रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४६ रामायणमीमांसा एकौनविंश
मैं भी तपस्या द्वारा लक्ष्मी का पिता बनने का वर प्राप्त करूंगा। लक्ष्मी ने प्रकट होकर वाल्मीकि को वर प्रदान किया
कि त्रेतायुग में जनकपुत्री बनकर मैं तुम्हारे आश्रम में पुत्री की तरह रहूँगी।
जो भी हो, वाल्मीकिरामायण में सीता-त्याग का अभाव नहीं कहा जा सकता। अतः उत्तरकाण्ड और
उसमें भी सीता-त्याग को प्रक्षेप कहना सर्वथा गलत है। सीतात्यागसम्बन्धी देश-विदेशों का विशाल साहित्य भी उसकी
प्रामाणिकता सिद्ध करता है। "नह्यमूलं प्ररोहति।" मूल के बिना अङ्कुरादि-प्ररोहण नहीं बन सकता।
अवास्तविक सीतात्याग
तुलसीकृत गीतावली में राम की आज्ञा के अनुसार लक्ष्मण सीता को वन में न छोड़कर महर्षि वाल्मीकि
के हाथों में सौंप देते हैं। दशरथ अपनी आयु पूर्ण होने के पहले स्वर्गवासी हुए थे। राम को उनकी शेष आयु मिली
थी, परन्तु सीता के साथ पिता की आयु भोगना अनुचित समझ कर राम ने अपनी आयु समाप्त होने पर सीता को
वन में भेज दिया था (गीताव० ७।२५)। अध्यात्मरामायण (७।२) के अनुसार भी सीतात्याग वास्तविक
नहीं है। देवताओं ने कहा यदि आप पहले वैकुण्ठ पहुँच जाओगी तो रघुनाथ आकर हम सबको सनाथ करेंगे।
राम ने कहा मैं लोकापवाद के बहाने तुम्हें त्याग दूंगा। वाल्मीकि के आश्रम में तुम्हारे दो पुत्र होंगे। बाद में तुम मेरे
पास आकर शपथकर पृथ्वी में प्रवेश कर वैकुण्ठ जाओगी। रसिक-सम्प्रदाय के लोग भी सीतात्याग को अवास्तविक
मानते हैं। आनन्दरामायण (५। सर्ग २, ३) के अनुसार सत्त्वमयी सीता राम के रूप में अदृश्य रहकर रजस्तमो-
मयी स्वकीय छाया बनाकर बाह्यरूप में दृश्य थी। उन्हीं का वाल्मीकि आश्रम में लोकापवाद के कारण निवास
हुआ था।
बुल्के उपसंहार में सीतात्याग एवं उसके विकास, त्याग के कारणों का क्रमिक विकास मानते हैं। अन्त
में छायामयी सीतामात्र के परित्याग को विकास की परिणति मानते हैं, परन्तु उनकी यह कल्पना भी प्रमाण-
विरुद्ध ही है।
वाल्मीकिरामायण के अनुसार सीतात्याग एक व्यावहारिक घटना है। उसका दृष्ट कारण लोकापवाद है
एवं अदृष्ट कारण भृगु-शाप आदि हैं।
राम का सीता के प्रति पूर्ण अनुराग था। वह त्याग भी बहिरङ्ग ही था।
वस्तुस्थिति के अनुसार सीता और राम अभिन्न तत्त्व थे। आनन्दसुधासिन्धु राम थे एवं माधुर्यसारसर्वस्व
की अधिष्ठात्री महालक्ष्मी सीता थीं। गङ्गाजल से जैसे उसकी शीतलता, मधुरता और पवित्रता का पार्थक्य नहीं हो
सकता है वैसे ही राम से सीता का पार्थक्य नहीं हो सकता था, अतः सीता का लङ्कानिवास या वाल्मीकि के आश्रम
में निवास उनकी छाया का ही निवास समझना उचित है। कालक्रम से मूल ग्रन्थ वाल्मीकिरामायण के विपरीत
अनेक प्रकार की विकृतियाँ कल्पनामात्र हैं।
कुश-लव चरित
७३५ वें अनु० में बुल्के कहते हैं कि "प्राचीनतम रामकथाओं में कुश-लवसम्बन्धी सामग्री का नितान्त
अभाव था। वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड के अन्त में राम के दस हजार वर्ष के राज्यकाल का और उनके पुत्रों तथा
भाइयों के साथ बहुत से यज्ञ करने का उल्लेख किया गया है, किन्तु कुश और लव का संकेत नहीं है। महाभारत की
चारों रामकथाओं, हरिवंश, ब्रह्मपुराण तथा नृसिंहपुराण में कुश-लव का उल्लेख नहीं है।"
बुल्के का उक्त कथन भी सारशून्य तथा दुरभिसन्धिपूर्ण है। वर्तमान वाल्मीकिरामायण ही प्राचीनतम
राम-कथा है। उसमें कुश और लव की कथा वर्णित है ही। युद्धकाण्ड के अन्तिम अध्याय में श्लोक ९१ से लेकर १०८