सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 269 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 212

( २०६ ) रामचंद्रिका-सटीक ।

शरथकोसुखदायक ॥ सोदरसहितपितापदपावन । वंदनकि-
यतबहींमनभावन ॥ २५ ॥
टी०--विराटरूप सो जग तुम्हीं हौ और यह जग तुम्हींमें बसतह्रै “यथा कवि-
प्रियायां, शेष धरे धरणी धरणी विधि केशव जीव रचे जग जेते । चौदह लोक
समेत तिन्हें हरिके प्रति रोमनमें चितये ते”॥ ताको कहे ताके वधको ॥२०॥ धर
कहे पर्वत अर्थ समुद्र मथन--समय मंदराचलको कच्छरूप है पृष्ठमें धारण कियो
॥ २१ ॥ २२ ॥ २३ ॥ अनेक और स्वरूप व्यासादि जानो ॥ २४ ॥ २५ ॥
मू०-दशरथ-निशिपालिकाछंद ॥ रामसुतधर्म्मयुतसीयम-
नमानिये । बन्धुजनमातृगनप्रानसमजानिये॥ ईशसुरईशज-
गदीशसमदेखिये । रामकहँलक्ष्मणविशेषप्रभुलेखिये ॥२६॥
रामचन्द्र-चञ्चलाछन्द ॥ जूझिजूझिकैगयेबानरालिऋक्ष-
राजि । कुम्भकरणलोकहरणभक्षियोजेगाजिगाजि ॥ रूपरे-
खस्योविशेषिजीउठैंकरौसोआज । आनिपाँइलागियोतिन्हेंस-
मेतदेवराज ॥ २७ ॥ दोहा॥ बानरराक्षसऋक्षसब, मित्रकल-
त्रसमेत ॥ पुष्पकचढ़िरघुनाथजू, चलेअवधिकेहेत ॥ २८ ॥
टी०-हे राम ! सुत ! सीताको धर्म्मयुत मनमें मानों अर्थ सीता निर्दोष हैं
जो संदेह करो कि हम ग्रहण करें हमारे बंधु आदि गृहजन कैसे ग्रहण करिहैं तौ
बंधुजन भरतादि औ मातृगण कौशल्यादिकनकी सम जानों जैसे कोऊ प्राणनका
त्याग आपुसों नहीं करत तैसे सीताको त्याग वे ना करिहैं या प्रकार रामचन्द्रको
शिक्षा दै लक्ष्मणसों कहत हैं कि हे लक्ष्मण ! रामचन्द्रको ईश ( महादेव ) सुर-
ईश ( विष्णु ) जगदीश ( ब्रह्मा ) के सम देखौ कहे जानों इनको विशेषिकै प्रभु
स्वामी लेखौ अर्थ स्वामी सम इनकी सेवा करौ बंधुसम न जानों इति भावार्थः
॥ २६ ॥ रूप ( स्वरूप ) रेख ( चिह्न ) तिनसों स्यो कहे सहित जो उठें सो
उपाय करौ या प्रकार रामचन्द्र देवराज जे इंद्र हैं तिनसों कह्यो सो रामचन्द्रकी
आज्ञासों संजीवनी आदि उपायसों सबको जियाइकै रामचन्द्रके आइ पाँई लगे
॥ २७ ॥ भरतकी प्रतिज्ञा है कि जो चौदह वर्षमें रामचन्द्र ना ऐहैं तौ हम नहीं जी
हैं ता अवधि कहे मर्यादाके लिये पुष्पकमें चढि अतिशीघ्र अथवा अवधि चले
( अयोध्या ) ॥ २८ ॥