रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय अध्याय
पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त
सम्प्रदायभेद से ग्रन्थों में प्रामाणिक पाठभेद होते हैं। व्यवहार में अत्यन्त प्रचलित दुर्गासप्तशतीपाठ
में भी यह भेद दृष्ट है। वे सब मन्त्र माने जाते हैं। उसी प्रकार वाल्मीकिरामायण के धार्मिक अनुष्ठान लाखों की
संख्या में हुए हैं, हो रहे हैं और यावच्चन्द्रदिवाकरौ होते ही रहेंगे। इसी लिए विभिन्न संस्करणों की कई पुस्तकों
में, आरम्भ में ही, विभिन्न सम्प्रदायों के मङ्गलाचरण आदि भी दिए हुए होते हैं।
यह ठीक है कि प्राचीनकाल में कण्ठस्थ करने की ही प्रवृत्ति अधिक प्रचलित थी। महर्षि वाल्मीकि ने ही
विभिन्न प्रकार के श्लोक बनाए होंगे और शिष्यों को उपदेश करते हुए भिन्न-भिन्न पाठों का उपदेश भी किया होगा।
यह भी प्रसिद्ध है कि उन्होंने शतकोटिप्रविस्तर रामायण का निर्माण किया था। उसी का सार २४
हजार श्लोकों का वर्तमान प्रसिद्ध वाल्मीकिरामायण ग्रन्थ है।
इस दृष्टि से शाखाभेद से वेदों के पाठ जैसे भ्रान्ति से नहीं किन्तु प्रामाणिक ही हैं, वैसे ही सम्प्रदाय-
भेद से वाल्मीकिरामायण, दुर्गासप्तशती आदि के पाठभेद, भूल या भ्रान्ति से नहीं, किन्तु प्रामाणिक ही हैं। इसी
दृष्टि से कुछ कथाभेद भी, कल्पभेद होने के कारण, प्रामाणिक ही हैं। प्रसिद्ध है—
“कलपभेद हरिचरित सुहाए। भाँति अनेक मुनीसन गाए ।।” (रा० मा० १।३२।४) श्रीमद्भागवत में
भी सम्प्रदायभेद से पाठभेद मान्य है।
पुस्तकें देखकर मनमाने ढङ्ग से पाठ करना या समालोचना करना, यह आधुनिक पद्धति है। प्राचीन
काल में ये सभी आर्ष ग्रन्थ गुरु-परम्परा से पढ़े जाते थे, अतः गुरु-परम्परा ही प्रामाणिक पाठ की कसौटी है।
कतक, तीर्थ, भूषण, रामाभिरामी आदि टीकाकारों ने वाल्मीकिरामायण के कई सर्गों को प्रक्षिप्त बताकर उनकी
टीका नहीं की है। नागेश ने कई सर्गों के प्रक्षिप्त होने से उनकी टीका नहीं की और बतलाया है कि कतक ने
तथा तीर्थ ने भी इन्हें प्रक्षिप्त माना है।
श्रीमद्भागवत के सम्बन्ध में भी यही बात है। भागवत के प्रसिद्ध टीकाकार श्रीधर स्वामी ने लिखा है
कि मैं स प्रदाय-परम्परा से पौर्वापर्य के अनुसार टीका कर रहा हूँ—
“सम्प्रदायानुरोधेन पौर्वापर्यानुसारतः ।
श्रीभागवतभावार्थदीपिकेयं प्रतन्यते ।। (भा० टी० १।१।१)
इसी आधार पर वाल्मीकिरामायण में भी प्रक्षिप्त, अप्रक्षिप्त आदि का निर्णय करना उचित है।
अतः दाक्षिणात्य, गौड़ीय, पश्चिमोत्तरीय, उदीच्य आदि पाठभेदों के कारण किसी अंश को क्षेपक कहना
अनुचित है, क्योंकि इस तरह परस्पर विरोध होने से किसी भी पाठ की सत्यता में सन्देह ही बना रहेगा। दाक्षिणात्य
पाठ में भी वामनावतार आदि, अगस्त्य द्वारा सूर्यस्तव देना आदि अत्यन्त प्रामाणिक हैं। परम्परा से उनका पाठ
प्रचलित है। नागेश आदि ने उन अंशों पर टीका भी लिखी है।
भारत में कोटि कोटि आस्तिक राम और रामायण के भक्त हैं। बहुतों में रामायण के पाठ की परम्परा
है। आदित्यहृदय का पाठ तो आज भी लाखों व्यक्ति करते हैं। यदि भारतीय टीकाकार और उपासकों का पाठ