रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ] उत्तरकाण्ड [ ६४५
बुल्के इस अंश को भी प्रक्षेप कहते हैं। उसके हेतुरूप में वे कहते हैं "वाल्मीकिरामायण गौड़ीय तथा
पश्चिमोत्तरीय पाठ में यह नहीं मिलता। भृगुपत्नी-वध का उल्लेख वैदिक साहित्य, महाभारत तथा रामायण में नहीं
मिलता। पौराणिक साहित्य में भृगुशाप विष्णु के अवतार धारण का कारण कहा गया है।" किन्तु उनका यह कहना
निःसार है, क्योंकि दाक्षिणात्य पाठ का भी प्रामाण्य अव्याहत ही है। रामायण, पुराण आदि वेद के ही उपबृंहण हैं।
अतः रामायण तथा पुराण के आधार पर ही जानना चाहिये कि किसी लुप्त वैदिकशाखा में उसका उल्लेख होगा।
वेद, पुराण, इतिहास, तन्त्र, आगम कहीं भी जो अंश मिलता है उन सबका समन्वित अर्थ ही वेदार्थ होता है।
वाल्मीकिरामायण के उदीच्य, गौड़ीय तथा पश्चिमोत्तरीय पाठों में तारा का शाप सीता-त्याग का परोक्ष
कारण माना गया है। बालिवध के बाद तारा ने राम से कहा था कि मेरे शाप के कारण तुमको सीता की सङ्गति
कम समय तक प्राप्त हो सकेगी—
“अचिरेण तु कालेन त्वया बाणैरुपार्जिता।
न सीता मम शापेन चिरं त्वयि भविष्यति ॥
आत्मनः शौचमाधाय पतिव्रतगुणा सती।
याच्यमाना त्वया सीता पुनर्यास्यति भूतले॥”
तारा ने कहा था कि बाणों द्वारा विजित सीता अधिक काल तक तुम्हारे पास नहीं रहेगी। अपने पवित्रता
और पातिव्रत्य के गुण से युक्त वह तुम्हारे प्रार्थना करने पर भी भूतल में प्रवेश करेगी। वाल्मीकिरामायण गौड़ीय
तथा पश्चिमोत्तरीय पाठ, माधवकन्दली, कृत्तिवासरामायण, बलरामदासरामायण, भावार्थरामायण आदि में भी
ताराशाप का उल्लेख है। वस्तुतः अनेक कारणों से भी एक कार्य सम्पन्न होता है। अतः भृगुशाप तथा ताराशाप दोनों
ही के सीता-त्याग के परोक्ष कारण होने में कोई विरोध नहीं है।
पद्मपुराण (पातालखण्ड अध्याय ५७) के अनुसार किसी दिन अविवाहिता सीता अपने उद्यान में शुकों
के एक जोड़े से रामकथा सुनती हैं। इस कथा को विस्तार से सुनने के लिए वे इन पक्षियों को पकड़वा लेती हैं। वे
दोनों वाल्मीकि के आश्रम में सीखे हुए रामायण का गान करते हैं। कथा समाप्त होने पर सीता अपना परिचय देकर
उनसे कहती है कि जब तक राम मुझे नहीं ले जाते, मैं तुम दोनों को यहाँ बन्द रखूँगी। पक्षी विनय करते हैं,
विशेषतः इसलिए कि शुकी गर्भवती थी। सीता केवल नरपक्षी (नर) को छोड़ देती है। शुकी यह शाप देकर
पिंजड़े में मर जाती है—
“यथा त्वं पतिना सार्धं वियोजयसि मामितः।
तथा त्वमपि रामेण विमुक्ता भव गर्भिणी॥
अपनी मादा की मृत्यु जानकर शुक ने भी संकल्प किया कि मैं अयोध्या में जन्म लेकर सीता के राम-वियोग
का कारण बन जाऊँगा। वही गङ्गा में डूबकर रजक के रूप में अयोध्या में प्रकट हुआ। उसने राम की निन्दा की,
जिससे राम ने सीता का त्याग किया।
पउमचरियं (पर्व १०३) के अनुसार सीता ने पूर्वजन्म में सुदर्शन मुनि की निन्दा की थी। इसी लिए
लोकापवाद की लक्ष्य बनीं। भावार्थरामायण (७।४८) के अनुसार सीता सोचती हैं कि मैंने वन में लक्ष्मण पर
अधिक्षेप किया था; उसी का मुझे यह फल मिला है। इन सभी कारणों का योग भी सीता के वनवासदुःख का कारण
हो सकता है। तत्त्वसंग्रहरामायण के अनुसार वाल्मीकि क्षीरसागर पर तपस्या करने गये थे। सागर की लहरों
से उन्हें कष्ट हुआ। उन्होंने सोचा कि क्षीर-सागर लक्ष्मी का जन्मदाता होने के कारण अभिमानी हो गया है, अतः