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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 128

अध्याय पाठभेदादि-समीक्षा तथा ऐतिहासिक वृत्त ५१.
अब क्या श्रीबुल्के के फलश्रुतिवाले सिद्धान्त के अनुसार यह मान लिया जाय कि गीता १५ अध्याय की
है और अन्त के ३ अध्याय प्रक्षिप्त हैं ? “रामायणमिदं कृत्स्नम्”—इस पद्य के 'कृत्स्नं' शब्द से सम्पूर्ण पूर्वकाण्ड ही
निर्दिष्ट हुआ है, ऐसा समझना चाहिये । ब्राह्मण-भाग वेद में ही कहा गया है—
“पूर्णाहुत्या सर्वान् कामानाप्नोति ॥”
पूर्णाहुति से सब काम प्राप्त होते हैं तो क्या अश्वमेध, राजसूय आदि यज्ञों के भी सभी फल पूर्णाहुति से
मिल जाते हैं, यह मान लिया जाय ? वस्तुतः यह अर्थ सङ्गत नहीं है। वहाँ प्रकृत यज्ञ के फल के अभिप्राय से 'सर्व-
काम' शब्द का प्रयोग समझना चाहिये । ठीक वैसे ही 'कृत्स्न' शब्द का तात्पर्य भी पूर्वकाण्ड की सम्पूर्णता में ही है ।
इसी तरह बालकाण्ड के प्रक्षिप्त होने का प्रमाण दिया गया है कि “बालकाण्ड के प्रथम सर्ग में जो अनुक्रम-
णिका मिलती है, उसमें अयोध्याकाण्ड से युद्धकाण्ड तक के विषयों का ही उल्लेख है। बाद में इस अनुक्रमणिका की
अपूर्णता का अनुभव हुआ, तब दूसरी अनुक्रमणिका की रचना की गयी, जिसमें बालकाण्ड की सामग्री के साथ उत्तर-
काण्ड का भी उल्लेख मिलता है—
“स्वराष्ट्ररञ्जनं चैव वैदेह्याश्च विसर्जनम् ॥
अनागतञ्च यत्किञ्चिद् रामस्य वसुधातले ।
तच्चकारोत्तरे काव्ये वाल्मीकिर्भगवानृषिः ॥” ( वा० रा० १।३।३८,३९ )
अगले सर्ग में भी—
“प्राप्तराज्यस्य रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषिः ।
चकार चरितं कृत्स्नं विचित्रपदमर्थवत् ।'
“कृत्वा तु तन्महाप्राज्ञः सभविष्यं च सोत्तरम् ॥” ( वा० रा० १।४।१, ३ )
इन दो उद्धरणों से स्पष्ट प्रतीत होता है कि बालकाण्ड की इस भूमिका के रचना-काल में उत्तरकाण्ड
की सृष्टि प्रारम्भ हो चुकी थी । फिर भी सीता-त्याग को छोड़कर किसी अन्य विषय का उल्लेख न होने के कारण
ऐसा प्रतीत होता है कि उत्तरकाण्ड उस समय अपना वर्तमान रूप और विस्तार नहीं प्राप्त कर पाया था । इस
तर्क की इससे पुष्टि होती है कि बाद में वाल्मीकिरामायण के उदीच्य पाठ में एक तीसरी अनुक्रमणिका जोड़ी गयी
है, जिसमें सातों काण्डों की सामग्री का ध्यान रखा गया है ।”
विचार करने से श्रीबुल्के के ये सब तर्क निःसार सिद्ध हो जाते हैं। असल में प्रथम सर्ग तो मूलरामायण
है । वह वाल्मीकिरामायण की अनुक्रमणिका है ही नहीं। उसके वक्ता तो नारदजी हैं। वाल्मीकिजी ने तो उस
संवाद को ज्यों का त्यों श्लोकबद्ध भर कर दिया था । उसमें “को न्वस्मिन् साम्प्रतं लोके” के अनुसार वर्तमान
समय में ऐसा गुणवान् पुरुष कौन है ? वाल्मीकि का प्रश्न था, अतः राम के तात्कालिक स्वरूप से ही वर्णन
आरम्भ हो गया । राम के जन्म और विवाह आदि की चर्चा का भी उसी में अन्तर्भाव समझना चाहिये । जैसे
दीपक जलने के साथ ही उसकी प्रभा भी प्रकट होती है और उस प्रभा का वर्णन पृथक् न होने पर उसे भी उसी
में समझा जा सकता है । जैसे “राजाऽसौ गच्छति” कहने पर भी सामात्य सवाहन सोपकरण राजा का गमन
प्रतीत होता है वैसे ही सीता और लक्ष्मण सहित राम का वन गमन कहने से ही राम, लक्ष्मण, सीता आदि का
जन्म और विवाह आदि भी समझ लेना चाहिये ।
मूलरामायण का संक्षेप होना तो उचित ही था । मूलरामायण को वाल्मीकिरामायण की अनुक्रमणिका
मानना विशुद्ध भ्रान्ति ही है । वाल्मीकिरामायण की अनुक्रमणिका तो तीसरा सर्ग ही है। तीसरी अनुक्रमणिका के
प्रक्षिप्त होने पर भी मुख्य अनुक्रमणिका को प्रक्षिप्त सिद्ध करने में कोई भी तर्क सक्षम नहीं है। एक व्यक्ति के