रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविंशप्रकाशः २०. (२०३)
ब्राह्मण मंगलपाठ पढ़त हैं तैसे सीताजूको रामचन्द्रके पास गमनमें देव वदत
भये अथवा द्विज औ देवन औ बंदीजन शुभगीता पढ़त भये औ जो अग्निके
अंकमें बैठिकै सीताआई सो लोकके देखाइवेको तौ शुद्धताकी साक्षि दियो औ
जो सीताको देह कनककुरंगके आगमनमें रामचन्द्र अग्निको सौंप्यौ रहै ता देहकी
थातीसम रामचन्द्रके दीवेको अग्नि ल्याये हैं सो जानौ ॥ ५ ॥ ६ ॥
मू०-महादेवकेनेत्रकीपुत्रिकासी । किसंग्रामकीभूमिमेंचं-
डिकासी ॥ मनोरत्नसिंहासनस्थाशचीहै । किधौंरागिनीराग-
पूरेरचीहै ॥ ७॥ गिरापूरमेंहेपयोदेवतासी । किधौंकंजकीमंजु
शोभाप्रकाशी ॥ किधौंपद्महीमेंसिफाकंदसोहै । किधौंपद्मके-
कोषपद्माविमोहै ॥ ८॥ किसिन्दूरशैलाग्रमेंसिद्धकन्या । कि-
धौंपद्मिनीसूरसंयुक्तधन्या ॥ सरोचासनाहैमनोचारुबानी ।
जपापुष्पकेबीचबैठीभवानी ॥ ९ ॥ मनोऔषधीवृन्दमेंरोहि-
णीसी । किदिग्दाहमेंदेखियेयोगिनीसी ॥ धरापुत्रज्योंस्वर्ण
मालाप्रकाशै ॥ मनौंज्योतिसीतच्छकाभोगभासै ॥ १० ॥ सुरे-
न्द्रबज्राछंद ॥ आसावरीप्राणिकुंभशोभै अशोकलग्राबनदेव
तासी॥ पालाशमालाकुसुमालिमध्येवसन्तलक्ष्मीशुभलक्षणा-
सी ॥ आरक्तपत्राशुभचित्रपुत्रीमनोबिराजैअतिचारुवेषा॥ सं-
पूर्णसिन्दूरप्रभावसैकैधौंगणेशभालस्थलचंद्ररेखा ॥ ११ ॥
टी०-जहां केवल रत्नपद पाये तहां अरुणही रत्नको बोध होत है यह कवि
नियम है रागदीपकादि अथवा अनुराग प्रेम इति ॥ ७ ॥ गिरा सरस्वतीके पूर
कहे जलसमूहमेंकी पयो देवता कहे जल देवता है औ कि गिरापूर में कंजकी
शोभा है अर्थ कि कमल है सरस्वतीको जल अरुण प्रसिद्ध है ॥ “पूरो जलसमूहे
स्यादिति मेदिनी” ॥ ८ ॥ सूर जे सूर्य हैं तिनसों संयुक्त मिली पद्मिनी
कमलिनी है सूरसम अग्नि है कमलिनी सम सीता हैं इहां अरुण सरोज जानौ ॥
॥ ९ ॥ चन्द्रमा औषधीश है औ रोहिणी चंद्रमाकी स्त्री है ता संबंधसों जानौं
औषधिनको अग्निसम ज्वलन प्रसिद्ध है धरापुत्र मंगलके जैसे स्वर्णमाला प्रकाशै
कहे शोभै, धरापुत्र सम अग्नि हैं स्वर्णमाला सम सीता हैं भोगिफण तक्षकको