रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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कतेरूपअनेकबनाये ॥ एकहैजोरजोगुणरूपतिहारो। त्यहिंसृ-
ष्टिरचीविधिनामबिहारो ॥१८॥ गुणसत्त्वधरेतुमरक्षतजाको ।
अबविष्णुकहैंसिगरेजगताको ॥ तुमहींजगरुद्रस्वरूपसँहारो ।
कहियेतिनमध्यतमोगुणभारो ॥ १९॥
टी०-अन्तर्यामी कहे सबके अन्तरमें व्याप्त रहतहौ अभिरामी कहे रमता अर्थ
चौदहौं लोकमें रमत हौ या जगके एकै प्राणी ( वेदांती ) तुमको निर्गुण कहे
रक्ष, रज सत्त्व तमोगुण तीनों करिके रहित ज्योतिरूप जानत हैं औ एकै
सदा रज सत्त्व तमोगुण युक्त ब्रह्मादिरूप बखानत हैं ॥ १६ ॥ यामें निर्गुण
रूप कहतहौं कहो नहिं जाइ इत्यादिसों या जनायो जहां इन्द्रिनको गमन नहीं
॥ १७ ॥ अब सगुण कहत हैं सत्त्वादि तीनों गुणरूप तुमही हौ औ गुण ब्रह्मा-
दिरूपतुमहीं हौ रजोगुणरूप कहे रजोगुणयुक्त रूप ॥ १८ ॥ जाको कहे जा
सृष्टिको ॥ १९ ॥
मू०-तुमहींजगहौजगहैतुमहींमें । तुमहींबिरचीमर्याददु-
नीमें ॥ मर्यादहिछोड़तजानतजाको । तबहींअवतारधरोतुम
ताको॥ २० ॥तुमहींधरकच्छपवेषधरेजू । तुममीनहैवेदनको
उधरेजू ॥ तुमहींजगयज्ञबराहभयेजू । क्षितिछीनिलईहिरण्या-
क्षहयेजू ॥ २१ ॥ तुमहीनँरसिंहकोरूपसँवारचो । प्रहलादको
दीरघदुःखबिदारचो ॥ तुमहींबलिबावनवेषछल्योजू। भृगुनंद-
नह्वैक्षितिछत्रदल्योजू ॥ २२ ॥ तुमहीयहरावणदुष्टसँहारचो ।
धरणीमहँबूडतधर्म्मउबारचो । तुमहींपुनिकृष्णकोरूपधरौगे ।
हतिदुष्टनकोभुवभारहरौगे ॥ २३॥ तुमबौद्धस्वरूपदयाहि
धरौगे । पुनिकल्किहैम्लेच्छसमूहहरौगे ॥ यहिभाँतिअनेक
स्वरूपतिहारे । अपनीमर्यादकेकार्य्यसँवारे॥ २४ ॥महादेव-
पङ्कजबाटिकाछन्द ॥ श्रीरघुवरतुमहौजगनायक । देखहुद-