रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)
Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 469, कुल 1049 में से
संदर्भ में पढ़ें३९२ रामायणमीमांसा त्रयोदश
स्कन्दपुराण में तीर्थयात्रा तथा शिवलिङ्ग-स्थापना का महत्त्व वर्णन करने में भी अहल्या की कथा का
उपयोग किया गया है। अतः "यत्परःशब्दः स शब्दार्थ" (शब्दों का जिसमें तात्पर्य होता है वही शब्दार्थ होता है)
के अनुसार अर्थवादरूप होने के कारण इस कथा का तीर्थ एवं शिवलिङ्ग-माहात्म्य के वर्णन में ही तात्पर्य है,
वाल्मीकिरामायण प्रोक्त कथा के विरोध में तात्पर्य नहीं है।
ब्रह्मपुराण के 'शुष्कनदी भव' के अनुसार अहल्या शुष्क नदी हो गयी थी। आनन्दरामायण के अनुसार
वह जनस्थान में नदी के रूप में प्रकट हुई थी। इस कथा को कल्पान्तरीय समझना चाहिये। पद्मपुराण (सृष्टिखण्ड
५।१३३) के अनुसार अहल्या का शरीर शुष्क होकर अस्थिचर्ममात्र रह गया था। योगवासिष्ठ के काल्पनिक इन्द्र
और अहल्या जिस आधार पर कल्पित है उसकी कथाओं में पूर्व कथा से कोई विशेष अन्तर नहीं है।
रामकेर्ति के अनुसार अञ्जना और वाली तथा सुग्रीव तीनों ही अहल्या की सन्तति हैं। यद्यपि रामकेर्ति का
मुख्य स्रोत वाल्मीकिरामायण ही है तथापि अनेक देशों तथा क्षेत्रों से होकर पहुँचने के कारण उसमें कई अंशों में
विकृति आ गयी है। अखण्ड-ब्रह्मचर्यनिष्ठ हनुमान् उसके अनुसार बड़े रसिक और अनेक स्त्रियों से संपर्क करनेवाले
बताये गये हैं। सुग्रीव, वाली और अञ्जना हनुमान् आदि वाल्मीकिरामायण में वानररूप ही वर्णित हैं। अति सुन्दरी
अहल्या में इन्द्र तथा सूर्य से वानरस्वरूप वाली और सुग्रीव की उत्पत्ति यद्यपि असंगत सी प्रतीत होती है फिर
भी रावणादि के वधार्थ देवताओं के संकल्पविशेष से वानररूप में उनका प्रकट होना संभव हो सकता है।
महाभारत की अहल्या का राम के साथ सम्बन्ध नहीं प्रतीत होता है। इससे भी यही प्रतीत होता है कि
भारत की कथा कल्पान्तरीय कथा है। महाभारत की अपेक्षा रामायण अति प्राचीन है, अतः वाल्मीकिरामायण
द्वारा वर्णित राम द्वारा अहल्योद्धार की कथा में विष्णु के अवतार राम के दर्शनमात्र से उसके पवित्र होने की बात भी
ठीक ही है।
अहल्या की स्थिति
वाल्मीकिरामायण बालकाण्ड के अनुसार गौतम ने कहा था—तुम इसी आश्रम में अनेक सहस्र वर्षों तक
वातभक्षा तथा निराहारा तप करती हुई भस्मशायिनी तथा सब भूतों से अदृश होकर रहोगी·········राम का आतिथ्य
कर फिर अपना पूर्वरूप धारण करोगी—
“स्वं वपुर्धारयिष्यसि” (वा० रा० १।४८।३२)।
बुल्के कहते हैं “इसी वाक्यांश के अनुसार अहल्या के शिला बन जाने की धारणा बन गयी” पर वह
संगत नहीं है, क्योंकि “स्वं वपुः” का तो यह भी अर्थ हो ही सकता है—रूपध्वंस के पूर्व का रूप—अर्थात् वैरूप्य-
रहित अत्यन्त सुन्दर अहल्यारूप प्राप्त करोगी, किन्तु शिला बनने की धारणा नहीं; प्रामाणिकता नृसिंहपुराण
(अध्याय ४७), स्कन्दपुराण (रेवाखण्ड अध्याय १३६; नागरखण्ड अध्याय २०८) आदि आर्ष प्रमाणों पर निर्भर
है। काव्य ग्रन्थों की यह परम्परा है कि किसी इतिहास-पुराणप्रसिद्ध अर्थ के आधार पर ही काव्य-निमिति होती है।
अतः रघुवंश में कालिदास ने इन पुराणों के आधार पर ही अहल्या के शिला बनने का उल्लेख किया है।
“तेन् नीतो विनीतात्मा अहल्या यत्र तिष्ठति ।
व्यभिचारान्महेन्द्रेण भर्त्रा शप्ता हि सा पुरा ॥
पाषाणभूता राजेन्द्र तस्य रामस्य दर्शनात् ।
अहल्या मुक्तशापा च जगाम गौतमं प्रति ॥” (अग्निपु० अ० ४७)।
विनीतात्मा राम विश्वामित्र द्वारा वहाँ ले जाये गये जहाँ महेन्द्र से व्यभिचार के कारण शापवशात् गौतम-