राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४० राजतरंगिणी
चतुर्दशेऽहनि कर्तव्यं विशाखानां च पूजनम् ।
पञ्चदशेऽहनि कर्तव्यं स्थाननागस्य पूजनम् । ४।१ = १०२०, १०२१
भारत-बर्मा की सीमा पर नागवासुकी मठ था । उस मठमें नाग वासुकी की मूर्ति थी । उनका
शरीर मनुष्य किन्तु मुख फणाकार भयंकर सर्प का था । उसके सम्मुख नरों की बलि दी जाती थी ।
दक्षिण पूर्व एशिया के इतिहास में नाग जाति का मुख्य स्थान है। कश्मीर के समान आर्यों के प्रवेश
के पूर्व वहाँ नाग जाति रहती थी । कम्बुज अर्थात् कम्बोडिया के विषय में चीनी गाथा है—लगभग दो
सहस्र वर्ष पूर्व कम्बुज निवासी नंगे रहते थे । शरीर पर गुदना गुदवाते थे । नौकरों तथा सम्बन्धियों को
मार कर मृतक शव के साथ कब्रमें गाड देते थे । स्त्री एव पुरुषों में लज्जा का अभाव था । उन का जीवन
अरण्यवासी था । वहाँ धर्म एवं मानवीय विचार उत्पन्न नहीं हुए थे ।
कौण्डिन्य भारतवासी थे । सोम वंशी ब्राह्मण थे । वे जहाज द्वारा कम्बुज उत्तर आये । यहाँ की
रानी का नाम सोमा था । वह नाग कन्या थी । चम्बा चम्पा अर्थात् वीतनाम के आलेख में उसका नाम
नागिन दिया गया है ।
कौण्डिन्य का जहाज लूटने सोमा आयी । संघर्ष में सोमा ने आत्म समर्पण कर दिया । कौण्डिन्य की
विजय हुई । राजकन्या सोमा के साथ कौण्डिन्य ने विवाह कर लिया । उन्होंने राज्य स्थापित किया । भारतीय
संस्कृति तथा सभ्यता फैलायी । उनके नाम पर देश का नाम कम्बुज पड़ा । भवपुर में अपनी राजधानी
स्थापित की । जनता को वस्त्र पहनना सिखाया । अक्षर ज्ञान कराया । उसके वंशजों ने २ शताब्दी तक
राज्य किया । उस वंश का अन्तिम राजा वनपण था ।
एक दूसरी गाथा है । इन्द्रप्रस्थ के राजा आदित्य थे। अपने एक पुत्र से अप्रसन्न हो गये । उसे राज्य
से निर्वासित कर दिया । वह कम्बुज आया । कम्बुज में उस समय चम्पा का एक राजा राज्य करता था ।
राजा को उसने मार भगाया । एक दिन समुद्र तट पर 'नामो' अर्थात् एक नाग कन्या से भेंट हुई । दोनों में
अनुराग हो गया । नागी का पिता नाग राजा था । उसका नागी से विवाह हो गया । उसने अपने राज्य की
राजधानी इन्द्रप्रस्थपुर अर्थात् वर्तमान एंगकोर बनाया ।
तमिल काव्य में एक नगर नागपुरम् का वर्णन मिलता है । वह जावा में था । यहाँ के राजा
इन्द्रवंशीय भूमिवन्द्र तथा पुत्रराज थे ।
नागो गाथा कांची के पल्लवो में प्रचलित है। द्रोण के पुत्र अश्वस्थामा ने नामो कन्या से विवाह किया
था । उनकी सन्तानें स्कन्दशिष्य नाम से विख्यात हुईं । ये पल्लवो के पूर्वज थे । नवी शताब्दी के शिला-
लेख से प्रकट होता है । उत्तरी आरकट से इसका शिलालेख मिला है । उसके अनुसार विरूपाक्ष ने एक
नागी से विवाह किया था । उसमें उसे राजचिन्ह मिला । तत्पश्चात् स्कन्द शिव आए ।
नाग जाति के सम्बन्ध में एक कथा प्रचलित है। विश्व के आदि काल में केंग काग ( शेषनाग ) थे ।
एक पुरुष तथा स्त्री भी थे । भारतीय गाथा के अनुसार महाप्रलय के पश्चात् शेषशायी विष्णु तथा लक्ष्मी
शेष रह जाती है ।
उक्त पुरुष अम्बर का व्यापार करने के लिए पर्यटन आरम्भ किया। उसकी स्त्री का नाम 'री' था ।
बच्चा का नाम 'एल' था । एकदिन 'री' जंगल में लकड़ी काटने गयी । उसकी कुल्हाड़ी अकस्मात् नाग पर