार्ग में ही उन्होंने विश्राम किया। वही भावयव्य
का पुत्र स्वनय नाम का नृपति अपने अनुचरों के साथ सैर करता हुआ अकस्मात् कक्षीवान् के पास आया। कक्षीवान्
सहसा जाग उठे। उन्होंने स्वनय को अपने सम्मुख खड़ा पाया। कक्षीवान् सहसा प्रतिबुद्ध होकर उठे ही थे कि राजा
ने उनका हाथ पकड़कर उनको अपने आसन पर बैठा लिया और उनके सौन्दर्य से मुग्ध होकर उन्हें अपनी कन्याएँ
प्रदान करने की इच्छा व्यक्त की। उनका नाम, गोत्र आदि पूछा। कक्षीवान् ने अपने पिता और अपना वृत्तान्त
बताया। राजा ने संभाव्य (कुलीन) समझ कक्षीवान् को अपने घर ले जाकर मधुपर्क, वस्त्र, माल्य आदि से पूजन
किया और रथ सहित दस कन्याएँ, दो सौ निष्क (सुवर्णमुद्राएँ), सौ घोड़े, सौ बैल और एक हजार साठ गौएँ
उन्हें प्रदान कीं। पुनश्च एकादश रथ भी दिये। कक्षीवान् ने सब सामग्री लेकर अपने पिता दीर्घतमा को अर्पित
कर दी।

अध्याय कामिल बुल्के की रामकथा ४७
एक सौ पचीसवें (१२५) सूक्त में दान की स्तुति है, अतः दान ही उसका देवता है। उपर्युक्त विषय ही
उस सूक्त के मन्त्रों में वर्णित है -
“प्राता रत्नं प्रातरित्वा दधाति तं चिकित्त्वान् प्रतिगृह्या नि धत्ते ।
तेन प्रजां वर्धयमान आयू रायस्पोषेण सचते सुवीरः ॥” (ऋ० सं० १।१२५।१)
अर्थात् स्वनय नाम के राजा ने प्रातःकाल ही मेरे समीप आकर रत्न—रमणीय रत्नादिक मेरे सामने
रखे। उन स्थापित समस्त वस्तुओं को मैंने निर्दुष्ट जाना और स्वीकार कर उन्हें अपने पिता को समर्पित कर दिया ।
“उस निष्क आदि से पुत्र, भृत्य आदिरूप प्रजा का पोषण एवं जीवन-संवर्धन करते हुए शोभन वीरों से युक्त धनों के
पुनः पुनर्वर्धन से वह राजा संगत या समुपयुक्त हो ।” राजा के लिए ऋषि का यह आशीर्वाद है।
एक सौ छब्बीसवें (१२६) सूक्त की पाँच ऋचाओं के भी वही कक्षीवान् ऋषि हैं। उनमें भी भावयव्या-
त्मज राजा स्वनय के दान की ही स्तुति है। तीसरे मन्त्र में कहा गया है कि राजा स्वनय के दिये हुए श्यामवर्ण के
घोड़ों से युक्त ऐसे दस रथ मेरे समीप उपस्थित हुए जिनमें सुन्दरी नवोढ़ा वधुएँ बैठी हुई थीं। स्वनय के दिये हुए
एक हजार साठ गायों का समूह भी मेरे पास आया। अपना परोक्षरूप से निर्देश करते हुए ऋषि कहते हैं—उन
सबको स्वीकार कर कक्षीवान् ने सन्निहित दिनों में ही पिता को अर्पित कर दिया ।
'अभिपित्व' और 'प्रपित्व' शब्द सन्निहित-काल के बोधक हैं ।
“उप मा श्यावाः स्वनयेन दत्ता वधूमन्तो दश रथासो अस्थुः ।
षष्टिः सहस्रमन्व गव्यमागात् सनत् कक्षीवां अभिपित्वे अह्नाम् ॥” (ऋ० सं० १।१२६।३)
चतुर्थ मन्त्र में उसी दस रथवाले कक्षीवान् का ही वर्णन है ।
"चत्वारिंशद्दशरथस्य शोणाः सहस्रस्याग्रे श्रेणिं नयन्ति ।
मदच्युतः कृशनावतो अत्यान् कक्षीवन्त उद्मृक्षन्त पज्रा ॥” (ऋ० सं० १।१२६।४)
दस रथवाले सहस्रसंख्यक अनुचरों या सहस्रसंख्यावाले गो-यूथों से युक्त कक्षीवान् के आगे-आगे लाल वर्ण
के चालीस घोड़े श्रेणीबद्ध होकर रथों को अभिमत प्रदेश में ले जाते हैं। अथवा चालीस घोड़े अश्व-नियुक्त रथों को
श्रेणीबद्ध बनाते हैं। कक्षीवान् के अनुचर उन घोड़ों के मार्गश्रमजनित स्वेद का अपनोदन करने (हटाने) के लिए
उत्तम रूप से मार्जन करते हैं। कक्षी अश्वबन्धनी रज्जु का नाम है। उस रज्जु को रखनेवाले कक्षीवान् ऋषि के
अनुचर भी कक्षीवान् हुए ।
वृद्ध राजा कलिङ्ग ने अपनी रानी में पुत्रोत्पादन के लिए दीर्घतमा ऋषि से प्रार्थना की, परन्तु लज्जाव-
शात् रानी ने स्वयं उनके पास न जाकर अपने ही भूषण-वस्त्रों से अलङ्कृत कर उशिक नामवाली अपनी दासी को
भेज दिया। महर्षि ने योगबल से सब जान लिया और मन्त्रपूत जल के द्वारा उसे ऋषि-पुत्री बना लिया और उसमें
गर्भाधान किया। उसीसे कक्षीवान् ऋषि की उत्पत्ति हुई। श्रीसायण ने १२५ वें सूक्त के आरम्भ में यह भी कहा
है कि अश्वबन्धनी रज्जु के सम्-बन्ध से क्षत्रिय-सम्बन्ध सूचनार्थ ही ऋषि का कक्षीवान् नाम भी हुआ था ।
अस्तु, कक्षीवान् ऋषि के, अश्व-बन्धनी रज्जु से युक्त अनुचर, घास आदि तथा अन्न आदि से युक्त होकर
उन घोड़ों की मार्जनादि परिचर्या करते हैं। वे घोड़े भी मद-स्रावी हैं अर्थात् मत्त या अत्यन्त प्रबल हैं अथवा
शत्रुओं का मद चूर्ण करनेवाले हैं और कृशनावान् अर्थात् सुवर्णमय भूषणों से युक्त हैं और अत्य अर्थात् निरन्तर
चलनेवाले हैं।

४८ रामायणमीमांसा द्वितीय
इस तरह उक्त मन्त्र से दस रथ एवं सहस्र गो-यूथवाले कक्षीवान् ऋषि का वर्णन है, दशरथ नाम के
किसी राजा का नहीं तथापि आपने (श्रीबुल्के ने) दशरथ राजा का वर्णन उक्त मन्त्र में मान लिया। तीसरे मन्त्र में
'सहस्रं गव्यम्' इस रूप से 'सहस्र' गव्य का विशेषण है। अतः "लाल घोड़े सहस्र घोड़ों का नेतृत्व करते हैं"—यह
अर्थ नहीं बन सकता है।
उक्त मन्त्र का पुराण और इतिहासों के अनुसार राजा 'दशरथ' अर्थ निकल सकता है। दसों दिशाओं
में जिनके दस प्रधान रथों की अव्याहत गति हो—वह अखण्ड भूमण्डल के प्रसिद्ध सम्राट्, इन्द्र की सहायता के
लिए देवलोक की भी यात्रा करनेवाले 'महाराज दशरथ' हैं। अश्वबन्धनी रज्जु उनके हाथ में रहती है, इसलिए
वे कक्षीवान् भी हैं। उनके चालीस लाल घोड़े सहस्र अर्थात् अपरिमित सैनिकों एवं अश्वों के आगे-आगे, पंक्तिबद्ध
होकर, अभिमत प्रदेश में सम्राट् के रथ को पहुँचाते हैं। वे मदस्रावी एवं शत्रुमद-मोचक, सतत गमनशील एवं
दिव्य सौवर्ण भूषणों से अलङ्कृत हैं। सम्राट् का अनुसरण करनेवाले भृत्यगण कक्षीवान् अश्वबन्धनी रज्जु हाथ में
लिए घास, दाना आदि लेकर स्नपन, मार्जन आदि द्वारा उनको छरहरे बनाते रहते हैं। इस तरह उक्त मन्त्र
'दशरथ सम्राट्' के अर्थ में भी संगत हो जाता है।

तृतीय अध्याय
पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त
सम्प्रदायभेद से ग्रन्थों में प्रामाणिक पाठभेद होते हैं। व्यवहार में अत्यन्त प्रचलित दुर्गासप्तशतीपाठ
में भी यह भेद दृष्ट है। वे सब मन्त्र माने जाते हैं। उसी प्रकार वाल्मीकिरामायण के धार्मिक अनुष्ठान लाखों की
संख्या में हुए हैं, हो रहे हैं और यावच्चन्द्रदिवाकरौ होते ही रहेंगे। इसी लिए विभिन्न संस्करणों की कई पुस्तकों
में, आरम्भ में ही, विभिन्न सम्प्रदायों के मङ्गलाचरण आदि भी दिए हुए होते हैं।
यह ठीक है कि प्राचीनकाल में कण्ठस्थ करने की ही प्रवृत्ति अधिक प्रचलित थी। महर्षि वाल्मीकि ने ही
विभिन्न प्रकार के श्लोक बनाए होंगे और शिष्यों को उपदेश करते हुए भिन्न-भिन्न पाठों का उपदेश भी किया होगा।
यह भी प्रसिद्ध है कि उन्होंने शतकोटिप्रविस्तर रामायण का निर्माण किया था। उसी का सार २४
हजार श्लोकों का वर्तमान प्रसिद्ध वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ है।
इस दृष्टि से शाखाभेद से वेदों के पाठ जैसे भ्रान्ति से नहीं किन्तु प्रामाणिक ही हैं, वैसे ही सम्प्रदाय-
भेद से वाल्मीकिरामायण, दुर्गासप्तशती आदि के पाठभेद, भूल या भ्रान्ति से नहीं, किन्तु प्रामाणिक ही हैं। इसी
दृष्टि से कुछ कथाभेद भी, कल्पभेद होने के कारण, प्रामाणिक ही हैं। प्रसिद्ध है—
“कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन गाए ।।” (रा० मा० १।३२।४) श्रीमद्भागवत में
भी सम्प्रदायभेद से पाठभेद मान्य है।
पुस्तकें देखकर मनमाने ढङ्ग से पाठ करना या समालोचना करना, यह आधुनिक पद्धति है। प्राचीन
काल में ये सभी आर्ष ग्रन्थ गुरु-परम्परा से पढ़े जाते थे, अतः गुरु-परम्परा ही प्रामाणिक पाठ की कसौटी है।
कतक, तीर्थ, भूषण, रामाभिरामी आदि टीकाकारों ने वाल्मीकिरामायण के कई सर्गों को प्रक्षिप्त बताकर उनकी
टीका नहीं की है। नागेश ने कई सर्गों के प्रक्षिप्त होने से उनकी टीका नहीं की और बतलाया है कि कतक ने
तथा तीर्थ ने भी इन्हें प्रक्षिप्त माना है।
श्रीमद्भागवत के सम्बन्ध में भी यही बात है। भागवत के प्रसिद्ध टीकाकार श्रीधर स्वामी ने लिखा है
कि मैं स प्रदाय-परम्परा से पौर्वापर्य के अनुसार टीका कर रहा हूँ—
“सम्प्रदायानुरोधेन पौर्वापर्यानुसारतः ।
श्रीभागवतभावार्थदीपिकेयं प्रतन्यते ।। (भा० टी० १।१।१)
इसी आधार पर वाल्मीकिरामायण में भी प्रक्षिप्त, अप्रक्षिप्त आदि का निर्णय करना उचित है।
अतः दाक्षिणात्य, गौड़ीय, पश्चिमोत्तरीय, उदीच्य आदि पाठभेदों के कारण किसी अंश को क्षेपक कहना
अनुचित है, क्योंकि इस तरह परस्पर विरोध होने से किसी भी पाठ की सत्यता में सन्देह ही बना रहेगा। दाक्षिणात्य
पाठ में भी वामनावतार आदि, अगस्त्य द्वारा सूर्यस्तव देना आदि अत्यन्त प्रामाणिक हैं। परम्परा से उनका पाठ
प्रचलित है। नागेश आदि ने उन अंशों पर टीका भी लिखी है।
भारत में कोटि कोटि आस्तिक राम और रामायण के भक्त हैं। बहुतों में रामायण के पाठ की परम्परा
है। आदित्यहृदय का पाठ तो आज भी लाखों व्यक्ति करते हैं। यदि भारतीय टीकाकार और उपासकों का पाठ

प्रामाणिक नहीं, तो बाहर के लोगों, जिनकी भाषा, सभ्यता आदि सब कुछ भिन्न हैं, के निर्णय के आधार पर सत्य
पाठ कैसे प्रामाणिक होगा ?
पाश्चात्यों का रोग
इसी प्रकार "रामायण का रचनाकाल" शीर्षक पृ० ३२ से विचार करते हुए श्रीबुल्के ने अनेक पाश्चात्य
विद्वानों के मत उद्धृत करते हुए कहा है कि "ई० एक शताब्दी के पूर्व पहले पहल रामायण ग्रन्थ विख्यात होने लगा
था । कुछ विद्वान् इसे बहुत प्राचीन १२ शती से ११ शती ई० पूर्व की रचना मानते हैं। डॉ० वेबर ने रामायण
पर यूनानी तथा बौद्ध प्रभाव मानकर उसकी रचना अपेक्षाकृत अर्वाचीन मानी है।"
परन्तु ये सब कल्पनाएँ निराधार ही हैं। प्रायः पाश्चात्यों को यह रोग हैं कि वे लोग ईसा से पूर्वकाल में
सभ्यता के विकास को असम्भव समझते हैं। अतः वे ईसा के इधर-उधर ही सब महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों तथा ग्रन्थों का
काल निश्चित करने का प्रयत्न करते रहते हैं। मूल ग्रन्थ में ही जब रामायण का रचनाकाल निर्दिष्ट है तब फिर अटकल
लगाने की क्या आवश्यकता है ? क्या वाल्मीकिरामायण के रचनाकाल के सम्बन्ध में भी ऐसी अटकल लगानी ठीक
होगी ? इसी लिए उनका यह भी कहना ठीक नहीं है कि वाल्मीकि की प्रामाणिक रचना आदिरामायण और प्रचलित
वाल्मीकिरामायण का काल पृथक् पृथक् है। किन्तु प्रामाणिक अप्रामाणिक रामायण का निर्णय भारतीय परम्परा से
रामायण जानने और मानने वाले ही कर सकते हैं न कि यहाँ की भाषा, सभ्यता आदि से अपरिचित कोई विदेशी
व्यक्ति । उत्तरकाण्ड में पाठभेद कम होने से उसे अर्वाचीन मानना भी उपहासास्पद ही है। यह कोई व्याप्ति नहीं है
कि जो प्राचीन है उसमें पाठभेद हो तथा जो अर्वाचीन है उसमें पाठभेद न हो। तुलसीकृत रामचरितमानस
वाल्मीकिरामायण की अपेक्षा अत्यन्त नवीन रचना है, पर इसमें भी अधिक पाठभेद हैं।
आठवें अध्याय में श्रीबुल्के ने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि "उत्तरकाण्ड और बालकाण्ड
वाल्मीकिकृत रचना में विद्यमान नहीं थे।" उत्तरकाण्ड के प्रक्षिप्त होने के प्रमाण में उन्होंने २२ वें से २६ वें तक
पाँच अनुच्छेदों में वर्तमान में उपलब्ध अनेक पाठों की तुलना की है। इसका उत्तर पीछे दिया जा चुका है कि प्रामा-
णिक पाठभेद सम्प्रदाय-भेद के कारण है और उसके आधार पर किसी को क्षेपक नहीं कहा जा सकता । दूसरा कारण
श्रीबुल्के ने यह कहा है कि युद्धकाण्ड के अन्त में "रामायणमिदं कृत्स्नम्" (वा० रा० ६।१३०।११६)
इस फलश्रुति के अनुसार "रामायण ग्रन्थ वहीं समाप्त माना जाता है" यह भी ठीक नहीं है। पहले तो कतक-
व्याख्यान के अनुसार फलश्रुतिवाला यह श्लोक युद्धकाण्ड में है ही नहीं, अतः अनिश्चित आधार पर की गयी कल्पना
निःसार सिद्ध होती है। इसके अतिरिक्त रामायण के उत्तरकाण्ड के आधार पर, उसके पूर्वकाण्ड और उत्तरकाण्ड ये
दो प्रमुख काण्ड मान्य हैं और पूर्वकाण्ड चूंकि सबसे बड़ा है, अतः पूर्वकाण्ड की समाप्ति पर फलश्रुति का कथन कोई
अनुचित नहीं है। एक और भी सुन्दर तर्क है, वह यह कि यदि फलश्रुति ही ग्रन्थसमाप्ति का चिह्न हो तो पहले ही
अध्याय के अन्त में फलश्रुति है—
"पठन् द्विजो वागृषभत्वमीयात् स्यात् क्षत्रियो भूमिपतित्वमीयात् ।
वणिग्जनः पण्यफलत्वमीयात् जनश्च शूद्रोऽपि महत्त्वमीयात् ॥" (वा०रा० १।१।१००)
ऐसी स्थिति में यह भी मानना क्या उचित होगा कि केवल एक प्रथम सर्ग ही रामायण है और शेष
सब क्षेपक ही है। पर यह समझना क्या असङ्गत नहीं है ? गीता के १५ वें अध्याय में भगवान् ने कहा है—मैंने
यह गुह्यतम शास्त्र तुम्हारे लिए कहा है। इसको जानकर बुद्धिमान् पुरुष कृतकृत्य हो जाता है—
"इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
एतद् बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत ।" (गी० १५।२०)

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ५१.
अब क्या श्रीबुल्के के फलश्रुतिवाले सिद्धान्त के अनुसार यह मान लिया जाय कि गीता १५ अध्याय की
है और अन्त के ३ अध्याय प्रक्षिप्त हैं ? “रामायणमिदं कृत्स्नम्”—इस पद्य के 'कृत्स्नं' शब्द से सम्पूर्ण पूर्वकाण्ड ही
निर्दिष्ट हुआ है, ऐसा समझना चाहिये । ब्राह्मण-भाग वेद में ही कहा गया है—
“पूर्णाहुत्या सर्वान् कामानाप्नोति ॥”
पूर्णाहुति से सब काम प्राप्त होते हैं तो क्या अश्वमेध, राजसूय आदि यज्ञों के भी सभी फल पूर्णाहुति से
मिल जाते हैं, यह मान लिया जाय ? वस्तुतः यह अर्थ सङ्गत नहीं है। वहाँ प्रकृत यज्ञ के फल के अभिप्राय से 'सर्व-
काम' शब्द का प्रयोग समझना चाहिये । ठीक वैसे ही 'कृत्स्न' शब्द का तात्पर्य भी पूर्वकाण्ड की सम्पूर्णता में ही है ।
इसी तरह बालकाण्ड के प्रक्षिप्त होने का प्रमाण दिया गया है कि “बालकाण्ड के प्रथम सर्ग में जो अनुक्रम-
णिका मिलती है, उसमें अयोध्याकाण्ड से युद्धकाण्ड तक के विषयों का ही उल्लेख है। बाद में इस अनुक्रमणिका की
अपूर्णता का अनुभव हुआ, तब दूसरी अनुक्रमणिका की रचना की गयी, जिसमें बालकाण्ड की सामग्री के साथ उत्तर-
काण्ड का भी उल्लेख मिलता है—
“स्वराष्ट्ररञ्जनं चैव वैदेह्याश्च विसर्जनम् ॥
अनागतञ्च यत्किञ्चिद् रामस्य वसुधातले ।
तच्चकारोत्तरे काव्ये वाल्मीकिर्भगवानृषिः ॥” ( वा० रा० १।३।३८,३९ )
अगले सर्ग में भी—
“प्राप्तराज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषिः ।
चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत् ।'
“कृत्वा तु तन्महाप्राज्ञः सभविष्यं च सोत्तरम् ॥” ( वा० रा० १।४।१, ३ )
इन दो उद्धरणों से स्पष्ट प्रतीत होता है कि बालकाण्ड की इस भूमिका के रचना-काल में उत्तरकाण्ड
की सृष्टि प्रारम्भ हो चुकी थी । फिर भी सीता-त्याग को छोड़कर किसी अन्य विषय का उल्लेख न होने के कारण
ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तरकाण्ड उस समय अपना वर्तमान रूप और विस्तार नहीं प्राप्त कर पाया था । इस
तर्क की इससे पुष्टि होती है कि बाद में वाल्मीकिरामायण के उदीच्य पाठ में एक तीसरी अनुक्रमणिका जोड़ी गयी
है, जिसमें सातों काण्डों की सामग्री का ध्यान रखा गया है ।”
विचार करने से श्रीबुल्के के ये सब तर्क निःसार सिद्ध हो जाते हैं। असल में प्रथम सर्ग तो मूलरामायण
है । वह वाल्मीकिरामायण की अनुक्रमणिका है ही नहीं। उसके वक्ता तो नारदजी हैं। वाल्मीकिजी ने तो उस
संवाद को ज्यों का त्यों श्लोकबद्ध भर कर दिया था । उसमें “को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके” के अनुसार वर्तमान
समय में ऐसा गुणवान् पुरुष कौन है ? वाल्मीकि का प्रश्न था, अतः राम के तात्कालिक स्वरूप से ही वर्णन
आरम्भ हो गया । राम के जन्म और विवाह आदि की चर्चा का भी उसी में अन्तर्भाव समझना चाहिये । जैसे
दीपक जलने के साथ ही उसकी प्रभा भी प्रकट होती है और उस प्रभा का वर्णन पृथक् न होने पर उसे भी उसी
में समझा जा सकता है । जैसे “राजाऽसौ गच्छति” कहने पर भी सामात्य सवाहन सोपकरण राजा का गमन
प्रतीत होता है वैसे ही सीता और लक्ष्मण सहित राम का वन गमन कहने से ही राम, लक्ष्मण, सीता आदि का
जन्म और विवाह आदि भी समझ लेना चाहिये ।
मूलरामायण का संक्षेप होना तो उचित ही था । मूलरामायण को वाल्मीकिरामायण की अनुक्रमणिका
मानना विशुद्ध भ्रान्ति ही है । वाल्मीकिरामायण की अनुक्रमणिका तो तीसरा सर्ग ही है। तीसरी अनुक्रमणिका के
प्रक्षिप्त होने पर भी मुख्य अनुक्रमणिका को प्रक्षिप्त सिद्ध करने में कोई भी तर्क सक्षम नहीं है। एक व्यक्ति के

अन्धे होने मात्र से दूसरे को भी अन्धा कहना अन्धता का ही परिचय देना है। यह कैसे हो सकता था कि राम,
सीता आदि का जो विशाल चरित्र हजारों श्लोकों में लिखा गया, उसमें चरितनायक के जन्म, स्थान, पिता, माता
और विवाह आदि का उल्लेख तक न किया जाय। जब आज का साधारण लेखक भी ऐसी भूल नहीं करता है तो
सर्वज्ञ महर्षि वाल्मीकि ऐसी भूल कैसे कर सकते थे ? भूमिका के बारे में यही बात है; क्योंकि जब भूमिका के बिना
कोई सामान्य लेख या भाषण भी नहीं होता, तब भूमिका के बिना “गच्छता मातुलकुलम्” ( वा० रा० २।१।१ )
अयोध्याकाण्ड के इस श्लोक से आदि काव्य रामायण का आरम्भ कैसे संगत हो सकता था ? साथ ही जब विष्णु
या परमात्मा का मर्त्यलोक में किसी कारण से आगमन या अवतार का वर्णन हुआ तब कार्य के सम्पन्न हो जाने
पर उनका स्वधाम में प्रवेश-वर्णन भी उचित ही है; अतः उत्तरकाण्ड बालकाण्ड की भांति ही अत्यन्त संगत है।
आज भी किसी ऐतिहासिक व्यक्ति के जन्म और स्वर्गवास दोनों का ही वर्णन होना अनिवार्य माना जाता है।
अतः ऐसी ऊटपटांग कल्पनाओं के बल पर वाल्मीकिरामायण जैसे पवित्रतम पूजनीय ग्रन्थ के पूरे के
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अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ५३
स्पष्ट करने के लिए निमि की कथा भी संगत ही है। निमि के प्रसंग से वसिष्ठ की कथा भी संगत ही है। इस
तरह साधारण विषयानुक्रम पढ़ने से भी संगति स्पष्ट हो जाती है। रावणादि के वध के अनन्तर राज्यासनासीन
राम से मिलने कौशिक आदि महर्षियों का आगमन, राम का स्तवन, इन्द्रजित् मेघनाद के वध की प्रशंसा सुनकर
राम के मन में विशेष जिज्ञासा से प्रश्न और महर्षियों द्वारा रावणादि के जन्म का वर्णन भी संगत ही है।
श्रीबुल्के के मतानुसार "सीता-त्याग, शत्रुघ्न-चरित, शम्बूक-वध, राम का अश्वमेध, सीता-तिरोधान आदि
में कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है।" पर वे कौन सा विशेष सम्बन्ध चाहते हैं यह नहीं बताते। महान् महान् विद्वान्
टीकाकारों को उन कथाओं के सम्बन्ध में कोई शङ्का नहीं है। नागेश के शब्देन्दुशेखर, परिभाषेन्दुशेखर, लघुमञ्जूषा
तथा बृहन्मञ्जूषा इतने कठिन एवं गम्भीर ग्रन्थ हैं जिनका कम-से-कम पाश्चात्य देशों में तो कोई विद्वान् है ही
नहीं, जो उनकी शङ्काओं की गहराई समझ सके। उन महापण्डित नागेश की लिखी हुई वाल्मीकिरामायण
की रामाभिरामी टीका है। उनकी दृष्टि में उत्तरकाण्ड एवं उसकी सब कथाएँ पूर्ण सङ्गत हैं। संस्कृत की उन
टीकाओं को गुरु-परम्परा से पढ़ने पर ही वाल्मीकिरामायण का अभिप्राय अवगत हो सकता है। इसी तरह उत्तर-
काण्ड में अवतार की व्यापकता देखकर भी श्रीबुल्के को उत्तरकाण्ड खटकता है। परस्पर विरोध दिखाते हुए
बुल्के यह भी कहते हैं कि "युद्धकाण्ड के अन्तिम सर्ग में सुग्रीव आदि के विदा हो जाने का स्पष्ट उल्लेख हुआ है;
फिर भी उत्तरकाण्ड में उनके प्रस्थान का वर्णन किया जाता है।" पर इतना ही क्यों ? युद्धकाण्ड के अन्त में
रामराज्य का भी तो वर्णन हो चुका था फिर विशेषतः उत्तरकाण्ड की विशेषताओं का वर्णन हुआ। युद्धकाण्ड
के अन्तिम सर्ग में जो बातें बहुत संक्षेप में कही गयी थीं, उन्हीं का उत्तरकाण्ड में कुछ विस्तार से कहना असङ्गत
नहीं है। ग्रन्थकारों की यह पद्धति होती है। युद्धकाण्ड में सिर्फ छः श्लोकों में सुग्रीव, विभीषण आदि का विसर्जन
कहा गया है। उसी वस्तु का उत्तरकाण्ड में ३९वें और ४०वें दो सर्गों में विस्तार से वर्णन कर दिया गया—इसे
कोई भी समझदार व्यक्ति विसङ्गत कैसे कहेगा ? इसी तरह श्रीबुल्के वेदवती वृत्तान्त का सीता-जन्म के प्रसङ्ग
में तथा अन्य काण्डों में न होना भी उसके प्रक्षिप्त होने का कारण समझते हैं। वस्तुतः ये सब इतनी तुच्छ बातें
हैं कि इन विषयों पर समय का व्यय करना ही व्यर्थ है। ब्रह्मसूत्र में, प्रथमाध्याय के प्रथम पाद के दूसरे सूत्र में
ब्रह्म का लक्षण कहा गया है—"जन्माद्यस्य यतः" (ब्र० सू० १।१।२) सम्पूर्ण दृश्य विश्वप्रपञ्च का जिससे जन्म,
स्थिति एवं प्रलय होता है वह ब्रह्म है। सैकड़ों सूत्रों के पश्चात् पुनः कहा है कि ब्रह्म जगत् का उपादान कारण है,
क्योंकि एकविज्ञान से सर्वविज्ञान की प्रतिज्ञा और मृल्लोष्ठादि के दृष्टान्त निमित्तकारणमात्र में नहीं बनते हैं, उपादान
कारण में ही वे सङ्गत होते हैं। "प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्" (ब्र० सू० १।४।२४)। यह सिद्धान्त
सर्वमान्य हैं, किन्तु आप के अनुसार तो वह विश्वकारणत्व-निरूपण के प्रसङ्ग में न होने के कारण क्षेपक ही
ठहरेगा। वास्तव में ये सब बुल्के महाशय की दुःशङ्काएँ शास्त्रज्ञानशून्यता का ही परिणाम हैं। मीमांसा तथा
मीमांसानुसारी निबन्धादि ग्रन्थों का परस्पर असङ्गत-से प्रतीत होनेवाले वचनों का समन्वय करना ही मुख्य कार्य
है। विभिन्न उपनिषदों में कहीं-कहीं समान विद्याओं में भी कुछ अंश आवश्यकता से अधिक हैं तथा कुछ अंशों का
सर्वथा अभाव है तो भी उन समान विद्याओं में समन्वय कर एक शाखा की विद्या में अनुक्त अङ्गों की पूर्ति दूसरी
शाखा से कर ली जाती है। किन विद्याओं में गुणों का शाखान्तरों से उपसंहार होता है और किन में नहीं होता
तथा उसमें क्या हेतु है—इसी निर्णय के लिए ब्रह्मसूत्र में 'गुणोपसंहारानुपसंहार' विचार तीसरे अध्याय के तीसरे
पाद में किया गया है।
यह भी श्रीबुल्के को ज्ञात होना चाहिए कि महाभारत में वर्णित रामचरित का आधार भी प्रचलित
वाल्मीकिरामायण ही है। महाभारत में ग्रन्थ का संक्षेप में वर्णन होना या कुछ ही अंश का वर्णन होना भी कोई
अनहोनी बात नहीं है। रामचरितवर्णन का अभिषेक पर ही समाप्त हो जाना भी अनिवार्य नहीं है। मङ्गलान्त

ग्रन्थ लिखने की दृष्टि से कई ग्रन्थकारों ने ऐसा किया भी है, परन्तु उससे सम्पूर्ण चरित्र के वर्णन पर कोई प्रतिबन्ध
नहीं आता । रावणवध, भट्टिकाव्य, जानकीहरण, अनर्घराघव, बालरामायण आदि का वैसा रूप होने पर भी,
महाकवि कालिदास का रघुवंश वैसा नहीं है । कालिदास ने बालकाण्ड के—'मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः' की
चर्चा करते हुए इसे प्रथम काव्य माना है । हर्षवर्धन ने भी वैसा ही माना है। शैली की दृष्टि से कवि किसी प्रसंग
में कभी एक तरह की शैली अपनाता है तो कभी दूसरी तरह की। क्या अन्य काण्डों की शैलियों की अपेक्षा
सुन्दरकाण्ड की शैली भिन्न नहीं है ? सुन्दरकाण्ड के जैसे अनुप्रासबहुल गम्भीर पाण्डित्यपूर्ण श्लोक क्या अन्यत्र हैं ?
फिर क्या इतने से ही सुन्दरकाण्ड को प्रक्षिप्त मान लें ?

बालकाण्ड में उर्मिला-लक्ष्मण का विवाह होने को भी श्रीबुल्के उस काण्ड के प्रक्षिप्त होने का कारण
कहते हैं। अयोध्याकाण्ड में कहीं उर्मिला का उल्लेख नहीं मिलता। अरण्यकाण्ड में लक्ष्मण को अविवाहित कहा
कहा गया है—"अकृतदारः" (वा० रा० ३।१८।१), यह कथन भी ठीक नहीं, क्योंकि “स्वेच्छया श्लक्ष्णया वाचा
स्मितपूर्वमथाब्रवीत्” (वा० रा० ३।१८।४) से स्पष्ट विदित होता है कि श्रीराम ने शूर्पणखा से परिहास करते
हुए वैसा कहा है। अतएव नागेश कहते हैं “परिहासविनोदेन” अर्थात् श्रीराम ने परिहास विनोद में ही उससे बातें
की थीं, अन्यथा "अपूर्वी भार्यया चार्थी" (३।१८।४) यह असंगत होगा ? उसका अर्थ है—लक्ष्मण अपूर्वी इससे
पहले वे भार्यास्पर्श-सुख से अपरिचित हैं, अतएव भार्यार्थी हैं, अतः परिहास करते हुए श्रीराम ने, धातुओं के अनेक
अर्थ होने से, असंनिहितदार के अर्थ में ही 'अकृतदार' शब्द का प्रयोग किया है। नागेश आदि ने ऐसी ही व्याख्या
भी की है। अतः 'अकृतदार' इस शब्द-मात्र के आधार पर लक्ष्मण के विवाह का अपलाप नहीं किया जा सकता।
इससे विपरीत शास्त्रीय व्यवस्था तो यह है कि पूर्व प्रसंग के अनुसार ही उत्तर प्रसंग भी लगाया जाता है। जब
बालकाण्ड में लक्ष्मण का विवाह वर्णित है तब तो उसी के अनुसार अकृतदार शब्द का 'असंनिहितदार' अर्थ ही
संगत है। इस प्रकार अर्थनिर्धारण मीमांसा के उपक्रम-न्याय से किया जाता है।

“यावतोऽश्वान् प्रतिगृह्णीयात्तावतो वारुणान् चतुष्कपालान् निर्वपेत् ॥”
(तै० सं० २।३।१२।१)

यह ब्राह्मणवचन है। इसका प्रतीतिक अर्थ यह है कि जितने घोड़ों का प्रतिग्रह करे उतने वारुण चतुष्क-
पाल पुरोडाशों का निर्वाप करना चाहिये, परन्तु यह उपक्रम के विरुद्ध है। उपक्रम के अनुसार, यह इष्टि घोड़े
लेनेवाले के लिए नहीं है, किन्तु देनेवाले के लिए है । “प्रजापतिर्वरुणायाश्वमानयत् स जलोदरेण गृहीतोऽभवत् ।
एतान् वारुणांश्चतुष्कपालानपश्यत्तन्निरवपत् ॥' इसके अनुसार विधिवाक्य के उपक्रम में कहा गया है कि प्रजापति
ने वरुण को अश्व प्राप्त कराया (दिया) । इससे उसे जलोदर हो गया। तब प्रजापति को वारुण-चतुष्कपालों का
दर्शन हुआ । उनका निर्वाप करने से प्रजापति रोगमुक्त हुए। अतः उपक्रम के अनुसार ही 'प्रतिगृह्णीयात्' का
'प्रतिग्राहयेत्' ऐसा अर्थ किया जाता है। अतः मीमांसा आदि शास्त्र न जानने और परिहास-विनोद का अभिप्राय
न जानने के कारण ही श्रीबुल्के ने लक्ष्मण के अविवाहित होने की कल्पना कर ली। जब तीनों अन्य भ्राताओं का
विवाह हुआ तो लक्ष्मण का विवाह क्यों नहीं हुआ। इसका भी तो कुछ कारण होना चाहिए। ठीक वाल्मीकि के
अनुसार ही गोस्वामीजी ने भी बालकाण्ड में चारों भ्राताओं के विवाह का वर्णन लिखा है—
जसि रघुबीर ब्याहु बिधि बरनी ।
सकल कुँअर ब्याहे तेहि करनी ॥ ( रा० मा० १।२३५।१ )
ऐसी स्थिति में अरण्यकाण्ड में राम ने परिहास, विनोद में ही लक्ष्मण के सम्बन्ध में कहा है। यह सहज
भावसे समझ में आ सकता है ।

'अहं कुमार मोर लघु भ्राता' (रा० मा० ३।१६।६) यहाँ भी उनका यही तात्पर्य था, जैसे तुम
(शूर्पणखा) विवाहित होने पर भी, तत्काल पति न होने से-ही, अपने को कुमारी कहती हो उसी तरह लक्ष्मण भी
असंनिहितदार होने के कारण कुमार हैं ।
भरत का भी तो विवाह अयोध्याकाण्ड में वर्णित नहीं है, फिर क्या उन्हें भी अविवाहित मानें ? बुल्के तो
भरत के भी सम्बन्ध में इसी तरह लिखते हैं—"बाल एव तु मातुल्यं भरतो नायितस्त्वया ।” (वा० रा० २।८।२८)
में भरत की बाल्यावस्था कही गयी है। लेकिन बालकाण्ड में युधाजित् मिथिला पहुँचकर कहते हैं—कैकेय भरत को
सस्त्रीक देखना चाहते हैं। इसके बाद चारों भाइयों के विवाह का वर्णन किया जाता है। लेकिन मिथिला में युधाजित्
का और उल्लेख नहीं होता। बालकाण्ड के अन्तिम सर्ग में दशरथ भरत को युधाजित् के साथ राजगृह में भेज देते हैं
और इसके बाद बहुत समय बीत जाने का उल्लेख 'बहून्नृतून्' (वा० रा० १।७७।२५) से है, फिर भी रामाभिषेक की
तैयारी के समय भरत को बालक कहा गया है।”
परन्तु उक्त सब बातें तात्पर्य-ज्ञान न होने से ही उठती हैं। साधारण शास्त्रज्ञ भी समझता है कि दृष्टार्था-
पत्ति के समान ही श्रुतार्थापत्ति भी प्रमाण है। जिस प्रकार देवदत्त दिन को भोजन नहीं करता और मोटा दिखता
है तो बिना देखे और बिना बताये ही समझा जाता है कि वह रात को भोजन करता है। उसी प्रकार देवदत्त जीवित
है और घर में नहीं है इतना सुनकर ही देवदत्त का बाहर होना सिद्ध होता है। ठीक इसी न्याय से जब बालकाण्ड
के ७३ वें सर्ग में स्पष्ट यह वर्णन है कि "मिथिला में जिस दिन राजा दशरथ ने गोदान किया उसी दिन केकयराज-
पुत्र युधाजित् आये। महाराज से मिलकर कुशल-प्रश्न के बाद उन्होंने अपने पिता का सन्देश सुनाया और यह भी
कहा कि पिताजी मेरे भगिनी-पुत्र भरत को देखना चाहते हैं। मैं अयोध्या गया था, पर सुना कि आप लोग पुत्रों के
विवाहार्थ मिथिला गये हैं तो मैं यहाँ आया हूँ। दशरथ ने उनका सम्मान किया। अब मिथिला के अन्य प्रसङ्गों में
युधाजित् की चर्चा न होने पर भी इससे उनका मिथिला आना तो सिद्ध ही है। फिर मिथिला में विवाहपर्यन्त उनके
रहने तथा भोजन-पान करने का भी परिज्ञान हो ही जाता है।
"कैकेय भरत को सस्त्रीक देखना चाहते हैं" श्रीबुल्के का यह कथन—अत्यन्त मिथ्या है। सम्भवतः, संस्कृत
न समझने के कारण उन्होंने भ्रान्ति से 'स्वस्रियम्' का अर्थ 'सस्त्रीक' समझ लिया हो। यही है श्रीबुल्के के रिसर्च का
नमूना। वस्तुतः 'स्वस्रियम्' का अर्थ भागिनेय या भानजा ही है।
'बाल एव तु मातुल्यं' के अनुसार, यह नहीं सिद्ध होता कि भरत विवाह के योग्य ही नहीं थे। क्योंकि
दशरथ आदि वयोवृद्धों की अपेक्षा बीस वर्ष तक के लड़के बालक ही माने जाते हैं। आज भी तो २० वर्ष से नीचे
के लोग नाबालिग माने जाते हैं। एम० पी० तथा एम० एल० ए० आदि के निर्वाचन के अयोग्य कहे जाते हैं। इस
अवस्था में यदि कोई चुनाव जीत भी जाय तो नाबालिग प्रमाणित होने से उसका निर्वाचन अवैध माना जाता है।
फिर यहाँ तो मन्थरा भेद-नीति का प्रयोग करती हुई कैकेयी को सम्बोधित कर रही है। "कैकेयी, राजतन्त्र में ज्येष्ठ
पुत्र को ही राज्य मिलता है। तुम्हारा पुत्र भरत राजवंश से पृथक् हो जायगा। राम अकण्टक राज्य पाकर भरत
को देशान्तर भेज देंगे अथवा लोकान्तर में ही भेज देंगे। संनिकर्ष से स्थावरों में भी सौहार्द पैदा होता है। परन्तु
तुमने तो भरत को बाल्यावस्था में ही ननिहाल भेज दिया" इत्यादि। फिर जब अयोध्याकाण्ड के अनुसार राम का
विवाह मन्थरा संवाद के पहले हो चुका था तो भरत के विवाह में आपत्ति ही क्या हो सकती थी ? क्योंकि प्रायः
सभी रामायणों के अनुसार पुत्रेष्टि-यज्ञ में प्राप्त चरु से ही चारों भ्राताओं का, कुछ ही घड़ी-पल के अन्तर से, जन्म
हुआ था। तब क्या कारण है कि राम बालक नहीं थे और भरत बालक रह गये । 'बहून् ऋतून्' का भी कोई विरोध
नहीं पड़ता। विवाह से आते ही, भरत मातुल-कुल चले गये। राज्याभिषेक की बात तो कुछ ऋतुओं के ही पश्चात्
नहीं अनेक वर्षों के बाद की है। फिर भरत बहुत ऋतु मातुलकुल में रहे तो क्या विरोध है ?

५६ रामायणमीमांसा तृतीय
श्रीबुल्के कहते हैं "१ म और ७ म काण्ड कम से कम दूसरी शती के हैं।" पर पूर्वोक्त युक्तियों से यह
कथन निःसार ही सिद्ध होता है। एच० याकोबी के अनुसार "प्रचलित रामायण का काल पहली या दूसरी शती है।
एम० विण्टरनित्स इसे ईसा की दूसरी शती से अधिक प्राचीन समझते हैं। सी० चिन्तामणि वैद्य इसका काल दूसरी
ई० शती पूर्व मानते हैं। परन्तु कालिदास के समय रामायण ने अपना पूर्ण रूप ले लिया था। महाभारत के
आरण्यकपर्व के रचना-काल में बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड की कुछ सामग्री प्रचलित हो गयी थी। अतः अधिक सङ्गत
है कि प्रचलित रामायण का रूप दूसरी शती ई० के बाद का नहीं है।" परन्तु यह सब अटकलमात्र है। किसी के पास
रामायण के काल का निर्णय करने के लिए ठोस प्रमाण नहीं है। इन अटकलबाजियों का कोई भी आधार नहीं है।
रघुवंश के महाकवि कालिदास विक्रम के समय के ही हैं; अतः विक्रमीय प्रथम शती की अपेक्षा भी रामायण का
साङ्गोपाङ्ग पूर्ण रूप सुतरां उनसे बहुत पूर्व का है। महाभारत भी व्यास भगवान् की कृति है। उनका काल विक्रम
से तीन हजार वर्ष से भी पुराना है। अतः आरण्यकपर्व की रामकथा से भी प्रचलित रूप की प्रामाणिकता सिद्ध होती
है। संक्षिप्त संकलन के कारण आधुनिकों को उससे कुछ सामग्री का ही प्रचलन प्रतीत होता है। आदिरामायण के
सम्बन्ध में श्रीबुल्के कहते हैं कि "आदिरामायण से प्रचलित रामायण का रूप इतना भिन्न है कि इस महत्त्वपूर्ण
विकास के लिए कई शतियों की आवश्यकता प्रतीत होती है; अतः वाल्मीकिकृत रचना कम से कम तीसरी शती ई०
पूर्व की होगी। कई विद्वान् वाल्मीकि का काल और प्राचीन मानते हैं।" पर यह भी निरर्थक उदारता-प्रदर्शन
है। पहले तो आदिरामायण कौन है ? इसका स्पष्ट उत्तर यही है कि जहाँ रामायण का जन्म हुआ और प्रचार हुआ,
जहाँ करोड़ों मनुष्य उसके अनुसार राम की उपासना करते हैं, जहाँ लाखों व्यक्ति रामायण का पाठ, अनुष्ठान करते हैं
एवं जहाँ वाल्मीकिरामायण के आधार पर सहस्रों पुस्तक-पुस्तिकाएँ निर्मित हुईं, वहाँ प्रचलित वाल्मीकिरामायण से
भिन्न कोई तथाकथित आदिरामायण नहीं है।
श्रीबुल्के कहते हैं कि "प्रामाणिक वाल्मीकिकृत रामायण से बौद्ध-धर्म की ओर निर्देश नहीं मिलता,
अतः इसकी रचना बुद्ध के पूर्व ही अथवा पांचवीं शती ई० पूर्व में हुई होगी। यह एम० मानियर विलियम्स आदि का
प्रधान तर्क है। लेकिन बौद्धसाहित्य जातकों की सामग्री के विश्लेषणसे स्पष्ट है कि त्रिपिटक के रचना-काल में
रामकथासम्बन्धी स्फुट आख्यानकाव्य प्रचलित हो चुका था। लेकिन रामायण की रचना नहीं हो पायी थी। डॉ०
याकोबी रामायण का रचनाकाल ई० पूर्व छठी और आठवीं शती के बीच में समझते हैं। अतः अधिक सम्भव प्रतीत
होता है कि वाल्मीकि ने लगभग ३०० ई० पू० अपनी अमर रचना की सृष्टि की हो। इसकी पुष्टि इससे भी होती है
कि पाणिनि-सूत्रों में रामायण अथवा वाल्मीकि का उल्लेख नहीं है, लेकिन उनके समय में रामकथा प्रचलित हो गयी
होगी; क्योंकि सूत्रों में कैकेयी (पा० सू० ७।३।२), कौशल्या (पा० सू० ४।१।१५५) तथा शूर्पणखा (पा० सू०
६।२।१२१) की ओर संकेत मिलते हैं। गणपाठ में परिवर्धन होता रहा है। अतः उनके उल्लेखों पर तर्क आधारित
नहीं किया जा सकता। इसमें रामकथा के पात्रों राम, लक्ष्मण, भरत, रावण आदि आये हैं।"
श्रीबुल्के आदि के उपर्युक्त तर्क निरर्थक ही नहीं दुष्टतापूर्ण भी हैं। त्रिपिटक में रामकथा-सम्बन्धी स्फुट
आख्यान काव्य प्रचलित हो चुका था, यह ठीक है, पर इससे यह कैसे विदित हुआ कि रामायण की रचना नहीं
हो पायी थी।
अपनी पुस्तक के ८२ वें अनुच्छेद में आप कहते हैं—
"दशरथ-जातक में जो वृत्तान्त प्रस्तुत हुआ है वह तो वाल्मीकिरामकथा का विकृत रूप है ही, किन्तु
इस जातक की गाथाओं का भी मूल स्रोत बौद्ध नहीं हैं फिर भी इनका आधार वाल्मीकिरामायण भी नहीं हो सकता।
अतः ये गाथायें पुराने आख्यानों पर निर्भर होंगी।" परन्तु इसमें भी क्या प्रमाण है कि वह रामायण पर आधारित
न होकर अन्य आख्यानों पर निर्भर है? ७२ वें अनुच्छेद में भी कोई प्रमाण नहीं दिया, किन्तु "ब्राह्मण-धर्म के

वातावरण में निर्मित पुराने आख्यान-साहित्य में और राम-सम्बन्धी प्राचीन गीतों में ढूंढ़ना चाहिए"—यह कहकर
समाप्त कर दिया। यह कोई विचार है या मखौल है? किसी वस्तु का, जहाँ भी हो, साङ्गोपाङ्ग विचार करना
चाहिये। एक सम्बन्ध की वस्तु के दोष कहकर अनेक स्थलों का उल्लेख करना और उसमें भी सार की कोई भी बात
नहीं रखना तर्क नहीं कहलाता। जो ग्रन्थ प्रामाणिक परम्परा से प्रचलित है, उसको प्रमाण न मानकर, अप्रामाणिक
अप्रसिद्ध आख्यानों एवं गीतों को आधार मानना कहाँ तक उचित है? संस्कृत में कहावत है—“उपस्थितं परित्य-
ज्यानुपस्थितकल्पने मानाभावात्” अर्थात् उपस्थित प्रमाण को छोड़कर अनुपस्थित अप्रसिद्ध आधार की कल्पना सर्वथा
असङ्गत ही है।
पाणिनि के सूत्र इतिहास ग्रन्थ तो हैं नहीं कि वे सम्पूर्ण रामायण की कथा लिखते। वे तो शब्द-साधुत्व
के लिए हैं। पाणिनि के सूत्रग्रन्थ में कौशल्या, कैकेयी, शूर्पणखा आदि शब्दों के साधुत्व के लिए अपेक्षित सूत्रों का
उल्लेख किया ही गया है। वे शब्द प्रामाणिक आर्ष काव्य रामायण के ही हो सकते हैं। असंस्कृत आख्यानों एवं गीतों
में तो शब्द-साधुत्व पर इतना ध्यान भी नहीं होता है। इसी तरह जब गणों का उल्लेख पाणिनि-सूत्रों में हैं ही तो
राम, लक्ष्मण आदि शब्दों का ही अप्रामाणिक परिवर्धन मानना हठात् कुनीयत (दुरभिप्राय) की शङ्का उत्पन्न
कर देता है।
भारतीय संस्कृति के संस्कृत भाषा के व्याकरण-सूत्रों में आये हुए कौशल्या, कैकेयी, राम, लक्ष्मण आदि
शब्दों का आधार भारतीय संस्कृति के प्रसिद्ध ग्रन्थ रामायण को छोड़कर अन्य आधार का अन्वेषण स्पष्टतः भारतीय
संस्कृति के प्रति द्वेषभावना के कारण ही हो सकता है। मैक्समूलर आदि की परम्परा से ही उक्त द्वेषभावना पाश्चा-
त्यों में चली आ रही है।
२८ वें अनुच्छेद में बुल्के ने कहा है “युद्धकाण्ड की फलश्रुति तथा बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड और महाभारत
में वाल्मीकि को रामायण का रचयिता माना गया है। इस प्राचीन परम्परा के विरोध में कोई युक्ति सङ्गत तर्क
नहीं दिया जा सकता" यहाँ तक तो ठीक है परन्तु आगे वे कहते हैं—"किन्तु यह अवश्य मानना पड़ेगा कि इस
महान् कवि के जीवन-वृत्त के सम्बन्ध में प्रामाणिक सामग्री का नितान्त अभाव है" यह भी असङ्गत ही है। रामायण,
महाभारत तथा पुराणों के आधार पर आदि कवि का जो भी वृत्तान्त उपलब्ध है, उसे ही उनका प्रामाणिक महत्त्व-
पूर्ण वृत्त मानना चाहिये। बुल्के कहते हैं—"तैत्तिरीयप्रातिशाख्य के वैयाकरण वाल्मीकि निश्चितरूप में आदि कवि से
भिन्न हैं।" परन्तु इस मत का मिथ्या आधार यही है कि प्रातिशाख्य का काल उनके अभिमत आदिकवि-काल से
प्राचीन है। पर जो उन लोगों के उस मत को अशुद्ध मानते हैं उनके अनुसार जब ऋग्वेद के राम और सीता,
दशरथ तथा वेदों के वसिष्ठ, दशरथ आदि अति प्राचीन हैं तो वाल्मीकि भी अर्वाचीन न होकर प्राचीन ही हैं। ऋग्वेद
के कई सूत्रों के द्रष्टा वभ्री-ऋषि हैं। वभ्री और वाल्मीकि दोनों एक ही हैं। दीमक जन्तु का ही नाम वभ्री है।
इन्ही वभ्रियों ने विष्णु के धनुष की प्रत्यञ्चा काट दी थी। उनके द्वारा एकत्रित मृत्तिका के विशेष उभरे हुए
स्थान को वल्मीक कहा जाता है। उन्ही वभ्री जन्तुओं ने निरन्तर तपस्या कर रहे उनपर वल्मीक बना दिया था।
वल्मीक से उद्भूत होने के कारण ही उनका नाम वाल्मीकि हो गया था। इत्यादि वस्तु का उपपादन नीलकण्ठ ने
मन्त्ररामायण में किया है। महाभारत के सुपर्ण आदि कवि वाल्मीकि से भिन्न हो सकते हैं, क्योंकि सुपर्ण कश्यपपत्नी
विनता की सन्तान हैं। वह एक पक्षि-जाति है। जैसे कश्यपपत्नी कद्रू की सन्तानें सर्प और नाग आदि हैं वैसे ही
विनता की सन्तान सुपर्ण हैं। हाँ, यह ठीक है कि वे सामान्य नाग और सामान्य पक्षी नहीं थे। गरुत्मान् सुपर्ण विष्णु
के प्रिय रथ और वाहन हैं। नागों में 'अनन्त' या 'शेष' विष्णु की शय्या के रूप में सेवारत हैं। वे ही गरुत्मान् या
गरुड़ युद्धकाण्ड में विष्णुस्वरूप श्रीराम की सहायता के लिए आये थे। उनके आते ही मेघनाद के मन्त्र और अस्त्र-बल

५८ रामायणमीमांसा तृतीय
से जिन नागों ने राम और लक्ष्मण आदि को नागपाश में बाँध रखा था वे सब भाग गये थे, यह निम्न निर्दिष्ट श्लोकों
से स्पष्ट है—
'एतस्मिन्नन्तरे वायुर्मेघाश्चापि सविद्युतः ।
पर्यस्य सागरे तोयं कम्पयन्निव पर्वतान् ॥
महता पक्षवातेन सर्वद्वीपमहाद्रुमाः ।
निपेतुर्भग्नविटपाः सलिले लवणाम्भसि ॥
ततो मुहूर्ताद् गरुडं वैनतेयं महाबलम् ।
वानरा ददृशुः सर्वे ज्वलन्तमिव पावकम् ॥
तमागतमभिप्रेक्ष्य नागास्तेऽपि प्रदुद्रुवुः ।
यैस्तु तौ पुरुषौ बद्धौ शरभूतैर्महाबलैः ॥" (वा० रा ६।५५।३३,३४,३६,३७ )
"अहं सखा ते काकुत्स्थ प्रियः प्राणो बहिश्चरः ।
गरुत्मानिह सम्प्राप्तो युवयोः साह्यकारणात् ॥" (वा० रा० ६।५०।४६ )
जैसे सुग्रीव, वाली, हनुमान्, जाम्बवान् आदि भालू और वानर होते हुए भी देवताओं के अवतार होने से
दिव्यशक्तिसम्पन्न थे, वैसे ही गरुड़, अनन्त आदि पक्षी और नाग होते हुए भी दिव्यशक्तिसम्पन्न भगवान् की विशिष्ट
विभूति थे । यह कहना तो निःसार है कि 'सुपर्णवंश विष्णुभक्त था, किन्तु वाल्मीकि ने शिव की शरण ली थी ।
क्योंकि वैदिकों में शिव और विष्णु दोनों ब्रह्मरूप ही हैं, अतः विष्णुभक्त भी शिवभक्त ही होते हैं। यह तो स्पष्ट ही
है कि सुपर्णरूप वाल्मीकि पक्षियों में थे, परन्तु शिव की शरण लेनेवाले वाल्मीकि तो मनुष्य थे । और वे ही शिवजी
के वरदान से निर्दोष होकर आदि काव्य रामायण का निर्माण कर असीम यश के भागी हुए । फिर जब श्रीबुल्के के
अनुसार ही महाभारत के द्रोणपर्व (११८।४८) तथा शान्तिपर्व (२००।४) में वाल्मीकि को स्पष्ट शब्दों में कवि माना
गया है और शान्तिपर्व (५७।४) में भार्गव कवि का तथा अनुशासनपर्व (१८।८-१०) में श्रेष्ठ यशवाले वाल्मीकि का
वर्णन है । आदिपर्व (५०।१४), सभापर्व (७।१४), वनपर्व (८३।१०२) तथा उद्योगपर्व (८१।२७ ) में वाल्मीकि का
वर्णन है तब वाल्मीकि को ई० पूर्व तीन सौ वर्ष का मानने में अभिनिवेश क्यों ?
श्रीबुल्के कहते हैं, "विशेषज्ञों के अनुसार द्रोणपर्व का वर्तमान रूप बहुत परिवर्धित है । शान्तिपर्व एवं
अनुशासनपर्व निश्चितरूप से अर्वाचीन हैं । बहुत सम्भव है कि महाभारत के व्यासों ने अपेक्षाकृत अर्वाचीन काल में
कवि वाल्मीकि का परिचय प्राप्त किया हो और ये बहुसंख्यक स्थल आदि कवि वाल्मीकि से भिन्न किसी अन्य वाल्मीकि
ऋषि से सम्बन्ध रखते हों इत्यादि ।" परन्तु यह भी सङ्गत नहीं है । पाश्चात्यों के अनुसार कोई भी भारतीय संस्कृत
का साहित्य प्रामाणिक एवं क्षेपकशून्य नहीं है । जब वे ऋग्वेद जैसे परम्परा प्राप्त वेद ग्रन्थ में भी क्षेपक होने की
कल्पना करते हैं तब किसी अन्य ग्रन्थ को प्राचीन एवं शुद्ध कैसे मान सकते हैं ? यही बात श्रीतुलसीदासजी ने कही
थी —
"हरित भूमि तृन संकुल सूझि परहि नहि पंथ ।
जिमि पाखण्ड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ ॥" (रा० मा० ४।१४)
अभी भी कोई धर्मभीरु व्यास या विद्वान् आर्ष ग्रन्थों में बाहर से किसी अंश को जोड़ने में पाप मानता है ।
जो भी कोई चीज जोड़ी जाती है वह प्रक्षिप्त रूप से ही जोड़ी जाती है । वाल्मीकिरामायण के बालकाण्ड तथा उत्तर-
काण्ड से स्पष्ट ही विदित है कि वाल्मीकि महर्षि ही आदि कवि भी हैं और वे राम के समकाल में ही थे । ऐसी

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ५९
स्थिति में, द्वापर में बननेवाले महाभारत में उनका नाम आना सुतरां उचित है। उत्तरकाण्ड के अनुसार सीता
वनवास-काल में महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में ही रही थीं।
"राज्ञो दशरथस्यैव पितुर्मे मुनिपुङ्गवः ।
सखा परमको विप्रो वाल्मीकिः सुमहाद्यशाः ॥” (वा० रा० ७।४७।१६,१७)
लक्ष्मण ने सीता से कहा था कि मेरे पिता दशरथ के परम सखा विप्र मुनिपुङ्गव वाल्मीकि यहाँ रहते हैं।
आप उन्हीं की पादच्छाया का आश्रयण करके समय व्यतीत करें।
इसी तरह—
“प्रचेतसोऽहं दशमः पुत्रो राघवनन्दन ।
न स्मराम्यनृतं वाक्यमिमौ तु तव पुत्रकौ ॥
बहुवर्षसहस्राणि तपश्चर्या मया कृता।
मनसा कर्मणा वाचा भूतपूर्व न किल्बिषम् ॥” (वा० रा० ७।९६।१८-२०)
वाल्मीकि ने कुश, लव और सीता को लेकर श्रीराम के सामने यह कहा था—मैं प्रचेता का दसवां पुत्र
हूँ। मैंने हजारों वर्ष तपश्चर्या की है। मैंने कभी भी असत्य भाषण नहीं किया है। मन, वचन और कर्म से कोई
पाप मुझसे नहीं हुआ। इन प्रमाणों से भी वाल्मीकि राम के समसामयिक ही सिद्ध होते हैं।
वाल्मीकि के आश्रम के सम्बन्ध में बुल्के कहते हैं—"बालकाण्ड (सर्ग २ श्लोक ३) के अनुसार
वाल्मीकि का आश्रम तमसा और गङ्गा के समीप था। सर्ग ४५,४६ के अनुसार तमसा से भिन्न गङ्गा की कोई
उपनदी है। उत्तरकाण्ड के प्रसंगों से पता चलता है वह नदी गंगा के दक्षिण में थी, क्योंकि लक्ष्मण और सीता आयो-
ध्या से आकर गंगा पार करने के बाद ही वाल्मीकि के आश्रम में पहुँचे थे (सर्ग ४७) । शत्रुघ्न के विषय में
कहा गया है कि वाल्मीकि के आश्रम से पश्चिम की ओर जाते हुए वह यमुनातीर पर उतरे (वा० रा० ७।६६।१५) ।
बाद में अन्य परम्परा प्रचलित होने लगी। जिसके अनुसार वाल्मीकि का आश्रम गंगा के उत्तर माना गया है।
रामायण के टीकाकार कतक तथा गोविन्दराज उपर्युक्त 'यमुनातीरम्' के स्थान में 'गङ्गातीरम्' को शुद्ध मानते हैं।
रामायण के दाक्षिणात्य पाठ के एक प्रक्षेप के अनुसार, जो अन्य पाठों में नहीं मिलता, चित्रकूट के पास वाल्मीकि के
आश्रम पर राम, लक्ष्मण और सीता पहुँचते हैं—
“इति सीता च रामश्च लक्ष्मणश्च कृताञ्जलिः ।
अभिगम्याश्रमं सर्वे वाल्मीकिमभ्यवादयन् ॥”
अयोध्याकाण्ड (सर्ग ५६), अध्यात्मरामायण (२।६), आनन्दरामायण (१।६) तथा रामचरितमानस
(२।१२४) में वाल्मीकि का आश्रम यमुना के पार चित्रकूट पर स्थित माना गया है। वस्तुतः बालकाण्ड का वाल्मीकि
आश्रम प्रसिद्ध तमसा के तीर ही मानना चाहिये ।
'जगाम तमसातीरं जाह्नव्यास्त्वविदूरतः ।" (वा० रा० २।१।३) यहाँ अविदूरतः का समीप अर्थ नहीं
है, किन्तु जाह्नवी से अधिक दूर भी नहीं अर्थात् कुछ दूर तो जाह्नवी से तमसा नदी है ही। यों भी दूरत्व और
सामीप्य साक्षेप होते हैं।
अयोध्याकाण्ड (सर्ग ४५) की भी तमसा वही है, अन्य कोई गंगा की उपनदी नहीं। इसी लिए तमसा से
चलने के पश्चात् श्रीराम आदि को वेदश्रुति, गोमती और उसके पश्चात् गंगा मिली थी।
“ततो वेदश्रुतिं नाम शिववारिवहां नदीम् ।”
"गोमतीं गोयुतानूपामतरत् सागरङ्गमाम् ॥”

६० रामायणमीमांसा तृतीय
“गोमतीं चाप्यतिक्रम्य राघवः शीघ्रगैर्हयैः ।
मयूरहंसाभिरुतां ततार स्यन्दिकां नदीम् ॥” (वा० रा० २।४९।९,१०,११)
इन प्रमाणों के आधार पर अविदूरतः का अर्थ समीप नहीं; किन्तु अधिक दूर नहीं है। तमसा नाम
की गंगा की कोई भी उपनदी प्रसिद्ध है ही नहीं और न वह अयोध्या ओर प्रयाग के मध्य में मिलती है।
उत्तरकाण्ड (सर्ग ४७) में तमसा का वर्णन ही नहीं है। वहाँ तो वाल्मीकि आश्रम का वर्णन है। महर्षि का एक
आश्रम वहाँ भी रहा होगा। इतना ही क्यों, चित्रकूट से कुछ ही दूर पर अब भी एक वाल्मीकि नाम का पर्वत है,
उसे भी वाल्मीकि का आश्रम माना जाता है। आज भी महात्माओं के अनेक आश्रम होते ही हैं। गंगा के तीर पर
वाल्मीकि-आश्रम कानपुर से पश्चिम बिठूर के पास है। वहीं सीता को लक्ष्मण ने पहुँचाया था। वहाँ से पश्चिम
मथुरा के मार्ग में यमुना भी पड़ती है, अतः शत्रुघ्न का भी उसी आश्रम से पश्चिम की ओर जाना संगत है। वहाँ
भी तमसा की चर्चा नहीं है। उत्तरकाण्ड के (सर्ग ६६) में भी तमसा का नाम नहीं है। शत्रुघ्न ने वाल्मीकि
के उसी आश्रम में रात्रि में निवास किया था। सीता-पुत्रों का जन्म सुनकर, अभिनन्दन कर तथा प्रातःकालीन
कृत्य करके वहाँ से व पश्चिम दिशा की ओर चल पड़े थे और तब यमुना के मार्ग में महर्षियों के आश्रमों में रुकते
हुए सात रात्रियों के अनन्तर यमुना के तीर पर पहुँचे थे।
“स गत्वा यमुनातीरं समरात्रोषितः पथि ।” (वा० रा० ७।६६।१५)
इस दृष्टि से विचार करने पर वाल्मीकिरामायण के विभिन्न काण्डों तथा अन्य रामायणों में विरोध
दिखाने की चेष्टा निरर्थक ही है। इसी प्रकार भार्गव वाल्मीकि के सम्बन्ध की शङ्काएँ भी निःसार हैं, क्योंकि
भार्गव शब्द उपाधि नहीं है, किन्तु भृगुवंश में उद्भूत होनेवाले को भार्गव कहा जाता है। च्यवन तथा परशुराम
आदि भी उसी वंश में उद्भूत होने के कारण भार्गव कहे जाते हैं। यह भी आवश्यक नहीं कि जहाँ भार्गव का
नाम आये वहाँ दूसरे भार्गवों का भी नाम आये ।
दस प्रचेतस प्राचीनबर्ही राजा के पुत्र थे। समानरूप से धर्म तथा व्रतों में स्नात होने के कारण उनके
समान ही नाम थे—
“प्राचीनबर्हिषः पुत्राः शतद्रुत्यां दशाभवन् ।
तुल्यनामव्रताः सर्वे धर्मस्नाताः प्रचेतसः ॥” (भा० ४।२४।१३)
परन्तु ‘प्रचेतस’ के अनुसार वाल्मीकिरामायण के निर्माता वाल्मीकि ऋषि से सम्बन्ध रखनेवाले प्रचेता
वरुण हैं। “प्रचेता वरुणः पाशी” (अमर १।१।६१) के अनुसार वरुण का प्रचेता नाम है। वरुण के अंश से जैसे
अगस्त्य आदि का जन्म हुआ है वैसे ही वाल्मीकि का जन्म है। अन्यत्र उन्हें ब्रह्मा का अवतार भी माना गया है।
जैसे नारद ब्रह्मपुत्र होते हुए शापादि के कारण दासीपुत्र हो गये थे उसी तरह कभी उनका भृगुवंशीय ब्राह्मणों के
कुल में जन्म हुआ था।
वाल्मीकि संगवश दस्यु हो गये थे ओर सप्तर्षियों के सम्बन्ध और उपदेश से राम का उलटा नाम ‘मरा’
जपने में तल्लीन हो गये। उनके ऊपर दीमकों द्वारा वल्मीक बन गया। उससे निकलने के बाद उनका ‘वाल्मीकि’
नाम अन्वर्थक हो गया था। उस नवीन जन्म मिलने के बाद उन्होंने महती तपस्या की और सर्वथा निष्किल्बिष
रहे। उत्तरकाण्ड का ‘मनसा वाचा कर्मणा’ यह वचन भी सार्थक हुआ।
उन महर्षि ने स्पष्टरूप से कहा है कि कुश और लव जानकी के दो यम-जात (जुड़वे) पुत्र हैं। एतावता
बुल्के का यह कहना दुष्टतापूर्ण है कि कुश तथा लव का अर्थ अर्थशास्त्र के अनुसार गणिकाध्यक्ष होता है। उनका

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ६१
समाज में कोई विशेष आदर नहीं था। किन्तु इन्हीं उद्देश्यों की सिद्धि के लिए तो वे बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड
को अप्रमाण और पीछे का मिलाया हुआ मानते हैं, क्योंकि दोनों काण्डों में कुश और लव श्रीराम के औरस पुत्र
कहे गये हैं। उनमें कुश राम के राज्यसिंहासन के अधिकारी हुए थे। महाकवि कालिदास ने भी यही माना है।
महर्षि को रामायण-निर्माण करके यह चिन्ता हुई कि इस रामायण का सभाओं में गान कौन करे ? उसी समय
सीता-पुत्रों ने आकर महर्षि का चरण-ग्रहण किया। वे दोनों धर्मज्ञ थे, यशस्वी थे और राजपुत्र थे। दोनों वेद-
वेदांगपारंगत, स्वरसम्पन्न तथा मेधावी थे। वेदों के उपबृंहण के लिए महर्षि ने उन्हें रामायण महाकाव्य
पढ़ाया—
"अगृह्णीतां मुनेः पादौ मुनिवेषौ कुशीलवौ ।
कुशीलवौ तु धर्मज्ञौ राजपुत्रौ यशस्विनौ ।
भ्रातरौ स्वरसम्पन्नौ ददर्शाश्रमवासिनौ ॥
स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ ।
वेदोपबृंहणार्थाय तावग्राहयत प्रभुः ।। (वा० रा० १।४।४-६)
कुश-लव को गणिकाध्यक्ष कहना हृदय-कालुष्यद्योतन है
क्या ये गुण गणिकाध्यक्ष कुशीलवों में हो सकते हैं ? इसके अतिरिक्त यदि बालकाण्ड और उत्तरकाण्ड
का प्रामाण्य आपको मान्य नहीं हैं तो किसी कुशीलव ने रामायण महाकाव्य वाल्मीकि से प्राप्त किया और उसका
गान किया, यह असिद्ध ही है। यदि उक्त दोनों काण्ड सप्रमाण हैं तो कुशीलव श्रीराम और सीता के पुत्र सिद्ध
ही हैं। फिर उन्हें छोड़कर अनर्गल कल्पना, अर्थशास्त्र के प्रसंगान्तरीय अप्रकृत कुशीलव का प्रकृत से सम्बन्ध
जोड़ना, कहाँ तक उचित है ? इसे ही प्रकृत-परित्याग और अप्रकृतप्रसंग कहा जाता है।
भार्गव ने उपाख्यान समन्वित २४ हजार श्लोकों के रामायण ग्रन्थ की रचना की। उसमें उत्तरकाण्ड
सहित आदि (बाल) काण्ड से लेकर युद्ध-काण्ड तक छह काण्ड हैं और पाँच सौ सर्ग हैं।
नागेश के अनुसार 'कुशश्च लवश्च' इस द्वन्द्वसमास में यहाँ कुश शब्द पृषोदरादि में पठित होने से कुशी
शब्द बन गया है। इस तरह 'कुशीलव' शब्द सम्पन्न हुआ है। सीता-पुत्रों का कुशीलव नाम क्यों पड़ा यह भी
उत्तरकाण्ड में स्पष्टरूप से प्रतिपादित है।
महर्षि ने मन्त्र-संस्कृत कुशों से जिसका मार्जन किया था उसका नाम कुश हुआ और जिसका मार्जन
लवों से किया उसका नाम लव हुआ। नागेश के अनुसार काट कर दो खण्डों में विभक्त कुशमुष्टि का अग्रभाग
कुश कहा जाता है एवं शेष अधोभाग लव कहा जाता है। अर्थात् कुछ कुशों को लेकर उनको बीच से दो टुकड़ों में
विभक्त करके अग्रभाग से ज्येष्ठका एवं अधो भाग से कनिष्ठ का मार्जन किया गया —
"यस्तयोः पूर्वजो जातः स कुशैम्र्न्त्रसंस्कृतैः। १
निर्मार्जनीयस्तु तदा कुश इत्यस्य नाम तत् ॥
यश्चावरो भवेत्ताभ्यां लवेन सुसमाहितः ।
निर्मार्जनीयो वृद्धाभिर्लवेति च स नामतः ॥” (वा० रा० ७।६६।७,८)
इतना स्पष्ट विवरण रहने पर भी कुश और लव को कुशीलव गणिकाध्यक्ष मानना हृदय की कलुषता का
ही द्योतक है।
१. मन्त्रसत्कृतैः, भी पाठ है।

६२ रामायणमीमांसा तृतीय
वाल्मीकि ही भार्गव थे
उत्तरकाण्ड में रामायणकार महर्षि वाल्मीकि को भार्गव कहा गया है—
“संनिबद्धं हि श्लोकानां चतुर्विंशत्सहस्रकम् ।
उपाख्यानशतं चैव भार्गवेण तपस्विना ॥
आदिप्रभृति वै राजन् पञ्चसर्गशतानि च ।
काण्डानि षट् कृतानीह सोत्तराणि महात्मना ॥” (वा० रा० ७।९४।२५, २६)
इससे बालकाण्ड, उत्तरकाण्ड तथा रामायण के उपाख्यानों को अर्वाचीन या प्रक्षिप्त कहना सर्वथा निर्मूल
सिद्ध होता है । उक्त श्लोकों में वाल्मीकि को ही भार्गव कहा गया है ।
नागेश भट्ट के अनुसार काव्यनिर्माण में भार्गव (उशना) के तुल्य होने से वे भार्गव कहे गये हैं । ‘कवीना-
मुशना कविः’ (गी० १०।३७) के अनुसार उशना कवि सभी कवियों में श्रेष्ठ माने जाते हैं । मनुष्य-लोक में वाल्मीकि
ही आदि कवि हैं । अथवा प्रचेता वरुण का नाम है । भृगु भी वरुण के ही पुत्र हैं “भृगुर्वे वारुणिः । वरुणं पितर-
मुपससार” (तै० उ० ३।१), ‘तस्येदम्’ (पा० सू० ४।३।१२०) के अनुसार अण् प्रत्यय हुआ, जिससे ‘भृगोर्भ्राता
भार्गवः’ भृगु के भ्राता होने से वाल्मीकि भी भार्गव हुए ।
मुख्य बात तो यह है कि मीमांसा-शास्त्रों एवं मिताक्षरा आदि निबन्ध-ग्रन्थों के अनुसार विभिन्न आर्ष
ग्रन्थों का समन्वय ही भारतीय पद्धति है । अतः महाभारत, स्कन्दपुराण तथा अन्य पुराणों में परस्पर विरोध ढूंढने
का प्रयास न कर समन्वय का ही यत्न करना चाहिए ।
परन्तु पाश्चात्य विद्वान् ग्रन्थों के परस्पर विरोध ही ढूंढ़ते रहते हैं । वे आर्ष पुराणादि ग्रन्थों को ईसवी
सन् के भीतर लाने की ही चिन्ता में लगे रहते हैं । वस्तुतः,
“श्लोकश्चायं पुरा गीतो भार्गवेण महात्मना ।
आख्याते रामचरिते नृपतिं प्रति भारत ॥”
“राजानं प्रथमं विन्देत्ततो भार्यां ततो धनम् ॥” (म० भा० १२।५७।४०, ४१)
के अनुसार श्रीभीष्मजी ने अत्यन्त प्राचीन भार्गव महर्षि वाल्मीकि के रामायण का श्लोक उद्धृत किया
था । प्रथम राजा को प्राप्त करना चाहिये, फिर भार्या और तब धन प्राप्त करना चाहिये । राजा के बिना अराजकता
में भार्या, धन कुछ भी सुरक्षित नहीं रहता और वह यह है—
“अराजके धनं नास्ति नास्ति भार्याप्यराजके ।
इदमत्याहितं चान्यत् कुतः सत्यमराजके ॥” (वा० रा० २।६७।११)
अराजकता में धन, भार्या कुछ भी सुरक्षित नहीं रहता, यह महाभीति¹ होती है फिर अराजकता में सत्य
कहाँ; अतः भार्या और धन प्राप्त करने के पहले राजा को प्राप्त करना आवश्यक है । महाभारत के बहुत पहले
रामायण की रचना हो चुकी थी, इस बात के ऐसे पुष्ट प्रमाणों के मिलने पर भी पश्चिमी विद्वान् रामायण को महा-
भारत के बाद का सिद्ध करने की धृष्टता करने का दुःसाहस करते हैं, इससे बढ़कर उनकी हृदयहीनता का दूसरा
प्रमाण क्या हो सकता है । विष्णुपुराण (३।३।१८) तथा मत्स्यपुराण (१२।५१) में जो वाल्मीकि को भार्गव कहा
गया है वह वस्तुस्थिति का वर्णन है । वह असम्भव नहीं है । आर्षविज्ञान-सम्पन्न व्यास आदि महर्षियों ने अपने आर्ष
ज्ञान से निरीक्षण कर च्यवन एवं वाल्मीकि का वृत्तान्त लिखा है । दोनों ही के तपःसंलग्न देह दीमकों द्वारा रचित
१. अत्याहितं महाभीतिः (अमरकोष)

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ६३
वल्मीक से प्रावृत हो गये थे। दोनों के वृत्तान्तों के मिश्रण की बात नहीं है। फिर भी 'वल्मीक' से उद्भूत होने के
कारण 'वाल्मीकि' शब्द च्यवन में प्रसिद्ध न होकर रामायणकार प्राचेतस महर्षि में ही प्रसिद्ध हुआ है।
'भार्गव' शब्द वाल्मीकि में वरुणस्वरूप प्रचेता के पुत्र होने से एवं वरुण-पुत्र भृगु से संबद्ध होने से उचित
ही है। अध्यात्मरामायण आदि प्रामाणिक ग्रन्थों के आधार पर कालान्तर में शापादि के कारण उन्हीं का जन्म किसी
भृगुकुलोद्भूत ब्राह्मणकुल में हुआ था, इससे भी वे भार्गव हुए। इस दृष्टि से भृगुवंशीय होने के कारण भी उन्हें
औपचारिक रूप से च्यवन-पुत्र कहा गया है।
सन्तान-परम्परा में उत्पन्न होने पर भी पुत्रत्व का व्यवहार होता है। श्रीभागवतादि पुराणग्रन्थों में
सूर्यवंश और सोमवंश के वर्णन के प्रसङ्ग में उस वंश में होनेवाले उत्तरोत्तर के प्रधान-प्रधान पुरुष पूर्व पूर्व के
प्रधान पुरुषों के पुत्ररूप में वर्णित किये गये हैं। तभी लाखों वर्षों के दीर्घ काल में वर्णित राजाओं की संख्या बहुत
ही कम है।
इसी दृष्टि से कृत्तिवासीय रामायण तथा अश्वघोष के बुद्धचरित में वाल्मीकि को च्यवन का पुत्र कहा
गया है—
"वाल्मीकिरादौ च ससर्ज पद्यं जग्रन्थ यन्न च्यवनो महर्षिः।" (बुद्ध-च० १।४३)
यहाँ यही अभिप्राय विवक्षित है कि पूर्व के लोगों ने जो लोकोत्तर कार्य नहीं किया वह उत्तरोत्तर लोगों
ने किया था। वाल्मीकि ने जो आदिपद्य की रचना की उसकी रचना उनके पूर्वज बड़े प्रभावशाली च्यवन भी नहीं
कर सके थे। इसी तरह के और भी अनेक उदाहरण हैं।
दस्यु वाल्मीकि
बुल्के यह कहते हैं कि "वाल्मीकि पहले डाकू थे। वे दीर्घकालीन तपस्या के बाद रामायण की रचना में
समर्थ हुए। इस कथा की प्राचीनता में सन्देह है।
मुनियों के ब्रह्मघ्न कहने पर वाल्मीकि पातक से आविष्ट हो गये थे और शिवपूजा कर वे मुक्त हुए थे।
अनुशासनपर्व की इस कथा का स्कन्दपुराण में विकास हुआ है।"
स्कन्दपुराण भी तो बुल्के की दृष्टि में अधिक से अधिक ई० १० वीं शती की रचना है। पर यह सब
असङ्गत है। क्योंकि वेद, उपनिषद् तथा पुराणों की दृष्टि से अन्य पुराणों की भाँति वह भी अनादि ही है। पुराणों
का प्रतिकल्प में आविर्भाव होता रहता है। अपौरुषेय वेद में आनुपूर्वी अपरिवर्तित रहती है। इतिहास-पुराणों की
आनुपूर्वी में महर्षियों द्वारा परिवर्तन होता रहता है। इसी लिए वे पौरुषेय कहे जाते हैं। वर्तमान आनुपूर्वीवाले
पुराणादि द्वापर में, आज से पाँच हजार वर्षों से भी अधिक पूर्व, निर्मित हुए हैं। व्यास सर्वज्ञ-कल्प थे। अतएव
उन्होंने भूत तथा भविष्यत् की भी कथाएँ लिखी हैं। अतः कथाओं के आधार पर उनका उत्पत्तिकाल निश्चित नहीं
किया जा सकता। अनुशासनपर्ववाली कथा का विकास स्कन्दपुराणीय कथा के रूप में हुआ, यह कहना सर्वथा गलत
है; क्योंकि उनका परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं है—
"वाल्मीकिश्चाह भगवान् युधिष्ठिरमिदं वचः ।
विवादे साग्निमुनिभिर्ब्रह्मघ्नो वै भवानिति ॥
उक्तः क्षणेन चाविष्टस्तेनाधर्मेण भारत ।
सोऽहमीशानमनघममोघं शरणं गतः ॥

६४ रामायणमीमांसा तृतीय
मुक्तश्चास्मि ततः पापैस्ततो दुःखविनाशनः ।
आह मां त्रिपुरघ्नो वै यशस्तेऽग्र्यं भविष्यति ॥” (म० भा० १३।१८।१८-१० )
वाल्मीकि ने युधिष्ठिर से कहा था कि किसी विवाद में आहिताग्नि मुनियों ने मुझसे ‘आप ब्रह्मघ्न हैं’ कह
दिया । उनके ऐसा कहते ही मैं पापों से युक्त हो गया । तब मैं अमोघ, अनघ भगवान् ईशान की शरण में गया ।
और पापों से मुक्त हो गया । तदनन्तर दुःखविनाशन त्रिपुरघ्न शिव ने मुझसे कहा—तुम्हारा श्रेष्ठ यश होगा ।
इस कथा में डाका डालने या तपस्या की कोई बात नहीं है, अतः उन्हीं महर्षि के सम्बन्ध में इस स्वतन्त्र
घटना का वर्णन समझना चाहिये ।
स्कन्दपुराण वैष्णवखण्ड वैशाख-माहात्म्य आदि की कथाओं के अनुसार किसी ने राम-नाम के जप के
प्रभाव से यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि अगले जन्म में तुम वल्मीक नामक ऋषि के कुल में उत्पन्न होओगे
तथा वाल्मीकि नाम धारण कर महान् यशस्वी बन जाओगे । कृणु नामक तपस्वी के शरीर के चारों ओर वल्मीक बन
गया था । उसका नाम वल्मीक पड़ा था । व्याध उसी के पुत्ररूप में उत्पन्न होकर वाल्मीकि नाम से प्रसिद्ध हुआ
और दिव्य रामकथा रचने में समर्थ हुआ, आदि रूप में वाल्मीकि का इतिवृत्त ज्ञात होता है । अन्य प्रकार के इति-
वृत्त भी वाल्मीकि के सम्बन्ध में प्राप्त हैं—
स्कन्दपुराणीय अवन्तीखण्ड के २४ वें अध्याय में अग्निशर्मा की कथा है । वह डाकू था । किसी दिन
सप्तर्षियों से उसकी भेंट हो गयी । वह उनको मार डालना चाहता था । ऋषियों ने उसे परिवार से यह पूछने भेज
दिया कि क्या वे लोग तुम्हारे पापकर्मों में भी भागीदार होंगे ? पूछने पर जब परिवार के लोगों ने पाप-कर्म में भागी-
दार होना अस्वीकार कर दिया तब अग्निशर्मा ऋषियों के पास लौटा और उनका उपदेश प्राप्त कर ध्यान तथा मन्त्र-
जप में निरत हुआ । तेरहवें वर्ष बाद जब ऋषि लोग उसी मार्ग से लौटे तो उन्होंने उसके शरीर के चारों ओर
वल्मीक बना देखा । ऋषियों ने वहाँ से निकाल कर उसका ‘वाल्मीकि’ नाम रखा और रामायण लिखने का
आदेश दिया ।
नागरखण्ड के १२४ वें अध्याय में लोहजङ्घ की कथा है । वह माता-पिता की सेवा में सदैव तत्पर रहता
था । परिवार-पालन की दृष्टि से दस्यु बन गया था । उसकी सप्तर्षियों के साथ भेंट हुई । पूर्व वृत्तान्त के समान
उसको भी ऋषियों ने कोई मन्त्र बतलाया, वह उसे जपकर सिद्ध हुआ और वाल्मीकि नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
प्रभासखण्ड के २९८ वें अध्याय में शमीमुख ब्राह्मण की कथा है । उसका पुत्र वैशाख था । वह चोरी
द्वारा अपने परिवार का पालन करता था । उसकी भेंट सप्तर्षियों से हुई । धन के ही हम भागी हैं, पाप के नहीं, परिवार-
वालों से यह सुनकर उसे वैराग्य हो गया । वह भी तप करते करते वल्मीक से आवृत होकर वाल्मीकि बन गया ।
सप्तर्षियों ने उसके लिए भविष्यवाणी की--
“स्वच्छन्दा भारती देवी जिह्वाग्रे ते भविष्यति ।
कृत्वा रामायणं काव्यं ततो मोक्षं गमिष्यसि ॥”
तुम्हारे जिह्वाग्र में स्वच्छन्द ( बेरोकटोक ) भगवती सरस्वती देवी का निवास होगा । तुम अमर काव्य
रामायण की रचना कर तदनन्तर मोक्ष की प्राप्त होओगे ।
उपर्युक्त सभी कथाएँ प्रामाणिक ग्रन्थों की होने से प्रामाणिक हैं, अतः ‘गुणोपसंहारन्याय’ से इन सबका
समन्वय करना ही ठीक है । व्याधवाली कथा में कोई नामनिर्देश नहीं है । वह जन्मान्तर में वल्मीक ऋषि का पुत्र
होने से वाल्मीकि बना । उन वाल्मीकि ऋषि को अन्य कथाओं के अनुसार भृगुवंशी मानने में भी कोई विरोध नही