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सर्वकोश
राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

पृष्ठ 168, कुल 307 में से

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पृष्ठ 168

पातंजल-योगसूत्र १५१

योगीगण ईश्वर सम्बन्धी सृष्टि-कर्तृत्व आदि विविध भावो की कोई बात नही उठाते। योगियो के ईश्वर से जगत् के सृष्टि-कर्ता ईश्वर का बोध नही होता। वेद के मतानुसार ईश्वर जगत्-स्रष्टा है। वेद का अभिप्राय यह है कि जगत् में जब सामंजस्य देखा जाता है, तो जगत् अवश्य एक इच्छा-शक्ति का ही प्रकाश होगा।

योगीगण ईश्वर का अस्तित्व स्थापित करने के लिए एक नए प्रकार की युक्ति काम मे लाते हैं। वे कहते हैं —

तत्र निरतिशयं सर्वज्ञत्वबीजम् ॥२५॥

सूत्रार्थ—औरो में जिस सर्वज्ञत्व का बीज मात्र रहता है, वही उनमें निरतिशय अर्थात् अनन्त भाव धारण करता है।

व्याख्या—मन को सदैव अति वृहत् और अति क्षुद्र, इन दो चरम भावो के भीतर ही घूमना पड़ता है। तुम एक ससीम देश की बात भले ही सोचो, पर वही भावना तुम्हारे भीतर असीम देश का भाव भी जगा देगी। यदि आँखे बन्द करके तुम एक छोटेसे देश के बारे मे सोचो, तो देखोगे, उस छोटेसे देशरूप वृत्त के साथ ही उसके चारो ओर अमर्यादित विस्तारवाला एक दूसरा वृत्त भी है। काल के बारे मे भी ठीक यही बात है। मान लो, तुम एक सेकण्ड समय के बारे मे सोच रहे हो। तो उसके साथ-ही-साथ तुमको अनन्त काल की भी बात सोचनी पड़ेगी। ज्ञान के बारे मे भी ठीक ऐसा ही समझना चाहिए। मनुष्य मे ज्ञान का केवल बीज-भाव है; पर इस क्षुद्र ज्ञान की बात मन मे लाने के साथ ही अनन्त ज्ञान के बारे मे भी सोचना पड़ेगा। इस प्रकार, हमारे मन की गठन से ही यह बिलकुल स्पष्ट है कि एक अनन्त ज्ञान है। इस अनन्त ज्ञान को ही योगीगण ईश्वर कहते हैं।