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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

पृष्ठ 724, कुल 1049 में से

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पृष्ठ 724

तक में अभिषेकोत्तर रामकथा का वर्णन है। इतने संक्षेप में कुश-लव के जन्म आदि की कथा कैसे हो सकती है ?
वाल्मीकि की दृष्टि से उत्तरकाण्ड में सविस्तर कुश-लव की कथा का वर्णन करना ही था। इसके अतिरिक्त सभी पुराणों
की दृष्टि से राम के अनन्तर भी राम के उत्तराधिकारी अयोध्या के राजा हुए ही हैं। अतः ऐतिहासिक दृष्टि से भी
कुश और लव का होना सिद्ध है । वाल्मीकिरामायण युद्धकाण्ड में भी कुश-लव का वर्णन है ही।
“ईजे बहुविधैर्यज्ञैः ससुतभ्रातृबान्धवः ।” (वा० रा० ७।१२८।१९७)
यहाँ सुत शब्द कुश और लव का वाचक स्पष्ट है ।
बुल्के भी यह मानते ही हैं कि 'पुत्रों तथा भाइयों के साथ राम ने यज्ञ किये थे ।' जब पुत्र थे तो उनके
कुछ नाम भी होंगे ही। यदि कुश-लव उनके नाम नहीं तो क्या नाम थे ? उपस्थित को छोड़कर अनुपस्थित की
कल्पना असङ्गत ही है। पद्मपुराण, रामाश्वमेध आदि में कुश-लव का वर्णन है। रघुवंश आदि में भी उनका वर्णन
है। हरिवंश आदि में लाघव की दृष्टि से ही कुश-लव के चरित का अभाव है ।

राम का वैष्णव तेज में प्रवेश
बुल्के यह भी कहते हैं कि 'महाभारत के रामोपाख्यान को छोड़कर उक्त रचनाओं में राम की मृत्यु का
भी उल्लेख है।' परन्तु यह भी निरर्थक है। लौकिक दृष्टि से मृत्यु शब्द का व्यवहार किये जाने पर भी उत्तरकाण्ड-
रामायण के अनुसार सरयू का जलस्पर्शमात्र करके राम ने विष्णुरूप धारण कर लिया। सूर्य के समान दीप्यमान
राम गृह से निकले। राम के दक्षिण पार्श्व में पद्माश्री एवं वामभाग में महीदेवी उपस्थित हुईं। व्यवसाय शक्ति
उनके आगे एवं उसके सहकारी नाना प्रकार के बाण एवं धनुष तथा अन्य आयुध पुरुष-विग्रह धारण करके स्थित
थे। वेद तथा सर्वरक्षिणी गायत्री एवं तन्मूल ओंकार तथा वषट्कार मूर्तरूप में राम का अनुगमन कर रहे थे। वृद्ध,
बालक आदि सहित सान्तःपुर भरत, शत्रुघ्न, अग्निहोत्रादि सहित मन्त्री आदि सभी राम के अनुगामी हुए
(वा० रा० ७।१०९।५-१०) ।
ब्रह्मा ने "आगच्छ विष्णो" कहकर स्वागत किया और प्रार्थना की कि चाहे अपने वैष्णव तेज में अथवा
सनातन निर्गुण ब्रह्मरूप में प्रवेश करें । आप महद्भूत ब्रह्म अजर अक्षय अचिन्त्य हैं । विशालाक्षी ज्ञानशक्ति माया को
छोड़कर आपको कोई नहीं जानते हैं—
“त्वं हि लोकगतिर्देव ! न त्वां केचिद्विजानते ॥
ऋते मायां विशालाक्षीं तब पूर्णपरिग्रहाम् । (वा० रा० ७।११०।१०,११)
पितामह की प्रार्थना सुनकर सशरीर सहानुज राम अपने वैष्णव तेज में प्रविष्ट हो गये। अर्थात् शरीर
त्यागे बिना विष्णुरूप में प्रकट हुए। उन विष्णुरूपापन्न राम का साध्य, मरुद्गण, इन्द्र, अग्नि सहित सभी देवताओं ने
एवं ऋषिगण, गन्धर्व, अप्सरा, सुपर्ण, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव और राक्षसों ने पूजन किया—
“विवेश वैष्णवं तेजः सशरीरः सहानुजः ॥
ततो विष्णुमयं देवं पूजयन्ति स्म देवताः ।” (वा० रा० ७।११०।१२,१३)
तिलक टीका के अनुसार यज्ञज्वाला के तुल्य राम उपेन्द्र (विष्णु) के तेज में प्रविष्ट हुए । एतावता भगवान्
का मनुष्यादि देहरूप से गृहीत स्वरूप दिव्य तेजोरूप हो है । तेज में प्रवेश करने से जल में जल के समान सब तेजोमय
ही हो गये। एतावता भरतादि का भी सशरीर ही प्रवेश सिद्ध है ।
वस्तुतः ईसाई बुल्के ईसाइयत की दृष्टि से ही अपनी दुष्कल्पनाओं द्वारा रामायण को दूषित करने, राम
को साधारण मनुष्य एवं उनकी मृत्यु सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। जहाँ-जहाँ राम को विष्णु या ब्रह्मरूप कहा