राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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मत्स्य तथा नरसिंह दोनों अवतार माने गये हैं। उन्हें मान्यता दी गयी है। नाग भगवान् का रूप नहीं हो
सकता। उसे भगवान् की शय्या अर्थात् शेषशय्या कहा गया है। नाग को आर्य देवता विष्णु से निम्न स्थान
अर्थात् उनकी शय्या के रूप में चित्रित किया गया है। कालान्तर में इस विषय पर विवाद चला होगा।
अतएव मध्य का मार्ग निकालकर नाग तथा मनुष्य दोनों के मिश्रित रूप की कल्पना नरसिंह तथा मत्स्याव-
तारों की तरह की गयी। अनन्त नाग को मनुष्य तथा नाग का मिश्रित आकार देकर उन्हें भगवान् का रूप
दे दिया गया। उनका अधोभाग नाग और ऊर्ध्वभाग मनुष्य का बनाया गया।
सिन्धु सभ्यता काल में नाग पूजा प्रचलित थी। मोहेंजोदारो की सील से प्रगट होता है कि फणधर
नाग के पृष्ठ भाग में दो उपासक खड़े हैं। उनसे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सिन्धु-सभ्यता काल
में नागों का तथा उनकी पूजा का महत्त्व था। हरप्पा में प्राप्य संग्रह में नाग के सम्मुख बैठ कर पूजा
करते लोगों की आकृतियाँ मिली हैं। भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में नाग पूजा अत्यन्त प्रचलित थी।
ईरान, एशिया माइनर, मिश्र, अबीसीनिया, यूनान, इटली, उत्तरो पश्चिमी यूरोप, मेक्सिको, पेरू, संयुक्त राष्ट्र
अमेरिका, चीन, जापान तथा श्री लंका में नाग पूजा प्रचलित थी। अत्यन्त प्राचीन लुप्त जाति कोनोशिया
तथा मिश्र का नाग दैवी प्रतीक था।
पेरू तथा मेक्सिको के प्राचीन मन्दिरों पर नाग मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। उत्तरी अमेरिका के आदम
कन्ट्री तथा ओहियो में १००० लम्बी मिट्टी की बनी नाग मूर्ति मिली है। केल्ट जाति में नाग सम्बन्धित
अनेक गाथायें प्रचलित हैं। चीन में नाग पूजा के लिए मन्दिरों का निर्माण किया गया है। जापान में नाग
का रूप भगवान् की आत्मा का द्योतक माना जाता रहा है।
बाइबिल वर्णित सिनाई एपिदोरस तथा जरमेशिया लोगों के कुटियो में नाग स्वास्थ्य तथा सौभाग्य
का प्रतीक माना जाता था।
अरब, यूनान, रोम, यहूदी, अमेरिका, रेड इण्डियन, चोगा तथा एनिप्रेस जाति में सर्पदंश के स्थान
पर नाग को मार कर उसकी मज्जा तथा मांस लगाया जाता था। उसका मांस भी खिलाया जाता था।
विश्वास था कि सर्पदंश से व्यथित व्यक्ति इस प्रकार आरोग्य प्राप्त करता था।
सीरिया (अमरदेश) तथा मिश्र में नाग Wisdom गुण का देवता माना जाता था। फरोहा के
शरीर पर नाग तथा गरुड़ दोनों की देवतुल्य मूर्तियाँ मिलती हैं। हेब्रो अथवा चाल्डियन जाति की गाथाओं
में नाग के सम्बन्ध की अनेक गाथाएं मिलती हैं। नाग को सूर्य का वंशज मानते थे। उसके फण को अपने
गोत्र का चिह्न मानते थे।
कृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलराम जी के विषय में कथा है कि उनमें नाग रक्त का अंश था। महाभारत
की कथा के अनुसार वासुकी नाग ने अपने बहिन का विवाह जरत्कारु ऋषि से किया था। विरूपाक्ष गण
नाग कहे गये हैं। नहुष देवता के शाप से नाग हो गये थे। अर्थात् उन्हें जाति च्युत कर दिया गया था।
बात यहीं तक नहीं समाप्त होती। मैं लिख चुका हूँ कि मथुरा अर्थात् ब्रज मण्डल के समीप नाग
जाति का प्रभुत्व था। इस जाति की आबादी थी। भगवान् श्री कृष्ण को भी भारतीय विद्वानों का एक
प्रवल मत नाग वंशीय कहता है। कालिय नाग के मारने की गाथा इससे सम्बन्धित की जा सकती है
कालिय नाग जो वास्तव में नागवंशीय जाति का शक्तिशाली व्यक्ति था। कृष्ण की स्पर्धा करता था। कृष्ण ने
उसे मारकर यमुना उपत्यका को कालिय नाग के अत्याचार से मुक्त किया था। यह कथा पुराणों में तोड़-